Ansh kartik Aryan in Hindi Crime Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | अंश, कार्तिक, आर्यन - 19

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अंश, कार्तिक, आर्यन - 19

50 साल बाद…

आज के समय में रंजीत मर चुका था।

लेकिन उसके द्वारा खड़ा किया गया साम्राज्य आज भी जीवित था।

नहीं...

सिर्फ़ जीवित नहीं था।

वह पहले से कहीं अधिक विशाल, शक्तिशाली और खूंखार हो चुका था।

जिस साम्राज्य की शुरुआत कभी बदले से हुई थी, वह अब एक ऐसी अँधेरी दुनिया बन चुका था, जहाँ झूठ, फरेब, लालच और गुनाह ही सबसे बड़े कानून थे।

रंजीत ने इस काली दुनिया में कदम अपने परिवार के लिए रखा था।

उसने हथियार उठाए थे...

उन लोगों से बदला लेने के लिए जिन्होंने उससे उसका पिता और उसकी पत्नी छीन ली थी।

लेकिन उसकी आने वाली पीढ़ियों ने उसी साम्राज्य को एक नया रूप दे दिया था।

अब यह बदले की दुनिया नहीं रही थी।

यह सत्ता की दुनिया बन चुकी थी।

एक ऐसी दुनिया...

जहाँ हर रोज़ खून बहता था।

जहाँ मासूमों की चीखें बंद कमरों की दीवारों में दफन हो जाती थीं।

जहाँ बेबसों की आवाज़ों को दबा दिया जाता था।

जहाँ सच बोलने वालों को चुप करा दिया जाता था।

और जहाँ ताकतवर बनने के लिए इंसानियत को मारना पड़ता था।

कभी जो मनहोत्रा परिवार न्याय और सम्मान के लिए खड़ा होता था...

जो गरीबों का साथ देता था...

जो अन्याय के खिलाफ लड़ता था...

आज वही मनहोत्रा परिवार खुद जुर्म का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका था।

एक ऐसा गढ़...

जिसकी जड़ें इतनी गहरी थीं कि उसे मिटाना लगभग नामुमकिन था।

पुलिस...

राजनीति...

अपराध...

पैसा...

सत्ता...

हर जगह मनहोत्रा परिवार की पहुँच थी।

लोग कहते थे—

"अगर शहर में कोई अपराध होता है, तो उसके पीछे किसी न किसी तरह मनहोत्रा परिवार का नाम जरूर छिपा होता है।"

लेकिन...

हर साम्राज्य की एक कमजोरी होती है।

और मनहोत्रा साम्राज्य की कमजोरी बनने चला था...

कार्तिक।

महज़ बीस साल का एक लड़का।

न कोई माँ...

न कोई पिता...

न कोई परिवार।

उसके पास अगर कुछ था, तो बस...

किसी अपने को खोने का दर्द।

एक ऐसा दर्द...

जिसे उसने अपने सीने में दबा रखा था।

और उसी दर्द के साथ वह उस पूरे साम्राज्य को मिटाने निकल पड़ा था...

जिसकी हर ईंट में न जाने कितने मासूमों की चीखें दबी हुई थीं।

वह अकेला था।

और उसके सामने था...

देश का सबसे शक्तिशाली अपराधी परिवार।

क्या एक बीस साल का लड़का...

उस साम्राज्य को चुनौती दे सकता था?

कहते हैं—

«एक तिनका भी पूरे जंगल में आग लगा सकता है...
और बूंद-बूंद मिलकर सागर भर जाता है।»

तो क्या...

एक इंसान उन गुनाहों की दीवार को नहीं तोड़ सकता?

कार्तिक को पता नहीं था कि जिस दीवार को वह तोड़ने निकला है...

उस दीवार का एक चेहरा है।

एक नाम है।

एक ऐसा नाम...

जिसे सुनकर बड़े-बड़े लोग अपनी आवाज़ धीमी कर लेते हैं।

उस दीवार का नाम था—

“विक्रम मनहोत्रा।”


“विक्रम मनहोत्रा...”

यह सिर्फ़ एक आदमी का नाम नहीं था।

यह एक ऐसा नाम था...

जिसे सुनते ही बड़े-बड़े लोगों की आवाज़ धीमी पड़ जाती थी।

एक ऐसा नाम...

जिसके सामने पुलिसवाले अपनी आँखें झुका लेते थे।

राजनेता उसके साथ हाथ मिलाने से पहले कई बार सोचते थे।

और अपराधी भी...

उसके इलाके में कदम रखने से पहले इजाज़त लेते थे।

कहते हैं...

विक्रम मनहोत्रा को दुश्मन की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।

उसका नाम ही काफी था।

उसने अपने परिवार से एक ऐसा साम्राज्य विरासत में पाया था, जिसकी जड़ें देश के हर कोने में फैली हुई थीं।

लेकिन उसने उसे केवल संभाला नहीं...

उसे और भी बड़ा बनाया।

पहले लोग मनहोत्रा परिवार से डरते थे।

अब...

वे विक्रम मनहोत्रा से डरते थे।

उसके बारे में कहा जाता था—

«“अगर विक्रम तुम्हारा नाम जानता है, तो तुम अभी ज़िंदा हो।
लेकिन अगर वह तुम्हारा नाम भूल जाए... तो समझ लेना कि तुम्हारी कहानी खत्म होने वाली है।”»

कई लोग उसके खिलाफ खड़े हुए।

लेकिन...धीरे-धीरे...सब गायब हो गए।


उनके बारे में फिर कभी कोई खबर नहीं मिली।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि...

विक्रम कभी खुद को माफिया नहीं कहता था।

अगर कोई उसके सामने यह शब्द इस्तेमाल करता...

तो वह बस हल्का-सा मुस्कुरा देता।

और कहता—

“माफिया डर फैलाते हैं...”

“मैं व्यवस्था चलाता हूँ।”

शहर के लोग जानते थे...

उसकी बनाई हुई व्यवस्था में हर किसी की एक कीमत थी।

पुलिस ,

नेताओं ,

व्यापारियों ,

और यहाँ तक कि कुछ दुश्मनों की भी।

लेकिन एक चीज़ की कोई कीमत नहीं थी—

मनहोत्रा परिवार के खिलाफ गद्दारी।

क्योंकि गद्दारी...

विक्रम मनहोत्रा की दुनिया का सबसे बड़ा अपराध थी।

और उसकी सज़ा... मौत से भी बद्तर जिसकी कोई हद नहीं थी।

पूरा शहर जानता था

उससे बचना लगभग नामुमकिन था।

और अब...उससे लड़ने चला था...

एक बीस साल का लड़का।

जिसे अभी तक यह भी नहीं पता था...

कि वह जिस आदमी को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझ रहा है...

उसकी दुनिया में कदम रखते ही...

उसकी पूरी ज़िंदगी बदलने वाली थी।

दुसरी तरफ

आर्यन कार्तिक को सीधे अपने कमरे में ले आया।

दरवाज़ा बंद होते ही कार्तिक ने एक बार फिर आर्यन की ओर देखा।

उसकी आँखों में सवाल थे।

बहुत सारे सवाल।

लेकिन आर्यन ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।

वह आराम से अपने कोट के बटन खोलने लगा।

कार्तिक कुछ क्षण तक उसे देखता रहा।

फिर बोला—

"तुम मुझे वहाँ से इतनी जल्दी क्यों ले आए?"

आर्यन के हाथ अचानक रुक गए।

बस एक पल के लिए।

लेकिन कार्तिक ने वह पल देख लिया।

आर्यन ने धीरे से उसकी ओर देखा।

"कहाँ से?"

कार्तिक हल्का-सा मुस्कुराया।

"तहखाने की सीढ़ियों से।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

आर्यन की आँखें कुछ पल के लिए कार्तिक के चेहरे पर टिकी रहीं।

फिर वह उसके पास आया।

इतना करीब...

कि कार्तिक को उसके साँसों की गर्माहट महसूस होने लगी।

"तुम बहुत सवाल पूछने लगे हो, कार्तिक।"

कार्तिक पीछे नहीं हटा।

"और तुम बहुत कुछ छिपाने लगे हो, आर्यन।"

दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं।

कुछ क्षणों तक कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसों की आवाज़ थी।

फिर कार्तिक ने धीमी आवाज़ में कहा—

"उस तहखाने में क्या है?"

आर्यन का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

"एक ऐसी जगह..."

वह रुका।

"...जहाँ तुम्हें नहीं जाना चाहिए।"

कार्तिक की भौंहें सिकुड़ गईं।

"क्यों?"

आर्यन ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।

और यही बात...

कार्तिक का शक और गहरा कर गई।

क्योंकि अब उसे यकीन हो चुका था—

उस तहखाने में सिर्फ़ कोई पुरानी चीज़ नहीं छिपी थी।

वहाँ...

कोई ऐसा राज़ दफ़न था...

जिसे आर्यन किसी भी कीमत पर कार्तिक से छिपाना चाहता था।

आर्यन ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

"कार्तिक..."

"कुछ दरवाज़े बंद ही अच्छे होते हैं।"

कार्तिक ने उसकी ओर देखा।

"और अगर उनके पीछे किसी को मेरी ज़रूरत हो?"

आर्यन का हाथ अचानक ढीला पड़ गया।

उसकी आँखों में एक पल के लिए...

एक अजीब-सा डर दिखाई दिया।

बस एक पल के लिए।

लेकिन कार्तिक ने उसे देख लिया।

और उसी क्षण उसे अपने भीतर फिर वही अजीब एहसास महसूस हुआ...

जैसे...

कोई उसे पुकार रहा हो।

बहुत दूर से।

बहुत गहराई से।

जैसे कोई अँधेरे में बैठा...

उसका इंतज़ार कर रहा हो।

कार्तिक ने अनजाने में अपनी छाती पर हाथ रख लिया।

उसकी धड़कन तेज़ हो गई।

आर्यन ने घबराकर पूछा—

"क्या हुआ?"

कार्तिक ने धीरे से कहा—

"मुझे नहीं पता..."

उसने बंद दरवाज़े की ओर देखा।

और फिर...

उसकी नज़र नीचे की ओर चली गई।

तहखाने की दिशा में।

"लेकिन..."

उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।

मुझे लग रहा है जैसे कोई बार बार मेरा नाम पुकार रहा है