----------------जगल उपन्यास मेरीलेखनी का सब से बेस्ट लेखन है खुद सिफ्त करनी पड़ती है.. लोगों पास टाइम की शार्ट जयादा है। एक गाड़ी जो दूध की डायरी की उस मुकाम तक पुहच चुकी थी। यहां सब गिरफ्तार हो गए थे।
" वाहा अका " एक जोर से हसना, वीरान खडर मे दुबारा से आवाज का आना आम बात थी। चुप के पीछे भी एक रहस्य था। " कितने हो दूध वेचने वाले... मेरा पुत्र है... या नहीं। " जनाब इधर तो गड़बड़ है। इसमें रहस्यमय कुछ था। चारो और से पुलिस ने घेरा डाल लिया था .. वो सब राहुल की मेहरबानी ही थी... "मेरा बेटा " वो न खुशग्वार था। " पुलिस की चेतवानी थी.. "सब आपने हथेयर नीचे रख सलेडर कर दे। खैरियत चाहते हो, कोई नुकसान हुआ तो, बहुत पछताओगे। "
गोली बारी नहीं हुई... सलेडर पहली बार हुआ... सब केस्टडी मे ले लिए गए। एक जोर का धमाका हुआ.. ये मानव बम्ब था... सब ले डूबा... आधे से जयादा आतक वादी थे। हिमाचली पुलिस भी नुकसान जयादा था।
राहुल को आपनी बच्ची प्रिये थी। हो सकता है एक बार कही मिल जाये... दूरबीन मे आग ही आग थी। उसमे कौन बचा कौन नहीं...
खबरों मे लाइव चल पड़ा था। पुलिस अब मानव बम्ब को पहले चैक कर रही थी। मिशन नुकसान देह पर पावर फूल रहा। हिमाचली पुलिस ठंड मे गर्मी मे थी। सब को मार देना चाहती थी।
गाड़ियां चार भर कर निकल पड़ी थी। राहुल की बेटी ठंड मे थी आकड़ गयी थी.. साथ वाले मर चुके थे.. ये दयनीय खबर मिडिया पर लगातार टी.वी पर आ रही थी। सब देख कर स्तम्भक हो गए थे। कया से कया हो गया था... कोई सोच ही नहीं सकता था। उसके साथी तीन रणणभूमि मे शहीद हो गए थे। निज़ाम और राहुल थे बचे हुए... रो रहे थे।
अंत निज़ाम के सीने मे भी एक गोली राहुल ने उतार कर कहा था..." साले गरदार... तू सब कुछ जानता था। "
राहुल ने वही पिस्टल कही दूर नहीं धरती मे पड़ी बर्फ मे दफन कर दी थी। इतना सब सफाई मे जो भी हुआ था... ये राहुल उसके शहीद मित्र ही जानते थे। घबराहट बहुत कुछ करा देती है.. ठीक हो, चाहे गलत।
" रुकना मेरी हैसियत मे हो गया था, कोई काम अब वो तेजी से नहीं धीरे धीरे करता था"
राहुल ने ये टीचा ही बना लिया था.... सिकदरा रोड मे कोठी मे गाड़ी मे वो आपने दोस्त के पास था... माजूस काफ़ी था। जो भी हुआ एक दिल दहला देने वाला था।
एक खबर जो अखवार मे पहली सुर्खियों मे थी... सब का दिल दहल गया था।ये कैसे हो गया था..... " कौन था इसके पीछे जो पर्दा बेनक़ाब कर दिया था। " आख़र कया था '...
सुबह की कश्मक्श, सुबह का संगीत पंछीओ के संग था... जैसे गुल खिले हो। घेरा बंदी थी रिपोटरो की... सारा सेहरा जिसको जाना चाहिए था जा चूका था, किसको जानते हो.. नहीं न.... "
"डीएसपी तरुण को " रिपोटरो की एक के बाद एक बात, सब उलझनों भरा था।
डीएसपी तरुण को एसएसपी ज़िला कसौली तब्दील कर दिया गया था... जिसने पंजाब मे रहते इतना बड़ा काम किया।
एक फोन काल हुई... " मिलोगे यार " तरुण ने रोद्र गले से पूछा।
"एसएसपी " लांच 15 अगस्त को होना तय हुआ... मंत्री गणो ने कहा " ईमानदार ऐसे अफसर हमारे बीच हो, तो भय से कोई वास्ता नहीं होना चाहिए.. जगल के क़ानून समझने वालो अब जो भी हो चूका बस। "
राहुल ने एसएसपी को धन्यवाद दिया ------ कहा यार शायद हम अब कभी न मिल सके, मेरा लखते जिगर नहीं रहा, -----"
तभी एकाएक तरुण ने कहा... " बेवकूफ हो, वो मेरे पास है, लो बात करो। "
"पापा ----"ये आवाज ने जैसे वो सिसकी मे बिलख पड़ा।
-------****------
आगे फिर पढ़े कुछ हट के.... मूवी की तरा... किरदार जंगल के नहीं... नाम होगा... हाँ तुम कहो हम रख लेगे.... गंदा नाम गंदी सोच नहीं चलेगी....
हाँ कहना कया चाहते हो.... कहो डरते हो... पंजाब की सर जमीन की कहानी... यही न
नहीं मिया कुछ उत्तेजक कुछ उस विशेष पर भी लिखो, कयो नहीं लिखते... "छापे गे नहीं " कया पता लिख दो देखी जायेगा।
नाम ------- आने वाला छोटा उपन्यास ( उलझन ) ओ उलझन वालो की, नहीं बाबा नहीं, उस रात के बाद.....
अगला धारावाहिक जल्दी ही। बनारस के तट पे गंगा की लरजती छले उठ रही थी --------------- नीरज शर्मा।