Part 1 — शुरुआत
दिल्ली के बाहरी इलाके में बनी नई हाईराइज़ सोसायटी ब्लैकवुड रेजीडेंसी दिन में जितनी चमकती थी, रात में उतनी ही डरावनी लगती थी। ऊँची इमारतें, लंबे सुनसान कॉरिडोर, सीसीटीवी कैमरों की लाल बत्तियाँ और आधी रात के बाद ऐसा सन्नाटा कि अपनी साँसें भी तेज सुनाई दें। उसी सोसायटी के टॉवर-सी की तेरहवीं मंज़िल पर रहता था 22 साल का आयुष। कॉलेज खत्म हो चुका था, नौकरी की तलाश चल रही थी, और ज़िंदगी का ज़्यादातर समय फोन, गेमिंग, रील्स और देर रात जागने में निकलता था।
उस रात भी वह सो नहीं रहा था। कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ लैपटॉप की नीली रोशनी और फोन की स्क्रीन चमक रही थी। समय था 2:13 AM। बाहर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। खिड़की पर गिरती बूंदों की आवाज़ कमरे के अंदर अजीब बेचैनी फैला रही थी।
तभी फोन वाइब्रेट हुआ। Instagram पर नया नोटिफिकेशन आया—
@AndherRaat_13 started following you
आयुष मुस्कुराया। “फिर कोई फेक अकाउंट।”
उसने प्रोफाइल खोली। कोई फोटो नहीं। कोई पोस्ट नहीं। कोई फॉलोअर नहीं। सिर्फ बायो में एक लाइन लिखी थी—
“मैं वही लौटाता हूँ, जिसे लोग भूलना चाहते हैं।”
आयुष को मज़ाक लगा। उसने फोन साइड में रखा ही था कि मैसेज आया—
“जाग रहे हो?”
आयुष ने टाइप किया—
“हाँ। कौन?”
कुछ सेकंड तक typing… दिखा। फिर जवाब आया—
“जिसे तुमने आखिरी बार इसी बारिश वाली रात में देखा था।”
आयुष के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। छह महीने पहले ऐसी ही बारिश वाली रात थी… जब नंदिनी अचानक गायब हो गई थी। नंदिनी उसकी एक्स गर्लफ्रेंड थी। दोनों का ब्रेकअप बुरा हुआ था। उसके बाद वह एक रात घर से निकली और फिर कभी वापस नहीं लौटी। पुलिस, पोस्टर, खबरें… सब हुआ, पर कुछ नहीं मिला।
आयुष ने खुद को संभाला। “किसी को पुरानी बात पता है, बस डराने की कोशिश कर रहा है।”
उसने लिखा—
“नाम बता।”
उत्तर आया—
“नाम से क्या होगा? खिड़की मत खोलना।”
आयुष ने तुरंत खिड़की की तरफ देखा। पर्दे बंद थे। दिल तेज धड़कने लगा। उसने जाकर पर्दा हटाया। बाहर अंधेरा था, नीचे पार्किंग में पानी जमा था, स्ट्रीट लाइट टिमटिमा रही थी। कोई नहीं था।
वह लौटने लगा कि फोन फिर चमका—
“अब पीछे मत देखना।”
आयुष वहीं रुक गया। गर्दन अपने आप सख्त हो गई। उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।
कमरा खाली था।
“Enough!” वह चिल्लाया।
तभी पूरे कमरे की लाइट झपकी… एक बार… दो बार… और बंद।
कमरा अंधेरे में डूब गया। सिर्फ फोन की रोशनी बची। उसी रोशनी में उसे लगा जैसे अलमारी के पास कोई खड़ा है। लंबा, स्थिर, बिना हिले।
आयुष ने फ्लैशलाइट ऑन की। वहाँ कुछ नहीं था।
साँस भारी हो चुकी थी। तभी फोन पर नया मैसेज आया—
“तुम अब भी जल्दी घबरा जाते हो।”
उसके साथ एक फोटो अटैच थी।
आयुष ने फोटो खोली… और उसका खून जम गया।
वो फोटो उसके कमरे की थी। अभी की। उसी एंगल से जैसे कोई दरवाज़े के पास खड़ा होकर क्लिक कर रहा हो। फोटो में आयुष फोन पकड़े बीच कमरे में खड़ा था।
मतलब… फोटो लेने वाला अभी कुछ सेकंड पहले इसी कमरे में था।
उसने घबराकर दरवाज़े की तरफ दौड़ लगाई। दरवाज़ा अंदर से लॉक था। चेन लगी हुई थी। कोई अंदर आया ही कैसे?
फोन फिर वाइब्रेट हुआ—
“दरवाज़ा बंद है… पर बालकनी खुली है।”
आयुष ने काँपते हुए पीछे मुड़कर बालकनी की तरफ देखा।
काँच के दरवाज़े पर किसी ने बाहर से हथेली रखी हुई थी।
धीरे-धीरे वह हथेली नीचे खिसकी… और काँच पर पानी से एक शब्द लिखा गया—
AYUSH
और फिर उसी हाथ ने दरवाज़ा खटखटाया।
To be continued…