जुलाई की शुरुआत में, गढवाल क्षेत्र में बसे गंगापुर जिले में लगातार मूसलाधार बारिश और पहाडी नालों में उफान के कारण समय से पहले ही बाढ का प्रकोप आ गया था. दस जुलाई की सुबह तडके, जिला प्रशासन की एक सरकारी महिंद्रा बोलेरो सबसे ज्यादा प्रभावित सुजलपुर तहसील की ओर जा रही थी, तभी वह भूस्खलन की चपेट में आ गई. चालक संभल पाता, उससे पहले ही वाहन उफनती हुई सोन नदी की तेज धारा में जा गिरा.
इस हादसे में जिला परिषद अध्यक्ष, जिला सतर्कता अधिकारी (विजिलेंस ऑफिसर), जिला कानून व्यवस्था प्रमुख, जनसंपर्क अधिकारी (डीआईपीआरओ) और एडीएम (अपर जिला मजिस्ट्रेट) समेत आठ लोगों की डूबने से मौत हो गई.
हे भगवान! जिला प्रशासन के चार प्रमुख स्तंभ और एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एक झटके में खत्म हो गए थे. इस हादसे ने न केवल पूरे उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया, बल्कि देश की राजधानी नई दिल्ली तक उच्च अधिकारियों का ध्यान खींच लिया. राज्य सरकार को तुरंत तीन सख्त निर्देश जारी किए गए: आपदा राहत के साथ- साथ जमीनी स्तर पर तैनात अधिकारियों की सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जाए. सरकार के लिए किसी अधिकारी को तैयार करने में सालों लग जाते हैं; एक साथ इतने प्रशासनिक अधिकारियों का जाना राज्य और देश दोनों के लिए बडी क्षति थी.
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी था. चार प्रमुख प्रशासनिक पद अचानक खाली होने से कई महत्वाकांक्षी अधिकारियों की उम्मीदें जाग उठीं. कुछ ही दिनों में राज्य मुख्यालय (राजधानी) में सिफारिश लगाने वाले अधिकारियों की होड मच गई. स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि जिले का काम प्रभावित होने लगा और कई अधिकारी अपनी कुर्सियों से नदारद रहने लगे. आखिरकार, अंतरिम रूप से जिले का प्रभार संभाल रहे उप- जिलाधिकारी (एसडीएम) रमेश गंगवार को कडा फरमान जारी करना पडा—" जो भी अधिकारी पद पाने के चक्कर में अपने काम में लापरवाही बरतेगा, उस पर कडी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
साहब का आदेश था, इसलिए नीचे के कर्मचारी शांत हो गए और दिखावे के लिए ही सही, यह गुटबाजी थम गई.
एक हफ्ते बाद, कलेक्ट्रेट परिसर के सभागार में शहीद हुए आठों अधिकारियों के लिए शोक सभा का आयोजन किया गया. मंडल के मंडलायुक्त (कमिशनर) आनंद शर्मा ने राज्य सरकार की ओर से श्रद्धांजलि दी, जबकि एसडीएम रमेश गंगवार ने शोक संदेश पढा. शोक संदेश हमेशा की तरह औपचारिक और लच्छेदार बातों से भरा था—जो जाने वालों के लिए कम और जिंदा लोगों को सुनाने के लिए ज्यादा था. इंसान के जाते ही चाय ठंडी पड जाती है, और यहाँ तो लोग ही दुनिया छोड चुके थे.
दो घंटे चली शोक सभा खत्म होने के बाद, जिला वृद्धजन एवं भूतपूर्व सैनिक कल्याण विभाग के उप- निदेशक, ललित यादव (लकी) जब पार्किंग की ओर बढ रहे थे, तो किसी ने पीछे से उनके कंधे पर थपकी दी.
मुडकर देखा तो उनके पुराने Collage का दोस्त जितेन्द्र सिंह (जीतू) खडा था, जो कलेक्ट्रेट ऑफिस में उप- सचिव (डिप्टी सेक्रेटरी) के पद पर था. यूनिवर्सिटी के दिनों से ही दोनों में गहरी दोस्ती थी. पिछले दस सालों से नौकरी में रहते हुए भी उनकी बॉन्डिंग वैसी ही थी—बिलकुल बेझिझक, जहाँ कोई पर्दा नहीं था.
जितेन्द्र ने आँख से इशारा किया, और ललित समझ गए. ललित पार्किंग में खडी अपनी पुरानी मारुति ऑल्टो में जाकर बैठ गए. गाडी स्टार्ट करने के बजाय उन्होंने गोल्ड फ्लैक सिगरेट सुलगानी चाही. अभी माचिस जलाई ही थी कि बगल का दरवाजा खुला और जितेन्द्र अंदर आ बैठा. उसने बिना किसी औपचारिकता के ललित के हाथ से सिगरेट छीन ली और खुद सुलगा ली.
दो- तीन लंबे कश खींचने के बाद जितेन्द्र बोला, अरे यार, दम घुट रहा था अंदर! आधा घंटा और बैठना पडता तो उंगलियाँ ही फूंक लेता।
ललित मुस्कुराए और अपनी दूसरी सिगरेट जलाते हुए बोले, मैंने देखा, गंगवार साहब पूरे हॉल पर चील की तरह नजर रखे हुए थे. सिगरेट तो दूर, अगर किसी को पेशाब भी जाना होता तो रोककर बैठना पडता! इस वक्त उठकर जाना यानी साहब की नजर में सीधे गद्दारी।
फिर ललित ने जितेन्द्र की तरफ देखते हुए थोडा संशय भरे लहजे में पूछा, वैसे गंगवार साहब पहले तो बडे सीधे- सादे बनते थे, अब तो पूरा रौब झाड रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि नए जिला कलेक्टर (डीएम) वही बनने वाले हैं, बात पक्की हो गई क्या?
जितेन्द्र वर्षों से कलेक्ट्रेट में था, उसकी पहुँच और खबरें ललित से कहीं ज्यादा तेज थीं. उसने धीरे से सिर हिलाया और कहा, हाँ, गंगवार साहब का प्रमोशन तो लगभग तय है. लेकिन मैं आज गंगवार की बात करने नहीं आया, असली खेल तो नए एसडीएम / एडीएम की कुर्सी का है!
नए एसडीएम? ललित थोडा उलझन में पड गए.
भले ही वे दोनों राजपत्रित (Class- 2) अधिकारी थे, आम जनता के लिए' साहब' थे, लेकिन बडे नेताओं और आईएएस अफसरों की नजर में तो छोटे कर्मचारी ही थे. दो छोटे अधिकारी जिले के इतने बडे पद के तबादले की चिंता करें, यह तो फिजूल की दिमागपच्ची लग रही थी.
गाडी स्टार्ट कर, चलकर अपने अड्डे पर बैठकर बात करते हैं, जितेन्द्र ने अधजली सिगरेट खिडकी से बाहर फेंकी और हुक्म चलाने वाले अंदाज में कहा.
वे हमेशा की तरह शहर के बाहरी इलाके वाले त्यागी जी के ढाबे पर पहुँचे, जहाँ शांति से बैठकर बात की जा सकती थी. ढाबे वाले ने ताजा मटन करी, तंदूरी रोटी, सलाद और' देसी ढर्रे' का अद्धा लाकर रख दिया.
दोनों ने एक- एक घूंट लगाया, फिर जितेन्द्र असली मुद्दे पर आया. उसने बताया कि उसके खास सूत्रों के मुताबिक, शासन जिले में स्थिरता बनाए रखने के लिए किसी स्थानीय अधिकारी को ही प्रमोट करने की सोच रहा है. रेस में दो नाम सबसे आगे थे—तहसीलदार रामनाथ और वरिष्ठ अधिकारी सूर्यकांत.
लेकिन इन दोनों से ललित या जितेन्द्र का कोई लेना- देना नहीं था.
तभी जितेन्द्र ने एक ऐसा नाम लिया जिसे सुनते ही ललित की आँखें चमक उठीं—जितेश शर्मा!
जितेश शर्मा की उम्र करीब सैंतीस साल थी—ललित और जितेन्द्र से करीब पाँच साल बडे. सबसे खास बात यह थी कि वे भी लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य विभाग से पढे थे, यानी उनके सीधे सीनियर थे. इस समय वे जिले में शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी उप- जिलाधिकारी (एसडीएम) थे. प्रशासनिक सूची में उनका नंबर काफी नीचे था.
ललित का विभाग अलग था, इसलिए जितेश शर्मा से उनका मिलना- जुलना कम ही होता था. लेकिन जितेन्द्र कलेक्ट्रेट में होने और यूनिवर्सिटी का एलुमनाई होने के नाते उनके थोडा करीब था.
फिर भी, ललित की समझ में यह नहीं आ रहा था कि इस सब से उनका क्या लेना- देना? जितेन्द्र आखिर क्या खिचडी पका रहा है?
जितेन्द्र ने एक और घूंट भरा, अपना मुँह पोंछा और अचानक बात का रुख बदलते हुए पूछा, लकी. तन्वी से तलाक हुए तुझे छह महीने से ज्यादा हो गए हैं. कभी सोचा है फिर से घर बसाने का?
तन्वी का नाम सुनते ही ललित की छाती में जैसे कोई काँटा सा चुभ गया.
तन्वी जिले के सबसे बडे लोकल न्यूज चैनल की स्टार एंकर हुआ करती थी. जब ललित जिला परिषद अध्यक्ष के निजी सचिव (पीएस) थे, तब उनका करियर बुलंदियों पर था. तन्वी ने कई बडे- बडे रिश्ते ठुकराकर ललित से शादी की थी. शादी के शुरुआती दो सालों में ललित का प्रमोशन भी तेजी से हुआ और वे प्रशासनिक सेवा में आगे बढते गए. तीसरे साल वे कलेक्ट्रेट ऑफिस में उप- सचिव बने और जल्द ही एसडीएम बनने वाले थे.
लेकिन किसे पता था कि किस्मत का पासा यूँ पलट जाएगा?
उन्हें आगे बढाने वाले वरिष्ठ नेता/मंत्री को अचानक ब्रेन हैमरेज हुआ और उनका निधन हो गया. नेता जी के जाते ही ललित का करियर भी ठंडा पड गया. न केवल उनका प्रमोशन रुका, बल्कि उन्हें कलेक्ट्रेट से हटाकर वृद्धजन कल्याण विभाग में भेज दिया गया—एक ऐसा विभाग जहाँ न कोई पावर थी, न कोई रोब.
नौकरी के नाम पर सिर्फ सुबह जाना, चाय पीना, अखबार पढना और शाम को घर आकर खाना बनाना रह गया था. दुनिया की नजर में ललित एक शरीफ और सीधे- सादे इंसान थे, लेकिन तन्वी की नजर में वे' नाकारा' बन चुके थे. तन्वी का मानना था कि उसने अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन साल एक ऐसे आदमी पर बर्बाद कर दिए जिसका कोई भविष्य नहीं है.
रोज- रोज के झगडे, ताने और तानों की कडवाहट इतनी बढ गई कि बात तलाक तक पहुँच गई. बच्चे थे नहीं, इसलिए बांद्रा/सिविल कोर्ट में दस मिनट के अंदर कागजों पर दस्तखत हुए और पाँच साल पुराना रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो गया.
जितेन्द्र के मुँह से तन्वी का नाम सुनते ही ललित का पीने का सारा मूड खराब हो गया. उन्होंने हाथ में पकडा ग्लास टेबल पर रख दिया.
ललित का उतरा हुआ चेहरा देखकर जितेन्द्र को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने तुरंत बात संभाली, अरे यार, सॉरी. मुझे वो बात नहीं छेडनी चाहिए थी. चल छोड, घूंट मार।
ललित ने ग्लास नहीं उठाया. वे सीधे जितेन्द्र की आँखों में देखते हुए बोले, जीतू, दस साल पुरानी दोस्ती है हमारी. जलेबी की तरह बातें मत घुमा. साफ- साफ बता, बात क्या है?
जितेन्द्र ने एक गहरी साँस ली. आखिरकार उसने अपना असली पत्ता खोला और बताया कि आज वह ललित को यहाँ क्यों लाया था.