चैप्टर 2: किसी और के काम आना
आसमान से मौत एक खौफनाक आग के गोले का रूप लेकर बहुत तेजी से नीचे की तरफ गिर रही थी।
उस लाल चमकते हुए उल्कापिंड ने पूरे शाम के आसमान को एक डरावने खून जैसे लाल रंग में रंग दिया था।
समीर के दिल की धड़कनें इतनी तेज हो चुकी थीं मानो वे उसकी पसलियों को तोड़कर बाहर आ जाएंगी।
खौफ से उसकी नसें सुन्न पड़ने लगी थीं और उसका गला पूरी तरह से सूख चुका था।
मौत को अपने इतने करीब आते देखकर उसने अपनी जान बचाने के लिए बिना एक भी पल गंवाए उस पुराने बरगद के पेड़ से नीचे की तरफ छलांग लगा दी।
हवा को चीरते हुए वह बहुत ही तेजी से डालियों का सहारा लेकर जमीन पर आ गिरा और बिना पीछे देखे वहां से दूर भागने के लिए मुड़ा ही था।
लेकिन तभी उसके तेजी से भागते हुए कदमों में अचानक जैसे किसी ने ब्रेक लगा दिया।
हवा की सनसनाहट और मौत की उस खौफनाक गूंज को चीरते हुए कुछ आवाजें उसके कानों तक पहुंची।
यह आवाजें समीर उस बहुत साफ सुनाई दे रही थी।
वह आवाज उन नन्हे और बेजुबान चिड़िया के बच्चों की थी जो उसी पुराने पेड़ के ऊपर एक घोंसले में मौजूद थे।
वे छोटे और कमजोर बच्चे मौत को अपने इतने करीब देखकर खौफ के मारे बहुत जोर-जोर से चीख रहे थे।
उनकी चीखें समीर के कानों में चुभ रही थीं।
समीर के दिमाग ने उसे तुरंत वहां से भाग जाने की चेतावनी दी क्योंकि वहां रुकने का मतलब सिर्फ और सिर्फ एक खौफनाक मौत थी।
लेकिन समीर का साफ़ दिल उन मासूम चीखों को अनसुना करके खुदगर्जी के साथ नहीं भाग सका।
अगले ही पल समीर ने बिना कुछ सोचे समझे और अपनी जान को दांव पर लगाते हुए वापस उस पेड़ की तरफ दौड़ लगा दी।
उसकी सांसें बुरी तरह से फूल रही थीं और उसका पूरा शरीर खौफ के मारे कांप रहा था।
अपनी जान की रत्ती भर भी परवाह किए बिना वह दुबला-पतला समीर बहुत ही तेजी से उस पेड़ के खुरदरे तने पर चढ़ने लगा।
तेजी से चढ़ने की वजह से पेड़ की कठोर और सूखी छाल से उसके हाथ छिल रहे थे।
उसके हाथों से खून की कुछ बूंदें भी छलकने लगी थीं लेकिन उसने उस दर्द की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।
वह पागलों की तरह अपनी पूरी ताकत लगाकर बस ऊपर और ऊपर चढ़ता जा रहा था।
ऊपर पहुंचते ही उसने अपने बुरी तरह से कांपते हुए हाथों से चिड़िया के उस घोंसले को पूरी मजबूती के साथ पकड़ लिया।
उस घोंसले के अंदर वे मासूम बच्चे बुरी तरह से कांप रहे थे और समीर को देखकर और जोर से चीखने लगे थे।
तभी अचानक समीर को अपने सिर के ठीक ऊपर एक भयंकर और झुलसा देने वाली गर्मी का अहसास हुआ।
आसमान से गिरते उस आग के गोले ने वहां की हवा को किसी धधकती हुई भट्टी की तरह गर्म कर दिया था।
समीर को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके शरीर के ऊपर उबलता हुआ पानी डाल दिया हो।
वह गर्मी इतनी जानलेवा और डरावनी थी कि समीर की ऊपर आंख उठाकर देखने की हिम्मत ही नहीं हुई।
उसे पता था कि अगर उसने ऊपर देखा तो मौत का वह खौफनाक और विशाल मंजर उसे वहीं पत्थर का बना देगा।
इसलिए उसने बिना एक पल की भी देरी किए उस घोंसले को अपने सीने के पास कर लिया।
और अपनी तथा उन मासूम बच्चों की जान बचाने के लिए सीधा उस बरगद के पेड़ से नीचे छलांग लगा दी।
हवा में नीचे गिरते समय उसका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ उस घोंसले को सुरक्षित रखने पर केंद्रित था।
लेकिन जैसे ही समीर के पैर पूरी रफ्तार और शरीर के पूरे वजन के साथ कठोर जमीन से टकराए एक आवाज गूंजी।
कड़ाक।
यह किसी सूखी लकड़ी के टूटने की आवाज नहीं थी बल्कि यह एक इंसान की हड्डी के क्रैक होने की आवाज थी।
समीर को तुरंत अहसास हो गया कि उसकी अपनी हड्डी टूटने की आवाज थी।
उसका सीधा पैर झटके से मुड़कर टूट चुका था।
हड्डी टूटने का वह दर्द इतना ज्यादा भयंकर था कि समीर की आंखों के सामने एक पल के लिए अंधेरा छा गया।
दर्द की एक बहुत तेज लहर उसके टूटे हुए पैर से होते हुए सीधे उसके दिमाग तक दौड़ गई।
उसके मुंह से एक दर्दनाक चीख निकलने ही वाली थी लेकिन उसने अपने होंठों को दांतों से जोर से भींच लिया।
इतने भयंकर दर्द और शरीर को तोड़ देने वाली तकलीफ के बाद भी उसने अपने हाथों से उस घोंसले की पकड़ को जरा भी ढीला नहीं होने दिया।
वह घोंसला अब भी उसकी बाहों में उसके सीने से लगा हुआ पूरी तरह से सुरक्षित था।
अपने एक टूटे हुए पैर में उठ रहे उस दर्द को सहते हुए वह वहां से दूर भागने की कोशिश करने लगा।
वह लंगड़ाता हुआ और अपने टूटे पैर को मिट्टी पर घसीटता हुआ किसी तरह उस पेड़ से दूर जाने की जद्दोजहद कर रहा था।
हर एक कदम के साथ उसके टूटे हुए पैर से असहनीय दर्द की लहरें उठ रही थीं जो उसके पूरे वजूद को हिला रही थीं।
लेकिन तभी उसके ठीक पीछे एक बहुत ही जोरदार और कान फोड़ देने वाला धमाका हुआ।
वह विशाल आग उगलता हुआ उल्कापिंड पूरी तेजी के साथ जमीन से टकरा चुका था।
उस धमाके की आवाज इतनी ज्यादा भयानक थी कि समीर के कानों के पर्दे फटने को हो गए और उसे कुछ पल के लिए कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया।
उस उल्कापिंड के जमीन से टकराते ही वहां एक बहुत ही ताकतवर शॉकवेव पैदा हुई।
यह शॉकवेव किसी अदृश्य और विनाशकारी तूफान की तरह आगे बढ़ी और सीधा आकर समीर की पीठ से बहुत जोर से टकराई।
उस टक्कर की ताकत इतनी ज्यादा थी कि समीर की पसलियां झनझना उठीं और उसे लगा कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाएगी।
समीर ने अगले ही पल उस घोंसले को अपने सीने के और भी ज्यादा करीब कर लिया ताकि वह झटके से गिर ना जाए।
शॉकवेव की उस विनाशकारी ताकत ने समीर के शरीर को जमीन से पूरी तरह उखाड़ दिया और वह हवा में बहुत दूर तक उड़ गया।
हवा में गोते खाते समय समीर के दिमाग में अपनी जान का कोई भी ख्याल नहीं आ रहा था।
उसके दिमाग में बस यही बात चल रही थी कि कहीं जमीन पर गिरते वक्त उसके ही शरीर के नीचे दबकर वे छोटे और नाजुक बच्चे मर ना जाएं।
वह हवा में किसी बेजान पुतले की तरह उड़ रहा था और जमीन तेजी से उसके करीब आ रही थी।
लेकिन जैसे ही उसे अहसास हुआ कि वह अब जमीन से टकराने वाला है उसने अपने शरीर को हवा में ही घुमाने की कोशिश की।
समीर ने अपनी आखिरी बची हुई ताकत लगाई और अपने दोनों हाथों को हवा में ऊपर की तरफ कर लिया।
वह खुद को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहा था ताकि जमीन और उन बच्चों के बीच में उसका शरीर आ सके और बच्चों को कोई खरोंच ना आए।
वह किसी भी कीमत पर उन बच्चों को जिंदा बचाना चाहता था चाहे इसके लिए उसकी अपनी जान ही क्यों ना चली जाए।
अगले ही पल समीर बहुत ही जोरदार धड़ाम की आवाज के साथ कठोर जमीन से टकराया।
यह टक्कर इतनी जोरदार थी कि समीर के मुंह से खून निकल आया।
वह खुरदरी और पथरीली जमीन पर बहुत दूर तक घिसटता हुआ चला गया।
जमीन पर घिसटते समय नुकीले पत्थर उसके शरीर को बुरी तरह से चीर रहे थे और उसके कपड़े भी फट चुके थे।
उसी समय समीर को अपने शरीर के अंदर कई सारी हड्डियां एक साथ चटकने और टूटने की आवाजें बहुत साफ सुनाई देने लगीं।
उसका बायां हाथ और सीने की कई पसलियां उस भयानक झटके से बुरी तरह से टूट चुकी थीं।
जैसे ही उसका खून से लथपथ शरीर आगे जाकर रुका उसके हर एक अंग में एक बहुत ही जोरदार और असहनीय दर्द शुरू हो गया।
यह दर्द इतना ज्यादा था कि उसका पूरा शरीर तड़प रहा था और वह सांस भी ठीक से नहीं ले पा रहा था।
उसके हाथों की ताकत पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और नसें ढीली पड़ गई थीं।
और आखिरकार न चाहते हुए भी उसके सुन्न पड़ चुके हाथों से वह घोंसला छूटकर गिर गया।
समीर का दिल पूरी तरह से टूट गया और उसके अंदर एक गहरा सन्नाटा छा गया।
उसे बहुत गहरी निराशा हुई कि अपनी जान दांव पर लगाने के बाद और इतना भयंकर दर्द सहने के बाद भी वह उन बेजुबान चिड़िया के बच्चों को नहीं बचा सका।
उसकी आंखों से बेबसी और दुख के आंसू बहने लगे थे जो उसके चेहरे पर लगे खून और मिट्टी के साथ मिल गए थे।
उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह अपनी आंखें उठाकर उस घोंसले का हाल देखे।
उसे लग रहा था कि वे मासूम बच्चे उस भयानक झटके की वजह से उसके सामने ही कुचल कर मर चुके होंगे।
लेकिन फिर भी उसने अपने शरीर में हो रहे उस बेइंतहा दर्द को किसी तरह नजरअंदाज किया।
उसने बड़ी मुश्किल से अपनी आखिरी ताकत बटोरी और अपने भारी हो चुके सिर को धीरे-धीरे उठाकर उस तरफ देखा।
वहां उड़ती हुई धूल के बीच वह उस घोंसले को ढूंढने की कोशिश कर रहा था।
और जब उसकी नजर उस घोंसले पर पड़ी तो वहां का नजारा देखकर समीर के अंदर खुशी की एक लहर दौड़ गई।
वह घोंसला मिट्टी पर गिरा पड़ा था लेकिन वह अब भी बिल्कुल सही सलामत था और पूरी तरह से सुरक्षित था।
और अगले ही पल उस घोंसले के अंदर से ची-ची करने की साफ आवाजें आने लगीं।
वे नन्हे बच्चे अभी भी पूरी तरह से सुरक्षित थे उन्हें खरोंच तक नहीं आई थी।
हा वो ये सब देख कर डर जरूर गए थे पर वो अब भी जिंदा थे।
यह देखकर समीर के खून से सने चेहरे पर एक बहुत ही दर्द भरी लेकिन सुकून वाली मुस्कान आ गई।
उसे एक बहुत ही बड़ी राहत मिली कि उसकी यह कुर्बानी बेकार नहीं गई और उसने उन बच्चों का जीवन बचा लिया।
वो मन ही मन बुदबुदाया, “देखा मैने कहा था न में तुम्हे कोई चोट पहुंचाने नहीं आया हूं।”
उसे दर्द हो रहा था पर उसके अंदर एक सुकून भी था।
सुकून किसी और के काम आने का।
पर तभी अचानक उसे अपने ठीक पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
कोई धीरे-धीरे से उसके करीब आ रहा था।
समीर ने देखा कि एक बड़ी सी और डरावनी परछाई आगे बढ़ती हुई दिखाई दी।
उस विशाल परछाई ने पल भर में समीर के साथ-साथ उस घोंसले को भी पूरी तरह से अपने अंधेरे घेरे में ले लिया था।
समीर का दुबला पतला शरीर अब पूरी तरह से जवाब दे चुका था और उसमें एक उंगली तक हिलाने की भी ताकत नहीं बची थी।
वह कुछ भी समझ पाता या अपनी गर्दन घुमाकर उस परछाई की तरफ देख भी पाता उससे पहले ही उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
उसका दिमाग सुन्न पड़ गया और वह पूरी तरह से बेहोशी की गहरी और शांत खाई में गिरता चला गया।