वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
कुंवर महेंद्र प्रताप सिंह इलाके़ के नामी रईस थे। उनकी पहुंच कुमाऊं के कमिश्नर तक थी। उनकी पत्नी इंद्राणी विवाह कर उनके घर आईं तो अपने साथ चांदी की मां लक्ष्मी की मूर्ती भी लाईं थी। घर में कुल देवता की पूजा का रिवाज था पर कुंवर साहब ने कभी पत्नी की आस्था पर प्रश्न नहीं किया।
विवाह के पन्द्रह वर्ष बाद इंद्राणी तपेदिक से पीड़ित हो गई थी। वैधो और हकीमो ने एक स्वर में कहा- "मैदान की हवा अब नहीं बचाएगी, पहाड़ पर ले जाइए।"
उन्होंने कमिश्नर से कहकर रेस्ट हाउस एलाट कराया। पत्थर की दीवारों और खपरैल वाला मकान पहाड़ों के बीच बना था। इसके चारों ओर चीड़ का जंगल था। पेड़ों के तनो से शाखाएं और उनमें से लंबी-लंबी बेलें नीचे गिरती चारों तरफ फैल रही थी। यहां से मीलो तक घने पेड़ पौधों से भरी घाटी दिखाई देती थी।
कुंवर साहब का सामान पहले ही आ गया था और वरांडे में रखा था। नौकरों की कोठरियों के पास कुली उकड़ू बैठे चिलम पी रहे थे जो सबके बीच घूम रही थी। नौकरों की हुक़्क़ा पार्टी ख़त्म हुई जब उन्हें एक पालकी आती दिखी जिसमें कुंवर साहब की पत्नी और पुत्री रूपवती बैठी थी।
बूढ़ा चौकीदार हाथ जोड़कर कुंवर साहब के सामने खड़ा हो गया। "हुज़ूर मैं ही यहां का चौकीदार हूं।"
परिवार ने घूम-घूम कर निरक्षण किया। डूबते सूरज की लालिमा से सारा मकान, आगे पीछे का मैदान, फूलों की क्यारियां, जंगल के पेड़ और उनकी शाखाएं तथा बेलें जगमगा रही थी। चारों तरफ शांति थी। दूर घाटी में बहते झरने से कल- कल की आवाज़ आ रही थी।
कुंवर परिवार ने रहने का इंतज़ाम करना शुरू कर दिया। बैरे लालटेनें जलाने डिनर की मेज़ लगाने और पलगोँ पर मच्छरदानियां खड़ी करने में लग गए। इंद्राणी और रूपवती कमरों में जाकर काम का निरीक्षण करने लगी। सूरज की रोशनी के लुप्त होते ही जंगल में चारों तरफ जैसे एक चीख़ता सन्नाटा और शांति छा गई। चुड़ियें अपने घोसलों में लौटने लगी और कुछ ही मिनट में घुप अंधेरा छा गया। अब जंगल में दूसरे क़िस्म की आवाज़ें सुनाई देने लगी। कुंवर साहब बैठे स्कॉच और सिगरेट पी रहे थे और बाहर लाॅन में कीट पतंगे और जुगनू उड़ते हुए उनके पास तक आने लगे।
बैरे ने कहा, डिनर तैयार है। खाने की मेज़ पर मोमबत्तियां जला दी गई। दीवार पर लगी खूटी से टंगी लालटेन की पीली रोशनी दीवारों पर पड़ रही थी।
खाना खाते हुए रूपवती ने अचानक छुरी काटा मेज़ पर रखकर कहा -"मम्मी देखो दीवार पर कोई चेहरा बन रहा है...।"
इंद्राणी ने चौक कर उधर नज़र डाली। दीवार पर लगी सफेदी पर ऊपर से गिरने वाले बारिश के पानी से लकीरे पड़ गई थी जिन पर लालटेन से पड़ने वाली झिलमिलाती रोशनी के कारण तरह-तरह के चेहरे बन-बिगड़ रहे थे।
"रूपवती, इंद्राणी ने डपटकर कहा- मुझे डराना बंद करो और चुपचाप खाना खाओ।" उसके बाद सब शांति से खाते- पीते रहे। काॅफी आई तो रूपवती सोने चली गई।
इंद्राणी ने फिर दीवार पर नज़र डाली, अब वहां कुछ नहीं था।
"कुंवर साहब, मुझे यह जगह पसंद नहीं है।"
"तुम थक गई हो। जाकर आराम करो।"
इंद्राणी सोने चली गई। थोड़ी देर बाद कुंवर साहब भी आकर लेट गए और बड़ी जल्दी खर्राटे लेने लगे।
इंद्राणी को नींद नहीं आ रही थी। वह तकिए पर बांहें टिकाकर बाहर बगीचे की तरफ देखने लगी। चंद्रमा नहीं निकला था लेकिन आसमान साफ था और ऊपर तारे छिटके हुए थे। लाॅन के पास जंगल था जो धनी काली दीवार की तरह चारों ओर खड़ा था। मेंढक और झींगुर की आवाज़े, कभी-कभी किसी पक्षी की चीख़, लकड़बग्घों की आवाज़ें और सियारों की घू-घू वातावरण में फैल रही थी। इन्हें सुनकर इंद्राणी के माथे पर ठंडा पसीना आ जाता।
कई घंटे बाद पीला-सा चांद आसमान में निकला और जंगल के पार से लाॅन में हल्की रोशनी फ़ैलाने लगा। लाॅन पर लगी घास पर ओ़स की छोटी-छोटी बूंदे चमकने लगी।
इंद्राणी ने सन्नाटे के एहसास को दबाने के लिए बाहर निकल कर घूमने का विचार किया। उसे नंगे पैरों के नीचे उगी घास ठंडी और गीली लग रही थी। वह आगे बढ़ते हुए अपने पैरों से घास पर पड़ते हुए निशानों को देखती जा रही थी। उसने अपना सिर झटका, जैसे उस पर रखा हुआ बोझ हटा रही हों और कई बार गहरी सांस ली। इससे उसे ताज़गी महसूस हुई। कहीं कुछ गड़बड़ नहीं था और डर की कोई बात नहीं थी।
इंद्राणी लाॅन में आगे-पीछे कई मिनट तक टहलती रहीं। स्वस्थ होकर उसने बिस्तर पर लौटने का विचार किया। बरांडे की तरफ बढ़ी और अचानक रुक गई। उसके आगे के लाॅन पर पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे, वहां से वे निशान सूखी ज़मीन तक गए थे। और जंगल में पहुंच कर लुप्त हो गए थे। इंद्राणी के पैरों में कमज़ोरी सी महसूस हुई, बुख़ार सा चढ़ता हुआ लगा और वह ज़मीन पर गिर पड़ी।
जब उनकी चेतना जागी, सवेरा हो रहा था। चारों तरफ चिड़ियों ने चहचहाना शुरू कर दिया था। वह धीरे-धीरे घिसटकर अपने बिस्तर तक जा पहुंची।
जब बैरा चाय लाया, सूरज की रोशनी बरांडे में फैल गई थी। कुंवर साहब ने नाश्ता किया और घूमने के लिए निकल गए।
शाम को वह सूरज ढलने से पहले लौट आए। उन्होंने व्हिस्की का आर्डर किया। दो पैग पेट में जाते ही उनका चेहरा सचेत हो उठा- "आज डिनर मैं चिकन करी बनाई है?"
मुझे तो भूख लगी है।
सब लोग शांति से डिनर करने लगे। इंद्राणी बोली- "यहां अजीब सी दहशत है।"
"कल रात नींद तो अच्छी आई?"
"मैं तो सोई ही नहीं थी।"
"मम्मी, मैंने तुम्हें बाहर चलते देखा था,"रूपवती ने बीच में ही कहा। आप सफेद गाउन पहने थी।"
"रूपवती बेकार बात मत करो, सोने जाओ। और मेरे पास सफैद गाउन नहीं है।" इंद्राणी का चेहरा पीला पड़ गया। यह कहकर वह उठी और उसके पति साथ हो लिए।
"तो तुम्हारी नींद पूरी नहीं हुई?"
"यह फ़िज़ूल बातें हैं। तुम खीर खाओ और जाकर सो जाओ। कुंवर साहब ने बंदूक उठाई, उसमें गोलियां भरी और बिस्तर के पास दीवार के सहारे टिका ली। फिर पाइप जलाकर पीने लगे और तब तक बातें करते रहे जब तक सोने का समय नहीं हो गया।
फिर पत्नी से बोले, "अगर आहट सुनाई दे तो मुझे जगा देना।"
"ठीक है।"
कुछ ही मिनट में कुंवर साहब को नींद आ गई। रूपवती भी सो गई थी। लेकिन इंद्राणी मच्छरदानी के भीतर से बाहर आंखे गड़ाये पेड़ों से बनी दीवार और उसके पार फैले जंगल को देख रही थी। हवा चल रही थी और पर्दे हिल रहे थे। फिर बाहर के धुंधलके में सफेद रंग का गाउन पहने एक औरत की छाया उभरी। उसके बाल दो पट्टियों में बंधे थे जो दोनों कंधों पर गिर रही थी उसकी शक्ल तो साफ नज़र नहीं आ रही थी, लेकिन उसकी आंखों की चमक मनुष्य जैसी नहीं थी। इंद्राणी का शरीर ठंडा पड़ गया और वह बहुत डर गईं। उसने चीख़ मारी। कुंवर साहब उठे और बंदूक उठाने को लपके।
"सफेद कपड़ो में औरत। वह हमारी तरफ आ रही थी। इंद्राणी चिल्लाई।
"बकवास बंद करो। मुझे क्यों नहीं दिखाई दी? तुम अपने ऊपर क़ाबू करना सीखो।"
"लेकिन कुंवर साहब, तुम्हें मुझ पर यक़ीन करना होगा।पिछली रात मैंने घास पर उसके पैरों के निशान देखे थे।"
इंद्राणी यह कहकर रुकी और फिर खड़ी होकर बोली, "आओ तुम्हें दिखाऊं।"
वह कुंवर साहब को लाॅन में ले गई। उस पर पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। कुंवर साहब ने बंदूक उठाई और निशानों के पीछे चलते हुए मैदान तक पहुंचे। वहां बीच में एक कब्र थी- पुरानी टूटी-फूटी जिसके चारों तरफ काई जमा हो गई थी और उसके बीच कई जगह कटीले पौधे उग रहे थे।
कुंवर साहब यह देखकर हिल उठे लेकिन उन्होंने अपनी आवाज़ नहीं बदली। इसके बारे में क्या कहा जाए, समझ में नहीं आता," धीरे से उन्होंने कहा।
कुंवर साहब ने चौकीदार से पूछा- "इस मकान के बारे में क्या जानते हो?"
"कुमाऊं के राजा भद्रसेन की इकलौती पुत्री घर से भाग गई थी। राजा को वारिस न होने की चिंता सताती थी। कई वर्ष बाद राजा को पता चला, उसकी बेटी इस मकान में रहती है और उसके एक पुत्र भी है। राजा ने उसके पति को मरवा दिया। यह कब्र उसी की है।
"राजा की बेटी का क्या हुआ?" कुंवर साहब ने प्रश्न किया।
राजा उसके पुत्र को छीन कर ले गया। वह इस मकान में अकेली रह गई थी। रात को वह पति की कब्र पर जाती थी फिर एक दिन लापता हो गई। लोग कहते हैं- उसकी आत्मा सफेद चोगे में कहती- फिरती है-"मेरा बच्चा... लौटा दो...।"
उस रात इंद्राणी को तेज़ बुख़ार था। वह नींद में बड़बड़ा रही थी- "मेरा बच्चा... लौटा दो...।"
रूपवती आधी नींद में बाहर की ओर चल पड़ी।
कुंवर साहब सन्न रह गए। उन्होंने दौड़कर उसे पकड़ लिया-"कहां जा रही हो?"
"मां बुला रही है...," उसने अजीब आवाज़ में कहा।
कुंवर साहब के अंदर पहली बार भय ने जन्म लिया। उन्होंने तत्काल वापस आने का निर्णय लिया।
सामान छूट गया। इंद्राणी और रूपवती पालकी में बैठकर बस स्टैंड गई।
इंद्राणी अचानक बोली- "माता रानी की मूर्ति रह गई!"
कुंवर साहब झल्लाए- "शुक्र करो, तुम सही सलामत हो।"
इंद्राणी ने रुआसु होकर कहा, "मां ने कहा था, विपत्ति में भी माता रानी को अलग मत करना।"
कुंवर साहब कुछ क्षण मौन रहे। फिर धीमे स्वर में बोले- "अगर मैं जाऊं... तो तुम यही ठहरोगी। कहीं नहीं जाओगी।"
इंद्राणी ने सिर हिला दिया।
कुंवर साहब ने बंदूक कंधे पर टांग ली। रेस्ट हाउस पहुंचे, बरामदे की लालटेन बुझी हुई थी। दरवाज़ा आधा खुला था। कुंवर साहब भीतर दाखिल। गहराई में क़दमों की आहट जैसे किसी और के पांव से टकरा रही थी। कुंवर साहब ने मुड़कर देखा।
बरामदे में,चांदनी के धुंधलके में, सफेद गाउन पहने एक स्त्री खड़ी थी। बाल दो पट्टियां में बंधे, कंधों पर गिरते हुए। चेहरा धुंधला, पर आंखें अस्वाभाविक रूप से चमकती हुई।
स्त्री ने धीरे क़दमों से भीतर आना शुरू किया। उसके पांव ज़मीन को छूते नहीं थे-जैसे हवा में सरक रही हो।
कुंवर साहब का गला सूख गया, पर उन्होंने बंदूक तान दी- "कौन हो तुम?"
ठीक पीछे से सिसकी-- "मेरा बच्चा... लौटा दो..।" स्वर जैसे वर्षों से एक ही वाक्य दोहराते-दोहराते थक चुका हो।
यह वही शब्द थे जो इंद्राणी बुख़ार में बड़बड़ा रही थी।
अचानक कमरे में ठंडी हवा का तेज़ झोंका आया। लालटेन की लौ कॉपी और बुझ गई। अंधेरे में केवल उस स्त्री की आंखें चमक रही थी।
कुंवर साहब ने शक्ति बटोर कर कहा- "तुम अपने पिता की इकलौती औलाद थी। तुम और तुम्हारा बेटा राजा के वारिस थे। तुम्हारे पिता अपने वारिस को ले गए। अब तुम्हारा बच्चा सिंहासन पर विराजमान है।" कैसी मां हो तुम- "राजस्वी ठाट-बाट छीनकर वीराने में लाना चाहती हो?"
"तो -अब नहीं लौटेगा।" उसने आख़िरी बार पूछा।
"नहीं, कुंवर साहब ने धीरे से कहा, "पर तुम भूल सकती हो।"
दीवारों पर जमी ठंडक पिघलने लगी। जैसे वर्षों से बंद कोई खिड़की खुल गई हो।
सफेद आभा हवा में विलीन हो गई।
मकान पहली बार खाली लगा- डर से नहीं, इतिहास से मुक्त हुआ। मूर्ति उस कोने में रखी थी जहां इंद्राणी पूजा करती थी। कुंवर साहब ने उसे उठाया। वापस बस स्टैंड पहुंचे तो इंद्राणी का बुख़ार उतर चुका था, आंखों में शांति थी। उसने मूर्ति को सीने से लगाया और धीमे स्वर में कहा- "वहां कुछ था?"
उन्होंने शांत भाव से कहा- वहां! एक मां की प्रतीक्षा। आज वह भी चली गई! मकान अब वह भुतहा नहीं, बस पुराना था। मेरा बच्चा...लौटा दो..."अब एक अनंत अधूरा काल बन गया।"
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