Ansh kartik Aryan - 15 in Hindi Crime Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | अंश, कार्तिक, आर्यन - 15

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अंश, कार्तिक, आर्यन - 15

श्री मलोत्रा अपनी बेटी कल्याणी के साथ हवेली की ओर लौट रहे थे।

कार शहर की भीड़भाड़ से निकलकर अब एक सुनसान सड़क पर पहुँच चुकी थी।

चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था।

सड़क के दोनों ओर घने पेड़ खड़े थे, जिनकी परछाइयाँ सड़क पर अजीब-सी आकृतियाँ बना रही थीं।

दूर-दूर तक कोई दूसरी गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी।

हवेली अब ज़्यादा दूर नहीं थी।

बस कुछ ही मिनटों की दूरी बाकी थी।

कार के भीतर माहौल बिल्कुल अलग था।

श्री मलोत्रा पूरे रास्ते अपने आने वाले नाती की बातें कर रहे थे।

"देखना, मैं उसे सबसे पहले घुड़सवारी सिखाऊँगा..."

उन्होंने हँसते हुए कहा।

कल्याणी मुस्कुराई।

"पापा... अगर वो घोड़ों से डर गया तो?"

"तो मैं उसे डरना ही नहीं सिखाऊँगा।"

दोनों की हँसी कार में गूँज उठी।

उन्हें क्या पता था...

कि किस्मत उनकी इस हँसी को आख़िरी बार सुन रही है।

अचानक...

चर्ररर...!

ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक लगाया।

कार झटके के साथ रुक गई।

कल्याणी ने घबराकर सामने की सीट पकड़ ली।

श्री मलोत्रा ने तुरंत आगे देखा।

"क्या हुआ?" उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा।

"गाड़ी क्यों रोक दी?"

ड्राइवर की नज़रें सामने सड़क पर जमी हुई थीं।

उसके माथे पर पसीना आ गया।

काँपती आवाज़ में उसने कहा—

"सर... आगे सड़क के बीचों-बीच कोई गाड़ी खड़ी है..."

श्री मलोत्रा ने शीशे से बाहर झाँका।

सचमुच...

थोड़ी दूरी पर एक काली एसयूवी तिरछी खड़ी थी, जिसने पूरा रास्ता रोक रखा था।

उसके शीशे पूरी तरह काले थे।

अंदर कौन था...

कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

पूरे इलाके में ऐसा सन्नाटा था कि दूर कहीं पेड़ों से उड़ते पक्षियों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।

श्री मलोत्रा की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

उनका वर्षों का अनुभव उन्हें चेतावनी दे रहा था...

"कुछ ठीक नहीं है..."श्री मलोत्रा ने एक बार फिर सामने खड़ी काली एसयूवी की ओर देखा।

उनकी अनुभवी आँखें उस सुनसान सड़क को ध्यान से परख रही थीं।

चारों ओर अजीब-सा सन्नाटा था।

न कोई दूसरी गाड़ी…

न कोई राहगीर…

न कोई आवाज़।

यह सन्नाटा उन्हें बेचैन कर रहा था।

उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में ड्राइवर से कहा—

"जाओ... देखकर आओ कि मामला क्या है।"

ड्राइवर ने शीशे से एक बार फिर बाहर झाँका।

"जी, सेठ जी।"

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला और सावधानी से नीचे उतरा।

उसकी नज़रें लगातार सामने खड़ी गाड़ी पर थीं।

वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।

हर कदम के साथ वातावरण और भी भारी होता जा रहा था।

कार के अंदर बैठी कल्याणी को भी अब बेचैनी होने लगी थी।

उसने धीरे से अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।

"पापा... मुझे अच्छा नहीं लग रहा।"

श्री मलोत्रा ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।

"घबराओ मत, बेटा। शायद किसी की गाड़ी खराब हो गई होगी।"

उन्होंने उसे दिलासा तो दिया…

लेकिन उनके अपने मन में भी एक अनजाना डर घर करने लगा था।

उधर ड्राइवर अब उस काली एसयूवी के बिल्कुल पास पहुँच चुका था।

उसने धीरे से आवाज़ लगाई—

"कोई है...? आपकी गाड़ी खराब हो गई है क्या?"

कोई जवाब नहीं आया।

उसने दोबारा पुकारा—

"हैलो... कोई सुन रहा है?"

फिर भी चारों ओर सन्नाटा ही पसरा रहा।

ड्राइवर ने हिम्मत करके गाड़ी की खिड़की के पास झाँकने के लिए कदम बढ़ाया…

और तभी...

उसकी नज़र गाड़ी के नीचे ज़मीन पर पड़ी एक लाल बूंद पर गई।

वह ठिठक गया।

उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।ड्राइवर धीरे-धीरे उस गाड़ी के पास पहुँचा।

उसने शीशे से अंदर झाँका।

जो दृश्य उसने देखा, उससे उसके चेहरे का तनाव कुछ कम हो गया।

गाड़ी के अंदर एक आदमी बेहद घबराया हुआ बैठा था।

उसके साथ एक गर्भवती महिला थी।

महिला दर्द से कराह रही थी।

उसके माथे पर पसीना था और वह बार-बार अपने पेट पर हाथ रख रही थी।

ऐसा लग रहा था कि उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो चुकी थी।

वह आदमी लगातार उसे ढाँढस बँधा रहा था।

"बस... थोड़ा और हिम्मत रखो।"

"हम अस्पताल पहुँच जाएंगे।"

"कुछ नहीं होगा तुम्हें... मैं यहीं हूँ।"

उसकी आवाज़ में घबराहट भी थी और अपनी पत्नी को संभालने की पूरी कोशिश भी।

ड्राइवर ने तुरंत आगे बढ़कर पूछा—

"क्या हुआ? आपकी गाड़ी खराब हो गई है?"

उस आदमी ने परेशान होकर कहा—

"हाँ... अचानक इंजन बंद हो गया। मेरी पत्नी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। मैं बहुत कोशिश कर चुका हूँ, लेकिन गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही।"

ड्राइवर ने एक पल के लिए महिला की हालत देखी।

वह सचमुच दर्द से तड़प रही थी।

उसे लगा कि हर पल कीमती है।

वह बिना देर किए वापस श्री मलोत्रा की कार की ओर दौड़ा।

कार के पास पहुँचते ही उसने जल्दी-जल्दी कहा—

"सेठ जी... सामने एक दंपती है। उनकी गाड़ी खराब हो गई है। महिला माँ बनने वाली है और उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो चुकी है। लगता है उन्हें तुरंत अस्पताल पहुँचाना होगा।"

श्री मलोत्रा ने बिना एक पल गंवाए कार का दरवाज़ा खोला।

"चलो," उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, "पहले उनकी मदद करते हैं।"

कल्याणी ने भी चिंता से उस दिशा में देखा।

उसे नहीं पता था...

कि कुछ ही पलों में यह सुनसान सड़क उनकी ज़िंदगी का रुख हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
ड्राइवर तेज़ी से वापस कार के पास पहुँचा।

उसने हल्का-सा झुककर कहा—

"सेठ जी, सामने वाली गाड़ी में एक परिवार है। उनकी गाड़ी अचानक खराब हो गई है।"

श्री मलोत्रा ने गंभीर स्वर में पूछा—

"क्या हुआ है?"

ड्राइवर ने बिना समय गँवाए पूरी बात बताई—

"सर, एक महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। उनके पति पीछे बैठकर उन्हें संभाल रहे हैं और उनका छोटा भाई गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इंजन बिल्कुल जवाब दे चुका है।"

उसने एक पल रुककर फिर कहा—

"वो लोग बहुत परेशान हैं, सर। बार-बार मदद की गुहार लगा रहे हैं। अगर उन्हें जल्दी अस्पताल नहीं पहुँचाया गया, तो माँ और बच्चे—दोनों की जान को खतरा हो सकता है।"

श्री मलोत्रा कुछ क्षण चुप रहे।

उन्होंने सामने खड़ी गाड़ी की ओर देखा।

फिर अपनी बेटी कल्याणी की तरफ नज़र डाली, जो स्वयं भी माँ बनने वाली थी।

उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

उन्होंने बिना एक पल सोचे दृढ़ स्वर में कहा—

"किसी की जान बचाना सबसे बड़ा धर्म है।"

"उन्हें हमारी गाड़ी में बैठाओ। हम उन्हें अस्पताल छोड़ देंगे।"

ड्राइवर ने तुरंत सिर झुकाया।

"जी, सेठ जी।"

वह तेजी से वापस उस परिवार की ओर दौड़ पड़ा, जबकि श्री मलोत्रा और कल्याणी भी कार से उतरकर उनकी मदद के लिए आगे बढ़ने लगे।ड्राइवर तुरंत उस परिवार के पास पहुँचा और बोला—

"आइए, सेठ जी ने आपको अपनी गाड़ी से अस्पताल छोड़ने का फैसला किया है। देर करना ठीक नहीं होगा।"

यह सुनते ही उस आदमी की आँखों में उम्मीद की चमक लौट आई।

उसने भावुक होकर कहा—

"भगवान आपका भला करे... आपने हमारी बहुत बड़ी मदद कर दी।"

वह सावधानी से अपनी गर्भवती पत्नी को सहारा देकर गाड़ी से बाहर लाया।

महिला दर्द से कराह रही थी।

उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।

श्री मलोत्रा खुद आगे बढ़े और बोले—

"आराम से... घबराइए मत। अब आप सुरक्षित हैं।"

कल्याणी भी तुरंत बाहर आई।

उसने महिला का हाथ थाम लिया और बड़े प्यार से कहा—

"हिम्मत रखिए बहन, बस थोड़ी ही देर में हम अस्पताल पहुँच जाएंगे।"

दोनों ने मिलकर उसे संभाला और धीरे-धीरे मलोत्रा परिवार की कार की पिछली सीट पर बैठा दिया।

उसका पति भी उसके पास बैठ गया, जबकि उसका देवर आगे वाली सीट पर ड्राइवर के बगल में बैठ गया।

सबके बैठते ही ड्राइवर ने इंजन स्टार्ट किया।

श्री मलोत्रा ने शांत स्वर में कहा—

"जल्दी चलो... लेकिन सावधानी से। माँ और बच्चे दोनों सुरक्षित रहने चाहिए।"

कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि यह मदद...

एक बहुत बड़ी साज़िश की शुरुआत बनने वाली थी।सभी लोग गाड़ी में बैठ चुके थे।

ड्राइवर ने बिना देर किए इंजन स्टार्ट किया और कार तेज़ी से अस्पताल की ओर दौड़ा दी।

सड़क अब भी सुनसान थी।

कार के भीतर तनाव का माहौल था।

पीछे की सीट पर कल्याणी उस गर्भवती महिला का हाथ थामे उसे ढाढ़स बँधा रही थी।

"घबराइए मत... बस थोड़ी ही देर में हम अस्पताल पहुँच जाएंगे। सब ठीक होगा।"

महिला ने दर्द से कराहते हुए सिर हिलाया।

उसके पास बैठा आदमी भी बार-बार कह रहा था—

"बस थोड़ा और... हिम्मत रखो।"

आगे वाली सीट पर बैठा उसका छोटा भाई बेचैनी से बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था।

श्री मलोत्रा ने एक नज़र उन लोगों पर डाली।

उन्हें अब भी सब सामान्य ही लग रहा था।

लेकिन...

अगले ही पल सब बदल गया।

पीछे बैठा वह आदमी अचानक सीधा होकर बैठ गया।

उसके चेहरे की घबराहट एक पल में गायब हो चुकी थी।

उसकी जगह एक ठंडी, निर्दयी मुस्कान ने ले ली।

उसने धीरे-धीरे अपनी जैकेट के अंदर हाथ डाला।

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता...

उसने एक पिस्तौल निकाल ली।

"कोई भी हिलेगा नहीं..."

उसकी आवाज़ अब बिल्कुल शांत थी।

अगले ही क्षण उसने पिस्तौल उठाकर सीधे कल्याणी की ओर तान दी।

कार के अंदर सन्नाटा छा गया।

कल्याणी का चेहरा सफेद पड़ गया।

ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर में यह दृश्य देखा तो उसके हाथ स्टीयरिंग पर कस गए।

श्री मलोत्रा की आँखें अविश्वास से फैल गईं।

उन्होंने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा—

"ये... क्या कर रहे हो तुम?"

वह आदमी हल्का-सा मुस्कुराया।

"वही... जिसके लिए हम यहाँ आए हैं, सेठ जी।"

उसी पल आगे वाली सीट पर बैठा उसका तथाकथित "देवर" भी मुस्कुराया।

अब उसके हाथ में भी एक हथियार था।

उसने ड्राइवर की ओर देखकर ठंडे स्वर में कहा—

"गाड़ी सीधे चलाते रहो... और कोई चालाकी करने की कोशिश मत करना।"

तभी श्री मलोत्रा को समझ आ गया...

गाड़ी खराब होना...

गर्भवती महिला...

मदद की गुहार...

सब एक सोची-समझी साज़िश थी।