जज की आवाज़ कोर्टरूम में गूँज रही थी।
“अदालत ने प्रस्तुत सबूतों, गवाहों और पुलिस की जाँच रिपोर्ट का अवलोकन किया है।”
कमरे में साँसें थम गईं।
“इस मामले में प्रस्तुत अधिकांश सबूत कमज़ोर हैं, सर्कमस्टांशियल हैं।”
“मुख्य गवाह—”
उन्होंने फ़ाइल से नज़र उठाई।
“वर्षा— लापता है।”
कोर्टरूम में हल्की फुसफुसाहट हुई।
जज ने हथौड़ा मेज़ पर हल्का सा ठोका।
“शांति रखिए।”
फिर बोले—
“पुलिस की जाँच… लापरवाहियों से भरी हुई है।”
सरकारी वकील की आँखें झुक गईं।
जज की आवाज़ अब पहले से भारी थी।
“और इस अदालत के सामने यह तथ्य भी है कि अभियुक्तों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई नाबालिग लड़कियों को मानव तस्करी के गिरोह से मुक्त कराया।
उन बच्चियों के बयान भी पिछली तारीख़ पर अदालत द्वारा सुने और अभिलेख पर लिए जा चुके हैं।”
उन्होंने फ़ाइल बंद कर दी।
फिर सीधे अनीश और जोगी की ओर देखा।
“जहाँ नवीना जांगिड़ जैसे अभियुक्त अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हों,
वहाँ ऐसे व्यक्तियों को इस अदालत में अपराधी की तरह खड़ा देखना
न्याय की मूल भावना के प्रतिकूल है।”
कुछ पल का विराम।
फिर उन्होंने स्पष्ट स्वर में कहा—
“अतः— अदालत अनीश और जोगी को— सभी आरोपों से बाइज्जत बरी करती है।
और पुलिस डिपार्टमेंट को उनका फ़र्ज़ याद दिलाते हुए असली मुजरिमों को ढूंढने का आदेश देती है।”
एक पल के लिए पूरा कमरा स्थिर रह गया।
फिर— तालियों का विस्फोट।
कोर्टरूम गूँज उठा।
लोग खड़े हो गए।
किसी ने नारा लगाया—
“जोगी भैया ज़िंदाबाद!”
दूसरी तरफ से आवाज़ आई—
“अनीश सर ज़िंदाबाद!”
पुलिस भीड़ को रोकने की कोशिश करती रही—
पर देर हो चुकी थी।
लोग आगे बढ़ आए।
किसी ने जोगी को कंधों पर उठा लिया।
किसी ने अनीश को।
कोर्टरूम से बाहर निकलते ही भीड़ और बढ़ गई।
कैमरे चमक रहे थे।
मोबाइल ऊपर उठे थे।
नारे गूँज रहे थे।
“जोगी भैया ज़िंदाबाद!”
“अनीश सर ज़िंदाबाद!”
भीड़ उन्हें कंधों पर बैठाकर
अदालत परिसर में घुमाने लगी।
दूर खड़ी मालती मुस्करा रही थी।
अनीश ने ऊपर से नीचे देखा।
फिर जोगी की तरफ।
दोनों की नज़र मिली।
जोगी हँस पड़ा।
और पहली बार—
कई दिनों बाद—
अनीश के चेहरे पर भी
पूरी राहत की मुस्कान थी।
—
नवीना जांगिड़ अपने ड्रॉइंग रूम में बैठी थी।
वही सफ़ेद साड़ी।
माथे पर बड़ी लाल बिंदी।
चेहरे पर पूरा मेकअप।
जैसे किसी समारोह के लिए तैयार हो।
कमरे में अजीब-सी शांति थी।
तभी—
दरवाज़े पर जोर की दस्तक।
धड़-धड़-धड़।
“पुलिस!”
बाहर से आवाज़ आई—
“दरवाज़ा खोलिए!”
दूसरी आवाज़—
“दरवाज़ा खोलिए वरना हमें तोड़ना पड़ेगा!”
नवीना ने सिर उठाकर दरवाज़े की तरफ देखा।
चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी।
बस एक थकी हुई मुस्कान।
उसने धीरे से अपनी मुट्ठी खोली।
हथेली में वही छोटी सफ़ेद-नीली गोली।
कुछ पल वह उसे देखती रही।
फिर गहरी साँस ली।
गोली दाँतों के बीच रखी।
कटक।
दरवाज़े पर फिर जोर पड़ा।
“आखिरी बार कह रहे हैं— दरवाज़ा खोलिए!”
अंदर—
नवीना पीछे की ओर लड़खड़ाई।
सोफ़े से टकराई।
फिर फर्श पर गिर गई।
उसके होंठों के किनारे से खून की पतली धार निकलने लगी।
आँखें धीरे-धीरे स्थिर हो गईं।
बाहर—
धड़ाम!
दरवाज़ा टूट गया।
पुलिस वाले अंदर घुसे।
“मैडम—!”
एक सिपाही दौड़कर उसके पास पहुँचा।
पर देर हो चुकी थी।
नवीना जांगिड़
फर्श पर पड़ी थी।
सफ़ेद साड़ी पर खून के छोटे-छोटे धब्बे।
आँखें खुली हुईं।
और बिल्कुल बेजान।
—
एक हफ्ता बीत चुका था।
अनीश अपने घर की डाइनिंग टेबल पर बैठा था।
सामने प्लेट में गरम ऑमलेट।
साथ में टोस्ट और कॉफ़ी का मग।
टेबल के सामने लगे बड़े मॉनिटर पर
ज़ेरोइन दिखाई दे रही थी।
नाक से नीचे उसका चेहरा अब भी नकाब से ढका हुआ था।
अनीश आराम से कौर काट रहा था।
तभी अंदर वाले कमरे से दरवाज़ा खुला।
जोगी बाहर आया।
बनियान पहने।
कमर पर तौलिया लपेटे।
बाल अब भी गीले।
वह इधर-उधर देखते हुए बोला—
“अनीश सर… आपके पास टूथपेस्ट एक्स्ट्रा होगा?”
स्क्रीन पर ज़ेरोइन मुस्करा उठी।
“तो तुम दोनों अब परमानेंट रूममेट हो गए हो क्या?”
अनीश हँस पड़ा।
“नहीं… इस पगले का टाँका कहीं और भिड़ा है।”
फिर उसने नाटकीय अंदाज़ में छाती पर हाथ रखा।
“और मेरा दिल तो…
तुम जानती ही हो किसके लिए धड़कता है।”
ज़ेरोइन ने आँखें घुमाईं।
“ड्रामा बंद करो।”
फिर वह अचानक गंभीर हो गई।
“वैसे तुम्हारा पुलिस वाला एंगल सही निकला।
मुझे समझ नहीं आया था कि हाईवे पर अचानक इतनी पुलिस जीपें तुम्हारे पीछे क्यों पड़ गई थीं।”
उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर चलने लगीं।
टक-टक-टक।
मॉनिटर पर तस्वीरें बदलने लगीं।
एक पार्टी का दृश्य।
शराब के गिलास।
हँसते लोग।
बीच में—
राज लढवान।
उसके साथ खड़ा था पचास-पचपन साल का एक आदमी।
दोनों साथ में शराब पीते, हँसते हुए।
ज़ेरोइन बोली—
“ये आदमी है केरल का एक सिक्योरिटी कंपनी ओनर।
नाम— सुंदर जैकब्स।”
अनीश ने स्क्रीन को ध्यान से देखा।
“अच्छा…
ये अपराजिता और राज लढवान की प्राइवेट सिक्योरिटी हैंडल करता था।
और भी कई बड़े अपराधियों और नेताओं की।”
उसने मग उठाकर कॉफ़ी की चुस्की ली।
“त्रिकोण फाइल्स में इसका ज़िक्र मैंने देखा था।
लेकिन इसे मरे पाँच साल हो चुके हैं।
इसलिए मैंने इसे आगे नहीं खंगाला।”
ज़ेरोइन हल्का सा मुस्कराई।
“जिसका ज़िक्र फाइल्स में नहीं है…
वो है सुंदर जैकब्स की पत्नी।”
एक और कीबोर्ड की आवाज़।
स्क्रीन बदल गई।
मॉनिटर पर एक नया चेहरा उभरा।
त्रिशा जैकब्स।
पुलिस कमिश्नर।
अनीश और जोगी ने एक-दूसरे की ओर देखा।
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
अनीश धीरे से बोला—
“तो पति के मरने के बाद…
धंधा इसी ने संभाल लिया।”
स्क्रीन पर त्रिशा जैकब्स का चेहरा स्थिर था।
अनीश ने मग उठाया।
कॉफ़ी का एक घूँट लिया।
फिर शांत आवाज़ में कहा—
“अच्छा… तो त्रिकोण के और भी मोहरे बचे हैं इस खेल में।”
— जारी —
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