Lal Nishan - 1 in Hindi Detective stories by Pankaj Sharma books and stories PDF | लाल निशान - 1

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लाल निशान - 1

लाल निशान

भाग – 1 : मौत की शुरुआत

अध्याय 1

रात, जिसने शहर की नींद छीन ली

रात के दो बजकर सत्रह मिनट।

अर्जुनपुर शहर सो रहा था।

सड़कें लगभग खाली थीं। कहीं-कहीं स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी बारिश से भीगी सड़क पर पड़ रही थी। आसमान में बादल इतने घने थे कि चाँद का नामोनिशान नहीं था। हवा में अजीब-सी ठंडक थी, जैसे मौसम किसी अनहोनी की खबर पहले से जानता हो।

शहर के बाहरी इलाके में स्थित शिव विहार पार्क वर्षों से वीरान पड़ा था। दिन में भी वहाँ लोग कम ही आते थे। पार्क के पीछे घना जंगल था और सामने आधा बना हुआ फ्लाईओवर, जहाँ रात के बाद कोई रुकना पसंद नहीं करता था।

अचानक उस सन्नाटे को एक कुत्ते के लगातार भौंकने की आवाज़ ने तोड़ दिया।

पार्क का बूढ़ा चौकीदार रामलाल अपनी छोटी-सी झोपड़ी से बाहर निकला। उसके हाथ में पुरानी टॉर्च थी।

"चुप... क्या हुआ रे?" उसने कुत्ते को डाँटते हुए कहा।

लेकिन कुत्ता पीछे हटने के बजाय और ज़ोर से भौंकने लगा।

रामलाल ने टॉर्च जलाई और धीरे-धीरे उस दिशा में चल पड़ा।

जैसे ही रोशनी सामने पहुँची, उसके कदम वहीं जम गए।

उसकी साँस अटक गई।

एक युवती घास पर सीधी लेटी हुई थी।

सफेद कुर्ता पूरी तरह खून से भीग चुका था।

उसकी आँखें खुली थीं...

लेकिन उनमें अब कोई जीवन नहीं था।

रामलाल के हाथ काँपने लगे।

वह डरते-डरते कुछ कदम और आगे बढ़ा।

तभी उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी।

लाश से लगभग चार फीट दूर...

खून से बना एक अजीब-सा निशान था।

आधा लाल वृत्त...

और उसके बीच से गुजरती एक सीधी लाल रेखा।

वह कोई आकृति नहीं लग रही थी।

मानो किसी ने जानबूझकर बहुत सावधानी से उसे बनाया हो।

रामलाल ने घबराकर पीछे कदम बढ़ाए, लेकिन उसका पैर पत्थर से टकराया और वह गिर पड़ा।

किसी तरह उठकर उसने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।

"हैलो... पुलिस... यहाँ... यहाँ किसी लड़की का... खून..."

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

---

सुबह छह बजे तक पूरा इलाका पुलिस से भर चुका था।

पीली बैरिकेडिंग लगा दी गई थी।

फोरेंसिक वैन, पुलिस जीप, एम्बुलेंस और मीडिया की गाड़ियाँ लगातार पहुँच रही थीं।

कैमरों की फ्लैश चमक रही थीं।

"क्या शहर में सीरियल किलर घूम रहा है?"

"युवती की बेरहमी से हत्या!"

"क्या पुलिस पूरी तरह नाकाम हो चुकी है?"

रिपोर्टरों की आवाज़ें एक-दूसरे पर चढ़ रही थीं।

तभी एक काली एसयूवी पार्क के बाहर आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला।

गहरे नीले रंग की वर्दी पहने एक महिला अधिकारी तेज़ कदमों से नीचे उतरीं।

एसीपी काव्या सिंह।

करीब पैंतीस वर्ष।

तेज़ नज़र।

बिल्कुल सीधा स्वभाव।

किसी भी केस को भावनाओं से नहीं, तथ्यों से देखने वाली अधिकारी।

"मीडिया को लाइन के बाहर रखिए," उन्होंने उतरते ही आदेश दिया।

एक कॉन्स्टेबल दौड़कर आया।

"जी मैडम।"

काव्या सीधे शव के पास पहुँचीं।

उन्होंने कुछ सेकंड तक बिना कुछ बोले मृतका को देखा।

चेहरे पर भय का कोई भाव नहीं था।

मानो मौत अचानक आई हो।

उन्होंने दस्ताने पहने।

घुटनों के बल बैठीं।

गर्दन पर एक बेहद महीन लेकिन गहरा कट था।

इतना सटीक कि पहली नज़र में दिखाई भी नहीं देता।

"एक ही वार..." उन्होंने धीरे से कहा।

इतने में फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. निखिल वर्मा भी पहुँच गए।

लगभग चालीस वर्ष के, शांत स्वभाव, चश्मा, और हर अपराध स्थल को प्रयोगशाला की तरह देखने वाले वैज्ञानिक।

"सुप्रभात, मैडम।"

"अगर इसे सुप्रभात कह सकते हैं तो..." काव्या ने बिना मुस्कराए जवाब दिया।

डॉ. निखिल ने शव की जाँच शुरू की।

कुछ मिनट बाद बोले—

"दिलचस्प है।"

"क्या?"

"संघर्ष का कोई निशान नहीं।"

"मतलब?"

"लड़की ने हमलावर से लड़ने की कोशिश नहीं की। नाखून साफ़ हैं। हाथों पर खरोंच नहीं। कपड़े फटे नहीं।"

काव्या ने भौंहें सिकोड़ लीं।

"क्या उसे पहले बेहोश किया गया?"

"संभव है। लेकिन पोस्टमार्टम के बाद ही निश्चित कह सकता हूँ।"

"हत्या का समय?"

"रात ग्यारह से एक बजे के बीच।"

काव्या ने आसपास नज़र दौड़ाई।

"फिंगरप्रिंट?"

"अभी तक कुछ नहीं।"

"जूते के निशान?"

"बारिश ने मिटा दिए।"

"सीसीटीवी?"

पास खड़े सब-इंस्पेक्टर ने जवाब दिया—

"मैडम, पार्क के कैमरे पिछले महीने से खराब हैं।"

काव्या ने गहरी साँस ली।

"और शहर वाले सोचते हैं कि अपराधी भाग्य से बच जाते हैं..."

---

तभी भीड़ को चीरती हुई एक युवती कैमरा और माइक्रोफोन लेकर बैरिकेड तक पहुँची।

"मैडम! मैं मीरा शर्मा, सिटी लाइव न्यूज़ से।"

काव्या ने उसकी ओर देखा।

"क्राइम सीन के अंदर आने की अनुमति नहीं है।"

"बस एक सवाल।"

"नहीं।"

"क्या यह किसी सीरियल किलर का काम है?"

काव्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।

मीरा मुस्कराई।

"आप जवाब नहीं देंगी, लेकिन जनता यही पूछेगी।"

काव्या बिना कुछ बोले आगे बढ़ गईं।

मीरा ने अपने कैमरामैन से धीरे से कहा—

"याद रखना... यह सिर्फ हत्या नहीं है। मुझे लग रहा है, यह कहानी अभी शुरू हुई है।"

---

दोपहर तक मृतका की पहचान हो गई।

नाम—रिया मल्होत्रा।

उम्र—चौबीस वर्ष।

पेशा—सॉफ्टवेयर इंजीनियर।

दो दिन पहले वह ऑफिस से घर लौटते समय लापता हो गई थी।

उसके परिवार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

कोई दुश्मनी नहीं।

कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं।

कोई फिरौती की माँग नहीं।

फिर उसे क्यों मारा गया?

यह सवाल पूरे पुलिस विभाग के सामने था।

---

उसी शाम पुलिस मुख्यालय में आपात बैठक बुलाई गई।

कमिश्नर राजीव खन्ना कॉन्फ्रेंस टेबल के सामने खड़े थे।

कमरे में शहर के सभी वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

दीवार पर लगी स्क्रीन पर उसी लाल प्रतीक की तस्वीर दिखाई दे रही थी।

कमिश्नर ने गंभीर स्वर में कहा—

"यदि यह एक अकेली हत्या होती, तो मैं इसे सामान्य अपराध मानता।"

उन्होंने कुछ क्षण रुककर सबकी ओर देखा।

"लेकिन..."

उन्होंने रिमोट का बटन दबाया।

स्क्रीन पर एक पुरानी फाइल खुली।

तीन वर्ष पुरानी।

एक दूसरी युवती की तस्वीर।

और उसके पास...

वही लाल निशान।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

एसीपी काव्या ने हैरानी से स्क्रीन की ओर देखा।

"सर... यह केस तो कभी मीडिया में आया ही नहीं था।"

कमिश्नर ने धीरे से कहा—

"क्योंकि उस समय इसे अलग घटना समझकर बंद कर दिया गया था।"

उन्होंने मेज़ पर एक मोटी फाइल रखी।

फाइल के ऊपर सिर्फ एक नाम लिखा था—

डिटेक्टिव आर्यन राठौर।

"यह केस अब उसी के हाथ में जाएगा।"

काव्या ने धीमे स्वर में पूछा—

"क्या वह वापस आएगा?"

कमिश्नर की आँखें कुछ पल के लिए खिड़की की ओर टिक गईं।

"अगर उसने यह लाल निशान देख लिया..."

"तो वह ज़रूर आएगा।"

और उसी समय...

शहर से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर...

एक पुराने पहाड़ी कस्बे में...

एक आदमी लकड़ी की मेज़ पर रखी उसी लाल निशान वाली तस्वीर को बिना पलक झपकाए देख रहा था।

उसका नाम था—

आर्यन राठौर।

उसने तस्वीर उठाई...

और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

"तो... तुम वापस आ गए।"