Raand ka Sand - 1 in Hindi Comedy stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | रांड का संड - भाग 1

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रांड का संड - भाग 1


बहुत पुराने ज़माने की बात है। एक छोटा-सा गाँव था। उसी गाँव में एक बूढ़ी औरत रहती थी। उसका पति कब का मर-खप चुका था। घर में बस वही बूढ़ी औरत और उसका एक इकलौता बेटा बचा था।

अब बेटा इकलौता था तो क्या हुआ?

निकम्मापन ऐसा कि गाँव भर में उसके बराबर दूसरा कोई नहीं था।

न काम करता, न धंधा करता, न खेत में जाता, न मज़दूरी करता। सुबह देर तक खाट तोड़ता रहता। जब भूख लगती तो उठकर हाथ-मुँह धोता, माँ के सामने बैठ जाता और कहता—

“अम्मा, रोटी दे!”

बेचारी माँ किसी के घर काम करती, किसी के खेत में मज़दूरी करती, कभी अनाज साफ़ करती, कभी गोबर पाथती। जैसे-तैसे दो पैसे कमाती और उसी से अपना और उस निकम्मे का पेट भरती।

जब खाना परोसती तो उसका गुस्सा फूट पड़ता—

“अरे निकम्मे! तेरे हाथ-पाँव में कीड़े पड़ गए हैं क्या? ज़रा-सा काम कर ले! कब तक मेरी छाती पर मूँग दलता रहेगा?”

लेकिन लड़के पर कोई असर ही नहीं होता।

वह आराम से रोटी तोड़ता, दाल में डुबोता और कहता—

“अम्मा, आज दाल में नमक थोड़ा कम है।”

बस फिर क्या था!

बूढ़ी औरत चिल्लाती—

“अरे हरामखोर! कमाकर एक दाना लाता नहीं और नमक का हिसाब करता है!”

आस-पड़ोस वाले सुन लेते तो हँसी छूट जाती।

लेकिन लड़का?

उसे क्या फ़र्क पड़ना था!

वह पेट भरकर डकार लेता, पानी पीता और फिर सीटी बजाता हुआ गाँव की गलियों में निकल जाता।

उस लड़के का असली नाम क्या था, यह किसी को याद भी नहीं था।

उसकी माँ विधवा थी। गाँव वाले उसे ताने मारते थे। किसी ने एक दिन उसे “रांड का संड” कह दिया।

बस फिर क्या था!

नाम ऐसा चला कि चल ही पड़ा।

कोई आवाज़ लगाता—

“अरे ओ रांड के संड!”

तो वह पलटकर कहता—

“हाँ, बोल!”

लोग पूछते—

“तेरा नाम यही है क्या?”

वह कहता—

“हाँ तो! सब इसी नाम से बुलाते हैं।”


समय बीतता गया। वह पंद्रह साल का हो गया।

लेकिन अक्ल?

वही की वही।

हाँ, एक दिन उसे एक बड़ा शौक चढ़ा।

वह जंगल गया और ढो के पेड़ की एक मोटी-सी लकड़ी काट लाया। अब उस लकड़ी को उसने साधारण लकड़ी की तरह नहीं रखा।

पहले कई दिन धूप में सुखाया।

फिर छील-छीलकर चिकना किया।

फिर उस पर तेल लगाया।

हर रोज़ सुबह उठकर लकड़ी पर तेल मलता, कपड़े से रगड़ता और चमकाता।

उसके बाद उसे कंधे पर रखकर पूरे गाँव में घूमता।

लकड़ी को सिरहाने रखकर सोता 

और सच पूछो तो वही करता भी था।

रात को उस लकड़ी को ऐसे सिरहाने रखता, जैसे कोई राजा अपनी तलवार रखता है।

रांड का संड खाने-पीने में किसी पहलवान से कम नहीं था।

सुबह उठता।

हाथ-मुँह धोता।

और बैठकर चार रोटियाँ साफ़ कर देता।

फिर माँ से कहता—

“चार और दे दो।”

माँ चिल्लाती—

“और चार क्यों?”

वह कहता—

“रास्ते के लिए।”

चार रोटियाँ कपड़े में बँध जातीं।

गाँव के बाहर एक पुरानी-सी पुलिया थी। बस वही उसका ठिकाना था।

सुबह वहाँ पहुँचता।

पुराना कंबल बिछाता।

ढो की लकड़ी सिरहाने रखता।

और फिर चारों रोटियाँ खाकर खर्राटे मारने लगता। की पूछता

“अरे रांड के संड! कुछ काम-धंधा भी कर लिया कर।”

वह आँख बंद किए हुए कहता—

“मैं बड़ा काम करूँगा।”


“कौन-सा?”


“जो कोई न कर पाए!”


अब गाँव वालों को उसकी यह बात रट चुकी थी।

लोग उसका मजाक उड़ाते 

लेकिन उसका जवाब एक ही होता—

“जो कोई न कर पाए... वो मैं करूँगा!”


एक दिन शाम के समय गाँव के सबसे बड़े सेठ पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

उसका इकलौता बेटा अचानक मर गया।

बस फिर क्या था!

सेठ के घर में ऐसा कोहराम मचा कि पूरे गाँव को खबर हो गई।

औरतें रोने लगीं।

सेठ छाती पीटने लगा।

आस-पड़ोस के लोग जमा हो गए।

उस ज़माने में गाँव की एक पुरानी रीति थी।

अगर किसी की मौत शाम या रात में हो जाए, तो उसका अंतिम संस्कार उसी रात नहीं किया जाता था। लेकिन शव को पूरी रात घर में भी नहीं रखा जाता था।

इसलिए सेठ के बेटे को बाँस की अर्थी पर रखा गया और गाँव वाले उसे श्मशान ले गए।

श्मशान में एक ऊँचा चबूतरा था।

शव वहाँ रख दिया गया।

तय हुआ कि रातभर कोई-न-कोई उसके पास पहरा देगा और सुबह होते ही अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

लेकिन जैसे-जैसे रात होने लगी...

सबकी हिम्मत जवाब देने लगी।

पहला आदमी बोला—

“मैं थोड़ी देर बैठ जाऊँगा।”

दूसरा बोला—

“हाँ, मैं भी बैठ जाऊँगा... लेकिन पूरी रात नहीं।”


“मुझे तो श्मशान में रात को जाने से ही डर लगता है।”

उधर गाँव के बाहर वाली पुलिया पर रांड का संड अपने कंबल में घुसा पड़ा था।

ढो की लकड़ी सिरहाने रखी थी।

मुँह खुला हुआ था।

और खर्राटे ऐसे चल रहे थे कि पास बैठे कौए भी डर जाएँ।



आगे क्या होगा