हवेली के उस बंद कमरे से हर रात 12:05 बजे एक धीमी घंटी की आवाज़ आती थी। जब शेखर ने दरवाज़ा खोला, तो सामने कोई नहीं था... बस दीवार पर ताज़ा खून से लिखा था: "अंगुलियों के निशान मत मिटाना, अगला नाम तुम्हारा है।"
पुरानी हवेली के उस सुनसान गलियारे में तीन दरवाज़े थे। दो दरवाज़ों के ताले सालों से जंग खा चुके थे, लेकिन तीसरे दरवाज़े पर पीतल का एक चमचमाता हुआ नया ताला लटका हुआ था।
शेखर ने जब शहर की भागदौड़ से दूर सुकून पाने के लिए उस हवेली को खरीदा, तो गाँव के बूढ़े चौकीदार ने उसे सिर्फ एक ही हिदायत दी थी—"साहब, रात को 12 बजे के बाद हवेली के पश्चिमी हिस्से में मत जाना, और खासकर उस तीसरे दरवाज़े की तरफ तो भूलकर भी नहीं।" लेकिन इंसान की फितरत अजीब होती है; रहस्य जितना गहरा होता है, उसे जानने की उत्सुकता उतनी ही बढ़ जाती है। शेखर ने चौकीदार की बात को महज़ एक अंधविश्वास मानकर हँसकर टाल दिया।
पहली रात, हवेली में सब कुछ शांत था। अचानक शेखर की आँख खुली। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी में ठीक 12:05 बज रहे थे। तभी हवा में एक अजीब सी भारीपन घुल गई और गलियारे से एक धीमी, झनझनाती हुई घंटी की आवाज़ आई।
शेखर का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने टॉर्च उठाई और दबे पाँव गलियारे की ओर बढ़ा। आवाज़ उसी तीसरे दरवाज़े से आ रही थी। वहाँ पहुँचकर शेखर के होश उड़ गए—दरवाज़े पर लटका पीतल का ताला गायब था और भारी लकड़ी का दरवाज़ा खुद-ब-खुद थोड़ा सा खुला हुआ था। अंदर से सड़े हुए गुलाब और गीली मिट्टी की एक अजीब सी बदबू आ रही थी।
शेखर ने काँपते हाथों से दरवाज़े को पूरा ढकेला। कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी शीशम की मेज़ रखी थी, जिस पर एक अकेली मोमबत्ती जल रही थी। कमरा पूरी तरह से खाली था, सिवाय सामने की सफ़ेद दीवार के। उस दीवार पर ताज़ा लाल रंग से—जो देखने में बिल्कुल खून जैसा लग रहा था—लिखा था: "अंगुलियों के निशान मत मिटाना, अगला नाम तुम्हारा है।"
डर के मारे शेखर का गला सूख गया। उसने टॉर्च की रोशनी मेज़ पर डाली। धूल से भरी उस मेज़ पर उसकी अपनी अंगुलियों के साफ़ निशान छपे हुए थे, जो दरवाज़ा खोलते समय गलती से लग गए थे। घबराहट और हड़बड़ी में शेखर ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और पागलों की तरह मेज़ पर लगे अपने निशानों को पोंछने लगा।
जैसे ही उसने आखिरी निशान मिटाया, कमरे में जलती हुई मोमबत्ती एक झटके में बुझ गई। पूरा कमरा गहरे सन्नाटे और अंधेरे में डूब गया।
अगले ही पल, शेखर को लगा कि अंधेरे में उसके ठीक कान के पास कोई बहुत करीब खड़ा है। किसी के ठंडी साँस लेने की आवाज़ आई और एक महीन, बर्फीली आवाज़ सीधे उसकी रूह में उतरी—
"मैंने साफ़-साफ़ लिखा था न शेखर... तुमने निशान मिटाकर सबसे बड़ी गलती कर दी।"
शेखर की चीख गले में ही फँस कर रह गई। उसने काँपते हाथों से टॉर्च की स्विच दबाई। टॉर्च की पीली रोशनी कमरे के सामने लगे एक बड़े से ढके हुए शीशे पर पड़ी। उस शीशे के ऊपर पड़ा कपड़ा हट चुका था। शीशे में शेखर को अपना चेहरा दिखाई दे रहा था—ज़र्द, पसीने से तर और खौफज़दा। लेकिन खौफ की असली वजह उसका अपना चेहरा नहीं था... शीशे के अंदर, उसकी अपनी परछाईं के ठीक पीछे एक धुँधली, बिना चेहरे वाली आकृति खड़ी थी, जो धीरे-धीरे शेखर के काँधे पर अपना सड़ चुका हाथ रख रही थी।
शेखर ने पीछे मुड़कर देखा, तो पीछे कोई नहीं था। लेकिन जब उसने वापस शीशे में देखा, तो वह आकृति अब उसकी अपनी परछाईं की जगह ले चुकी थी और शीशे के अंदर से उसकी तरफ मुस्कुरा रही थी।
कहानी कैसी लगी?
क्या शेखर उस बिना चेहरे वाली आकृति के चंगुल से बच पाएगा? क्या है इस तीसरे दरवाज़े का खौफ़नाक सच? अगर आप इस रहस्यमयी रात का अगला भाग जानना चाहते हैं, तो कमेंट (Comment) करके अपनी राय ज़रूर दें!
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