Just A Power System in Hindi Fiction Stories by Sam khan books and stories PDF | Just A Power System - 3

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Just A Power System - 3

चैप्टर 3: अंजान आवाज


समीर की आँखें एक अचानक लगे झटके के साथ खुल गईं। 

उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं जैसे वह किसी बहुत लंबे और डरावने सफर से दौड़ कर वापस लौटा हो। 

कमरे के अंदर सुबह के सूरज की हल्की और सुनहरी रोशनी खिड़की में लगी लोहे की बारीक जाली में से छनकर अंदर आ रही थी। 

रोशनी के उस तिरछे और सुनहरे जाले में धूल के अनगिनत बारीक कण हवा में बहुत शांति से तैरते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। 

उस खिड़की के बिल्कुल पास ही जमीन पर उसका छोटा भाई बहुत गहरी और सुकून भरी नींद में सोया हुआ था। 

उसके छोटे भाई की छाती हर एक सांस के साथ बहुत ही आराम से ऊपर और नीचे हो रही थी। 

वह कमरा बहुत ही ज्यादा छोटा और सीलन से भरा हुआ था जिसमें मुश्किल से दो लोग ही ठीक से सो सकते थे। 

कमरे की खुरदरी दीवारों का हल्का नीला रंग सीलन और नमी की वजह से कई जगहों से पपड़ी बनकर उखड़ चुका था। 

उन उखड़ी हुई दरारों में से अंदर की लाल ईंटें और सूखा हुआ सीमेंट बहुत साफ दिख रहा था। 

जमीन के उस ठंडे फर्श पर बस दो पुरानी और रंग उड़ी हुई रजाइयां बिछी हुई थीं। 

उन रजाइयों की रुई कई जगह से दब चुकी थी और उनके धागे बाहर निकल रहे थे। 

इन्हीं पुरानी रजाइयों पर समीर और उसका छोटा भाई हर रात सोते थे। 

कमरे के एक अंधेरे कोने में लोहे की एक बहुत पुरानी और भारी अलमारी रखी हुई थी। 

उस अलमारी का हरा पेंट अब लगभग पूरी तरह से गायब हो चुका था और उसकी जगह हर तरफ भूरे रंग की मोटी और खुरदरी जंग लगी हुई थी। 

उस अलमारी से किसी पुराने लोहे और बंद कमरे की एक अजीब सी महक आ रही थी। 

छत की तरफ देखने पर एक पुराना और जंग खाया हुआ पंखा टंगा था। 

वह पंखा धीमी रफ्तार में घूमते हुए लगातार अपनी मोटर और ब्लेड से खट खट और चर चर की कान खाने वाली आवाज कर रहा था। 

पंखे के उन मुड़े हुए ब्लेड पर काले रंग की मोटी धूल जमी हुई थी जो हर चक्कर के साथ हवा को और भी भारी बना रही थी। 

उस घुटन भरे और बेहद तंग कमरे में बस यही सब कुछ था जो उसकी गरीबी की कहानी को बिना कुछ बोले ही बयां कर रहा था। 

समीर अपनी जगह से एक झटके से उठकर फर्श पर सीधा खड़ा हो गया। 

अचानक खड़े होने की वजह से उसका सिर एक पल के लिए चकरा गया और उसकी आंखों के सामने हल्का सा अंधेरा छा गया। 

उसका दिमाग बिल्कुल सुन्न और खाली पड़ चुका था। 

उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था कि वह कब कैसे और किस वक्त इस बंद कमरे में यहाँ पर आया था। 

उसकी याददाश्त पर जैसे एक बहुत ही गहरा और घना कोहरा छा गया था। 

उसे बस धुंधला सा इतना याद आ रहा था कि वह कल शाम को उस पुराने और विशाल बरगद के खुरदरे पेड़ की डाल पर बैठा हुआ था और फिर? 

समीर ने अपनी दोनों कनपटियों को अपनी उंगलियों से जोर से दबाते हुए अपने दिमाग पर जोर डाला। 

उसे अंदर ही अंदर ऐसा महसूस हो रहा था कि वह कोई बहुत जरूरी भूल रहा है जिसे याद रखना उसके लिए सबसे ज्यादा अहम था। 

तभी अचानक उस शांत कमरे में खिड़की के बाहर से कुछ चिड़ियों के चहकने की बहुत ही तेज और तीखी आवाज सुनाई दी। 

चीं चीं की वह आवाज हवा को चीरते हुए सीधे समीर के कानों के पर्दे से टकराई। 

उस आवाज के कानों में पड़ते ही अगले ही पल समीर के दिमाग का वह घना कोहरा एक झटके में छंट गया और उसे सब कुछ याद आने लगा।  

यादों का एक सैलाब उसके दिमाग में पूरी ताकत के साथ उमड़ पड़ा। 

वह चिड़ियों का छोटा सा घोंसला और आसमान का शाम के वक्त का वो नारंगी रंग उसे सब कुछ दिखाई देने लगा। 

आसमान से पूरी तेजी के साथ नीचे गिरता हुआ वह आग उगलता और धधकता हुआ उल्कापिंड भी उसकी आंखों के सामने आ गया। 

समीर का अपनी जान की परवाह किए बिना पागलों की तरह पेड़ पर चढ़ना और उन बेजुबान बच्चों को अपने सीने से लगा लेना। 

और फिर उस ऊंचे पेड़ से जमीन की तरफ छलांग लगाना। 

समीर को याद आया कि कैसे जमीन से टकराते ही उसके सीधे पैर की हड्डी एक बहुत ही डरावनी कड़ाक की आवाज के साथ चूर चूर हो गई थी। 

उसे वह विनाशकारी शॉकवेव याद आई जिसने उसे हवा में एक सूखे पत्ते की तरह बहुत दूर तक उड़ा दिया था। 

समीर को धीरे धीरे वह सारा दर्दनाक मंजर वह बेइंतहा दर्द और अपनी ही हड्डियों के टूटने की आवाजें बहुत साफ याद आने लगीं। 

यह सब याद आते ही समीर का दिल इतनी जोर से धड़कने लगा मानो वह उसकी पसलियों को तोड़कर बाहर निकल आएगा। 

उसका पूरा शरीर घबराहट और खौफ के मारे ठंडे पसीने से पूरी तरह भीग गया। 

वह डर के मारे बहुत ही बुरी तरह से कांप रहा था। 

घबराहट के मारे उसने बहुत जल्दी से नीचे झुककर अपना वह सीधा पैर देखा जो कल शाम को टूट चुका था। 

लेकिन वहां का नजारा देखकर समीर की आंखें पूरी तरह से फटी की फटी रह गईं। 

उसका वह सीधा पैर बिल्कुल सही सलामत था। 

वहां पर किसी भी तरह की कोई सूजन नहीं थी और ना ही चोट या खून का कोई भी छोटा सा निशान वहां पर मौजूद था। 

समीर ने अपने कांपते हुए हाथों से अपने उस पैर को छूकर और दबाकर देखा लेकिन उसे वहां रत्ती भर भी दर्द का अहसास नहीं हो रहा था। 

समीर तेजी से भागकर और लड़खड़ाता हुआ उस जंग लगी पुरानी अलमारी के पास गया। 

उसने उस अलमारी के दरवाजे पर लगे एक पुराने और धुंधले आईने में खुद के अक्स को देखा। 

उस आईने के कांच पर पानी के सूखे हुए छींटों के कुछ पुराने दाग लगे थे लेकिन फिर भी उसमें उसका चेहरा बिल्कुल साफ दिख रहा था। 

उसके चेहरे पर कोई भी घाव नहीं था और ना ही पत्थरों और कांटों से छिलने का किसी भी तरह का कोई खरोंच का निशान था। 

वह पूरी हैरानी और एक अजीब से खौफ के साथ अपने ही चेहरे को उस आईने में बहुत देर तक घूरने लगा। 

कल शाम तो उसका पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया था फिर यह सब एकदम से कैसे मुमकिन हो सकता था। 

उसने घबराते हुए जल्दी से अपने दोनों हाथों से अपनी पुरानी टी शर्ट को पकड़कर ऊपर की तरफ उठा लिया। 

उसने आईने में अपने अंदर के दुबले पतले शरीर और अपनी छाती को बहुत ही ध्यान से देखा। 

उसकी पसलियां और उसके पेट का हर एक हिस्सा बिल्कुल सही सलामत था। 

उसकी त्वचा पर चोट या खरोंच का एक भी छोटा सा निशान तक नहीं था मानो कल कोई भी हादसा उसके साथ हुआ ही ना हो। 

समीर को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब क्या हो रहा है और यह कैसे हो सकता है। 

क्या वह पागल हो रहा था या फिर उसका दिमाग उसके साथ कोई बहुत बड़ा खेल खेल रहा था। 

उसने अपनी उलझन और अपनी घबराहट को शांत करने के लिए मन ही मन अपने आप से कहा। 

"क्या वह सब महज एक सपना था?" 

उसने खुद को तसल्ली देने की कोशिश की कि शायद वह कल शाम को उस बरगद के पेड़ पर ही सो गया होगा। 

और उसके पापा उसे उठाकर यहां लाए होंगे। फिर यह सब उसकी नींद में आया कोई बहुत ही बुरा सपना था। 

तभी अचानक उस सन्नाटे से भरे कमरे में उसके दिमाग अंदर एक बहुत ही अजीब और ठंडी सी आवाज गूंज उठी। 

"नहीं वह एक सपना नहीं था।" 

समीर यह अनजान आवाज सुनकर बुरी तरह से कांप उठा और वह बहुत ज्यादा डर गया।  

खौफ के मारे उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई और वह अलमारी से एक कदम पीछे की तरफ हट गया। 

समीर डरकर पागलों की तरह अपनी हैरान आंखों से अपने आसपास के उस पूरे छोटे से कमरे में देखने लगा। 

वह कमरे के हर एक अंधेरे कोने और हर एक दीवार को घूर रहा था मानो कोई उसके कमरे में छुपकर बैठा हो। 

उसने सबसे पहले जमीन पर लेटे हुए अपने छोटे भाई की तरफ देखा। 

उसका भाई अब भी उसी तरह अपनी पुरानी रजाई के अंदर लिपट कर बहुत ही गहरी और शांत नींद में सोया हुआ था। 

उसके भाई के चेहरे पर कोई हलचल नहीं थी और वह पूरी तरह से बेखबर था। 

समीर की धड़कनें और भी ज्यादा तेज हो गईं क्योंकि इस छोटे से बंद कमरे में उसके और उसके सोए हुए भाई के अलावा और कोई भी नहीं था।