जैसे ही शंख की आवाज़ गूँजी, पूरा सूरजगढ़ जाग उठा। गौरी घाट के किनारे बसी उस छोटी-सी बस्ती में हर सुबह यही होता था — पुजारी शंकर जी पूजा खत्म करते, शंख फूँकते, और जैसे पूरा माहौल एक पल के लिए पवित्र हो उठता।
प्रसाद बाँटते वक्त मुखिया जी सबसे पहले आगे आए।
"पंडित जी, जल्दी दीजिए — आज बिटिया की गोद भराई है, घर में मेहमानों का ताँता लगा है।"
शंकर जी ने उनके हाथ में प्रसाद रखते हुए मुस्कुराकर कहा, "महिमा बिटिया को हमारा आशीर्वाद देना।"
मुखिया जी ने नमस्कार किया और चले गए।
घर पहुँचे तो कुसुम दरवाज़े पर ही चाय लेकर खड़ी थीं। शंख की आवाज़ सुनते ही उन्होंने चाय चढ़ा दी थी — वर्षों का यही क्रम था। पाँच मिनट में पति आ जाते हैं, यह उन्हें खूब मालूम था।
"मुखिया जी की ओर से भोग आया है," शंकर जी ने थाली उनके हाथ में थमाते हुए कहा। "महिमा बिटिया की गोद भराई है आज, इसीलिए उन्होंने महादेव को विशेष भोग चढ़ाया।"
कुसुम ने थाली अंदर रखी और धीरे से बोलीं, "हाँ… महिमा खुद आई थी आज सुबह। कहने लगी — काकी, गोद भराई में ज़रूर आना, मेरे लिए आना।"
इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ अटक गई और वे चुप हो गईं।
शंकर जी ने उनका चेहरा देखा — कुसुम की आँखें भर आई थीं। वे सब समझ गए। कहने की ज़रूरत नहीं थी।
शादी को कई साल हो चुके थे। दोनों के बीच प्यार की कोई कमी नहीं थी, घर में सुख-चैन था — पर एक कमी थी जो कहीं न कहीं टीस बनकर रहती थी। कुसुम की गोद अब तक सूनी थी। वे रोज़ महादेव के सामने हाथ जोड़कर यही माँगती थीं — हे भोलेनाथ, बस एक बार माँ कहलाने का सुख दे दो। पर उनकी पुकार अब तक अनसुनी रही थी।
"आज मन मत खराब करो अपना," शंकर जी ने प्यार से उनके पास बैठते हुए कहा। "महिमा ने इतने स्नेह से बुलाया है — उसका दिल मत तोड़ो।"
कुसुम ने कुछ नहीं कहा। बस साड़ी बदली और मुखिया जी के घर की तरफ चल पड़ीं।
मुखिया जी का घर आज गाँव की औरतों से भरा था। हर तरफ हँसी-ठिठोली, गीत और रौनक थी। महिमा पूरे गाँव की लाडली थी — उसे सब बेहद चाहते थे।
कुसुम को देखते ही कानाफूसी शुरू हो गई।
"इसे यहाँ किसने बुलाया?" एक औरत ने दूसरी के कान में कहा, इतनी आवाज़ में कि कुसुम तक साफ़ पहुँचे।
"ख़ुद को तो कभी संतान का सुख नहीं मिला, और दूसरों की खुशियों में चली आई बाधा बनने।"
कुसुम ने सब सुना और अनसुना कर दिया। उनकी नज़रें बस महिमा पर टिकी थीं — कितनी सुंदर लग रही थी वो आज, चारों तरफ से प्यार में घिरी हुई।
तभी महिमा की चाची आगे आईं और सीधे बोल पड़ीं, "जीजी, कुसुम को किसने बुलाया? आपको नहीं पता कि ऐसे शुभ मौकों पर ऐसी औरतों को नहीं बुलाते जिनकी खुद की कोई संतान न हो।"
कुसुम ने उनकी तरफ देखा। सीना भारी हो रहा था।
महिमा तुरंत आगे बढ़ी और बोली, "मैंने बुलाया है कुसुम चाची को। आप जानती हैं ना कि मैं उनसे कितना प्यार करती हूँ — वो सिर्फ मेरे लिए यहाँ आई हैं।"
पर महिमा की माँ ने उसे सख़्ती से झिड़क दिया, "तू इन बातों में मत पड़। ये सब तू नहीं समझेगी अभी। तेरी चाची सही कह रही हैं।"
यह सुनते ही सभी औरतों की नज़रें कुसुम पर आ टिकीं।
फिर मुखिया जी की पत्नी बोल पड़ीं — जो अब तक दबी ज़बान में कहा जा रहा था, वो अब खुलकर सामने आ गया।
"कितनी बेशरम औरत है — इतना सब सुनने के बाद भी यहीं खड़ी है।"
कुसुम की आँखें भर आईं। महिमा कुछ कहना चाहती थी पर उसकी माँ ने उसे चुप करा दिया था। कुसुम ने किसी को नहीं देखा, कुछ नहीं कहा — बस वहाँ से बाहर निकल आईं।
उसी वक्त गाँव का एक आदमी उधर से गुज़र रहा था। उसने सब देखा था — कैसे औरतों ने कुसुम को भरे जमावड़े में अपमानित किया और कैसे वो रोती हुई नदी की तरफ जा रही हैं।
वो घबराया और दौड़ता हुआ शंकर जी के पास पहुँचा।
"पंडित जी… गाँव की औरतों ने कुसुम भाभी को बहुत अपमानित किया है। वो रोती हुई नदी की तरफ जा रही हैं — जल्दी चलिए।"
शंकर जी के पाँव तले ज़मीन खिसक गई। वे बिना एक पल गंवाए घाट की तरफ दौड़ पड़े।
जब तक वो वहाँ पहुँचे, कुसुम घाट के किनारे पर खड़ी थीं।
उन्होंने एक बार ऊपर आसमान की तरफ देखा, होठों पर भगवान का नाम लिया — और नदी में कूद गईं।
"कुसुम!"
शंकर जी की चीख पूरे घाट पर गूँज उठी। वे बिना रुके पानी में कूद गए और किसी तरह उन्हें पकड़कर किनारे खींच लाए।
किनारे पर आकर भी कुसुम छटपटाती रहीं, रोती रहीं।
"छोड़ दीजिए मुझे… मैं जीना नहीं चाहती।" उनकी आवाज़ टूटी हुई थी।
"माँ नहीं बन सकती तो मेरे होने का क्या मतलब है? सब मुझ पर सवाल उठाते हैं — और मेरी वजह से आप पर भी उँगली उठती है। मैंने कितनी बार कहा था — दूसरी शादी कर लीजिए, मुझे आज़ाद कर दीजिए। पर आपने कभी नहीं सुना मेरी बात। अब इस ज़िंदगी को और कितना ढोऊँ मैं?"
शंकर जी ने एक पल भी नहीं रुके — उन्होंने कुसुम को कसकर अपने सीने से लगा लिया।
"कुसुम," उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, "एक बार मेरी तरफ देखो। क्या मेरे प्यार में कभी कोई कमी रही है तुम्हें?"
कुसुम फूट-फूटकर रो पड़ीं।
"भगवान ने हमें संतान नहीं दी — यह उनकी इच्छा है," शंकर जी ने धीरे से कहा। "पर तुम मुझे छोड़कर चली जाओ — यह मेरी इच्छा नहीं है, कुसुम। यह मुझसे नहीं होगा।"
"ये कैसी इच्छा है भगवान की…" कुसुम सिसकते हुए बोलीं। "मैं भी माँ बनना चाहती थी। बस यही एक चाहत थी मेरी।"
शंकर जी कुछ नहीं बोले — बस उन्हें और कसकर थामे रहे।
दोनों घाट के किनारे बैठे रहे। कुसुम धीरे-धीरे शांत होने लगीं। शंकर जी को पहले से अंदाज़ा था कि वहाँ जाने से कुसुम का दिल भारी होगा — पर महिमा ने खुद आकर बुलाया था, इसलिए उन्होंने रोका नहीं था। काश रोका होता।
कुछ देर बाद शंकर जी ने गंभीर होकर कहा —
"कुसुम, मेरी कसम है तुम्हें। अगर तुमने फिर कभी ऐसी बात सोची — तो तुमसे पहले मैं ही इस दुनिया से चला जाऊँगा।"
कुसुम ने घबराकर झट से उनके मुँह पर हाथ रख दिया।
"ऐसा कभी मत बोलिए," वो सिसकते हुए बोलीं, "कभी नहीं।"
कब रात घिर आई, दोनों को पता ही नहीं चला।
हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई। बूँदें धीरे-धीरे गिरने लगीं — जैसे आसमान भी उनके साथ रो रहा हो।
और तभी — पास की झाड़ियों से किसी बच्चे के रोने जैसी आवाज़ आई।
शंकर जी और कुसुम दोनों एक साथ चौंके और एक-दूसरे को देखने लगे।
झाड़ियों के पीछे क्या था? क्या भगवान ने आखिरकार उनकी पुकार सुन ली थी?
जानने के लिए आगे पढ़िए