Shraapit Najar in Hindi Thriller by jaisy singh books and stories PDF | श्रापित नज़र - 2

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श्रापित नज़र - 2

राजीव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
All right, Miss श्रावणी. तुम्हारी आँखों में सच्चाई है। Welcome to JS Group of Architectures।
यह सुनते ही जैसे समय एक पल को ठहर गया।
श्रावणी की उंगलियाँ, जो अब तक फाइल के कोने को कसकर पकडे थीं, ढीली पड गईं। उसके चेहरे पर खुशी की चमक फैल गई — धीमे- धीमे, जैसे सूरज बादलों के पीछे से निकलता है।
उसकी आँखों में सपनों की रोशनी साफ दिखाई दे रही थी।
वर्षों का संघर्ष।
अनगिनत रातों की दुआएँ।
अकेलेपन के बीच खुद को संभालना।
सब जैसे एक क्षण में सार्थक हो गया।
Thank you so much, सर… उसकी आवाज में कृतज्ञता थी — और हल्का- सा कंपन भी।
राजीव ने फाइल बंद करते हुए कहा,
कल से report करना। और हाँ, हमारे Boss थोडे सख्त हैं। ध्यान रखना।
श्रावणी ने आत्मविश्वास से सिर हिलाया।
सर, मैं संभाल लूंगी।
उसके शब्द सरल थे, पर उनके पीछे दृढता थी।
जिंदगी ने उसे जल्दी बडा होना सिखा दिया था।
ऑफिस से बाहर निकलते समय सुबह की धूप उसके चेहरे पर पड रही थी। कांच की इमारत की दीवारों से टकराकर रोशनी उसके चारों ओर चमक रही थी।
उसे सचमुच लगा —
जैसे किस्मत खुद उसे आशीर्वाद दे रही हो।
सीढियाँ उतरते हुए उसके कदम हल्के थे।
हर सांस में एक नई उम्मीद थी।
इतने सालों की मेहनत, संघर्ष और इंतजार के बाद उसे लगा —
जैसे जिंदगी ने पहली बार उसे मुस्कुराकर देखा हो।
ऑटो में बैठते ही उसने खिडकी से बाहर झांका।
हवा उसके चेहरे से टकराई।
ठंडी, खुली, मुक्त।
उसके बाल हल्के- हल्के उडने लगे।
दुपट्टा हवा में लहराकर कभी उसके कंधे पर आता, तो कभी पीछे उड जाता।
वह मुस्कुराई।
माँ... मैंने कर दिखाया, उसने मन ही मन कहा।
उसे लगा जैसे वह सचमुच आजाद है।
अब वह सिर्फ मंदिर की सीढियों पर छोडी गई बच्ची नहीं थी।
अब उसके पास पहचान बनाने का मौका था।
पर शायद।
किस्मत को उसकी खुशी ज्यादा देर मंजूर नहीं थी।
अचानक तेज हवा का झोंका आया।
उसका दुपट्टा कंधे से फिसला।
और हवा में घूमता हुआ सामने से गुजरती एक काली कार के शीशे पर जा गिरा।
भैया, ऑटो रोको! जल्दी रोको! वह घबराकर बोली।
ऑटो झटके से रुका।
उसका दिल तेजी से धडक रहा था।
एक अजीब- सा डर — बिना वजह का — भीतर उठने लगा।
वह जल्दी से उतरी और कार की ओर बढी।
उसी क्षण कार का दरवाजा खुला।
एक लंबा, संतुलित व्यक्तित्व बाहर आया।
लगभग बत्तीस- तैंतीस वर्ष का युवक।
आँखों पर काला चश्मा।
चेहरे पर स्थिर, नियंत्रित भाव।
साधारण टी- शर्ट और जींस में भी उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली था।
उसकी चाल में एक ठंडा आत्मविश्वास था।
जैसे दुनिया उसे चुनौती देने से पहले दो बार सोचती हो।
श्रावणी के कदम वहीं ठिठक गए।
उसकी सांसें जैसे रुक गईं।
उंगलियाँ कांपने लगीं।
माथे पर पसीने की हल्की बूंदें उभर आईं।
वह चेहरा।
हाँ — वही चेहरा।
एक पल में उसका अतीत आंखों के सामने घूम गया।
खून में लथपत इंसान।
उसकी भारी आवाज।
वह परछाईं।
वह डर।
उसका गला सूख गया।
उसने तुरंत नजरें झुका लीं।
युवक ने दुपट्टा हाथ में लिया और हल्की- सी आवाज दी,
सुनिए.… आपका दुपट्टा।
पर वह एक क्षण भी वहाँ नहीं रुकी।
बिना दुपट्टा लिए।
बिना कुछ कहे।
वह मुडी और तेजी से ऑटो में बैठ गई।
भैया, जल्दी चलिए! उसकी आवाज घबराई हुई थी।
ऑटो आगे बढ गया।
युवक कुछ कदम आगे आया।
सुनिए, एक मिनट।
पर तब तक ऑटो मोड काट चुका था।
उसने उसका चेहरा साफ नहीं देखा था।
पर श्रावणी ने उसे पहचान लिया था।
और यही पहचान उसके भीतर तूफान बन चुकी थी।
पूरा रास्ता वह चुप बैठी रही।
बाहर शहर की हलचल जारी थी।
लोग आ- जा रहे थे।
दुकानें खुल रही थीं।
पर उसके भीतर।
अतीत की परतें खुल रही थीं।
उसने खुद से कहा,
यह सिर्फ एक संयोग है... शायद वो कोई और था। शायद मेरी आँखों ने धोखा दिया हो।
पर दिल।
दिल जानता था।
वह वही था।
ऑटो आश्रम के बाहर रुका।
उसने पैसे दिए।
बिना इधर- उधर देखे अंदर चली गई।
आंगन में बच्चों की हंसी गूंज रही थी।
रिया किसी को दौडा रही थी।
दो छोटे बच्चे झूले पर झूल रहे थे।
पर आज श्रावणी किसी से कुछ बोले बिना सीधे अपने कमरे में चली गई।
दरवाजा बंद करते ही उसका संयम टूट गया।
उसकी पीठ दरवाजे से टिक गई।
सांसें तेज।
दिल जैसे सीने से बाहर आना चाहता हो।
वह धीरे- धीरे फर्श पर बैठ गई।
उसे लगा —
जैसे कोई अदृश्य हाथ फिर से उसे उसी अंधेरे में धकेल रहा हो,
जिससे निकलने में उसे सालों लगे थे।
कुछ देर बाद उसने खुद को संभालने की कोशिश की।
गहरी सांस।
एक।
दो।
तीन।
वह उठी।
कमरे के कोने में रखे छोटे लकडी के मंदिर के सामने जाकर खडी हो गई।
माँ दुर्गा की मूर्ति शांत थी।
उसने हाथ जोडे।
माँ... आज फिर उसी अतीत से सामना हुआ। जिसे मैं भूल जाना चाहती थी। क्यों मेरी किस्मत बार- बार मुझे उसी मोड पर ले आती है?
उसकी आवाज हल्की काँप रही थी।
क्या मेरी परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई?
आंसू उसकी पलकों से फिसलकर गालों पर आ गए।
पर माँ... मैं हार नहीं मानूंगी। आपने मुझे अब तक संभाला है। आगे भी संभाल लेना।
कुछ क्षण बाद उसने धीरे से मुस्कुराया।
माँ... मेरी नौकरी लग गई है। कल से ऑफिस जॉइन करने जा रही हूँ।
जैसे अपनी सबसे बडी खुशी वह सबसे पहले माँ के साथ बांटना चाहती हो।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
उसने जल्दी से आंसू पोंछे।
चेहरा संभाला।
दरवाजा खोला।
सामने सात साल की रिया खडी थी।
दीदी! आप यहां छुपी बैठी हैं! काका आपको बुला रहे हैं!
श्रावणी मुस्कुराई।
अच्छा... चलती हूँ। तुमने होमवर्क किया?
रिया गर्व से बोली,
सब कर लिया! आज आपकी सालगिरह है ना!
श्रावणी का चेहरा नरम पड गया।
इन बच्चों के बीच ही तो उसकी असली दुनिया थी।
आंगन में सभी बच्चे इकट्ठा थे।
काका सफेद धोती- कुर्ते में खडे थे।
आ गई बेटी? आज हम सब तेरे साथ खाना खाएंगे। और बता — नौकरी का क्या हुआ?
श्रावणी ने मुस्कुराकर कहा,
काका... कल से मुझे जॉइन करना है।
बच्चों ने तालियां बजाईं।
काका की आंखों में गर्व चमक उठा।
मुझे पता था... तू जरूर सफल होगी।
उस शाम साधारण खाना भी उत्सव जैसा लगा।
बच्चों की हंसी।
रिया की शरारतें।
काका का स्नेह।
कुछ देर के लिए उसके मन का डर हल्का हो गया।
रात गहराने लगी।
बच्चे सो गए।
आंगन में सन्नाटा छा गया।
श्रावणी अपने कमरे में लौटी।
बिस्तर पर बैठी — तो फिर वही चेहरा सामने आ गया।
क्या वह सच में वही था?
अगर वह यहाँ है. तो क्या वह उसे पहचान लेगा?
क्या उसका नया जीवन शुरू होने से पहले ही अतीत लौट आया है?
उसने खुद को समझाया —
कल नई सुबह है। मुझे मजबूत बनना होगा। मैं अब वही कमजोर लडकी नहीं रही।
धीरे- धीरे उसकी आंखें बंद होने लगीं।
पर मन में सवाल अब भी जाग रहा था।

अध्याय समाप्त
क्या कल की सुबह सच में नई शुरुआत होगी?
या पुराने अंधेरे का दरवाजा खुलने वाला है?
क्या वह मुलाकात सिर्फ संयोग थी?
या किस्मत ने पहला संकेत दे दिया है?
To be continued…