IPS OJASWINI - 1 in Hindi Crime Stories by Deepak Kumar Tiwari books and stories PDF | आई पी एस ओजस्विनी - 1

Featured Books
Categories
Share

आई पी एस ओजस्विनी - 1




बिहार की राजधानी पटना से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर, भोजपुर और बक्सर की सीमाओं के बीच बसा एक छोटा और उपेक्षित सा गांव है—अकबरपुर। यह वो गांव था जहां की जमीन पर साल के अधिकांश महीनों में धूल उड़ती रहती थी और गर्मियों के दिनों में लू के थपेड़े हवा में चीखते हुए से महसूस होते थे। इस गांव के रास्ते तंग और कच्चे थे, जिन पर बैलगाड़ियों के पहियों के गहरे निशान सदियों की बेबसी की कहानी बयां करते थे। गांव के बीचों-बीच एक पुराना, विशालकाय नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी घनी छांव के नीचे गांव के बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाते हुए मौसम, फसल और राजनीति पर पंचायत किया करते थे।

यही वह नीम का पेड़ था, जिसके नीचे आज से पंद्रह साल पहले एक साधारण सा, बहुरूपिया और धूर्त व्यक्ति प्रकट हुआ था। उसका नाम था—सर्वानंद।

सर्वानंद का शुरुआती पाखंड और गांव की मिट्टी
शुरुआत में सर्वानंद के पास न तो कोई बड़ा तामझाम था, न ही चमचमाती गाड़ियां। वह मैले-कुचले भगवा वस्त्र पहने, हाथ में एक कमंडल और माथे पर नकली भभूत का त्रिपुंड लगाए गांव की सीमा पर दाखिल हुआ था। उसने खुद को हिमालय की गुफाओं से निकला एक ऐसा तपस्वी बताया, जिसके पास दुनिया के हर दुख का अंत करने की जादुई शक्ति थी। गांव के लोग स्वभाव से सीधे, सरल और भगवान में अटूट आस्था रखने वाले थे। वे उसकी मीठी, सम्मोहक और चिकनी चुपड़ी बातों में बहुत जल्दी फंस गए।

सर्वानंद ने अपनी चाल का पहला मोहरा उन लोगों को बनाया जो किसी न किसी बीमारी या मानसिक अशांति से जूझ रहे थे। उसने नीम के पेड़ के नीचे एक धुनी रमाई और जड़ी-बूटियों के साथ-साथ अंधविश्वास का ऐसा खतरनाक खेल शुरू किया कि देखते ही देखते लोग उसके पीछे पागलों की तरह भागने लगे। कोई कहता कि बाबा ने हाथ फेरकर उसका पुराना दर्द ठीक कर दिया, तो कोई ढिंढोरा पीटता कि बाबा ने राख से सोने की अंगूठी निकाल दी। इन छोटी-छोटी अफवाहों और जुमलों ने देखते ही देखते सर्वानंद को अकबरपुर का भगवान बना दिया।

गोपाल ओझा का अकेला संघर्ष
लेकिन इस पूरे गांव में एक इंसान ऐसा भी था जो सर्वानंद की इस मायावी चाल और पाखंड को पहले दिन से ही ताड़ गया था। वह था—गोपाल ओझा।

गोपाल ओझा गांव का एक पढ़ा-लिखा, समझदार और जमीन से जुड़ा हुआ किसान था। वह खेती-किसानी के साथ-साथ गांव के युवाओं को सही और गलत का फर्क भी समझाया करता था। जब उसने देखा कि लोग अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई और अनाज इस ढोंगी बाबा के चरणों में चढ़ा रहे हैं और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अंधविश्वास के दलदल में धंसते जा रहे हैं, तो उसका खून खौल उठा।

गोपाल ने अकेले ही इस पाखंड के खिलाफ आवाज उठाने की ठान ली। उसने गांव वालों को समझाने की कोशिश की, अरे भाइयों! होश में आओ। यह कोई संत नहीं, बल्कि एक शातिर बहरूपिया है जो तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठाकर अपनी रोटियां सेक रहा है। भगवान मंदिर और तुम्हारे दिलों में बसते हैं, इस ढोंगी के पास नहीं!

लेकिन गोपाल की उस आवाज को अनसुना कर दिया गया। जिस जनता को सर्वानंद ने अपनी चमत्कारी कहानियों से सम्मोहित कर लिया था, वह गोपाल के खिलाफ हो गई। लोगों ने गोपाल को ही बाबा का दुश्मन और नास्तिक करार देना शुरू कर दिया।

निर्मला ओझा की बेबसी और उस काली रात का तांडव
गोपाल की इस बगावत ने बाबा सर्वानंद और उसके कुछ चापलूस चेलों की नींद उड़ा दी। उन्हें लगा कि अगर यह गोपाल जिंदा रहा और उसकी बातें लोगों तक पहुंच गईं, तो उनका यह नया-नया खड़ा किया गया साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा।

एक अमवास्य की रात थी। आसमान में काले बादलों ने डेरा डाल रखा था और तेज आंधी चल रही थी। उस रात अकबरपुर गांव की खामोशी को चीरते हुए कुछ संदिग्ध लोग गोपाल ओझा के घर के दरवाजे पर पहुंचे। घर के अंदर गोपाल, उनकी पत्नी निर्मला ओझा और उनकी नन्ही सी पांच साल की बेटी ओजस्विनी ओझा गहरी नींद में थे।

दरवाजे पर जोरदार धक्के पड़े। इससे पहले कि गोपाल संभल पाता, बाबा के गुर्गों ने घर का दरवाजा तोड़ दिया। निर्मला ने घबराकर अपने पति को पीछे खींचना चाहा, लेकिन क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उन लोगों ने गोपाल ओझा को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। चीख-पुकार सुनकर छोटी सी ओजस्विनी अपनी मां की गोद से छिटक कर कोने में जा छिपी और उसने अपनी डबडबाई आंखों से वह सब देखा जो किसी भी बच्चे के दिल को हमेशा के लिए पत्थर बना देने के लिए काफी था।

गोपाल ओझा की आवाजें धीरे-धीरे दम तोड़ने लगीं। सुबह होते-होते गांव वालों को यह बताया गया कि गोपाल ने गांव के देवता की अवमानना की थी, इसलिए देवता के प्रकोप से उसकी अचानक मौत हो गई। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उस लाश पर से कफन हटाकर सच्चाई देख सके, क्योंकि अब पूरे गांव पर सर्वानंद का खुला डर और आतंक कायम हो चुका था।

पति की लाश के पास बैठी निर्मला ओझा की आवाज हमेशा के लिए घुट गई। सर्वानंद ने अपनी चौखट पर उसे बुलाया और धमकी दी कि अगर उसने या उसकी बेटी ने मुंह खोलने की कोशिश की, तो उनका नामोनिशान इस धरती से मिटा दिया जाएगा। बेबस निर्मला को बाबा के दरबार में अपनी और अपनी बेटी की जिंदगी की भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह बाबा की विशेष सेविका बनकर रह गई, जिसका शरीर और आत्मा दोनों उस पाखंडी के चंगुल में कुचले जाते रहे।

ओजस्विनी की आंखों में सुलगती प्रतिशोध की आग
लेकिन उसी धुएं और आंसुओं के बीच, उस पांच साल की बच्ची ओजस्विनी के भीतर एक ऐसी ज्वाला प्रज्वलित हुई जो समय के साथ बुझी नहीं, बल्कि और अधिक भड़कती चली गई। जब वह अपनी मां को रात-रात भर सिसकते हुए देखती, और जब वह उस ढोंगी बाबा को गांव वालों की झूठी श्रद्धा स्वीकार करते देखती, तो उसके बालमन में एक ही प्रतिज्ञा जन्म ले चुकी थी—इस राक्षस का साम्राज्य एक दिन इसी मिट्टी में मिला दूंगी।

वक्त बीतता गया। सर्वानंद का साम्राज्य अकबरपुर की सीमाओं को पार करके पूरे राज्य और फिर देश के कई हिस्सों तक फैल गया। छोटे से नीम के पेड़ के नीचे शुरू हुआ वह पाखंड अब एक विशाल कॉर्पोरेट जैसे आश्रम में बदल चुका था, जहां राजनेता, आईपीएस अधिकारी, बड़े-बड़े उद्योगपति और मंत्री बाबा के आशीर्वाद के बिना कोई फैसला नहीं लेते थे। पुलिस प्रशासन उसकी जेब में था और जनता उसकी एक झलक पाने के लिए बेकाबू रहती थी।

पंद्रह साल बाद: लौट आया तूफान
आज, पंद्रह साल बीत चुके हैं। वही अकबरपुर गांव एक बार फिर से सजा हुआ है। चारों तरफ पीले और लाल झंडे लहरा रहे हैं। ढोल-नगाड़ों की गड़गड़ाहट के बीच बाबा सर्वानंद का वह शाही काफिला, जिसमें पचास से ज्यादा लग्जरी गाड़ियां शामिल थीं, गांव की सीमा पर आ पहुंचा है।

बाबा सर्वानंद अपनी खुली गाड़ी में सवार हैं। उनके चेहरे पर वही पुराना, मक्कार और अहंकारी संतोष है। उन्हें लगता है कि इस दुनिया में अब ऐसा कोई नहीं है जो उनके इस अटूट साम्राज्य को चुनौती दे सके। उन्होंने अपनी ताकत के बल पर हर उस मुंह को बंद कर दिया है जो कभी उनके खिलाफ उठ सकता था।

लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि प्रकृति का पहिया किस तरह घूमता है।

गांव की सीमा से कुछ ही दूरी पर, एक साधारण खाकी वर्दी पहनी हुई जिप्सी आकर रुकती है। उस जिप्सी का दरवाजा खुलता है और जमीन पर एक भारी बूट पड़ता है। एक महिला अधिकारी बाहर निकलती है। उसकी वर्दी पर चमकते हुए स्टार और उसकी आंखों में तैरता हुआ वह शांत, गहरा समंदर जैसा संकल्प साफ बता रहा है कि वह इस बार किसी थानेदार या सिपाही की हैसियत से नहीं, बल्कि कानून के सबसे ताकतवर और खूंखार रूप में आई है।

वह हैं—IPS ओजस्विनी ओझा

ओजस्विनी ने अपनी कैप ठीक की, एक गहरी सांस ली और अपनी मां के आंसुओं और अपने पिता की चीखों को याद करते हुए मन ही मन खुद से कहा— सर्वानंद... तेरी इस भव्य विलासिता और झूठे भगवान के नाटक का अंत करने के लिए तेरी ही इस पुरानी धरती पर तेरी मौत आ चुकी है। बस, खेल शुरू होने वाला है।

वह बिना पलक झपकाए, सीधे उसी आश्रम की ओर अपने कदम बढ़ा देती हैं, जहां कभी उनकी मां की अस्मिता को लूटा गया था और जहां से इस खूनी खेल की शुरुआत हुई थी।

अगले भाग में क्या होगा?
क्या ओजस्विनी अपनी असली पहचान छिपाकर बाबा के सबसे खास और गोपनीय घेरे में घुसपैठ कर पाएंगी? और बाबा के चेलों के बीच उनकी इस एंट्री पर पहला शक किसे होगा? जानिए भाग 2 में।