Narvanshi - 1 in Hindi Fiction Stories by StickyK books and stories PDF | नभवंशी - 1

The Author
Featured Books
Categories
Share

नभवंशी - 1

भाग -1 || प्रोलॉग


••••••••••°°°°°°°°°°••••••••••


चम चम करती चांदनी और उस चांदनी की सांवली सी रोशनी में यमुना का सांवला सा जल अटखेलियां करता हुआ आगे बढ़ रहा था। वहीं कहीं कोने में कदंब की डाली पर से नीचे लटका हुआ पीताम्बर यमुना के पानी को इतना हौले हौले स्पर्श कर रहा था कि अमृतमय रस प्राप्त हो रहा था, किंतु साथ में तनिक और की चाह, अमृतमय रसपान में व्याधा थी। मद्धम बह रही हवा में मोरपंख झूम रहा था, आनंद ले रहा था। अपने उत्तम भाग्य को सकार रहा था। वो भाग्य जिसे चाहने के लिए बड़े बड़े तपस्वी बरसों तपस्या कर के भी नहीं प्राप्त कर पाते। यमुना का सांवला जल भी उस मोरपंख से ईर्ष्या जरूर करता होगा। सबके कर्म और पाप संवारते संवारते अनगिनत वर्ष बीत गए होंगे। लेकिन उस मोरपंख जैसा भाग्य उसका भी नहीं था। यमुना के उसी सांवले जल को निहारते वो कमल से नयन, जिनके बारे में हृदय से उठते भावों को शब्दों में उकेर दे ऐसा कोई कलमवीर पैदा नहीं हुआ। 

उन निगाहों की तो बात ही क्या कहें! जितनी जटिल सादगी थी उतनी ही सीधी जटिलता। एक नजर भी उन नुकीले बाणों की तरह थी जिसे अपना हृदय भेदने के लिए हम खुद अपना हृदय खोल कर उसके सामने रख देते हैं। भले वो हृदय, नयन रूपी बाणों से छलनी हो जाए पर बिना उनसे नजरें  मिलाए, बिना उस ओर देखे कोई कैसे रह सकता है!

सब कुछ थम जाता होगा, ताकि एक झलक मिल जाए। ज्यादा नहीं चाहिए। एक झलक काफी है। लेकिन एक झलक मिल जाने के बाद....

सारे भाव बदल जाते हैं।

ये अन्याय लगता है कि क्यों उसे लगातार नहीं देख सकते...

और जब वे मुस्कुराए जैसे चारों ओर सब कुछ खिल गया हो। एक दिव्य वसंत चारों ओर फैल गया। गुलाब की कोमल पत्तियों से भी सुंदर और सौम्य उनके होंठ के दोनों कोने मंद मंद ऊपर क्या उठ गए, सभी लता, पुष्प, पेड़, पौधे, पक्षी, जंतु, नदियां, झरने, हवा, तालाब, खेत-खलिहान सब के सब झूम उठे। खिल उठे। खिलखिला उठे। 

उस समय सांवले जल में प्रकाशित, सांवले चेहरे के मुस्कुराते प्रतिबिंब ने सांवली रात में आसमां में बिखरी सांवली चांदनी को धवल कर दिया...


————···————


आधी रात होने को थी। बाहर उल्लू, चमगादड़, अपनी हुड़दंग मचाए हुए थे। गांव रात के अंधेरे में कई घंटे पहले ही पूरी तरह समा चुका था। उस अंधेरे में बस एक घर की खिड़की थी, जो प्रकाशित थी। घर के बाकी सभी सदस्य कब का चद्दर ताने सो चुके थे। लेकिन एक कोने में हरे रंग का जादुई पत्थर मद्धम रोशनी दे रहा था।

थोड़ा और पढ़ने की चाहत में घर के कोने में बैठी करीब नौ दस साल की नन्ही बच्ची ने अपने सुकोमल हाथों से पन्ने पलटे पर आगे बड़े बड़े अक्षरों में समाप्त लिखा हुआ था। सांसों की गति पर एक धक्का सा लग गया, जब उस बच्ची को यह मालूम पड़ा कि वह अब और आगे नहीं पढ़ सकती। 

उसकी आँखें आखिरी पन्ने को इस तरह घूर रही थी जैसे मानो वह किताब अपने आप कुछ और पाठ जोड़ देगी। उसने अपने नन्हे हाथों से कई बार पन्ने पलटे लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। समाप्त वहीं का वहीं था।

तब उसे पहली बार एहसास हुआ कि सब कुछ एक सीमा लांघने के बाद समाप्त हो जाते हैं। जैसे यह किताब...

सबका एक अंत है। एक कहानी और उसके पाठक का भी एक सीमित पथ है। जहां वे अपने पसंदीदा किरदारों की कहानी पढ़ते हैं, उनके हर उतर चढ़ाव में साथ होते हैं। और एक समय कहानी खत्म होने के साथ उन्हें अलविदा कहना पड़ता है। 

उसने उठकर किताब को अपनी सारी पाठशाला की किताबों के बीच सरका दी। और जादुई पत्थर को जादुई गोले से हटा दिया। मद्धम प्रकाश बुझ गया। और अंधेरा फैल गया। मद्धम प्रकाश के बुझते ही बाहर की चांदनी ने अपनी जगह बना ली। 

बच्ची ने देखा उस ओर। तब कहीं जाकर उसके अव्यवस्थित विचारपूर्ण हृदय को एक परिचितापरिचित शांति मिली। टिमटिमाते तारों से भरा आसमां, एक चांद और उसकी शीतल और स्वच्छ चांदनी में बाहर की सजल घास धीरे धीरे हवा में झूम रही थी। बाहर आकर वह लड़की उसी सजलता में लेट गई।

जिज्ञासु आंखों के सामने फैला असीमित आकाश। जिसे देखकर बच्ची के मन में एक ही सवाल था।

『क्या... इसका भी अंत है? चंदा मामा का भी?』

उसका कौतुक शांत करने वाला अभी तो वहां कोई नहीं था। पर उसे इतना हमेशा से मालूम था कि आसमां से उसका लगाव अटूट है। धीरे धीरे बहुत दूर से आती किसी मनमोहक वंशी की मृदु किंतु हल्की तान ने बच्ची की कौतुकता शांत कर उसे सपनों के संसार में सुला दिया।


————···————

"चंद्रा! ओ री चंद्रा?! कहां मर गई ये लड़की!"

"आई मैडम!"

अपनी कलम मेज पर रखकर भागती हुई चंद्रा बाहर खड़ी साड़ी पहने मैडम के पास गई जो आराम से पचास के आस पास की उम्र की लग रही थीं। वहीं चंद्रा ने अभी एक साल पहले ही अपनी किशोरावस्था छोड़ी थी। 

मैडम नमिता, गांव के सभी बच्चों को पढ़ाने - लिखाने और योग्य बनाने का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर था। राज्य की सबसे उच्च स्तर की मैजिक एकेडमी की प्रवेश परीक्षा हाल ही में हुई थी, जिसमें चंद्रा ने भी भाग लिया था।

"क्या बात है मैडम जी?"

नमिता ने उसे एक लिफाफा थमाया। चंद्रा के हाथ लगते ही वह समझ गई कि बड़ा ही महत्वपूर्ण है। लिफाफे के स्तर और उस पर लगी मुहर चंद्रा को यह बताने के लिए काफी थी कि उसकी परीक्षा का ही परिणाम है। 

हृदय जोर जोर से धक धक करने लगा, जब चंद्रा ने लिफाफा खोलना शुरू किया। 

『मुरलीवाले! बड़ी मेहनत की थी। संभाल लेना!』

और जब लिफाफा खोलकर उसने पर्चा पढ़ा तो, हृदय एक पल के लिए मानो थम गया। सांसे भी। चंद्रा मानो बर्फ की तरह जम सी गई। 

"क्या हुआ चंद्रा? मूरत क्यों बन गई?"

नमिता ने आँखें सिकोड़ कर देखा तो देखते ही रह गई। फिर खुशी के मारे चंद्रा को गले लगा लिया। इतनी जकड़ कर गले लगाया कि एक पल के लिए चंद्रा खांस पड़ी।

"शाबाश मेरी बच्ची! मुझे पता था तू कर लेगी!"

चंद्रा भी मुस्करा पड़ी। आखिर उसका सपना सच हो गया। अब तो उसे कोई भी और कुछ भी नहीं रोक सकता था। 

उसकी आँखें ऊपर आसमान की ओर गई, जहां एक ओर सूर्य की लालिमा फैली थी, और दूसरी ओर तारे धीरे धीरे टिमटिमाने लगे थे। जैसे मानों चंद्रा को झिलमिलाते हुए बधाई दे रहे थे। चंद्रा ने अपना हाथ उठाया ऊपर की ओर...

उसके अंदर के दबे सवाल, बचपन से वहीं थे। हाथों के बीच से दिखते तारे हमेशा से चंद्रा को अपनी बांहे फैलाए अपनी ओर बुलाते थे।

शाम ढल रही थी, और दुबारा एक मृदु किंतु हल्की सी वंशी की तान वातावरण में फैल गई।


_________________________________________


जारी है...