​तीन तिगाड़ा, असाइनमेंट बिगाड़ा! in Hindi Comedy stories by Shivam Dhuriya books and stories PDF | ​तीन तिगाड़ा, असाइनमेंट बिगाड़ा!

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​तीन तिगाड़ा, असाइनमेंट बिगाड़ा!

शिव की ज़िंदगी में तीन ही चीज़ें सबसे ज़्यादा मायने रखती थीं—गणित के कड़े फॉर्मूले, प्रोबेबिलिटी की थ्योरम्स, और उसके दो परम-ज्ञानी दोस्त: दिनेश और शैलेन्द्र। शिव B.Sc. मैथ्स ऑनर्स का वो छात्र था, जो चाय में चीनी की मात्रा मापने के लिए भी कैलकुलस का इस्तेमाल कर सकता था। दिनेश मोहल्ले का सबसे बड़ा "जुगाड़ विशेषज्ञ" था, जिसके आईडिया सीधे तबाही की तरफ जाते थे। वहीं शैलेन्द्र इस तिकड़ी का वो अति-भावुक प्राणी था जो बात-बात पर अपनी वसीयत लिखने बैठ जाता था।
असली फसाद की जड़ वो 50 पन्नों का खौफनाक गणितीय असाइनमेंट था, जिसे शिव ने 6 महीने तक रात-रात भर जागकर, खून-पसीना बहाकर तैयार किया था!
​डकैती का प्लान बनाने के पीछे 3 सबसे बड़े और जानलेवा कारण थे:

​1. दिनेश का 'समोसा कांड'
घटना वाली शाम, शिव अपना असाइनमेंट टेबल पर रखकर नहाने गया। तभी हॉस्टल में दिनेश दो प्लेट गरम-गरम आलू-समोसे लेकर आ गया। टिशू पेपर न मिलने पर दिनेश के 'दिव्य दिमाग' ने शिव के 50 पन्नों वाले असाइनमेंट के पेज नंबर 12 से 25 को नेपकिन समझ लिया!
​जब शिव नहाकर बाहर आया, तो उसने देखा कि उसकी 6 महीने की तपस्या पर मीठी सौंठ, तीखी हरी चटनी और छोले का रस पूरी तरह फैल चुका था। आधी फाइल तो समोसे के तेल से पारदर्शी (Transparent) हो चुकी थी!
​
2. प्रोफेसर 'खड़ूस' शर्मा की धमकी
​प्रोफेसर शर्मा का नियम बड़ा सिंपल था—"नो असाइनमेंट = नो एग्ज़ाम!"
शिव ने जब अपनी गणितीय बुद्धि से प्रोबेबिलिटी निकाली, तो पता चला कि अगर सुबह 9 बजे तक फाइल जमा नहीं हुई, तो:
​99.87 % चांस थे कि शिव को पूरे साल के लिए 'बैक' (Fail) लग जाएगी।
​0.13 % चांस थे कि शर्मा सर उसे कॉलेज के गेट से ही धक्का देकर बाहर करवा देंगे।

​3. रात भर में 50 पेज दोबारा लिखना असंभव था!
​शिव अकेले रात भर में दोबारा 50 पन्नों की जटिल थ्योरम्स (int e^{-x^2} dx) याद करके नहीं लिख सकता था।
तभी दिनेश ने अपना "मास्टर प्लान" दिया:
​"देख शिव, शर्मा सर के पास इस असाइनमेंट की 'मास्टर आंसर की' (Answer Key) वाली फाइल उनके घर की स्टडी टेबल पर रखी रहती है। हम रात को उनके घर में घुसेंगे, उस फाइल के हर पेज की फोटो खींचेंगे, हॉस्टल आकर 3 घंटे में उसका प्रिंटआउट निकालेंगे और सुबह 9:00 बजे शर्मा सर के सामने हीरो बनकर फाइल ठोक देंगे!"

रात के 1:00 बजे, हॉस्टल के कमरा नंबर 302 को "ऑपरेशन मैट्रिक्स वॉर रूम" में बदल दिया गया था। दीवार पर लटके काले बोर्ड पर शिव ने पूरे चौक से प्रोफेसर शर्मा के बंगले का एक 3D ग्रिड मैप बना रखा था, जिसमें X, Y, Z अक्षों पर बंगले का कोना-कोना अंकित था।

​शिव हाथ में डस्टर लिए किसी सीनियर रोबो-साइंटिस्ट की तरह टहल रहा था।

​"ध्यान से सुनो," शिव ने बोर्ड पर एक फॉर्मूला लिखा, "प्रोफेसर शर्मा की उम्र 52 साल है। रात को 10 बजे भारी खाना खाने के बाद उनकी गहरी नींद (REM Sleep) का चक्र रात 1:45 AM से 3:15 AM के बीच अपने चरम पर होता है। यदि हमारी आवाज़ का साउंड लेवल L < 30 dB रहा, तो उनके जागने की प्रोबेबिलिटी P (wake) approx 0.004 होगी।"
​दिनेश ने अपनी जेब से अपनी "मिशन डकैती किट" टेबल पर पटक दी। उसमें था—एक काला जूता पॉलिश का डिब्बा, एक 10-मीटर पुरानी सूती साड़ी (रस्सी के लिए), बेबी पाउडर का एक डिब्बा, और हरे रंग की प्लास्टिक की पन्नी में लिपटी टॉर्च।
​
"यह बेबी पाउडर किसलिए?" शैलेन्द्र ने थरथराते हुए पूछा।

​"अबे गधे! हॉलिवुड की फिल्मों में देखा नहीं?" दिनेश ने अपनी छाती चौड़ी की, "शर्मा सर के स्टडी रूम में अगर इन्फ्रारेड लेज़र सिक्योरिटी सिग्नल्स हुए, तो यह पाउडर हवा में उड़ाकर लेज़र बीम की लोकेशन ट्रेस करेंगे!"

​शिव ने अपना माथा पीट लिया, "दिनेश, शर्मा सर B.Sc. के प्रोफेसर हैं, 'मिशन इम्पॉसिबल' के टॉम क्रूज़ नहीं! उनके घर में लेज़र नहीं, बस फर्श पर बिखरे चूहे के पिंजरे हो सकते हैं।"

शैलेन्द्र, जो कमरे के कोने में हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था, फौरन बोला, "तुम दोनों मुझे मरवाओगे! पिछले महीने भी दिनेश के कहने पर हम गर्ल्स हॉस्टल की दीवार कूदे थे तो मुझे चार रेबीज के इंजेक्शन लगे थे। इस बार मेरी आत्मा कह रही है कि हम तिहाड़ जेल के कैदी नंबर 420, 421 और 422 बनने वाले हैं!"

​रात के ठीक 2:30 बजे, तीनों अंधेरी सड़क पर रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे। दिनेश ने अपने 'मिशन इम्पॉसिबल' टूलकिट के नाम पर जेब में एक पेचकस, एक टॉर्च (जिसकी बैटरी आखरी सांसें ले रही थी) और एक उबला हुआ अंडा रख रखा था।

​"उबला अंडा किस लिए?" शैलेन्द्र ने कांपती आवाज़ में पूछा।
"इमरजेंसी प्रोटीन, भाई! भागने में काम आएगा," दिनेश ने शान से कहा।

​प्रोफेसर शर्मा का बंगला रात के सन्नाटे में किसी भूतिया हवेली जैसा लग रहा था।

प्रोफेसर शर्मा की बाउंड्री वॉल के पास पहुँचकर "फेज-1: दीवार ब्रीचिंग" शुरू हुआ।

8 फीट ऊँची बाउंड्री वॉल के सामने खड़े होकर शिव ने अपना चश्मा ठीक किया और हवा में अपनी उंगलियों से एंगल नापने लगा।

​"प्रोबेबिलिटी और काइनेटिक्स के हिसाब से," शिव फुसफुसाया, "यदि दीवार की ऊँचाई H = 2.5m है और हमारा सामूहिक भार M = 180 kg है, तो पार करने के लिए हमें प्रोजेक्टाइल मोशन का नियम लगाना होगा। दिनेश, तू आधार (x-अक्ष) बनेगा, शैलेन्द्र लंब (y-अक्ष), और मैं कर्ण (Hypotenuse) बनकर छलांग लगाऊँगा।"

​"अबे ओ आर्यभट्ट की औलाद!" शैलेन्द्र दबी चीख में बोला, "तेरा हाइपोटेन्यूज अगर मेरे कंधे पर पड़ा तो मेरी रीढ़ की हड्डी 180' के एंगल पर क्रैक हो जाएगी!"

​खैर, भारी धक्का-मुक्की और शैलेन्द्र की दबी हुई आहों के बाद तीनों दीवार के पार पहुंचे—लेकिन धरती पर लैंडिंग 'स्मूथ' नहीं हुई। दिनेश सीधे सड़ी हुई पत्तियों के ढेर में गिरा, शैलेन्द्र गुलाब के कांटों वाली झाड़ी में, और शिव का सिर सीधे एक खाली एल्युमीनियम की बाल्टी से टकराया।

​'टैंगंगंग!' बाल्टी की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूँज उठी।

अब आया "फेज-2: लेज़र और मोशन डिटेक्शन एरिया" (यानी शर्मा सर का गार्डन)।

​दिनेश ने तुरंत हवा में बेबी पाउडर की पूरी डिब्बी उड़ा दी। सारा पाउडर उड़कर वापस दिनेश और शिव की आँखों में ही घुस गया। दोनों आँगन में खड़े होकर बिना आवाज़ किए अपनी आँखें मलने लगे, जबकि शैलेन्द्र पाउडर की वजह से आ रही छींक को अपनी नाक दबाकर रोकने की नाकाम कोशिश कर रहा था—"कूं... कूं...!"

​"आगे बढ़ो!" शिव ने आँसू पोंछते हुए दबी आवाज़ में कहा, "खिड़की का डिस्टेंस 10 meters है। हमें पैरों के पंजों पर f = 0.5 Hz की फ़्रीक्वेंसी से चलना होगा ताकि फर्श से कोई वाइब्रेशन न पैदा हो।"

​और तभी... अंधेरे कोने से दो लाल अंगारे जैसी आँखें चमकीं।

​वह प्रोफेसर शर्मा का ख़ूंख्वार जर्मन शेफर्ड 'रॉकी' था—जिसकी कद-काठी किसी छोटे तेंदुए जैसी थी। रॉकी ने अपनी जीभ बाहर निकाली, अपने दाँत किचकिचाये और एक भयानक "ग़ुर्र्र्र... भों!" के साथ दहाड़ा।

​"शिव! जल्दी कैलकुलेट कर!" शैलेन्द्र की घिग्गी बंध गई, "यह कुत्ता हमें चबाने में कितना टाइम लेगा?"

​शिव ने घबराकर जेब से लेजर पॉइंटर और कैलकुलेटर निकाला, "इसकी दौड़ने की गति v approx 42 km/h है। हमारे और इसके बीच की दूरी S = 12 m है। समय t = S/V = 1.02 seconds! हमारे पास सोचने के लिए शून्य समय है!"
​"भागो रे!" दिनेश चिल्लाया।

​तीनों ने बिना पीछे देखे सीधे आँगन में खड़े एक पुराने, लचकीले अमरूद के पेड़ की तरफ दौड़ लगा दी। शैलेन्द्र बिल्ली की फुर्ती से सबसे ऊँची डाल पर चढ़ गया, दिनेश बीच वाली डाल पर अटक गया, और शिव की पैंट अमरूद की एक कांटेदार टहनी में फँस गई!
​नीचे रॉकी खड़ा होकर बार-बार ऊपर छलांग मार रहा था। उसकी लार सीधे शिव के जूते पर टपक रही थी।

​शैलेन्द्र ऊपर से रोते हुए फुसफुसाया, "चिट्ठी आई है... आई है... वसीयत लिख दो मेरी! मेरी पुरानी साइकिल दिनेश को मत देना!"

​"अबे चुप कर!" शिव ने पैंट छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, "पेड़ की इस डाल की मोटाई बहुत कम है। बेंडिंग स्ट्रेस का फॉर्मूला sigma = M y/ I होता है। अगर हम तीनों का सामूहिक भार इस डाल के 'यंग्स मॉड्यूलस' (Young's Modulus) से ज़्यादा हुआ, तो टहनी टूट जाएगी!"

तभी घर की मुख्य बत्ती जली। दरवाज़ा खुला और हाथ में डंडा और टॉर्च लिए प्रोफेसर शर्मा बाहर निकले। वह धारीदार पजामे और चेक शर्ट में थे, आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ा था।
​टॉर्च की रोशनी सीधे पेड़ पर लटके तीनों महारथियों पर पड़ी।

​"कौन है वहाँ?" शर्मा सर की बुलंद आवाज़ गूँजी। "डाकू? या हॉस्टल के वही आवारा लड़के?"

​दिनेश ने तुरंत टहनी पर लटके-लटके ही हाथ जोड़ लिए, "सर! हम चोर नहीं हैं! हम तो आपके प्रिय छात्र हैं! हम रात को 'नेचर वॉक' पर निकले थे और इस पेड़ की बायोडायवर्सिटी का अध्ययन कर रहे थे!"

​प्रोफेसर शर्मा ने टॉर्च शिव के मुंह पर मारी, "शिव? तू? रात के 3 बजे मेरे अमरूद के पेड़ पर 'वेक्टर कैलकुलस' लगा रहा है?"

​शिव ने कांपते हुए अपनी बात रखी, "स...सर! मेरी असाइनमेंट फाइल पर दिनेश ने चटनी गिरा दी थी। मैं फाइल का लॉस फंक्शन कैलकुलेट कर रहा था। तभी आपके कुत्ते रॉकी जी ने हमें 'आउटलायर' (Outlier) समझकर डेटा से बाहर धकेल दिया और हम इस टहनी के स्टेबिलिटी नोड पर अटक गए!"

​प्रोफेसर शर्मा ने 10 सेकंड तक चश्मा नीचे करके तीनों को घूरा। फिर उन्होंने गहरी सांस ली और बोले, "शिव, तेरा मैथ्स का लॉजिक बहुत तगड़ा है... लेकिन तूने इस अमरूद की सड़ी हुई डाल का फैक्टर ऑफ सेफ्टी (Factor of Safety) चेक नहीं किया।"

​और जैसे ही शर्मा सर ने यह कहा—
​'कटाक्क्क्क्क!'
​डाल टूट गई! तीनों एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए नीचे सूखी पत्तियों के विशाल ढेर पर जा गिरे! रॉकी ने लपककर शिव का चेहरा चाटना शुरू कर दिया, जैसे कह रहा हो—'गणित में पास, लेकिन लैंडिंग में फेल!'

​सुबह के 5:30 बजे, प्रोफेसर शर्मा के ड्राइंग रूम में सोफे पर तीनों दोस्त बैठे थे। दिनेश के कपड़ों पर खाद लगी थी, शैलेन्द्र के बालों में अमरूद के पत्ते फँसे थे, और शिव के हाथ में चाय का गरम कुल्हड़ था।

​प्रोफेसर शर्मा ने शिव की नई रिग्रेशन फाइल पर दस्तखत करते हुए मुस्कुराकर कहा, "शिव, अगली बार अगर असाइनमेंट खो जाए, तो 'इंटीग्रेशन' लगाने की जगह सीधे मेरे घर की घंटी बजा देना। और हां, दिनेश... अगली बार अगर मेरी बाउंड्री पर पैर रखा, तो रॉकी का 'डिस्टेंस-टाइम ग्राफ' तेरे शरीर पर छपेगा!"

अगले दिन सुबह के ठीक 8:55 बजे, B.Sc. (मैथ्स) फ़ाइनल ईयर का क्लासरूम किसी युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। पूरी क्लास में फुसफुसाहट थी, क्योंकि क्लासरूम की पिछली सीट पर बैठी 'तिकड़ी' का हुलिया देखकर ऐसा लग रहा था मानो वे किसी सर्जिकल स्ट्राइक से सीधे बिना सोए क्लास में चले आए हों।
​
शिव अपनी फटी पैंट को छुपाने के लिए अपने से दो साइज बड़ी रूममेट की पुरानी पतलून पहने बैठा था, जिसमें दो बड़ी-बड़ी सेफ़्टी पिन लगी थीं। दिनेश के कान के पीछे और गर्दन पर जूता पॉलिश की काली छाप अब भी चमक रही थी, जिसे साबुन भी नहीं मिटा पाया था। और शैलेन्द्र? शैलेन्द्र के माथे पर दो बड़ी बैंडेज लगी थीं l

सुबह के 9:00 बजे 'खड़ूस' शर्मा सर ने क्लास में कदम रखा। उनके एक हाथ में चश्मा था और दूसरे हाथ में... चाय का कुल्हड़ और वही लाल रंग की असाइनमेंट फाइल!
​पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। शिव की दिल की धड़कन का Frequency 120 beats/minute पार कर गया।
​शर्मा सर ने चश्मा पहना, पूरी क्लास को घूरा और फिर सीधे शिव की तरफ देखकर मुस्कुराए—वह मुस्कान कम और साक्षात यमराज की दस्तक ज़्यादा लग रही थी।

​"गुड मॉर्निंग क्लास!" शर्मा सर की भारी आवाज़ गूँजी। "आज हम कैलकुलस नहीं पढ़ेंगे। आज हम 'रात के अंधेरे में अमरूद के पेड़ पर फिजिक्स के नियम' पढ़ेंगे!"

​शर्मा सर ने पॉडियम पर फाइल रखी और कड़क आवाज़ में बोले, "रोल नंबर 11... शिव, ज़रा आगे आओ!"
​शिव कांपते पैरों से खड़ा हुआ। उसके सेफ्टी पिन की खट-खट आवाज़ शांत कमरे में साफ़ सुनाई दे रही थी। वह आगे पहुँचा।
​"शिव," शर्मा सर ने चश्मे के ऊपर से देखते हुए पूछा, "तेरा यह असाइनमेंट तो मुझे मिल गया। काम बहुत बढ़िया है... लेकिन मुझे एक बात बता, जब तू रात के 3 बजे मेरे अमरूद के पेड़ से गिरा, तो तेरी पैंट का जो 5 % हिस्सा मेरे कुत्ते 'रॉकी' के मुंह में रह गया था, क्या उसका एरिया तूने अपने इस 'एरिया अंडर द कर्व' वाले चैप्टर में शामिल किया है?"
​
पूरी क्लास में ठहाका गूँज उठा! शिव का चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया।

​दिनेश अब भी अपनी 'जुगाड़ बुद्धि' बाज नहीं लाया। वह अपनी सीट से खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, "सर! सर! वो शिव की कोई गलती नहीं थी! वो तो हवा का ड्रैग फ़ोर्स इतना तेज था कि शिव की पैंट रॉकी के दांतों से अपने आप टकरा गई! इसमें शिव की नीयत साफ़ थी सर!"

​शर्मा सर ने दिनेश को घूरा, "अच्छा? और दिनेश... तेरे कान के पीछे जो डाकू वाली पॉलिश लगी है, क्या वो तूने 'लाइट रिफ्लेक्शन' का प्रैक्टिकल करने के लिए लगाई थी?
और शैलेन्द्र..."
​शैलेन्द्र तो सर का नाम लेते ही सीधे डेस्क के नीचे झुककर रोनी सूरत बनाने लगा, "सर! मुझे मत मारिए! सारा प्लान दिनेश का था! मैंने तो पहले ही कहा था कि हम तिहाड़ जेल जाएँगे! मुझे तो जबरदस्ती 90^ के कोण पर दीवार के पार फेंका गया था सर!"

​शर्मा सर ने अपनी हंसी रोकने की कोशिश की, लेकिन उनसे रुका नहीं गया। उन्होंने टेबल पर हाथ पटका और जोर से हँस पड़े। पूरा हॉल तालियों और ठहाकों से गूँज उठा।

​शर्मा सर ने शिव की फाइल उसकी तरफ बढ़ाई और बोले, "शिव, तेरे मैथ्स की मैं दाद देता हूँ। तूने रात को 3.00 AM पर भी रॉकी की स्पीड का जो कैलकुलेशन किया था, वो एकदम सटीक था। इसलिए तुझे इस असाइनमेंट में मिलते हैं 10 में से 10 मार्क्स!"

​शिव की आँखों में खुशी के आँसू आ गए! उसने राहत की सांस ली, लेकिन शर्मा सर ने तुरंत उंगली उठाई—
​"लेकिन..." शर्मा सर मुस्कुराए, "अमरूद के पेड़ की टूटी डाल का नुकसान, और रात को मेरी नींद ख़राब करने के ज़ुर्म में—दिनेश, शिव और शैलेन्द्र... तुम तीनों अगले एक महीने तक रोज़ शाम को रॉकी को वॉक पर ले जाओगे!"

​शिव ने मुस्कुराते हुए जेब से कैलकुलेटर निकाला और दिनेश से बोला, "दिनेश, दुखी मत हो! 1 महीने में 30 दिन होते हैं। अगर हम रॉकी को रोज़ 2 km टहलाएंगे, तो 2 times 30 = 60 km। यानी प्रति व्यक्ति सिर्फ 20 km की रनिंग आएगी... प्रोबेबिलिटी के हिसाब से यह बहुत आसान सौदा है!"

​शैलेन्द्र ने बेंच पर सिर पटकते हुए कहा, "भाई! अगली बार अगर तेरा असाइनमेंट खोया, तो मुझे गोली मार देना, लेकिन इस गणितज्ञ के साथ डकैती करने मत ले जाना!"

​और इस तरह, क्लास के ठहाकों, शर्मा सर की मुस्कान और रॉकी की नई 'वॉक ड्यूटी' के साथ 'ऑपरेशन असाइनमेंट' का यह मजेदार किस्सा हमेशा के लिए कॉलेज की यादों में दर्ज हो गया!