Bandh Lifafa - 3 in Hindi Thriller by Digant J Patel books and stories PDF | बंद लिफाफा - 3

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बंद लिफाफा - 3

अनिकेत के हाथ काँप रहे थे।
मोबाइल की स्क्रीन पर अब भी वही संदेश चमक रहा था—
"पीछे मुड़कर मत देखना..."
लेकिन वह पीछे मुड़ चुका था।
अँधेरे में...
करीब पचास कदम दूर...
एक आदमी खड़ा था।
काले कपड़े...
काला मास्क...
और हाथ में एक सफ़ेद लिफाफा।
वह धीरे-धीरे ताली बजा रहा था।
ठक... ठक... ठक...
इंस्पेक्टर राघव ने तुरंत पिस्तौल तान दी।
"रुको!"
लेकिन उस आदमी ने भागने की कोशिश नहीं की।
वह बस मुस्कुराया...
और मास्क उतार दिया।
अनिकेत की आँखें फैल गईं।
राघव के मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला—
"अ... अर्जुन?"
वही चेहरा...
वही आँखें...
तीस साल पुरानी तस्वीर वाला आदमी।
राघव के मृत घोषित किए गए बड़े भाई—अर्जुन।
"यह... यह कैसे हो सकता है?" राघव की आवाज़ काँप रही थी।
अर्जुन मुस्कुराया।
"मैं मरा नहीं था, राघव..."
"मुझे मरने के लिए छोड़ दिया गया था।"
राघव ने धीरे-धीरे पिस्तौल नीचे कर दी।
"भैया..."
"मैंने तुम्हें हर जगह ढूँढ़ा था..."
अर्जुन हँस पड़ा।
लेकिन उसकी हँसी में दर्द था।
"झूठ मत बोलो।"
"अगर तुमने सच में मुझे ढूँढ़ा होता...
तो आज यह खेल शुरू ही नहीं होता।"
अनिकेत बीच में बोला—
"बस! कोई तो सच बताए!"
अर्जुन उसकी तरफ़ मुड़ा।
"तुम्हें लगता है कि यह लिफाफा तुम्हारे लिए आया है?"
"नहीं..."
"तुम तो सिर्फ़ मोहरा हो।"
अनिकेत सन्न रह गया।
अर्जुन ने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।
"जिस जवाब की तलाश है...
वह इस अनाथालय में नहीं है।"
"वह शहर के बाहर बने पुराने लॉकर्स में है।"
"लॉकर नंबर—307।"
इतना कहकर उसने चाबी अनिकेत की ओर फेंकी।
लेकिन उसी क्षण...
धाँय!
एक गोली चली।
गोली अर्जुन के कंधे में लगी।
वह ज़मीन पर गिर पड़ा।
अनिकेत और राघव ने पीछे देखा।
छत पर एक स्नाइपर खड़ा था।
उसने दूसरी गोली चलाई।
धाँय!
गोली इस बार राघव के बहुत पास से निकली।
तीनों अलग-अलग दिशा में भागे।
कुछ ही सेकंड बाद...
स्नाइपर गायब हो चुका था।
अनिकेत वापस उसी जगह पहुँचा...
जहाँ अर्जुन गिरा था।
लेकिन...
वहाँ कोई नहीं था।
न अर्जुन...
न खून...
न चाबी।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
सिर्फ़ ज़मीन पर पड़ा था...
एक नया सफ़ेद लिफाफा।
उस पर लिखा था—
"अब तुम सही रास्ते पर हो..."
अनिकेत ने इस बार बिना देर किए लिफाफा खोला।
अंदर सिर्फ़ एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में...
एक परिवार मुस्कुरा रहा था।
माँ...
पिता...
दो छोटे बच्चे...
और उनमें से एक बच्चा...
अनिकेत था।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
"लेकिन..."
"मेरे माता-पिता तो एक सड़क दुर्घटना में मरे थे..."
राघव ने तस्वीर उसके हाथ से ली।
पीछे कुछ लिखा था।
"दुर्घटना नहीं... हत्या।"
नीचे तारीख़ थी—
18 जुलाई 1996
राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।
उन्होंने धीरे से कहा—
"यही तारीख़...
जिस दिन अर्जुन गायब हुआ था।"
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
अब पहली बार उन्हें एहसास हुआ...
कि अर्जुन का गायब होना...
अनिकेत के माता-पिता की मौत...
और यह सफ़ेद लिफाफा...
तीनों एक ही कहानी के हिस्से थे।
लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी था—
आख़िर 1996 में हुआ क्या था?
उसी समय...
अनिकेत के मोबाइल पर एक वीडियो अपने-आप चलने लगा।
स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।
उसका चेहरा धुँधला था।
उसने कैमरे की तरफ़ देखकर कहा—
"अगर तुम यह वीडियो देख रहे हो... तो समझ लो... तुम्हारे माँ-बाप की हत्या करने वाला... आज भी ज़िंदा है।"
और फिर...
उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा कैमरे के सामने लाना शुरू किया
रात के 2:17 बज रहे थे।

अनिकेत और इंस्पेक्टर राघव सड़क किनारे खड़ी जीप में बैठे थे।
मोबाइल की स्क्रीन पर वही वीडियो चल रहा था।
वीडियो में दिख रहा आदमी धीरे-धीरे कैमरे के पास आया...
उसका चेहरा अब साफ़ दिखाई देने लगा।
अनिकेत की साँसें रुक गईं।
राघव के हाथ काँपने लगे।
वह आदमी कोई और नहीं...
इंस्पेक्टर राघव था।
अनिकेत ने घबराकर राघव की तरफ़ देखा।
"सर... ये... ये कैसे हो सकता है?"
राघव खुद भी हैरान थे।
"नहीं... यह नामुमकिन है।"
"यह वीडियो नकली है..."
लेकिन वीडियो अभी खत्म नहीं हुआ था।
स्क्रीन पर वही आदमी बोला—
"अगर तुम यह वीडियो देख रहे हो... तो शायद मैं अब ज़िंदा नहीं हूँ।"
अनिकेत चौंक गया।
आवाज़ राघव जैसी थी...
लेकिन बोलने का अंदाज़ अलग था।
वीडियो में आदमी आगे बोला—
"मेरा नाम राघव नहीं... राघवेंद्र सिंह है।"
"और मेरा एक जुड़वाँ भाई था..."
"राघव।"
जीप में सन्नाटा छा गया।
राघव की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
"मैंने... यह बात कभी किसी को नहीं बताई।"
अनिकेत ने पूछा—
"मतलब... दो भाई थे?"
राघव ने सिर हिलाया।
"हाँ..."
"मैं और राघवेंद्र जुड़वाँ थे।"
"लेकिन बचपन में..."
"हम अलग हो गए।"
"सबको लगा कि राघवेंद्र मर गया।"
अनिकेत का दिमाग़ घूम गया।
"तो वीडियो में कौन है?"
राघव ने जवाब दिया—
"मेरा भाई..."
उसी समय...
वीडियो फिर चलने लगा।
राघवेंद्र कैमरे की तरफ़ देखकर बोला—
"अगर यह वीडियो अनिकेत तक पहुँचा है... तो इसका मतलब है... 'वह' अब भी ज़िंदा है।"
"उस पर भरोसा मत करना... वह पुलिस में है..."
वीडियो अचानक बंद हो गया।
नाम नहीं बताया गया।
राघव ने गहरी साँस ली।
"हमारे बीच कोई पुलिस वाला गद्दार है।"
अनिकेत बोला—
"लेकिन कौन?"
राघव कुछ सोच ही रहे थे कि...
अचानक उनके वायरलेस पर आवाज़ आई—
**"इंस्पेक्टर राघव... तुरंत मुख्यालय पहुँचे।"
"आपको केस से हटा दिया गया है।"**
राघव हैरान रह गए।
"क्या?"
आवाज़ फिर आई—
"और ध्यान रहे... अनिकेत को ज़िंदा मत आने देना..."
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।
यह आदेश...
पुलिस कंट्रोल रूम से आया था।
राघव ने बिना एक पल गँवाए जीप स्टार्ट की।
"अब हमें किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए।"
लेकिन...
जीप मुश्किल से दो किलोमीटर चली होगी कि...
अचानक सामने से एक ट्रक पूरी रफ़्तार में उनकी तरफ़ आया।
राघव ने जीप मोड़ दी।
धड़ाम...!
जीप सड़क से नीचे खाई में जा गिरी।
सब कुछ अँधेरा हो गया।
जब अनिकेत की आँख खुली...
सुबह हो चुकी थी।
उसके सिर से खून बह रहा था।
जीप पूरी तरह टूट चुकी थी।
उसने घबराकर राघव को ढूँढा।
लेकिन...
ड्राइविंग सीट खाली थी।
राघव गायब थे।
उसी समय...
जीप के शीशे पर किसी ने उँगली से लिखा हुआ था—
"राघव को हमने नहीं उठाया..."
"वह खुद हमारे साथ आया है।"
अनिकेत का दिल बैठ गया।
क्या राघव ने उसे धोखा दिया?
या...
राघव का अपहरण हो चुका था?
उसी समय...
उसे मलबे में एक छोटी-सी धातु की प्लेट मिली।
उस पर सिर्फ़ एक निशान बना था—
एक सफ़ेद लिफाफा... और उसके नीचे लिखा था—
"THE CIRCLE"
अनिकेत पहली बार इस नाम से परिचित हुआ।
उसे अभी नहीं पता था...
कि "द सर्कल" सिर्फ़ एक संगठन नहीं...
बल्कि पिछले 30 वर्षों से सैकड़ों लोगों की ज़िंदगी नियंत्रित करने वाला एक गुप्त नेटवर्क था।
और...
उसका अगला निशाना...
खुद अनिकेत था।