Kaalchakra - 1 in Hindi Fiction Stories by Avinash books and stories PDF | कालचक्रः धुंध में छुपा सच - 1

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कालचक्रः धुंध में छुपा सच - 1

भाग 1: एक बेनाम संदेश

मसूरी की पहाड़ियों पर कोहरा इतना घना था कि तीन फ़ीट दूर का रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा था। रात के नौ बज चुके थे और चीड़ के जंगलों से उठती ठंडी हवाएँ किसी अनहोनी का इशारा दे रही थीं।
राजन ने अपनी जीप का स्टीयरिंग व्हील कसकर थाम रखा था। वह एक पेशेवर क्राइम रिपोर्टर था—एक ऐसा इंसान जिसकी खोजी नज़रें अक्सर उन सच तक पहुँच जाती थीं जिन्हें दुनिया छुपाना चाहती थी। लेकिन आज का मामला किसी रहस्यमयी केस का नहीं, बल्कि उसके अपने अतीत से जुड़ा था।
उसकी बगल वाली सीट पर एक पुराना, पीला लिफाफा रखा था। दो दिन पहले उसके दिल्ली स्थित दफ़्तर में यह लिफाफा आया था। उस पर कोई नाम या पता नहीं था, केवल लाल स्याही से लिखा था:
 "राजन, अगर अपनी बहन की रहस्यमयी मौत का सच जानना चाहते हो, तो मसूरी की पुरानी 'ग्रेस विला' पहुँचो। गीतिका तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।"
 
गीतिका... यह नाम सुनते ही राजन का दिल ज़ोर से धड़क उठा था। गीतिका—उसकी बचपन की दोस्त और एक काबिल फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट, जो तीन साल पहले एक हाई-प्रोफ़ाइल केस की तफ़्तीश के दौरान अचानक गायब हो गई थी। पुलिस ने उसे मृत मान लिया था, लेकिन राजन ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी।
"क्या गीतिका सच में ज़िंदा है? या यह किसी का बुना हुआ खौफनाक जाल है?" राजन ने खुद से सवाल किया।
अचानक जीप के सामने एक ज़ोरदार झटका लगा और गाड़ी 'ग्रेस विला' के लोहे के जंग लगे दरवाज़े के सामने रुक गई। यह हवेली कई सालों से सुनसान पड़ी थी। स्थानीय लोगों का कहना था कि यहाँ रात में अजीब आवाज़ें आती हैं।
राजन कार से बाहर निकला। टॉर्च की रोशनी में हवेली का ढांचा किसी खंडहर की तरह दिख रहा था। उसने अपनी जैकेट के अंदर रखी रिवॉल्वर को टटोला और हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ा दिए।
मुख्य द्वार आधा खुला हुआ था। जैसे ही राजन ने अंदर कदम रखा, भारी लकड़ी का दरवाज़ा अपने आप ज़ोर से बंद हो गया!
धड़ाम!
राजन ने मुड़कर देखा। दरवाज़ा बाहर से लॉक हो चुका था।
"खोलने की कोशिश मत करो राजन," अंधेरे कोने से एक शांत और जानी-पहचानी आवाज़ आई।
राजन ने तुरंत टॉर्च की रोशनी उस दिशा में घुमाई।
वहाँ एक लड़की खड़ी थी। काले कोट में लिपटी हुई, आँखों में थकान और गंभीरता।

"गीतिका...?" राजन की साँसें थम गईं। "तुम... तुम ज़िंदा हो?"
गीतिका ने एक हल्की सी मुस्कान बिखेरी, लेकिन उसकी आँखों में कोई खुशी नहीं थी। "ज़िंदा हूँ राजन, लेकिन शायद ज़्यादा देर तक नहीं। अगर हमने अगले दो घंटों में इस हवेली का राज़ नहीं ढूँढा, तो हम दोनों में से कोई यहाँ से बाहर नहीं जाएगा।"
"तुम तीन साल तक कहाँ थीं? और मेरी बहन का इस सब से क्या ताल्लुक है?" राजन ने आगे बढ़ते हुए पूछा।
"तुम्हारी बहन की मौत कोई हादसा नहीं थी राजन," गीतिका ने गंभीर स्वर में कहा। "उसका कत्ल हुआ था... क्योंकि वह उस सच के बेहद करीब पहुँच चुकी थी जिसे 'द शैडो कॉरपोरेशन' छुपाना चाहता है। और मैं भी उसी सच की वजह से इतने साल छुपकर जी रही हूँ।"

अचानक पूरी हवेली की लाइटें एक साथ जल-बुझ करने लगीं। ऊपर की मंज़िल से भारी कदमों की आवाज़ आई—जैसे कोई लोहे की जंजीर घसीटते हुए आ रहा हो।
गीतिका ने राजन का हाथ पकड़ा—उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। "वह आ चुका है," वह फुसफुसाई। "द फ़ैंटम!

कौन है द फैंटम? क्या है द फैंटम का राज? 
जानने के लिए पढ़िए भाग:२ ।