भाग – 1
आईने में बदलता जीवन
आज जब मैं खुद को आईने में देखती हूँ, तो कुछ अलग-सा महसूस होता है। आईने में चेहरा तो वही दिखाई देता है, लेकिन लगता है जैसे जीवन में न जाने कितने बदलाव आ गए हैं।
एक समय था, जब लोग एक साथ बैठते थे, परिवार की तरह रहते थे। एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते थे। रिश्तों में अपनापन था और लोग सामाजिक तथा व्यवहारिक भी थे। किसी के सुख-दुःख में साथ खड़े होना स्वाभाविक था।
लेकिन आज चारों ओर देखती हूँ तो बहुत कुछ बदला हुआ दिखाई देता है। जैसे किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं रहा। क्या यह बदलाव नई पीढ़ी का है?
आज हम आधुनिक दुनिया में जी रहे हैं। सुविधाएँ बढ़ी हैं, सोच के नए रास्ते खुले हैं, लेकिन कभी-कभी मन में एक सवाल उठता है—क्या आधुनिक होने की इस दौड़ में हमने बहुत कुछ खो तो नहीं दिया?
मैं अपने चारों ओर देखती हूँ तो लगता है, लोग एक-दूसरे की आलोचना करने में लगे हैं। कोई किसी की प्रगति को देखकर खुश नहीं होना चाहता। हर कोई स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ साबित करना चाहता है। ऐसा क्यों?
आधुनिक समय ने केवल हमारी जीवनशैली ही नहीं बदली, बल्कि कहीं न कहीं हमारी सोच और हमारे विचारों को भी बदल दिया है।
इन्हीं सवालों के बीच मैं आपको एक ऐसी लड़की की कहानी सुनाना चाहती हूँ, जो इस बदलती दुनिया के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रही है।
उसका नाम है विभा।
विभा आज इक्कीस वर्ष की है, लेकिन फिर भी वह स्वयं को पूरी तरह पहचान नहीं पा रही है।
आखिर क्यों?
यह प्रश्न शायद आपके मन में भी उठ रहा होगा।
तो आइए, विभा को जानने की कोशिश करते हैं।
विभा का बचपन
विभा अपने जीवन के शुरुआती पाँच वर्षों तक बहुत खुश थी। वह अपना पूरा दिन माँ-पापा के साथ बिताती थी। माँ से उसका लगाव कुछ ऐसा था कि वह उन्हें एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं देखना चाहती थी।
अगर माँ थोड़ी देर के लिए भी उसकी आँखों से ओझल हो जातीं, तो विभा बेचैन हो जाती। वह चाहती थी कि उसकी माँ पूरे दिन उसे अपने पास रखें, उससे बातें करें और उसे प्यार करती रहें।
लेकिन देखते ही देखते वे पाँच वर्ष कब बीत गए, पता ही नहीं चला।
अब विभा को स्कूल भेजने का समय आ गया था।
दुनिया की परंपरा थी—बच्चा बड़ा हो तो स्कूल जाए, पढ़े, नियम-कायदे सीखे और जीवन की राह पर आगे बढ़े। लेकिन उस छोटी-सी विभा की दुनिया तो उसकी माँ तक ही सीमित थी।
उसके लिए माँ को छोड़कर स्कूल जाना बहुत कठिन था।
स्कूल जाने के पहले दिन विभा रोते हुए अपनी माँ से कहती—
“मम्मी, मुझे आपको छोड़कर नहीं जाना। मैं आपके बिना नहीं रह पाऊँगी।”
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
माँ भी कहाँ कम दुखी थीं?
लेकिन माँ एक शिक्षिका थीं। उन्हें अपने कर्तव्य का पालन भी करना था। उन्होंने अपने मन को मजबूत किया और अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से अलग करके स्कूल भेज दिया।
विभा रो रही थी और माँ की आँखें भी नम थीं।
विभा की माँ शिक्षिका थीं, इसलिए उन्हें अपने कर्तव्य के कारण विद्यालय में समय देना पड़ता था। उनके पास हमेशा उतना समय नहीं होता था, जितना विभा चाहती थी। फिर भी माँ ने कभी विभा को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उससे दूर हैं।
विभा में एक बात बहुत अलग थी।
जब उसकी माँ उसे एक पल के लिए भी दिखाई नहीं देतीं, तो वह उन्हें याद करके दिनभर रोती रहती। उसकी छोटी-छोटी सिसकियों में केवल एक ही पुकार होती—माँ।
धीरे-धीरे विभा स्कूल जाने लगी।
पहला दिन उसके लिए डर से भरा था। वह सहमी हुई थी और बार-बार अपनी माँ को याद कर रही थी। लेकिन कहते हैं न, बच्चों की दोस्ती जल्दी हो जाती है। धीरे-धीरे उसकी भी दोस्ती होने लगी और उसका मन स्कूल में लगने लगा।
उस समय विभा को पेंसिल ठीक से पकड़ना भी नहीं आता था। बाकी बच्चे धीरे-धीरे सीख रहे थे और विभा भी सीखने की कोशिश कर रही थी। बचपन में हम इन छोटी-छोटी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते। बस खेलते, सीखते और आगे बढ़ते रहते हैं।
फिर स्कूल की छुट्टी हुई और विभा घर लौट आई।
लेकिन उसकी माँ अभी विद्यालय में ही थीं, क्योंकि वे स्वयं एक शिक्षिका थीं।
विभा घर आई और माँ का इंतजार करते-करते सो गई।
कुछ घंटे बाद उसकी माँ घर पहुँचीं। उन्होंने अपनी सोती हुई बेटी को देखा और उसे निहारती रहीं।
“मेरी प्यारी विभा...”
माँ की आँखों में अपनी बेटी के लिए अपार स्नेह था।
कुछ देर बाद विभा की आँखें खुलीं। सामने माँ को देखते ही उसने उन्हें कसकर गले लगा लिया।
वह बोली—
“मम्मी, मैं आपको छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी। मैं हमेशा आपके पास रहूँगी।”
बात बहुत छोटी थी, लेकिन उस छोटी-सी बात में विभा के पूरे बचपन का संसार छिपा था।
विभा धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।
वह अपने स्कूल के शिक्षकों से तो सीखती ही थी, लेकिन उसे सबसे अधिक सीख अपनी माँ से मिलती थी। माँ उसे गणित में पहाड़े सिखातीं, जोड़ना-घटाना सिखातीं और उसके सवालों के जवाब देतीं।
कभी-कभी जब विभा पढ़ाई में ध्यान नहीं देती, तो माँ को उसे डाँटना भी पड़ता। कभी हाथ भी उठ जाता। लेकिन डाँटने के बाद माँ की आँखों में आँसू आ जाते।
विभा अपनी माँ को दुखी नहीं देख सकती थी।
इसलिए वह मेहनत करने लगती।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा और विभा भी बड़ी होती गई।
देखते ही देखते वह तीसरी कक्षा में पहुँच गई।
यहीं से उसके मन में एक ऐसा सवाल जन्म लेने वाला था, जो आगे चलकर उसकी पूरी जिंदगी को प्रभावित करेगा...