नई जगह, नया जीवन
आखिरकार मैं अपनी दादी के रिश्तेदारों के घर रहने चला गया।
शुरुआत में सब कुछ थोड़ा नया-नया सा लग रहा था।
नया घर, नए लोग और नया माहौल…
लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने लगा और मैं भी उस घर के माहौल में ढलता चला गया।
मैं वहाँ सिर्फ रहने वाला नहीं था, बल्कि घर के कामों में भी हाथ बँटाता था।
कभी घास लाने जाना,
कभी पेड़ काटने का काम,
तो कभी घर के दूसरे छोटे-बड़े काम…
जो काम सामने आता, मैं अपनी तरफ से करने की कोशिश करता।
उस समय शायद मुझे ये सब बहुत सामान्य लगता था।
मैं बस यही सोचता था कि जिस घर में रह रहा हूँ, वहाँ के कामों में हाथ बँटाना भी मेरी जिम्मेदारी है।
दिन बीतते गए…
सुबह होती, काम में लग जाता और फिर दिन कब खत्म हो जाता, पता ही नहीं चलता।
लेकिन मेरे मन में एक बात हमेशा रहती थी—
मैं यहाँ सिर्फ समय बिताने नहीं आया हूँ।
मुझे अपना कंप्यूटर कोर्स भी करना है और जिंदगी में आगे बढ़ना है।
मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होगा…
लेकिन इतना जरूर पता था कि 12वीं के बाद शुरू हुई ये नई जिंदगी मुझे बहुत कुछ सिखाने वाली थी।
करीब दो महीने बीत चुके थे। मेरे कंप्यूटर सीखने और बाकी खर्चों का पैसा घर से ही आता था। मैं जिनके घर रह रहा था, उनके घर के कामों में भी हाथ बँटाता था।
एक दिन उन्होंने शायद मज़ाक में, या शायद सच में, मुझसे कहा—
“तू अपने घर चला जा, मेरी बस की बात नहीं है तुझे खिलाना।”
शायद उनके लिए वो बस एक साधारण-सी बात थी, लेकिन न जाने क्यों वो बात सीधे मेरे दिल में उतर गई।
मैंने उस वक्त उनसे कुछ नहीं कहा। बस मन ही मन तय कर लिया कि अब यहाँ नहीं रहना है।
मैं वापस अपने घर चला आया।
घरवालों ने पूछा कि अचानक वापस क्यों आ गया, तो मैंने उन्हें असली वजह नहीं बताई। मैं बस इतना कहकर बात टाल गया—
“आने-जाने का खर्चा बहुत ज्यादा हो रहा था, इसलिए अब कोई कमरा ले लूँगा। वहीं रहकर कंप्यूटर भी करूँगा और कॉलेज भी।”
घरवालों को शायद मेरी बात ठीक लगी होगी, लेकिन मेरे मन में उस दिन की वो एक बात कहीं गहराई तक बैठ गई थी।
कभी-कभी किसी इंसान की कही हुई छोटी-सी बात भी हमारे जीवन का बड़ा फैसला बन जाती है। मेरे लिए भी वो एक ऐसी ही बात थी—जिसने मुझे अपने पैरों पर खड़े होने की तरफ पहला कदम बढ़ाने पर मजबूर कर दिया।
मैंने आखिरकार एक कमरा ले लिया। कंप्यूटर का कोर्स तो ठीक से चल रहा था, लेकिन कॉलेज के एडमिशन अभी शुरू नहीं हुए थे।
अब मेरे पास अपना कमरा था, अपनी एक छोटी-सी दुनिया थी और पहले से ज्यादा आज़ादी भी।
कमरा लेने के बाद नए दोस्त भी बनने लगे। शुरुआत में तो सब कुछ अच्छा ही लगता था। दोस्ती धीरे-धीरे बढ़ती गई और फिर पता चला कि उन दोस्तों का पढ़ाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई खास मतलब नहीं था।
उनकी अपनी ही दुनिया थी—शराब, बीड़ी, लड़कियाँ और ऐसी ही कई आदतें।
मैं भी उस समय इतना समझदार नहीं था कि संगत का असर कितनी दूर तक जाता है। मुझे लगता था कि दोस्ती तो बस दोस्ती है, इंसान अपनी जगह खुद रहता है।
लेकिन शायद मैं भूल गया था—
इंसान जैसा सोचता है, उससे ज्यादा वह वैसा बनने लगता है जैसी उसकी संगत होती है।
और अब मेरी जिंदगी में एक ऐसा दौर शुरू होने वाला था, जहाँ मुझे धीरे-धीरे समझ आने वाला था कि दोस्त सिर्फ हँसी-मजाक के साथी नहीं होते, वे कभी-कभी हमारी जिंदगी की दिशा भी बदल देते हैं।
संगत का असर तो होना ही था… और हुआ भी।
लेकिन इतना भी नहीं हुआ कि मैं पूरी तरह गया-गुजरा बन जाऊँ। 😄
कुछ बातें अपनाईं, कुछ से दूरी बनाए रखी और जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।
फिर आखिरकार वो इंतजार भी खत्म हुआ, जिसका हम सबको बेसब्री से इंतजार था।
12वीं का परीक्षा परिणाम आ गया।
हमारी पूरी क्लास पास हो गई थी… और मैं भी पास हो गया था।
उस दिन खुशी सिर्फ पास होने की नहीं थी, बल्कि इस बात की भी थी कि अब स्कूल की वो दुनिया पीछे छूट चुकी थी और जिंदगी का अगला सफर सामने खड़ा था।
अब सवाल था—आगे करना क्या है?
मेरे मन में एक सपना था—मैं होटल मैनेजमेंट करना चाहता था।
लेकिन पापा चाहते थे कि मैं B.Sc. करूँ।
बस फिर क्या था…
मेरी पसंद और पापा की पसंद आमने-सामने आ गई।
इसी बात को लेकर घर में बहस भी हो गई। मैं अपनी बात पर अड़ा था कि मुझे होटल मैनेजमेंट ही करना है, और पापा चाहते थे कि मैं B.Sc. करूँ।
उस समय शायद मुझे लगता था कि पापा मेरी इच्छा नहीं समझ रहे हैं…
और शायद पापा को लगता था कि मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ हूँ कि अपने भविष्य का सही फैसला खुद कर सकूँ।
दोनों अपनी जगह सही थे।
लेकिन उस उम्र में कहाँ समझ आता है कि माता-पिता की चिंता और हमारी अपनी ख्वाहिशों के बीच की लड़ाई कितनी गहरी होती है।
12वीं तक का सफर खत्म हो चुका था…
अब जिंदगी का असली सफर शुरू होने वाला था।
आखिरकार काफी सोच-विचार और बहस के बाद फैसला हुआ कि मैं कोई कोर्स करूँगा।
उस समय पॉलीटेक्निक के फॉर्म की तारीख निकल चुकी थी, लेकिन Industrial Training Institute (ITI) के फॉर्म खुले हुए थे।
मैंने ज्यादा कुछ सोचा नहीं। मन में बस यही आया—
“चलो, फॉर्म भर देते हैं… जो होगा, देखा जाएगा।”
न कोई बड़ी योजना थी, न भविष्य का कोई साफ नक्शा।
बस एक छोटा-सा फैसला था, जिसके बारे में उस वक्त मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर यही फैसला मेरी जिंदगी को एक नई दिशा देने वाला है।
मैंने ITI का फॉर्म भर दिया…
अब इंतजार था कि आगे क्या होता है।
ITI के पेपर दे दिए थे और अब बस रिजल्ट आने का इंतज़ार था।
वक्त जैसे धीरे-धीरे गुजर रहा था और हमारे पास करने को कुछ खास था नहीं। लेकिन खाली बैठना भी तो हमारी फितरत में नहीं था। 😄
इसी बीच हमने खूब खुराफाती काम किए। उस समय की जिंदगी में न ज्यादा चिंता थी, न भविष्य की इतनी फिक्र… बस दोस्तों के साथ मस्ती थी और हर दिन कोई नया कारनामा।
उन्हीं दिनों हम लोग कर्णप्रयाग संगम पर नहाने जाया करते थे। गर्मियों के दिन थे और मई का महीना था। पानी उस समय काफी कम था, इसलिए एक दिन मन में आया कि क्यों न अलकनंदा नदी को तैरकर पार किया जाए।
बस फिर क्या था… जवान खून और दोस्तों का जोश था। नदी में उतर गए और तैरते-तैरते अलकनंदा को पार भी कर लिया। 😄
उस समय हमें यह एक बहुत बड़ा कारनामा लगता था। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वो उम्र भी क्या उम्र थी, जब खुराफात करने से पहले यह नहीं सोचते थे कि सामने क्या खतरा है।
मई में पानी कम था, इसलिए हम पार कर गए थे। लेकिन आज उसी जगह को देखकर शायद कोई पार करने की सोच भी नहीं सकता।
वक्त के साथ नदी वही रही, किनारे वही रहे…
बस हम बदल गए और वो बेफिक्र वाला बचपन कहीं पीछे छूट गया।
आज उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है कि जिंदगी में सबसे कीमती चीज शायद वही थी—
दोस्तों के साथ बिताया हुआ वो समय, जिसमें जेब खाली थी लेकिन दिल खुशियों से भरा रहता था।
आखिरकार ITI का रिजल्ट भी आ गया। शायद मेरी रैंक करीब 3000 के आसपास थी। रैंक देखकर मन में एक उम्मीद जगी कि अब शायद आगे कुछ अच्छा हो जाएगा।
फिर आई काउंसलिंग की बारी। पहली काउंसलिंग में मुझे रुद्रप्रयाग में सेंटर मिल गया। लगा कि चलो, अब आगे की राह आसान हो जाएगी और जिंदगी एक नई दिशा में बढ़ने लगेगी।
लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।
कुछ कागज़ी गड़बड़ी की वजह से वह सेंटर मुझे नहीं मिल पाया। जिस चीज को लेकर मन में खुशी थी, वही अचानक हाथ से निकल गई।
उस समय थोड़ी निराशा जरूर हुई, लेकिन उम्मीद अभी बाकी थी।
सोचा—कोई बात नहीं, दूसरी काउंसलिंग भी तो होगी।
बस फिर शुरू हुआ एक और इंतज़ार…
रिजल्ट के बाद काउंसलिंग का इंतज़ार, काउंसलिंग के बाद सीट मिलने का इंतज़ार और अब दूसरी काउंसलिंग का इंतज़ार।
जिंदगी शायद धीरे-धीरे मुझे यह सिखा रही थी कि हर चीज पहली कोशिश में नहीं मिलती…
कुछ मंजिलों तक पहुँचने के लिए थोड़ा इंतज़ार भी करना पड़ता है।
आखिरकार दूसरी काउंसलिंग का इंतज़ार भी खत्म हो गया।
इस बार मुझे जोशीमठ के तपोवन में सेंटर मिल गया। सबसे अच्छी बात यह थी कि मेरे साथ मेरा एक दोस्त भी था—वही दोस्त, जो आज इस दुनिया में नहीं है।
हम दोनों का सेंटर मिल गया था। मुझे Electronics Mechanic में सीट मिली और उसे Wireman में।
उस समय मन में एक अलग ही खुशी थी। लगता था कि अब हमारी जिंदगी भी कुछ नया करने वाली है। अब हम भी कुछ बनेंगे, कुछ करेंगे और अपने पैरों पर खड़े होंगे।
बस फिर क्या था… घर से कमरे का सारा जरूरी सामान समेटना शुरू कर दिया। जो सामान पहले से कमरे में पड़ा था, उसे भी साथ ले लिया। ऐसा लग रहा था जैसे सामान नहीं, बल्कि अपने साथ नई जिंदगी की शुरुआत लेकर जा रहे हों।
दोनों दोस्तों के मन में अपने-अपने सपने थे।
किसी को नहीं पता था कि आने वाले साल हमें कहाँ ले जाएंगे और जिंदगी हमारे साथ क्या-क्या करवाएगी।
आखिरकार वो दिन भी आ गया…
हमने ITI में प्रवेश ले लिया।
एक तरफ मन में खुशी थी कि अब पढ़ाई के बाद कुछ करने का रास्ता खुल गया है, और दूसरी तरफ अंदर ही अंदर एक नई दुनिया को लेकर उत्सुकता भी थी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उस दिन की खुशी याद आती है…
और उसी खुशी के साथ उस दोस्त की याद भी आ जाती है, जो उस वक्त मेरे साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने निकला था, लेकिन आज मेरी यादों में ही रह गया है।
कुछ लोग सफर में हमारे साथ चलते हैं,
और फिर एक दिन सफर से चले जाते हैं…
लेकिन उनकी यादें जिंदगी भर हमारे साथ चलती रहती हैं।
नया पाठ — ITI कॉलेज के वो 2–3 साल
ITI में प्रवेश लेते ही लगा जैसे जिंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया हो।
अब तक की जिंदगी कुछ और थी—स्कूल, दोस्त, शरारतें, गाँव की गलियाँ और बेफिक्र दिन। लेकिन अब सामने एक नई दुनिया थी। नया कॉलेज, नया कमरा, नए लोग और सबसे बड़ी बात—अपने भविष्य को लेकर पहली बार एक गंभीर सोच।
जोशीमठ के तपोवन में ITI के वो 2–3 साल मेरी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय बन गए, जिसे आज भी याद करता हूँ तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और दिल थोड़ा भावुक भी हो जाता है।
हम दो दोस्त साथ आए थे। दोनों के सपने थे, दोनों कुछ बनना चाहते थे। मुझे Electronics Mechanic मिला था और उसे Wireman।
कमरे में सामान तो आ गया था, लेकिन असली जिंदगी अब शुरू होनी थी।
सुबह कॉलेज जाना, दिनभर पढ़ाई और प्रैक्टिकल करना, फिर दोस्तों के साथ बैठना, खाना बनाना, घूमना और कभी-कभी वही पुरानी खुराफातें…
धीरे-धीरे कॉलेज के दोस्त परिवार जैसे लगने लगे और तपोवन की गलियाँ अपनी-सी।
इन 2–3 सालों में हमने सिर्फ किताबों और मशीनों के बारे में नहीं सीखा।
हमने दोस्ती निभाना, अकेले रहना, जिम्मेदारी उठाना, कम पैसों में गुजारा करना और जिंदगी को अपने दम पर जीना भी सीखा।
उस वक्त शायद हमें अंदाजा नहीं था कि ये दिन एक दिन हमारी जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगे।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—
स्कूल की यादें अपनी जगह थीं,
लेकिन ITI के वो 2–3 साल जिंदगी की किताब का एक बिल्कुल नया पाठ थे।
एक ऐसा पाठ जिसमें दोस्ती भी थी, मस्ती भी थी, संघर्ष भी था, सपने भी थे…
और कुछ ऐसी यादें भी थीं, जिन्हें वक्त चाहे जितना आगे निकल जाए, दिल कभी पुराना नहीं होने देता।
ITI का पहला दिन — नई जगह, नए लोग और एक खास दोस्त
कॉलेज का पहला दिन था।
सब कुछ नया-नया था—नया कॉलेज, नए चेहरे, नया माहौल और एक ऐसी जगह जहाँ अभी किसी को ठीक से जानता तक नहीं था। धीरे-धीरे परिचय हुआ और नए-नए दोस्त बनने लगे।
कहते हैं ना, दोस्तों के एक ग्रुप में एक ऐसा दोस्त जरूर बनता है जो बाकी सब से थोड़ा अलग होता है…
जो धीरे-धीरे हमारे दिल के बहुत करीब आ जाता है।
मेरी जिंदगी में भी ऐसा ही एक दोस्त बना।
आज भी वह मेरे साथ जुड़ा हुआ है और शायद मेरी कॉलेज लाइफ की सबसे अच्छी चीजों में से एक वही दोस्ती है।
मेरी एक आदत है—जिसने मुझे उसका भाई बना दिया। शायद इसी वजह से आज भी हमारे बीच वह अपनापन बना हुआ है। रोज-रोज बात नहीं होती, लेकिन महीने में एक बार ही सही, फोन पर बात जरूर हो जाती है… और जब बात होती है तो एक घंटे का पता ही नहीं चलता।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें रोज निभाने की जरूरत नहीं पड़ती।
बस दिल में जगह होनी चाहिए।
कॉलेज का पहला दिन वैसे भी खास था। कहते हैं—“First impression is the last impression.”
मैंने इस बात को आज तक अपने जीवन में अपनाकर रखा है।
पहले ही दिन मैंने कॉलेज के शिक्षकों के साथ अच्छी bonding बना ली थी। दोस्तों के साथ भी पहला introduction हुआ। हर किसी के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानने को मिला—कोई कहाँ से आया था, किसी का सपना क्या था, कोई पहले से किसी को जानता था तो कोई मेरी तरह बिल्कुल नया था।
मेरे लिए वह सिर्फ कॉलेज का पहला दिन नहीं था…
वह मेरी जिंदगी के एक नए अध्याय का पहला पन्ना था।
नई जगह थी, नया वातावरण था, नए चेहरे थे…
और मुझे क्या पता था कि इन्हीं नए चेहरों में से कुछ लोग आगे चलकर मेरी जिंदगी की पुरानी और सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगे।
नए चेहरे, नई दोस्ती और भाई जैसा रिश्ता
कॉलेज में नया एडमिशन हुआ था। नए लड़के आए, नई लड़कियाँ आईं और कॉलेज का माहौल फिर से थोड़ा बदल गया।
हम अपना पहला सेमेस्टर पूरा कर चुके थे। अब तक कई दोस्त बन चुके थे और कॉलेज की जिंदगी भी धीरे-धीरे अपनी-सी लगने लगी थी।
नए एडमिशन में कुछ ऐसी लड़कियाँ भी आईं, जिनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती इतनी अच्छी हो गई कि वे मुझे अपना भाई मानने लगीं।
वो जोशीमठ की ही रहने वाली थीं। और जोशीमठ की बात हो तो वहाँ की कुछ चीजों का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है—सेब, राजमा की दाल और पहाड़ के आलू।
उनके घर में अगर सेब ज्यादा हुए, राजमा की दाल बनी या अच्छे पहाड़ी आलू आए, तो मैं मजाक में कह देता—
“भाई को भी कुछ मिलेगा या सब खुद ही खा जाओगे?” 😄
और मेरा इतना कहना होता कि कुछ न कुछ मेरे लिए आ ही जाता था।
कभी सेब, कभी राजमा की दाल तो कभी पहाड़ी आलू…
रिश्ता खून का नहीं था, लेकिन अपनापन बिल्कुल अपने घर जैसा था।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि कॉलेज में हमें सिर्फ पढ़ाई नहीं मिली थी। वहाँ हमें ऐसे रिश्ते भी मिले थे, जिनका कोई नाम नहीं था, लेकिन उनमें अपनापन बहुत था।
कुछ दोस्त जिंदगी में दोस्त बनकर आते हैं,
कुछ भाई-बहन बन जाते हैं…
और कुछ रिश्ते बिना किसी नाम के भी दिल में हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेते हैं।
कुआरी पास — घूमने का चस्का यहीं से लगा
दूसरा सेमेस्टर खत्म होने से पहले 4–5 दोस्तों का घूमने का प्लान बना।
सच कहूँ तो मुझे घूमने का असली चस्का वहीं से लगा।
पहली बार दोस्तों के साथ कहीं दूर घूमने जाने का प्लान बना था और जगह चुनी गई—कुआरी पास।
उस समय पहाड़ों में घूमने का मेरा यह पहला बड़ा अनुभव था। मन में एक अलग ही उत्साह था। घर से दूर, दोस्तों के साथ और सामने पहाड़ों की एक नई दुनिया।
जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ते गए, रास्ता मुश्किल होता गया। चढ़ाई काफी थी, लेकिन दोस्तों का साथ हो तो थकान भी मजेदार लगने लगती है।
ऊपर पहुँचकर जो नजारा देखा, उसे शब्दों में बताना मुश्किल है।
चारों तरफ सफेद चादर ओढ़े हुए पहाड़…
ठंडी हवा चेहरे को छूती हुई…
दूर-दूर तक बर्फ से ढकी चोटियाँ…
और हम कुछ दोस्त, उस खूबसूरत दुनिया के बीच।
मेरे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था।
पहली बार महसूस हुआ कि किताबों और कॉलेज की चारदीवारी के बाहर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है, जिसे देखना बाकी है।
हमने वहाँ खूब मस्ती की, खूब फोटो खींचे, हँसे, एक-दूसरे की टांग खींची और उस सफर को जी भरकर जिया।
शायद हमें उस वक्त पता भी नहीं था कि यह सिर्फ एक घूमने की यात्रा नहीं थी।
यहीं से मेरे अंदर घूमने की वो चाह पैदा हुई, जो आगे चलकर मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई।
आज भी जब कुआरी पास का नाम सुनता हूँ तो सबसे पहले वही दिन याद आता है—
चार-पाँच दोस्त,
बर्फ से ढके पहाड़,
ठंडी हवा,
थकान के बीच चेहरे पर मुस्कान…
और जिंदगी का वो पहला सफर, जिसने मुझे घूमना सिखा दिया।
घूमने का चस्का — पहाड़ों से रिश्ता
जब घूमने की बात चल ही रही है, तो कुआरी पास के बाद तो जैसे मेरे अंदर घूमने का चस्का ही लग गया।
पहली यात्रा के बाद मन में बस यही रहता था कि अब अगली जगह कहाँ जाना है और दोस्तों के साथ फिर कब निकलना है।
धीरे-धीरे मैंने पहाड़ों की कई खूबसूरत जगहें घूमीं।
औली, बद्रीनाथ, भविष्य बद्री, नीति, माना पास, वसुधारा, गरम कुंड, फूलों की घाटी, हेमकुंड साहिब और न जाने कितनी जगहें…
हर जगह की अपनी एक कहानी थी और हर सफर की अपनी एक याद।
कहीं बर्फ ने रास्ता रोक लिया, कहीं ठंडी हवाओं ने स्वागत किया, कहीं घंटों पैदल चलना पड़ा तो कहीं रास्ते की थकान किसी खूबसूरत नजारे को देखते ही गायब हो गई।
पहाड़ों में घूमने की सबसे खास बात यही है—
मंजिल से ज्यादा रास्ता याद रह जाता है।
दोस्तों के साथ पैदल चलना, रास्ते में हँसी-मजाक करना, कभी थककर बैठ जाना और फिर किसी खूबसूरत नजारे को देखकर अचानक कैमरा निकाल लेना… यही तो उन यात्राओं की असली खुशी थी।
उस समय शायद मैं सिर्फ घूम रहा था, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उन यात्राओं ने मुझे बहुत कुछ दिया।
उन्होंने मुझे पहाड़ों को करीब से देखने का मौका दिया, प्रकृति को महसूस करना सिखाया और सबसे बड़ी बात—यादें जमा करना सिखाया।
आज भी जब किसी नई जगह जाने का मौका मिलता है तो मन फिर उसी पुराने दौर में पहुँच जाता है।
क्योंकि सच कहूँ तो…
कुआरी पास से शुरू हुआ वो घूमने का चस्का आज भी खत्म नहीं हुआ।
बस फर्क इतना है कि तब दोस्तों के साथ निकलता था,
और आज उन सफरों की यादें मेरे साथ चलती हैं।
कॉलेज की जिंदगी में आया एक अचानक मोड़
उसी कॉलेज के समय मेरी 12वीं की क्लासमेट, जो मेरी अच्छी दोस्त थी, उससे मेरी बात होती रहती थी। तब तक सब ठीक चल रहा था।
पुरानी दोस्ती थी, इसलिए बातचीत में वही अपनापन था। कॉलेज की जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी—दोस्त, घूमना-फिरना, पढ़ाई और रोजमर्रा की बातें।
लेकिन फिर एक दिन अचानक सब बदल गया।
एक दिन उसने मुझे कुछ बताए बिना ही मुझसे बात करना बंद कर दिया।
न कोई वजह बताई,
न कोई सफाई दी…
बस मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया।
मैं समझ ही नहीं पाया कि आखिर हुआ क्या था।
जिस इंसान से कल तक आराम से बात होती थी, उससे अचानक संपर्क ही खत्म हो गया। उस समय मन में बहुत सारे सवाल थे—आखिर मैंने ऐसा क्या कर दिया? ऐसी क्या बात हो गई कि बिना बताए ही रिश्ता खत्म कर दिया?
कभी-कभी जिंदगी में कुछ रिश्ते किसी बड़ी लड़ाई से नहीं टूटते…
बस एक दिन सामने वाला चुपचाप दूर चला जाता है।
और पीछे रह जाता है सिर्फ एक सवाल—
“आखिर मेरी गलती क्या थी?”
दोस्ती, गम और जिंदगी का गलत मोड़
उस समय मेरे दोस्तों ने भी मुझे समझाया।
कहते थे—
“भाई, गम को भूल जा।”
लेकिन गम भूलने का जो रास्ता मैंने चुना, वह शायद सही नहीं था। दोस्तों ने मुझे शराब पीना सिखा दिया और धीरे-धीरे मैं शराब का आदी होता चला गया।
शुरुआत में तो बस दोस्तों के साथ कभी-कभार पीता था, लेकिन धीरे-धीरे हालत ऐसी हो गई कि शराब मुझे पानी की तरह लगने लगी।
मेरा दूसरा सेमेस्टर भी पूरा हो चुका था। उस समय मेरी आदत थी कि मैं हर 3–4 महीने में घर चला जाता था। लेकिन शराब शुरू होने के बाद पता ही नहीं चला कि 6 महीने निकल गए या शायद 8 महीने, मैं घर नहीं गया।
घर वाले फोन करते थे, लेकिन मैं फोन तक नहीं उठाता था। कई बार गुस्से में उनसे उल्टा-सीधा बोल देता था। इतना ही नहीं, गुस्से और उस समय की मानसिक हालत में उन्हें मरने की धमकी तक दे देता था।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि उस समय मैं खुद को ही नहीं समझ पा रहा था।
जिस दर्द को भुलाने के लिए मैंने शराब का सहारा लिया था, वह दर्द तो कम नहीं हुआ…
उल्टा मैंने अपने आप को और अपने परिवार को उससे भी ज्यादा तकलीफ दे दी।
कभी-कभी जिंदगी में हम दुख से बचने के लिए जो रास्ता चुनते हैं, वही रास्ता हमें और गहरे अंधेरे में ले जाता है।
वो दौर मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा दौर नहीं था, लेकिन शायद उसी दौर ने मुझे बाद में यह समझाया कि इंसान चाहे कितना भी भटक जाए, एक दिन उसे अपने रास्ते पर वापस लौटना ही पड़ता है।
एक काली रात और खुद से पहली मुलाकात
इन सबके बीच एक दिन थोड़ी खुशी की खबर मिली।
मेरी दीदी का रिश्ता पक्का हो गया था और उनकी सगाई होने वाली थी।
यह खबर सुनकर दिल में थोड़ी खुशी हुई।
हालाँकि उस समय भी मेरी शराब नहीं छूटी थी।
एक रात का समय था। माँ का फोन आया। पहले तो मैं गुस्से में था, लेकिन जैसे ही माँ ने दीदी के रिश्ते की बात बताई, मेरे चेहरे पर थोड़ी खुशी आई।
फोन रखने के बाद अचानक मन में आया—
“सबकी जिंदगी आगे बढ़ रही है… लेकिन मैं कहाँ जा रहा हूँ?”
बस यही सोचकर मैं अकेला बाथरूम में चला गया।
और फिर पता नहीं कितने दिनों से अंदर जमा हुआ दर्द आँखों से निकलने लगा।
मैं इतना रोया कि रोते-रोते सिसकियाँ आने लगीं।
उस रात पहली बार शायद मैंने खुद को बाहर से नहीं, अंदर से देखा।
बाथरूम से बाहर आया तो रात काली हो चुकी थी। मैं कुछ देर अकेले बैठा रहा और खुद से ही सवाल करने लगा—
“क्या था मैं… और ये क्या कर रहा हूँ?”
कभी मैं दोस्तों के साथ सपने देखा करता था।
कभी घूमने जाता था।
कॉलेज में अपनी पहचान थी।
घर वाले मुझसे उम्मीद रखते थे।
और अब…
मैं घर वालों के फोन तक नहीं उठाता था।
शराब मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी।
और मैं खुद से ही दूर होता जा रहा था।
उस रात मुझे जिंदगी की पूरी समझ तो नहीं आई। शायद सिर्फ 20 प्रतिशत ही समझ आया होगा कि दुनिया कैसी है, जिंदगी कैसे चलती है, मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
लेकिन कभी-कभी जिंदगी बदलने के लिए पूरी समझ की जरूरत नहीं होती।
एक छोटा-सा एहसास भी काफी होता है कि रास्ता गलत है।
उस रात मैं पूरी तरह नहीं बदला था…
लेकिन शायद पहली बार मेरे अंदर का इंसान मुझसे पूछ रहा था—
“अब बस भी कर… आखिर जाना कहाँ है?”
दीदी की सगाई — घर की रौनक और फिर सन्नाटा
उस रात के बाद मैं घर चला गया—दीदी की सगाई के लिए।
दीदी की सगाई बड़े ही धूमधाम से हुई। घर में खुशी का माहौल था। दूर-दूर से रिश्तेदार आए थे, घर लोगों से भरा हुआ था। हर तरफ हँसी, बातें और चहल-पहल थी।
मैं भी सबसे मिला। पुराने रिश्तेदारों से बातें हुईं, दोस्तों से मुलाकात हुई और कई दिनों बाद ऐसा लगा जैसे जिंदगी फिर से थोड़ी सामान्य हो गई हो।
दोस्त भी आए थे। खूब मस्ती हुई, खूब हँसे और जमकर मजा किया।
कुछ दिनों के लिए ऐसा लगा जैसे मेरी सारी परेशानियाँ कहीं पीछे छूट गई हैं।
लेकिन हर खुशी का एक समय होता है।
धीरे-धीरे सगाई का कार्यक्रम खत्म हुआ।
रिश्तेदार अपने-अपने घर चले गए।
दोस्त भी वापस चले गए।
और देखते ही देखते जो घर कुछ दिन पहले लोगों की आवाजों से भरा हुआ था, वही घर अचानक बहुत सूना-सूना लगने लगा।
सच कहूँ तो मैं खुद भी उस घर में अब अपना-सा नहीं लग रहा था।
मैं भी तो बस 3–4 दिन का मेहमान था।
कुछ दिन पहले तक जिस घर में मेरी वजह से भी चहल-पहल थी, अब वहाँ फिर वही पुरानी खामोशी थी।
सब अपने-अपने घर चले गए थे…
और मैं सोच रहा था—
“मैं इस घर का होकर भी इस घर में मेहमान जैसा क्यों हो गया हूँ?”
शायद उस समय मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिला था।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, वह सवाल मेरी जिंदगी बदलने की शुरुआत का एक और हिस्सा था।
माँ के हाथों का प्यार
अब वापस जाने का समय हो गया था।
मैं घर से निकलने लगा तो माँ ने हमेशा की तरह मेरे बैग में बहुत-सी चीजें रख दीं—मिठाई, काजू, किशमिश और न जाने क्या-क्या।
सामान रखते हुए बस इतना कहा—
“रास्ते में खा लेना… और दोस्तों को भी खिला देना।”
माँ के लिए शायद यह छोटी-सी बात थी, लेकिन माँ को क्या पता था कि उसके रखे हुए सामान में सिर्फ मिठाई और मेवे नहीं थे…
उसमें उसका प्यार और उसकी चिंता भी रखी थी।
मैं पीपलकोटी से आगे निकल चुका था। सफर चल रहा था। बस मैं अपनी सीट पर बैठा था और पता नहीं क्यों मेरा हाथ बैग के अंदर चला गया।
मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि माँ ने बैग में क्या-क्या रखा है।
जब मैंने सामान बाहर निकाला और देखा तो मेरी आँखों से अचानक आँसू निकलने लगे।
मैं सोचने लगा—
“मुझे इतना प्यार करने वाली मेरी माँ… मेरी कितनी चिंता करती है।”
मैं एक-एक चीज देखता और रोता जाता।
जैसे-जैसे खाता, वैसे-वैसे आँखों से आँसू निकलते जाते।
पास में बैठी एक माताजी ने मुझे रोते हुए देखा तो पूछ लिया—
“बेटा, क्या हुआ?”
मैंने उन्हें माँ के दिए हुए सामान के बारे में बताया।
उन्होंने मेरी बात सुनी और फिर बहुत प्यार से कहा—
“बेटा, माँ तो सबके पास होती है… लेकिन तेरे जैसा माँ से प्यार करने वाला हर किसी के पास नहीं होता।”
उनकी यह बात सीधे दिल में उतर गई।
उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि दुनिया में चाहे कितने भी लोग हमारे साथ हों, कितने भी दोस्त हों, कितने भी रिश्ते हों…
माँ का रिश्ता सबसे अलग होता है।
हम बड़े होकर अपनी दुनिया में इतने खो जाते हैं कि माँ की छोटी-छोटी चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं।
लेकिन माँ…
वो हमारी चिंता करना कभी नहीं छोड़ती।
उस दिन बैग में रखी मिठाई और काजू-किशमिश तो कुछ दिनों में खत्म हो गए…
लेकिन माँ के हाथों से रखा हुआ वह प्यार आज भी मेरे दिल में रखा हुआ है।
सामान खत्म हो गया,
माँ का प्यार नहीं।
नंदा अष्टमी की यात्रा — फूलों की खुशबू और पहाड़ों की गोद में एक रात
अगस्त का महीना था।
मेरे एक दोस्त के गाँव से नंदा अष्टमी के लिए माता की छंतोली जा रही थी। दोस्त ने मुझे भी बुलाया। मेरे लिए तो यह एक और मौका था घूमने का, इसलिए मैंने भी बिना ज्यादा सोचे हाँ कर दी।
लगभग 80 किलोमीटर का रास्ता था और वह भी पैदल।
करीब 5–6 दिन की यात्रा थी। रास्ते में पहाड़, जंगल, चढ़ाई, उतराई और जगह-जगह प्रकृति के अलग-अलग रंग देखने को मिले।
चलते-चलते आखिरकार हमारी यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई।
वहाँ पहुँचकर जो नजारा देखा, उसे देखकर सच में लगा कि स्वर्ग शायद ऐसा ही होता होगा।
चारों तरफ सुंदर बुग्याल, रंग-बिरंगे फूल, हरे-भरे पहाड़ और ठंडी हवा…
जितना देखो, मन उतना ही भरता नहीं था।
और उसी यात्रा में पहली बार मैंने उत्तराखंड का राज्य पुष्प ब्रह्मकमल देखा।
चारों तरफ उसकी खुशबू फैली हुई थी।
खुशबू ऐसी कि जैसे हवा में ही कोई नशा घुला हो।
वह फूलों की खुशबू थी, लेकिन उस समय मुझे सच में ऐसा लग रहा था जैसे उस खुशबू का नशा सिर पर चढ़ रहा हो।
और शायद चढ़ भी गया था। 😄
मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न-सा होने लगा था। दोस्त ने मुझे नींबू दिया और कहा—
“इसे चाट, शायद थोड़ा ठीक लगे।”
नींबू चाटने से ज्यादा तो फर्क नहीं पड़ा, लेकिन थोड़ा-बहुत आराम जरूर मिला।
उस दिन का नजारा और वह अनुभव आज भी मेरी यादों में बिल्कुल ताजा है।
अगले दिन वापसी का पहला पड़ाव था, इसलिए हम समय से सो गए।
वहाँ रहने के लिए कोई घर या कमरा नहीं था। पहाड़ों में रात गुजारने के लिए एक गुफा जैसी जगह थी।
चारों तरफ से ठंडी हवा आ रही थी। मैं दो लोगों के बीच में सो गया। हैरानी की बात थी कि मुझे ज्यादा ठंड भी नहीं लगी।
आस-पास सभी लोग अपने-अपने अनुभव और बातें कर रहे थे।
किसी की यात्रा की बात, किसी की घर की बात, किसी की हँसी-मजाक…
और उन सबकी आवाजों के बीच पता ही नहीं चला कि कब मेरी आँख लग गई।
उस रात शायद शरीर थका हुआ था, लेकिन मन बहुत शांत था।
न कोई मोबाइल,
न कोई शोर,
न कोई शहर की भागदौड़…
बस पहाड़, ठंडी हवा और गुफा के अंदर दोस्तों के बीच एक सुकून भरी नींद।
पता ही नहीं चला कि कब रात बीत गई।
जब आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी।
और शायद उस रात पहली बार समझ आया कि—
सुकून महंगे कमरों में नहीं,
कभी-कभी पहाड़ की एक गुफा में भी मिल जाता है।
पूजा, जागर और पहाड़ का वो स्वाद
अगले पड़ाव पर पहुँचने के बाद सबसे पहले पूजा हुई।
गाँव-पहाड़ की परंपरा के अनुसार वहाँ गढ़वाली जागर भी लगे। देवी-देवताओं का अवतरण हुआ। मेरे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। मैंने इससे पहले ऐसा कुछ अपनी आँखों से नहीं देखा था।
मैं उन्हें देख रहा था और अंदर से थोड़ा डर भी लग रहा था।
आस-पास का माहौल भी ऐसा था कि मन अपने आप गंभीर हो जाए। श्रद्धा, आस्था और उस पूरे वातावरण में कुछ ऐसा था जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल था।
पूजा के बाद प्रसाद मिला। सबने मिलकर प्रसाद खाया।
लेकिन अब बारी थी उस चीज की, जिसका शायद हम सबको बेसब्री से इंतजार था—
रात का खाना। 😄
भोजन में था कढ़ी, रोटी और भात यानी चावल।
सामान्य-सा खाना था, लेकिन उस दिन उसका स्वाद ऐसा लगा जैसे पता नहीं कितने सालों बाद खाना मिला हो।
शायद वजह खाना नहीं था…
वजह थी 5–6 दिन की पैदल यात्रा, पहाड़ों की चढ़ाई, शरीर की थकान और पूरे दिन की मेहनत।
उस समय सच में लग रहा था कि कढ़ी-रोटी और भात से स्वादिष्ट खाना दुनिया में शायद कुछ नहीं है।
पेट भरने के बाद शरीर की हालत ऐसी थी कि अगर कोई बस इतना कह देता—
“सो जा…”
तो लगता था सीधे दूसरे लोक में पहुँच जाएंगे। 😄
इतनी गहरी थकान थी कि शरीर बिस्तर नहीं, बस जमीन ढूँढ रहा था और आँखें बंद होने का बहाना।
उस दिन समझ आया कि पहाड़ों में घूमने की असली खूबसूरती सिर्फ नजारों में नहीं होती।
थकान के बाद मिला साधारण-सा खाना भी दावत लगता है,
और दोस्तों के बीच जमीन पर मिली नींद भी किसी महल से कम नहीं लगती।
आज भी कढ़ी-भात का नाम आता है तो उस यात्रा की याद अपने आप लौट आती है।
भविष्य बद्री की यात्रा — दोस्ती जो आज भी कायम है
नंदा अष्टमी की यात्रा खत्म हुई और वापस कॉलेज आ गया। करीब एक महीना ही बीता था कि मेरे रूम पार्टनर के मन में एक नई इच्छा हुई—
भविष्य बद्री के दर्शन करने की।
उन्होंने मुझसे कहा कि चलना है।
मैं वैसे भी घूमने के मामले में ना नहीं बोल पाता था, तो फिर जाने का प्लान बन गया।
हम कुल चार लोग थे। मेरा रूम पार्टनर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ था और मैं अपनी एक जूनियर के साथ।
रास्ते में वही हमारी पुरानी मस्ती, हँसी-मजाक और बातें चलती रहीं। उस समय पैदल चलने के रास्ते भी काफी हुआ करते थे। चढ़ाई थी, लेकिन मौसम ठंडा था और वातावरण इतना अच्छा कि थकान का पता ही नहीं चलता था।
मेरी जो जूनियर थी, उसके रिश्तेदारों का घर रास्ते में ही था। पहले हम उनके घर गए और उनसे कहा—
“आप खाना बनाकर रखना, हम दर्शन करके वापस आते हैं।” 😄
फिर हम भविष्य बद्री मंदिर की तरफ निकल गए।
मंदिर पहुँचे तो वहाँ पुजारी जी ने हमें पूजा करवाई। उन्होंने मंदिर और उसके महत्व के बारे में भी बताया। वहाँ बैठकर चाय भी पी।
हमने फोटो खींचे, आसपास घूमे और उस जगह को अपने तरीके से महसूस किया।
दर्शन और घूमना पूरा करने के बाद वापस उसके रिश्तेदारों के घर पहुँचे। वहाँ खाना खाया, थोड़ा आराम किया और फिर वापस अपने कमरे की तरफ निकल पड़े।
उस यात्रा की सबसे खास बात सिर्फ भविष्य बद्री के दर्शन नहीं थे…
मेरी उस जूनियर के साथ बनी दोस्ती थी।
आज इतने साल बाद भी हमारी बात होती रहती है। उसकी शादी हो चुकी है और उसका एक बेटा भी है।
मैंने मजाक-मजाक में कभी उससे कहा था—
“तेरे बेटे का नाम मैं रखूँगा।” 😄
लेकिन उसने मुझे वो मौका ही नहीं दिया।
बाद में जब उसकी शादी हुई तो मैंने मजाक में उससे कहा—
“शादी में क्यों नहीं बुलाया?”
आज इन बातों को याद करके हँसी भी आती है और अच्छा भी लगता है कि कॉलेज के समय बने कुछ रिश्ते वक्त के साथ खत्म नहीं होते।
कॉलेज खत्म हो गया, जिंदगी बदल गई, लोग अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए…
लेकिन कुछ दोस्तियाँ ऐसी होती हैं जो सालों बाद भी फोन की दूसरी तरफ से वही पुरानी आवाज सुनाकर कह देती हैं—
“अरे, तू तो आज भी वैसा ही है!”
और शायद यही कॉलेज के उन दिनों की सबसे बड़ी कमाई थी—
कुछ ऐसे रिश्ते, जिन्हें वक्त भी पुराना नहीं कर पाया।
धीरे-धीरे खुद की तरफ लौटना
ITI के वो दिन धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे और अब जिंदगी पहले से काफी ठीक चल रही थी।
मैं पहले की तुलना में काफी सुधार चुका था। शराब पूरी तरह तो नहीं छूटी थी, लेकिन पहले के मुकाबले काफी कम हो गई थी। शायद उस दौर ने मुझे यह समझा दिया था कि जिंदगी को किस दिशा में ले जाना है।
अब मैं पहले जैसा नहीं रहा था।
दोस्तों के साथ हँसी-मजाक करता था, घूमता था, कॉलेज की जिंदगी जी रहा था और धीरे-धीरे अपने अंदर भी बदलाव महसूस कर रहा था।
लेकिन एक बात आज भी वैसी ही है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि यह मेरा शायद तीसरा जन्म है। 😄
क्योंकि जिंदगी में जितने बदलाव आए, जितने अनुभव मिले, जितनी गलतियाँ कीं और जितना सीखा—उन सबके बाद भी मेरे अंदर का एक हिस्सा आज भी बिल्कुल वैसा ही है।
लड़कों से मैं आज भी आराम से बात कर लेता हूँ। दोस्ती करने में कोई परेशानी नहीं होती, खुलकर बात कर लेता हूँ।
लेकिन लड़कियों से बात करने में आज भी थोड़ा uncomfortable महसूस करता हूँ।
और सच कहूँ तो यह कोई नई बात नहीं है।
यह मेरे स्वभाव का हिस्सा पहले से ही रहा है।
शायद इंसान जिंदगी में बहुत कुछ बदल सकता है—
अपनी आदतें, अपनी सोच, अपना रास्ता…
लेकिन अपने स्वभाव की कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो सालों बाद भी हमारे साथ रहती हैं।
और शायद यही चीज मुझे याद दिलाती है कि जिंदगी चाहे कितनी भी बदल जाए…
मैं आखिर हूँ वही—बस पहले से थोड़ा ज्यादा समझदार।
आखिरी सेमेस्टर — कॉलेज से जिंदगी की अगली राह तक
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
मेरे चौथे सेमेस्टर का आखिरी महीना चल रहा था और इसी बीच दीदी की शादी का समय भी नजदीक आ गया था। पेपर होने में अभी काफी समय था, लेकिन दीदी की शादी के लिए घर पर काम बहुत था।
शादी में छोटे से लेकर बड़े तक इतने काम होते हैं कि पता ही नहीं चलता दिन कब शुरू हुआ और कब खत्म।
इसलिए मैं पेपर की चिंता छोड़कर घर चला गया।
घर पहुँचते ही शादी की तैयारियों में व्यस्त हो गया। उन दिनों मुझे पहली बार एहसास हुआ कि हमारे परिवार में इतने सारे रिश्तेदार हैं। 😄
जिन रिश्तेदारों को शायद पहले कभी ठीक से देखा भी नहीं था, उनसे पहली बार मुलाकात हुई।
नए चेहरे, नए रिश्ते और हर तरफ शादी की चहल-पहल…
बहुत अच्छा लग रहा था।
आखिरकार शादी का दिन भी आ गया।
दीदी की शादी बड़े ही धूमधाम से हुई। घर में खुशियों का माहौल था और हमने भी खूब मस्ती की।
लेकिन खुशी के साथ-साथ मेरे मन में एक और बात चल रही थी—
अब मेरा भी कॉलेज खत्म होने वाला था।
शादी के बाद वापस कॉलेज जाने का समय आ गया, क्योंकि मेरे ITI के आखिरी पेपर होने वाले थे।
पेपर देने के लिए मुझे जोशीमठ से गोपेश्वर जाना था। वैसे गोपेश्वर मेरे लिए कोई नई जगह नहीं थी। अपने तीन सेमेस्टर के पेपर मैं पहले ही गोपेश्वर में दे चुका था।
लेकिन इस बार बात अलग थी।
इस बार ये मेरे कॉलेज के आखिरी पेपर थे।
इसके बाद न वही कॉलेज रहेगा, न रोज दोस्तों के साथ मिलना होगा, न वही कमरा और न ही रोज की वही जिंदगी।
इसके बाद तो बारी थी—नौकरी और असली जिंदगी की।
पेपर शुरू होने से पहले हम गोपीनाथ मंदिर में दर्शन करने गए। शायद मन में कहीं यह एहसास भी था कि जिस सफर की शुरुआत इतने सपनों के साथ की थी, उसका एक बड़ा पड़ाव अब खत्म होने वाला है।
फिर पेपर शुरू हुए।
पेपर काफी अच्छे गए। हमारे कई दोस्त अच्छे नंबरों से पास हुए और कई लड़के First Division से भी पास हुए।
वो समय शायद 2020 के आसपास का था।
और देखते ही देखते ITI के वो 2–3 साल, जो कभी बहुत लंबे लगते थे, खत्म हो गए।
कभी हम नए-नए एडमिशन लेकर कॉलेज आए थे…
और अब हाथ में आखिरी पेपर देकर बाहर निकल रहे थे।
तब समझ आया कि कॉलेज खत्म होना सिर्फ पढ़ाई खत्म होना नहीं होता—
वो जिंदगी के एक पूरे अध्याय का आखिरी पन्ना होता है।
ITI खत्म — अब नौकरी की बारी
ITI के आखिरी पेपर भी खत्म हो गए।
अब जोशीमठ से अपने कमरे का पूरा सामान समेटकर घर लाने का समय था। वही कमरा, जहाँ कभी दोस्तों के साथ हँसी-मजाक किया था, जहाँ घूमने के प्लान बने थे और जहाँ जिंदगी के सबसे यादगार 2–3 साल गुजारे थे।
एक-एक करके सारा सामान समेटा और घर ले आया।
कमरा खाली हो गया…
लेकिन यादें वहीं रह गईं।
अब बारी थी नौकरी ढूँढने की।
मैंने अपने कई रिश्तेदारों से बात की, उम्मीद थी कि शायद कोई नौकरी के लिए रास्ता बता दे या कहीं लगवा दे। मेरे चाचा जी ने भी किसी से बात की, लेकिन बात नहीं बन पाई।
उस दिन जिंदगी की एक अजीब-सी सच्चाई समझ आई।
हम अक्सर कहते हैं कि अपने लोग हमेशा अपने होते हैं और बाहर वाले पराए।
लेकिन जिंदगी में कई बार इसके उलट भी देखने को मिलता है।
उस दिन मुझे लगा—
“अपने ही हमेशा अपने नहीं होते,
और जो पराए होते हैं, उनमें भी कभी-कभी थोड़ा-सा अपनापन मिल जाता है।”
शायद रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।
रिश्ते उस इंसान से बनते हैं जो मुश्किल समय में आपके साथ खड़ा हो।
उस दिन नौकरी तो नहीं मिली…
लेकिन जिंदगी ने एक ऐसी सीख दे दी, जो शायद किसी कॉलेज या किताब में नहीं मिलती।
गाँव की जिंदगी — बकरियाँ, जंगल और पहाड़ की यादें
ITI के बाद घर में रहते-रहते मुझे एक-दो साल हो गए थे।
उस समय मेरे पापा की अपनी बकरियाँ थीं और फिलहाल के लिए बकरियाँ ही मेरा रोजगार थीं। उनके साथ जंगल जाना, उन्हें चराना और घर के छोटे-बड़े काम करना—यही दिनचर्या बन गई थी।
कभी-कभी गाँव के दूसरे लोगों के साथ भी जंगल जाना पड़ता था। उनके लिए पेड़ काटना और घर के चिता-मोटा काम करना भी होता था। लेकिन वह रोजगार मेरा नहीं था, मेरे पापा का था।
गाँव में बहुत से पेड़ थे। कुछ पेड़ ऐसे भी थे जो बहुत मुश्किल जगहों पर होते थे, जहाँ कोई आसानी से पहुँच भी नहीं सकता था।
और शायद यही मेरी एक खासियत थी—
जो पेड़ दूसरे लोग नहीं काट पाते थे, उन्हें काटने की कोशिश मैं करता था।
जो काम कोई नहीं कर पाता था, उसे करने में मुझे मजा आता था।
मेहनत थी, कभी जोखिम भी था, लेकिन अपने घर और अपने लोगों के लिए कुछ कर पाने का अलग ही संतोष था।
गाँव की अपनी एक अलग कहानी वहाँ की शुद्ध हवा, शुद्ध पानी और घर का सादा-सा शुद्ध खाना—इन सबकी कीमत उस समय शायद इतनी समझ नहीं आती थी।
मौसम के साथ मिलने वाली छोटी-छोटी चीजें भी जिंदगी का हिस्सा थीं।
काफल, भमोरा और ऐसी न जाने कितनी पहाड़ी चीजें, जिनका स्वाद आज भी याद आता है।
उस समय लगता था कि ये तो हमारे गाँव में हमेशा मिलती रहेंगी।
लेकिन जिंदगी आगे बढ़ी और वो सब धीरे-धीरे पीछे छूट गया।
आज शहर में बहुत कुछ मिलता है, लेकिन गाँव की वो हवा नहीं मिलती।
पैसे से बहुत कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन—
पहाड़ का पानी, जंगल की खुशबू, घर का खाना और पेड़ से तोड़कर खाया हुआ काफल-भमोरा…
इन चीजों का स्वाद किसी दुकान में नहीं मिलता।
आज मैं उन दिनों को बहुत याद करता हूँ।
तब जिंदगी शायद आसान नहीं थी,
लेकिन सच्ची थी।
जरूरतें कम थीं, साधन कम थे, लेकिन अपने लोगों के बीच रहने का जो सुकून था…
वो आज भी कहीं न कहीं दिल में बाकी है।