(अगली पीढी की भविष्यवाणी: स्वर्ण- विधि)
विवाह के पश्चात, जब पक्षीलोक में शांति स्थिर हो चुकी थी, तब रानी रत्नावली अधिराज और एकांक्षी को
काल- स्तंभ के समीप ले गईं—
वह स्थान जहां भविष्य स्वयं अपना स्वर प्रकट करता था.
काल- स्तंभ सदियों से मौन था.
पर उस दिन.
वह जाग उठा.
जैसे ही एकांक्षी ने उस पर हाथ रखा,
जिवंत मणि की शेष चेतना स्पंदित हुई.
आकाश गहराया,
और समय की परतें खुलने लगीं.
एक दिव्य स्वर गूंजा—
सुनो, पक्षीलोक के राजाओं.
अब जो जन्म लेगा,
वह केवल वारिस नहीं होगा—
वह निर्णायक होगा।
भविष्यवाणी प्रकट हुई—
अधिराज और एकांक्षी की संतान
तीन लोकों का रक्त वहन करेगी—
पक्षीलोक की चेतना,
मानव लोक का हृदय,
और जिवंत मणि का संतुलन।
आकाश में तीन प्रतीक उभरे—
स्वर्ण पंख –
जो उसे आकाश से जोडे रखेंगे.
उपचार चिह्न –
जो वैदेही की विरासत होगी.
खंडित मणि –
जिसमें सृजन और विनाश दोनों समाहित होंगे.
दिव्य स्वर आगे बोला—
उस संतान का जन्म
शांति के युग में होगा,
पर उसका भाग्य
तूफानों में लिखा होगा।
अधिराज ने आगे बढकर पूछा—“ क्या वह विनाश लाएगा?
काल- स्तंभ का उत्तर आया—
नहीं.
वह निर्णय लाएगा।
फिर एक और दृश्य उभरा—
एक युवा,
जिसकी आंखों में आकाश की गहराई थी,
और हथेलियों में प्रकाश नहीं—
चयन था.
जब तीन द्वार खुलेंगे—
नागलोक, पक्षीलोक और मानव लोक—
तब वही संतान तय करेगी
कि लोक जुडे रहेंगे
या सदा के लिए अलग हो जाएंगे।
एकांक्षी का स्वर कांप उठा—“ क्या उसे भी युद्ध करना होगा.
काल- स्तंभ मौन रहा.
फिर धीरे से बोला—
युद्ध बाहरी नहीं होगा,
सबसे बडा युद्ध
उसके भीतर होगा।
अंतिम पंक्तियां स्वर्ण अक्षरों में उभरीं—
जब प्रेम और कर्तव्य टकराएंगे,
तभी अगली पीढी का सत्य जन्म लेगा.
और उसी क्षण तय होगा—
क्या देवता बने रहेंगे,
या मनुष्य बनेंगे।
काल- स्तंभ शांत हो गया.
रानी रत्नावली ने गंभीर स्वर में कहा—“ यह भविष्यवाणी शाप नहीं है.
यह अवसर है।
अधिराज ने एकांक्षी का हाथ थाम लिया. जो भी जन्म लेगा,
वह अकेला नहीं होगा।
एकांक्षी ने मुस्कराकर कहा—“ क्योंकि इस बार.
इतिहास प्रेम से लिखा जाएगा।
पक्षीलोक की सुबह आज कुछ अलग थी.
आकाश सामान्य से अधिक उजला था, हवाओं में हल्की सी मिठास थी, और महल के ऊँचे शिखरों पर बैठे पक्षी बिना कारण ही मधुर स्वर में गा रहे थे.
रानी एकांक्षी महल की बालकनी में खडी थीं.
उनकी हथेलियाँ अनायास ही अपने उदर पर जा टिकीं.
दिल की धडकनें आज कुछ तेज थीं.
जैसे भीतर कोई नई हलचल जन्म ले रही हो.
अधिराज.
उनके होंठों से अनजाने में ही नाम फिसल गया.
अधिराज, जो कुछ ही दूरी पर अपने पंखों को समेटे खडे थे, उनकी आवाज सुनकर तुरंत उनकी ओर बढे.
क्या हुआ एकांक्षी?
उनकी आवाज में वही पुराना अपनापन था, वही सुरक्षा.
एकांक्षी कुछ क्षण चुप रहीं.
फिर धीरे से बोलीं—
मुझे नहीं पता ये क्या है.
पर आज सुबह से मेरे भीतर एक अलग ही ऊर्जा है.
जैसे. कोई मुझे पुकार रहा हो।
अधिराज ने उनकी आँखों में देखा.
वही आँखें, जिनके लिए उसने युद्ध लडे थे, जिनके लिए उसने लोकों को चुनौती दी थी.
क्या तुम्हें कोई पीडा है?
उन्होंने चिंतित होकर पूछा.
एकांक्षी हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाती हैं—
नहीं. पीडा नहीं.
बल्कि. शांति।
उसी समय महल के द्वार पर हलचल होती है.
राजवैद्य और देवी सावित्री, दोनों एक साथ अंदर आते हैं.
राजवैद्य का चेहरा असामान्य रूप से गंभीर था,
पर आँखों में चमक छिपी नहीं थी.
रानी रत्नावली भी अपने कक्ष से बाहर आ चुकी थीं.
क्या बात है?
रत्नावली ने पूछा.
राजवैद्य एकांक्षी के सामने झुकते हैं और कहते हैं—
महारानी.
पक्षीलोक को उत्तराधिकारी मिलने वाला है।
क्षण भर के लिए समय थम सा गया.
एकांक्षी की आँखें फैल जाती हैं.
अधिराज की साँस रुक जाती है.
क्या.
अधिराज के मुख से शब्द मुश्किल से निकलते हैं.
राजवैद्य मुस्कुराते हैं—
हाँ महाराज.
रानी एकांक्षी के गर्भ में एक दिव्य आत्मा ने प्रवेश किया है।
रत्नावली के नेत्र भर आते हैं.
वो आगे बढकर एकांक्षी को अपने सीने से लगा लेती हैं.
देवताओं की कृपा है ये.
उनकी आवाज कांप रही थी.
अधिराज धीरे- धीरे एकांक्षी के सामने घुटनों के बल बैठ जाते हैं.
अपने माथे को उनकी हथेली से लगाते हुए कहते हैं—
तुमने मुझे जीवन दिया था.
और अब हमारा प्रेम जीवन को जन्म देने वाला है।
एकांक्षी की आँखों से आँसू बहने लगते हैं.
ये आँसू डर के नहीं थे—
ये भविष्य की रोशनी के थे.
लेकिन उसी क्षण.
आकाश में बिजली कौंधती है.
महल के ऊपर बैठे पक्षी अचानक उड जाते हैं.
हवा भारी हो जाती है.
राजवैद्य का चेहरा गंभीर हो जाता है.
महाराज.
वे धीमे स्वर में कहते हैं—
ये बच्चा साधारण नहीं होगा.
इसके जन्म से त्रिलोक का संतुलन बदलेगा।
अधिराज उठ खडे होते हैं.
उनकी आँखों में पिता की ममता के साथ योद्धा की चेतावनी भी थी.
जो भी आए.
वे आकाश की ओर देखते हुए कहते हैं—
मेरी संतान को कोई स्पर्श नहीं कर पाएगा.
इसके लिए मुझे फिर से युद्ध ही क्यों न लडना पडे।
एकांक्षी उनके पास खडी होकर उनका हाथ थाम लेती हैं.
इस बार.
वो दृढ स्वर में कहती हैं—
हम अकेले नहीं हैं।
दूर कहीं.
अंधकार में एक शक्ति मुस्कुरा उठती है.
तो भविष्य ने जन्म लेना शुरू कर दिया है.