किंग कोबरा
विश्व का सबसे विशाल, साम्राज्यवादी और प्राणघातक विषधर
सरीसृप विज्ञान के संपूर्ण इतिहास में यदि किसी एक जीव को निर्विवाद रूप से 'सर्प-सम्राट' का दर्जा प्राप्त है, तो वह किंग कोबरा है। वैज्ञानिक वर्गीकरण की दृष्टि से इसे किंग कोबरा के रूप में जाना जाता है। वैज्ञानिक नाम में समाहित ग्रीक शब्द ' ओफिस फेगिनक् का शाब्दिक अर्थ है—"अन्य सांपों का भक्षण करने वाला"। प्राणीशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह सामान्य भारतीय नागों के वंश से पूरी तरह भिन्न है और अपने स्वयं के पृथक वंश का एकमात्र जीवित प्रतिनिधि है।
ऐतिहासिक और लोक-सांस्कृतिक परिदृश्य में किंग कोबरा केवल एक जीव नहीं, बल्कि शक्ति, धीरता और प्राकृतिक संतुलन का एक अनूठा प्रतीक रहा है। भारत के पश्चिमी घाट, असम, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटीय तथा वनीय क्षेत्रों में प्राचीन काल से ही इस जीव को जंगलों का रक्षक मानकर पूजने की परंपरा रही है। प्राचीन भारत के आयुर्वेद और विष-शास्त्र ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' में ऐसे विशालकाय सर्पों का संदर्भ मिलता है जो अपनी एक ही फुंकार और दंश से क्षण भर में प्राण हरने की क्षमता रखते थे।
अन्य सर्पों की तुलना में किंग कोबरा का व्यवहार अत्यंत विशिष्ट है। यह अनावश्यक रूप से आक्रामक होने के बजाय एक अत्यंत आत्म-नियंत्रित, गंभीर और उच्च बुद्धिमत्ता वाला जीव है। इंसानों की उपस्थिति को यह दूर से ही भांप लेता है और संघर्ष से बचने का भरसक प्रयास करता है। लेकिन जब इसे इसकी प्रादेशिक सीमाओं में घेरा जाता है, तब यह जिस रौद्र रूप का प्रदर्शन करता है, उसकी मिसाल प्राणी जगत में दुर्लभ है।
यद्यपि किंग कोबरा का नाम सुनते ही भीषण भय का संचार होता है, परंतु सांख्यिकीय दृष्टि से भारत में सर्पदंश से होने वाली मौतों के कुल आंकड़ों में किंग कोबरा का योगदान 1% से भी कम है। भारत में प्रतिवर्ष होने वाली लगभग 58,000 सर्पदंश मौतों में से 90% से अधिक मौतें 'बिग फोर' (भारतीय नाग, करैत, रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर) के कारण होती हैं। इसके विपरीत, किंग कोबरा के काटने से होने वाली मौतों की संख्या औसतन प्रतिवर्ष 10 से 30 के बीच दर्ज की जाती है।
किंग कोबरा पूरी तरह से घने, सदाबहार वर्षावनों दलदली क्षेत्रों और इंसानी बस्तियों से दूर सुदूर वनीय परिवेश में रहना पसंद करता है।
यह इंसान को देखते ही आक्रमण करने के बजाय चुपचाप दूर निकल जाता है।
यह एक बुद्धिमान शिकारी है। इसे ज्ञात होता है कि इंसान उसका भोजन नहीं है, इसलिए रक्षात्मक स्थिति में कई बार यह बिना जहर छोड़े केवल सिर से प्रहार करता है या 'ड्राई बाइट' देता है ताकि विष बेकार न हो।
किंग कोबरा के काटने से होने वाली मौतों के अधिकांश मामले तीन विशिष्ट परिस्थितियों में दर्ज किए जाते हैं:
1, जब इंसान लकड़ी या शिकार की तलाश में घने जंगलों के अति-संवेदनशील हिस्सों में प्रवेश करते हैं।
2, अप्रैल से जुलाई के बीच, जब मादा किंग कोबरा अपने अंडों की रक्षा कर रही होती है। इस समय यदि कोई इंसान घोंसले के 10 से 15 मीटर के दायरे में आता है, तो मादा बिना किसी हिचकिचाहट के जानलेवा हमला करती है।
3, अनप्रोफेशनल तरीके से सांप को पकड़ने या रेस्क्यू के दौरान की गई एक छोटी सी गलती सीधी मौत का कारण बनती है।
किंग कोबरा विश्व का सबसे लंबा विषधर सांप है। एक पूर्ण वयस्क किंग कोबरा की औसतन लंबाई 3.6 से 4.5 मीटर (12 से 15 फीट) तक होती है। अनुकूल वनीय वातावरण में इसके विशालकाय नमूने 5.6 से 5.85 मीटर (19 फीट से अधिक) तक लंबे और 10 से 12 किलोग्राम तक भारी दर्ज किए गए हैं।
इसका सिर चपटा, चौड़ा और अत्यधिक सुगठित होता है। आम भारतीय नाग (Naja naja) से इसकी सटीक वैज्ञानिक भिन्नता इसके सिर के शीर्ष पर स्थित शल्कों से होती है। किंग कोबरा के सिर के पीछे 'ओकिपिटल शल्क' के दो बड़े अतिरिक्त पैच होते हैं, जो सामान्य नागों में पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं।
आम नाग की तुलना में लंबा और संकरा होता है। जब यह फन फैलाता है, तो गर्दन की पसलियां बाहर की ओर विस्तारित होती हैं। इसके फन के पिछले हिस्से पर कोई 'चश्मा' या 'अंगूठी' का निशान नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह से एकरंग या हल्की धारियों वाला होता है।
इसका रंग निवास स्थान के अनुसार भिन्न होता है। दक्षिण भारत और पश्चिमी घाट के जंगलों में यह गहरे जैतून गहरे भूरे या काले रंग का होता है। इसके पूरे शरीर पर सिर से लेकर पूंछ तक हल्के पीले या सफेद रंग की उल्टे V-आकार की बारीक पट्टियां बनी होती हैं। इसकी गर्दन और गले का निचला हिस्सा चमकीला पीला, नारंगी या सुनहरा होता है।
इसकी आंखें मध्यम से बड़ी होती हैं जिनकी पुतलियां गोल होती हैं। यह 100 मीटर दूर से किसी भी गतिमान वस्तु को स्पष्ट रूप से देख और भांप सकता है। इसके ऊपरी जबड़े में दो स्थिर, खोखले विषदंत होते हैं जिनका आकार 1.2 से 1.5 सेंटीमीटर होता है।
किंग कोबरा का मुख्य भोजन केवल और केवल अन्य सांप होते हैं। यह मांसाहारी होने के साथ-साथ शुद्ध 'सर्पभक्षी' है। इसके दैनिक आहार में गैर-जहरीले सांप (जैसे धामन, जल-सांप) के अलावा अत्यधिक जहरीले सांप जैसे भारतीय नाग, करैत और विभिन्न वाइपर शामिल हैं। अन्य सांपों की अनुपलब्धता में यह कभी-कभार बड़ी मॉनिटर छिपकली (गोह) का शिकार करता है।
जब किंग कोबरा अत्यधिक तनाव में होता है, तो यह अपने शरीर के एक-तिहाई हिस्से (लगभग 4 से 5 फीट) को सीधे जमीन से ऊपर उठाकर फन फैला लेता है। यह आम सांपों की तरह पतली 'हिस' की आवाज नहीं निकालता। इसके फेफड़ों की हवा जब श्वास नली से गुजरती है, तो 2,500 हर्ट्ज से कम आवृत्ति की एक गहरी, भारी आवाज निकलती है जो बिल्कुल किसी आक्रामक कुत्ते के घुरराने जैसी सुनाई देती है।
विश्व भर की 3,000 से अधिक सांपों की प्रजातियों में किंग कोबरा एकमात्र ऐसा सांप है जो अपने अंडों के लिए बाकायदा घोंसला तैयार करता है।
प्रजनन काल (मार्च से मई) के दौरान मादा किंग कोबरा अपनी पूंछ और शरीर का उपयोग करके सूखे पत्तों, टहनियों और वन-मलबे को घसीटकर एक स्थान पर एकत्रित करती है।
यह लगभग 1 मीटर ऊंचा और 1 से 1.5 मीटर चौड़ा दो-मंजिला घोंसला बनाती है। निचले हिस्से में यह 20 से 50 तक सफेद अंडे देती है और ऊपरी हिस्से में पत्तों की मोटी परत बिछाकर खुद बैठ जाती है।
मादा 60 से 80 दिनों तक बिना भोजन किए अंडों पर कड़ा पहरा देती है। अंडों के फटने से ठीक 1-2 दिन पूर्व मादा घोंसला छोड़कर चली जाती है ताकि अत्यधिक भूख के कारण वह स्वयं अपने ही नवजात बच्चों को न खा जाए।
किंग कोबरा का जहर यदि प्रति मिलीग्राम विषैलेपन के पैमाने पर मापा जाए, तो यह करैत या इनलैंड ताइपान से कम तीखा होता है। परंतु, इसके दंश को दुनिया का सबसे विनाशकारी प्रहार बनाने वाला कारक है—एक ही दंश में छोड़ी जाने वाली विष की अत्यधिक मात्रा
यह घटक तंत्रिका कोशिकाओं के रिसेप्टर्स को पूरी तरह से ब्लॉक कर देता है।
यह सीधे हृदय की कोशिकाओं और मांसपेशियों के संकुचन तंत्र पर हमला करता है।
यह ऊतकों और कोशिकाओं को तुरंत पचाना व नष्ट करना शुरू कर देते हैं।
एक पूर्ण विकसित किंग कोबरा अपने एक ही दंश में औसतन 400 से 500 मिलीग्राम (शुष्क भार) विष शिकार के शरीर में उड़ेल देता है। अत्यंत गंभीर मामलों में यह मात्रा 700 मिलीग्राम तक दर्ज की गई है।
यह मात्रा इतनी भीषण है कि यह एक ही बार में 20 से 30 वयस्क इंसानों अथवा एक विशालकाय एशियाई हाथी को 3 से 4 घंटे के भीतर मारने के लिए पर्याप्त होती है।
दंश के स्थान पर दो गहरे छेद बनते हैं। घाव के आसपास तुरंत भयानक दर्द, असहनीय जलन और तेजी से सूजन आ जाती है।
विष में मौजूद न्यूरोटॉक्सिन तेजी से मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के संचार को काट देते हैं। रोगी को आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है, पलकें भारी होकर बंद होने लगती हैं अत्यधिक लार बहने लगती है और जीभ व गले में लकवा मारने से बोलना व निगलना बंद हो जाता है।
कार्डियोटॉक्सिन के असर से रक्तचाप तेजी से गिरता है। फेफड़ों को चलाने वाली डायफ्राम मांसपेशियां पूरी तरह निष्क्रिय हो जाती हैं।
यदि पीड़ित को तुरंत कृत्रिम श्वसन न मिले, तो काटने के 30 से 60 मिनट के भीतर श्वसन तंत्र पूरी तरह काम करना बंद कर देता है और हृदय गति रुकने से पीड़ित की मृत्यु हो जाती है।
भारत में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला 'पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम' (ASV), जो नाग, करैत और वाइपर के लिए बनता है, किंग कोबरा के विष के खिलाफ अप्रभावी या बहुत कम प्रभावी होता है। किंग कोबरा के इलाज के लिए विशेष 'मोनोवैलेंट किंग कोबरा एंटी-वेनम' की आवश्यकता होती है, जिसका निर्माण मुख्य रूप से थाईलैंड और भारत के कुछ विशेष शोध संस्थानों में किया जाता है।
मरीज की जान बचाने के लिए सबसे पहला कदम उसे तुरंत वेंटिलेटर पर डालकर कृत्रिम सांस देना है ताकि फेफड़े काम करते रहें।
यदि मोनोवैलेंट एंटी-वेनम उपलब्ध हो, तो उसे तुरंत सलाइन ड्रिप के जरिए मरीज की नसों में पहुंचाया जाता है।
न्यूरोमस्कुलर ब्लॉक को बेअसर करने के लिए इन दवाओं का उपयोग किया जाता है।
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत किंग कोबरा को अनुसूची 1 में शामिल किया गया है, जो इसे बाघ और हाथी के समान सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इसे मारना, पकड़ना, नुकसान पहुंचाना या इसके आवास को नष्ट करना एक घोर गैर-जमानती अपराध है, जिसके लिए 3 से 7 वर्ष तक का कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजाका प्रावधान है।
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रसेल वाइप
भारत का सबसे आक्रामक, घातक और रक्त-संहारक विषधर
भारतीय उपमहाद्वीप के सर्प-इतिहास में रसेल वाइपर सबसे अधिक खूंखार, विस्फोटक और विनाशकारी सांप माना जाता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण में इसे दबोइया रसल्स वाइपर कहा जाता है। यह वाइपरिडे कुल का प्रमुख सदस्य है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे आम बोलचाल में 'दबोइया' या 'कोरीवाला' कहा जाता है। 'दबोइया' नाम इसके छिपकर बैठने और शिकार पर अचानक भारी दबाव के साथ झपटने की आदत के कारण पड़ा है।
ऐतिहासिक रूप से, भारत के किसानों और खेत-मजदूरों के लिए यह सांप सदियों से सबसे बड़ा काल रहा है। कोबरा जहां फन उठाकर दूर से चेतावनी देता है और करैत जहां रात के अंधेरे में छिपकर काटता है, वहीं रसेल वाइपर दिन के उजाले में भी अपनी जगह पर अड़ा रहता है और जरा सी छेड़छाड़ पर बिजली की तेजी से हमला करता है। चिकित्सा इतिहास में इसे 'अंग-विनाशक' सांप का दर्जा दिया गया है क्योंकि इसका दंश इंसान की जान लेने के साथ-साथ बचे हुए लोगों के अंगों को स्थायी रूप से गला देता है।
रसेल वाइपर की शारीरिक बनावट इसे अन्य भारतीय विषधरों से पूरी तरह अलग और पहचान में आसान बनाती है।
इसका शरीर भारी-भरकम, मोटा और सुगठित होता है। एक पूर्ण वयस्क रसेल वाइपर की औसत लंबाई 1 मीटर (3.3 फीट) से 1.5 मीटर (5 फीट) तक होती है। इसका शरीर बीच में बहुत चौड़ा और भारी होता है, जबकि पूंछ अचानक पतली और छोटी हो जाती है।
इसकी त्वचा हल्के भूरे, बादामी या गहरे पीले रंग की होती है। इसके पूरे शरीर पर गहरे भूरे या काले रंग के बड़े-बड़े छल्ले बने होते हैं। इन छल्लों के किनारे सफेद या पीले रंग की रेखा से घिरे होते हैं। ये छल्ले शरीर के ऊपर तीन समानांतर कड़ियों की तरह दिखाई देते हैं—एक रीढ़ की हड्डी के ठीक ऊपर और दो दोनों किनारों पर। यह बनावट सूखे पत्तों और खेतों की मिट्टी में इसे पूरी तरह अदृश्य बना देती है।
इसका सिर चपटा और स्पष्ट रूप से त्रिकोणीय होता है, जो गर्दन से अलग और चौड़ा दिखाई देता है। सिर पर छोटे-छोटे खुरदुरे शल्क होते हैं। इसके नथुने बहुत बड़े और फैले हुए होते हैं।
रसेल वाइपर के विषदंत भारत के सभी सांपों में सबसे बड़े और विकसित होते हैं। इनकी लंबाई 16 मिलीमीटर तक हो सकती है। ये दांत मुड़े हुए और खोखले होते हैं, जो मुंह बंद रहने पर तालू की तरफ मुड़ जाते हैं और मुंह खोलते ही स्प्रिंग की तरह 90 डिग्री पर सीधे बाहर निकल आते हैं। यह शिकार के शरीर में गहराई तक जहर इंजेक्ट करने में सक्षम होते हैं।
जब रसेल वाइपर को खतरा महसूस होता है, तो यह भागने की कोशिश नहीं करता। यह अपने भारी शरीर को एक कुंडल में कस लेता है और अपने बड़े नथुनों से फेफड़ों की पूरी हवा को बाहर फेंकता है। इससे निकलने वाली आवाज किसी तेज प्रेशर कुकर की सीटी या तेज हॉर्न जैसी होती है। यह आवाज 20 से 30 फीट दूर तक साफ सुनाई देती है। यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि सांप अब किसी भी सेकंड हमला कर सकता है।
यह अपनी कुंडली को स्प्रिंग की तरह छोड़ते हुए बिजली की गति से हमला करता है। इसका हमला इतना तेज होता है कि मानव आंखें भी इसे समय पर नहीं भांप पातीं। यह एक ही सेकंड में आगे झपटकर डंक मारकर वापस अपनी स्थिति में लौट आता है।
यह खुले शुष्क मैदानों, घनी झाड़ियों, पथरीले इलाकों, और विशेष रूप से धान, गन्ना, कपास और गेहूं के खेतों में पाया जाता है। यह घने जंगलों में नहीं रहता। किसान जब नंगे पैर खेतों में काम करते हैं या फसल काटते हैं, तो सूखे पत्तों के बीच छिपा यह सांप पैर पड़ते ही डंक मार देता है।
नाग और करैत की तरह रसेल वाइपर अंडे नहीं देता। यह एक 'ओवोविविपेरस' जीव है, यानी मादा अपने शरीर के भीतर ही अंडों को पालती है और सीधे जीवित बच्चों को जन्म देती है। एक मादा रसेल वाइपर एक बार में 20 से लेकर 60 तक बच्चों को जन्म दे सकती है। जन्म के समय बच्चे 8 से 10 इंच लंबे होते हैं और पहले पल से ही अत्यंत घातक जहर से लैस होते हैं।
रसेल वाइपर का जहर मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक होता है। यह विष तंत्रिका तंत्र पर हमला करने के बजाय सीधे इंसानी खून, रक्त वाहिकाओं और आंतरिक अंगों को नष्ट करता है।
यह एंजाइम शरीर के रक्त के थक्के जमाने वाले सिस्टम को असंतुलित कर देते हैं। इससे पूरे शरीर की रक्त धमनियों में छोटे-छोटे लाखों थक्के बनने लगते हैं।
यह लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) की झिल्ली को फाड़कर खून को पानी में बदल देता है और मांसपेशियों के ऊतकों को तुरंत सड़ाना शुरू कर देता है।
यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों को छेद देता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है।
काटने वाली जगह पर अत्यधिक भयानक, असहनीय दर्द होता है, जैसे किसी ने खोलता हुआ तेजाब डाल दिया हो। घाव से लगातार खून रिसना शुरू हो जाता है जो सामान्य रूप से जमता नहीं है। कुछ ही मिनटों में काटे गए अंग पर भयानक सूजन आ जाती है और त्वचा पर खून से भरे बड़े-बड़े छाले बनने लगते हैं।
विष में मौजूद पाचक एंजाइम मांस और मांसपेशियों को तेजी से गलाने लगते हैं। यदि मरीज बच भी जाता है, तो घाव इतना सड़ जाता है कि संक्रमण रोकने के लिए उस हाथ या पैर को काटकर अलग करना पड़ता है।
शरीर में मौजूद क्लॉटिंग फैक्टर खत्म हो जाने के कारण खून जमने की क्षमता खत्म हो जाती है। पीड़ित के मसूड़ों से, नाक से, उल्टी में, खांसी के साथ थूक में और पेशाब में गाढ़ा खून आने लगता है। मस्तिष्क या आंतों में आंतरिक ब्लीडिंग होने से मरीज कोमा में जा सकता है।
लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से निकलने वाला भारी हीमोग्लोबिन और मायोग्लोबिन किडनी की बारीक नलियों को पूरी तरह जाम कर देता है। काटने के 24 से 48 घंटे के भीतर मरीज का पेशाब बनना पूरी तरह बंद हो जाता है और तीव्र किडनी फेलियर होने से शरीर में जहर भर जाता है।
रसेल वाइपर के दंश से बचने वाले कई मरीजों में मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि नष्ट हो जाती है, जिससे जीवन भर के लिए हार्मोनल असंतुलन, बांझपन और शरीर में गंभीर कमजोरी आ जाती है।
भारत में सर्पदंश से होने वाली कुल मौतों में रसेल वाइपर का योगदान 40% से अधिक है। इसके अलावा, भारत में हर साल सर्पदंश के कारण अपने हाथ या पैर गंवाने वाले और जीवन भर के लिए डायलिसिस पर जाने वाले 80% से अधिक पीड़ित रसेल वाइपर के ही शिकार होते हैं।
अस्पतालों में रसेल वाइपर के दंश की पुष्टि करने के लिए एक साधारण कांच की टेस्ट ट्यूब में मरीज का खून लेकर 20 मिनट के लिए रख दिया जाता है। यदि 20 मिनट बाद भी खून का थक्का नहीं बनता और वह तरल रहता है, तो यह रसेल वाइपर के विष का अचूक प्रमाण होता है।
खून में मौजूद विष को बेअसर करने के लिए तुरंत उच्च खुराक में एंटी-वेनम की ड्रिप दी जाती है।
किडनी को फेल होने से बचाने और खून से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए तुरंत हीमोडायलिसिस की जरूरत पड़ती है।
ब्लीडिंग को रोकने के लिए फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (FFP) और प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं।
सड़े हुए ऊतकों और छालों को ऑपरेशन के जरिए साफ कि
या जाता है।
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कॉमन करैत
भारत का सबसे खामोश, रहस्यमयी और प्राणघातक साइलेंट किलर
भारतीय उपमहाद्वीप के सर्प-इतिहास में यदि किसी एक सांप को सबसे अधिक छलिया, खामोश और निर्दयी माना गया है, तो वह कॉमन करैत है। इसे प्राणीशास्त्र की वर्गीकरण प्रणाली में के नाम से जाना जाता है। यह सांप इलापिडे कुल से संबंध रखता है।
ऐतिहासिक रूप से भारतीय ग्रामीण अंचलों में करैत को लेकर अनगिनत भ्रांतियां और खौफनाक लोककथाएं प्रचलित रही हैं। प्राचीन काल में ग्रामीणों का मानना था कि करैत रात में सोते हुए इंसान की छाती पर बैठकर उसकी सांसें चूस लेता है या अपने फूंकार से इंसान को जहर दे देता है। हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों और सर्प-विज्ञान ने यह स्पष्ट किया है कि यह कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं, बल्कि इस सांप के विशेष शारीरिक ढाँचे, इसके काटने की अनोखी तकनीक और इसके अत्यंत सूक्ष्म विषदंतों का परिणाम है। करैत को भारत का सबसे बड़ा 'साइलेंट किलर' कहा जाता है क्योंकि यह बिना किसी चेतावनी, बिना किसी आवाज और बिना किसी तेज दर्द के इंसान को मौत की नींद सुला देता है।
कॉमन करैत की शारीरिक बनावट इसे अत्यंत आकर्षक लेकिन बेहद खतरनाक बनाती है।
करैत की त्वचा का रंग जेट ब्लैक (गहरा स्याह काला), गहरा नीला या भूरा-काला होता है। इसकी त्वचा पर एक असाधारण और तेल जैसी चमक होती है। जब इस पर रोशनी पड़ती है, तो इसका शरीर नीली रंगत के साथ चमकता है। इसका पेट का हिस्सा पूरी तरह से दूधिया सफेद या हल्का पीला होता है।
इसके शरीर के ऊपरी हिस्से पर गर्दन के थोड़े नीचे से लेकर पूंछ के आखिरी छोर तक पतली, दोहरी सफेद पट्टियां बनी होती हैं। पूंछ की तरफ जाते-जाते ये पट्टियां अधिक स्पष्ट और घनी हो जाती हैं।
एक वयस्क करैत की औसत लंबाई 1 मीटर (लगभग 3 फीट) से 1.5 मीटर (5 फीट) तक होती है। इसका शरीर बेलनाकार होता है। इसकी रीढ़ की हड्डी के ऊपरी हिस्से पर मौजूद शल्क अन्य शल्कों की तुलना में बड़े और षट्कोणीय आकार के होते हैं, जो इसकी एक प्रमुख पहचान हैं।
इसका सिर गर्दन से अलग से फैला हुआ नहीं होता, बल्कि शरीर के साथ ही सपाट रूप से मिला होता है। इसकी आंखें छोटी, गहरी और पूरी तरह से काली होती हैं। सबसे खतरनाक बात इसके विषदंत हैं—इसके ऊपरी जबड़े में मौजूद विषदंत अत्यधिक छोटे (लगभग 1 से 2 मिलीमीटर) और सुई की तरह बेहद बारीक होते हैं।
करैत का व्यवहार भारत के अन्य सभी सांपों से पूरी तरह अलग और चौंकाने वाला है।
करैत एक शुद्ध निशाचर जीव है। दिन के उजाले में यह अत्यधिक सुस्त, डरपोक और निष्क्रिय रहता है। दिन में यह सूर्य की रोशनी से बचने के लिए मिट्टी की दरारों, ईंट के भट्टों, गोबर के ढेरों, दीमक के टीलों या घरों के कमरों में रखे कबाड़ के पीछे छुपा रहता है। यदि दिन के समय इसे छेड़ा भी जाए, तो यह काटने के बजाय अपने सिर को अपने ही शरीर के कुंडलियों के नीचे छुपा लेता है।
सूरज ढलते ही इस सांप का व्यवहार 180 डिग्री बदल जाता है। रात के अंधेरे में यह अत्यंत सतर्क, फुर्तीला और आक्रामक शिकारी बन जाता है। यह रात के समय शिकार की तलाश में लंबी दूरी तय करता है।
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गर्म हवाओं या बिजली की कमी के कारण लोग अक्सर जमीन पर चटाई या पतला बिस्तर बिछाकर सोते हैं। करैत एक शीत-रक्त वाला जीव है। रात के उत्तरार्ध (रात 12 बजे से सुबह 4 बजे के बीच) जब बाहरी तापमान गिरने लगता है, तो करैत इंसानी शरीर से निकलने वाली प्राकृतिक गर्मी की ओर आकर्षित होता है। यह रेंगते हुए सोते हुए इंसान के रजाई, गद्दे या चादर के अंदर घुस जाता है। जब इंसान नींद में करवट लेता है या अनजाने में सांप पर दबाव डालता है, तो करैत अपनी रक्षा में तुरंत डंक मार देता है।
करैत मुख्य रूप से दूसरे सांपों का शिकार करता है। यह अंधाधुंध रूप से अन्य जहरीले व गैर-जहरीले सांपों, चूहों, छिपकलियों और मेंढकों को खाता है।
कॉमन करैत का विष विष विज्ञान की दृष्टि से भारत के सभी जमीनी सांपों में सबसे ज्यादा तीव्र और शक्तिशाली माना जाता है। इसका विष भारतीय नाग (कोबरा) के जहर से लगभग 4 से 5 गुना अधिक विषैला होता है।
करैत के विष में मुख्य रूप से शक्तिशाली प्री-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन और पोस्ट-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन पाए जाते हैं।
यह विष तंत्रिका तंत्र के अंतिम छोरों पर हमला करता है और वहां मौजूद 'एसिटाइलकोलीन' नामक रासायनिक संदेशवाहक के स्राव को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
एक बार जब तंत्रिका तंत्र के ये छोर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, तो शरीर की मांसपेशियों तक मस्तिष्क के संदेश पहुंचना बंद हो जाते हैं।
चूंकि इसके दांत सुई जैसे छोटे होते हैं, इसलिए जब यह रात में सोते हुए इंसान को काटता है, तो पीड़ित को कोई तेज दर्द नहीं होता। इंसान को लगता है कि उसे किसी मच्छर, चींटी या छोटे कीड़े ने काटा है, और वह बिना ध्यान दिए सोता रहता है। काटने की जगह पर कोई सूजन, खून बहना या लालिमा नहीं होती।
काटने के 2 से 4 घंटे बाद, जब विष तंत्रिका तंत्र में फैलने लगता है, तो पीड़ित की नींद पेट में असहनीय ऐंठन और तेज दर्द के साथ खुलती है। चूंकि सांप के काटने का कोई निशान या दर्द नहीं होता, इसलिए परिजन और डॉक्टर अक्सर इसे साधारण पेट की बीमारी, गैस, या फ़ूड पॉइज़निंग समझकर गलत इलाज करने की भूल कर बैठते हैं।
जोड़ों और मांसपेशियों में भारी जकड़न और दर्द होना।
गले की मांसपेशियों का काम बंद कर देना, जिससे थूक निगलने या पानी पीने में परेशानी होना।
आवाज का भारी होना और बोलने में पूरी तरह असमर्थ हो जाना।
आंखों की पलकों का अपने आप गिरना और बंद हो जाना
धुंधला या दो-दो चीजें दिखाई देना
विष शरीर की सभी ऐच्छिक और अनैच्छिक मांसपेशियों को फेल कर देता है। अंततः फेफड़ों को चलाने वाली 'डायफ्राम' मांसपेशी काम करना बंद कर देती है। मरीज होश में रहते हुए भी सांस नहीं ले पाता और घुट-घुट कर उसकी मृत्यु हो जाती है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में रात के समय होने वाली सर्पदंश की मौतों में 50% से अधिक मौतों के लिए अकेला करैत जिम्मेदार होता है।
करैत के काटने के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती समय पर पहचान न हो पाना है। जब तक मरीज को लक्षण समझ आते हैं, तब तक प्री-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन तंत्रिकाओं को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा चुका होता है। इस स्थिति में मरीज को बचाने के लिए भारी मात्रा में पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम (ASV) देने के साथ-साथ कई दिनों तक कृत्रिम श्वसन प्रणाली पर रखना अनिवार्य हो जाता है।
ग्रामीण इलाकों में रात के समय जमीन पर सोने से पूरी तरह बचें; हमेशा चारपाई या खाट का प्रयोग करें।
बिस्तर के चारों तरफ मच्छरदानी को अच्छी तरह से दबाकर करके) लगाएं। करैत मच्छरदानी को पार नहीं कर सकता।
रात में घर से बाहर निकलते समय हमेशा टॉर्च का इस्तेमाल करें और छड़ी लेकर चलें।
रात में अचानक पेट में तेज दर्द, पलकें भारी होना या निगलने में तकलीफ होना सर्पदंश का लक्षण हो सकता है, तुरंत अस्पताल भागें।
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भारतीय नाग
भारतीय महाद्वीप का ऐतिहासिक, प्राणघातक और पूजनीय विषधर
भारतीय नाग, जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में Naja naja कहा जाता है, केवल एक सरीसृप नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास, पर्यावरण और लोक-संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसका नामकरण संस्कृत भाषा के मूल शब्द 'नाग' से हुआ है। प्राणीशास्त्र के वर्गीकरण प्रणाली में इसे इलापिडे कुल के अंतर्गत रखा गया है। इस कुल के सांपों की मुख्य विशेषता उनके मुंह के अगले हिस्से में स्थित छोटे, स्थिर और अत्यधिक विकसित विषदंत होते हैं।
ऐतिहासिक रूप से, भारत की प्राचीन सभ्यताओं से लेकर मध्यकालीन साहित्य तक नाग का उल्लेख बहुतायत में मिलता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिली मुहरों से लेकर प्राचीन धार्मिक ग्रंथों तक, इसे शक्ति, भूमि के संरक्षण और जल स्रोतों के रक्षक के रूप में चित्रित किया गया। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में भगवान शिव के कंठहार और भगवान विष्णु के शेषनाग के रूप में इसकी पूजनीय स्थिति रही है। इसके बावजूद, मानव और नाग का संघर्ष भी उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव इतिहास। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों के विस्तार के साथ ही इस सांप और इंसानों का आमना-सामना सदियों से होता आ रहा है।
शारीरिक संरचना, आकार एवं पहचान चिन्ह
एक व्यस्क भारतीय नाग का आकार और उसकी शारीरिक संरचना इसे अन्य जहरीले सांपों से पूरी तरह अलग बनाती है।
लंबाई एवं भार: पूर्ण रूप से विकसित नाग की औसत लंबाई 1.2 मीटर (लगभग 4 फीट) से लेकर 1.8 मीटर (6 फीट) तक होती है। अनुकूल जलवायु और प्रचुर भोजन उपलब्ध होने पर कुछ दुर्लभ मामलों में इसकी लंबाई 2.2 मीटर तक दर्ज की गई है। इसका शरीर बेलनाकार और सुगठित होता है।
फन की जटिल संरचना: नाग की सबसे बड़ी शारीरिक पहचान इसका 'फन' है। यह वास्तव में इसके गर्दन क्षेत्र की विस्तारित पसलियां और विशेष मांसपेशियां होती हैं। जब नाग तनाव, भय या खतरे की स्थिति में होता है, तो वह अपनी गर्दन की इन पसलियों को बाहर की ओर फैला लेता है, जिससे उसकी गर्दन एक चौड़े छाते का रूप ले लेती है।
चश्मे का निशान इसके फन के पिछले हिस्से पर एक विशिष्ट संरचनात्मक पैटर्न होता है। इसमें दो गोल घेरे होते हैं जो बीच में एक मुड़ी हुई रेखा से जुड़े होते हैं। यह आकृति बिल्कुल पुराने समय के चश्मे जैसी दिखाई देती है। इसी निशान के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'स्पेक्टेकल्ड कोबरा' कहा जाता है। हालाँकि, भारत के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों (विशेषकर पूर्वोत्तर भारत) में नागों के फन पर केवल एक घेरा होता है, जिसे 'मोनोकल्ड कोबरा' कहा जाता है।
त्वचा का रंग और शल्क: इसकी त्वचा चिकनी होती है। इसका रंग निवास स्थान के आधार पर बदलता है। उत्तर भारत में यह हल्के भूरे, पीले या बदामी रंग का हो सकता है, जबकि दक्षिण भारत और तटीय इलाकों में इसका रंग गहरा भूरा, गहरा भूरा-काला या पूरी तरह से स्याह काला भी पाया जाता है। पेट का निचला हिस्सा हमेशा हल्का पीला या मटमैला सफेद होता है।
आंखें और विषदंत नाग की आंखें मध्यम आकार की होती हैं जिनकी पुतलियां गोल होती हैं। ऊपरी जबड़े के सबसे अग्र भाग में दो विषदंत होते हैं। ये दांत खोखले (प्रोटेरोग्लिफस) होते हैं, जैसे डॉक्टर की सिरिंज की सुई होती है, और यह सीधे सिर के पिछले हिस्से में मौजूद विष ग्रंथियों से जुड़े होते हैं।
भारतीय नाग अत्यंत अनुकूलनशील जीव है, जिसने खुद को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की विविध जलवायु के अनुसार ढाला है।
भौगोलिक फैलाव: यह सांप भारत के लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है। समुद्र तल से लेकर 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों तक इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है। यह पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान में भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है।
प्राकृतिक आवास: इसे खुले घास के मैदान, पतझड़ वाले वन, दलदली भूमि, और नदी-नालों के किनारे पसंद आते हैं। यह स्वयं का बिल नहीं बनाता, बल्कि दीमकों द्वारा बनाए गए टीलों पुराने चूहों के बिलों, खोखले पेड़ों के तनों और पत्थरों के ढेरों में अपना आश्रय बनाता है।
मानव आबादी से निकटता: नाग का सबसे पसंदीदा भोजन चूहे हैं। भारत में कृषि क्षेत्रों (जैसे धान, गेहूं और गन्ने के खेत) और अनाज के गोदामों में चूहों की संख्या अत्यधिक होती है। इसी शिकार का पीछा करते हुए नाग इंसानी बस्तियों, पुराने खंडहरों, मवेशियों के तबेले और यहां तक कि आवासीय घरों की दीवारों की दरारों में अपना बसेरा बना लेता है।
दैनिक व्यवहार: नाग मूल रूप से एक दिवाचर जीव है, यानी यह दिन के उजाले में शिकार करना पसंद करता है। हालाँकि, अत्यधिक ग्रीष्मकाल या मानसून के दौरान जब दिन का तापमान बहुत बढ़ जाता है, तब यह अपनी गतिविधियों को संध्याकाल या रात के समय में बदल लेता है।
रक्षात्मक रुख: नाग स्वभाव से आक्रामक नहीं होता; यह एक अत्यंत शर्मीला और पलायनवादी जीव है। जब इंसान या कोई बड़ा जीव इसके करीब आता है, तो यह सबसे पहले छिपने या भागने का प्रयास करता है। यदि भागने का रास्ता बंद हो जाए, तो यह अपने शरीर के एक तिहाई हिस्से को जमीन से ऊपर उठाकर फन फैला लेता है और फेफड़ों से तेज हवा छोड़कर फुंकारता है। यह इसकी पहली और अंतिम चेतावनी होती है।
आहार चक्र: नाग मांसाहारी जीव है। इसके प्राथमिक भोजन में चूहे, गिलहरियां, छिपकलियां, मेंढक, छोटे पक्षी और उनके अंडे शामिल हैं। अवसर मिलने पर यह अपने से छोटे आकार के अन्य सांपों को भी खा जाता है। नाग अपने शिकार को चबाता नहीं है; यह विष के असर से शिकार के पंगु होने के बाद उसे पूरा निगल जाता है।
प्रजनन प्रक्रिया: नागों में संभोग का समय आमतौर पर बसंत ऋतु और ग्रीष्मकाल के प्रारंभिक महीनों (मार्च से मई) में होता है।
अंडे देना और सुरक्षा: मादा नाग एक अंडज जीव है। संभोग के लगभग दो महीने बाद, मादा नाग 10 से लेकर 30 तक (कभी-कभी 35 तक) सफेद, लेदर जैसी ऊपरी परत वाले अंडे देती है। अंडे देने के लिए यह किसी सुरक्षित दीमक के टीले या मिट्टी के बिल का चुनाव करती है। नर और मादा दोनों अंडों की सुरक्षा करते हैं। अंडे सेने की अवधि लगभग 48 से 69 दिनों की होती है। इस दौरान मादा नाग बिना भोजन किए अंडों के पास डटी रहती है।
सपेले (नवजात नाग): अंडों से बाहर निकलने वाले नवजात बच्चों की लंबाई 20 से 30 सेंटीमीटर तक होती है। जन्म के पहले सेकंड से ही इनके पास विष ग्रंथियां और तीखे विषदंत मौजूद होते हैं। नवजात नाग का विष वयस्कों जितना ही घातक होता है।
भारतीय नाग का विष एक जटिल जैव-रासायनिक यौगिक है जिसमें कई प्रकार के टॉक्सिक प्रोटीन, पेप्टाइड्स और पाचन एंजाइम पाए जाते हैं।
न्यूरोटॉक्सिन नाग के विष का सबसे मुख्य और घातक घटक 'पोस्ट-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन' है। यह रसायन सीधे मानव तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। यह तंत्रिका कोशिकाओं और मांसपेशियों के बीच के रासायनिक संकेतों को पूरी तरह से बाधित कर देता है।
साइटोटॉक्सिन विष में मौजूद साइटोटॉक्सिन डंक मारने की जगह के आसपास की जीवित कोशिकाओं और ऊतकों को नष्ट करने लगते हैं। इससे काटने वाले स्थान पर घाव सड़ने लगता है।
कार्डियोटॉक्सिन यह घटक हृदय की मांसपेशियों के संकुचन को प्रभावित करता है, जिससे रक्तचाप में तेजी से गिरावट आती है।
काटने के बाद शरीर में होने वाले क्रमिक लक्षण:
0 - 15 मिनट: काटने के स्थान पर दो दांतों के स्पष्ट निशान दिखाई देते हैं। वहां तुरंत तेज जलन, रेडनेस और सूजन शुरू हो जाती है।
30 - 60 मिनट: रोगी को चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, आंखों की पलकें भारी होकर नीचे झुकना शुरू होता है। मुंह से अत्यधिक लार बहने लगती है और बोलने या निगलने में असमर्थता होती है।
1 - 2 घंटे: तंत्रिका तंत्र के काम बंद करने के कारण गर्दन की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं और सिर आगे की ओर झुकने लगता है। हाथों-पैरों में लकवा फैलने लगता है।
अंतिम अवस्था: विष फेफड़ों को नियंत्रित करने वाली 'डायफ्राम' और छाती की मांसपेशियों को पूरी तरह से निष्क्रिय कर देता है। रोगी सांस लेने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है, जिससे अंततः श्वसन तंत्र विफल हो जाता है और हृदय गति रुकने से मृत्यु हो जाती है।
भारत में सर्पदंश की वर्तमान स्थिति और नीतियां
भारतीय नाग के कारण होने वाले हादसों और मौतों की रोकथाम के लिए भारत सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालयों ने कड़े नियम और नीतियां लागू की हैं।
अधिसूचित बीमारी का दर्जा: भारत के कई प्रमुख राज्यों ने सर्पदंश को एक 'अधिसूचित बीमारी' घोषित कर दिया है। इसके तहत देश के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों जिला अस्पतालों और निजी चिकित्सा संस्थानों के लिए अनिवार्य किया गया है कि वे सर्पदंश के हर एक मामले और उससे होने वाली मृत्यु को केंद्रीय स्वास्थ्य डेटाबेस पर दर्ज करें। इस नीति से मौतों के सटीक आंकड़ों को दर्ज करने में मदद मिल रही है।
राष्ट्रीय आंकड़े और मानसून का प्रकोप: आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष दर्ज होने वाले 1,40,000 से अधिक सर्पदंश के मामलों में स्पेक्टेकल्ड कोबरा का योगदान सबसे बड़ा होता है। आंकड़े बताते हैं कि इनमें से 80% से अधिक घटनाएं ग्रामीण इलाकों में खेती-किसानी के दौरान या रात में जमीन पर सोते समय होती हैं। मानसून के महीनों (जून से सितंबर) में इसके काटने की दर सबसे उच्चतम स्तर पर होती है, क्योंकि जलभराव के कारण नाग अपने बिलों से बाहर निकलकर सूखे स्थानों पर शरण लेते हैं।
गोल्डन आवर नेटवर्क: देश भर में एम्बुलेंस सेवाओं (जैसे 108 सेवा) को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है कि वे सर्पदंश के पीड़ित को काटने के 1 घंटे के भीतर (जिसे 'गोल्डन आवर' कहा जाता है) निकटतम ऐसे अस्पताल पहुंचाएं जहां वेंटिलेटर और एंटी-वेनम उपलब्ध हो।
एकमात्र प्रामाणिक उपचार: नाग के काटने का एकमात्र प्रामाणिक और वैज्ञानिक इलाज पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम है। यह इंजेक्शन भारत के सभी सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। यह दवा भारत के चार प्रमुख सांपों (नाग, करैत, रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर) के विष को बेअसर करने के लिए बनाई जाती है।
घाव पर चीरा लगाना या मुंह से खून चूसना पूरी तरह से जानलेवा अभ्यास है।
डंक के ऊपर कसकर रस्सी या तंग पट्टी बांधने से रक्तसंचार पूरी तरह रुक जाता है, जिससे वह अंग सड़ जाता है और उसे काटना पड़ सकता है।
किसी भी प्रकार के झाड़-फूंक, तांत्रिक क्रिया या जड़ी-बूटी से विष बेअसर नहीं होता; इसमें गंवाया गया समय ही मरीज की मौत का कारण बनता है।
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सॉ-स्केल्ड वाइपर
भारत का सबसे छोटा, सर्वाधिक दंश करने वाला आक्रामक विषधर
भारतीय उपमहाद्वीप के 'बिग फोर' घातक विषधरों में सॉ-स्केल्ड वाइपर आकार के दृष्टिकोण से सबसे छोटा है, लेकिन हमलों की बारंबारता के मामले में यह सबसे आगे है। प्राणीशास्त्र में इसे फुरसा सॉ-स्केल्ड वाइपर कहा जाता है, जो वाइपरिडे कुल के अंतर्गत आता है। हिंदी भाषी और ग्रामीण अंचलों में इसे 'फुरसा' के नाम से जाना जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से, भारत के शुष्क, रेतीले और पथरीले भू-भागों (जैसे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र का ग्रामीण भाग और तटीय आंध्र प्रदेश) में फुरसा सदियों से किसानों, चरवाहों और मजदूरों के लिए निरंतर भय का स्रोत रहा है। इसका छोटा आकार और मिट्टी के रंग से पूरी तरह मेल खाने वाली त्वचा इसे लगभग अदृश्य बना देती है। अनजाने में पैर पड़ते ही यह बिना किसी हिचकिचाहट के सेकंड के दसवें हिस्से में प्रहार करता है।
फुरसा एक छोटा सांप है। एक वयस्क फुरसा की औसत लंबाई 30 से 60 सेंटीमीटर (1 से 2 फीट) के बीच होती है। बहुत कम मामलों में यह 70 से 80 सेंटीमीटर तक पहुंचता है। छोटा होने के बावजूद इसका शरीर काफी गठीला और मजबूत होता है।
इसका सिर नाशपाती के आकार का और स्पष्ट रूप से त्रिकोणीय होता है, जो पतली गर्दन से अलग दिखाई देता है। इसके सिर के ठीक ऊपर हल्के पीले या सफेद रंग का एक विशिष्ट निशान होता है, जो देखने में 'क्रॉस', 'त्रिशूल' या उड़ते हुए पक्षी जैसा दिखाई देता है।
इसकी त्वचा के शल्क अत्यंत खुरदुरे और नुकीले होते हैं। शरीर के पार्श्व (किनारों) के शल्क 45 डिग्री के कोण पर तिरछे मुड़े होते हैं और उनके किनारों पर बारीक आरी जैसी धारियां होती हैं।
इसका रंग धूसर भूरा, बादामी, लाल-भूरा या रेतीला पीला होता है। पीठ के ऊपर सफेद रंग की लहरदार या धनुषाकार धारियां होती हैं, जो दोनों तरफ गहरे भूरे धब्बों से घिरी रहती हैं। पेट का हिस्सा मटमैला सफेद होता है जिस पर हल्के भूरे बिंदु होते हैं।
फुरसा के विषदंत उसके छोटे आकार की तुलना में काफी लंबे और खोखले होते हैं, जो मुंह के अग्रभाग में चल स्थिति में रहते हैं। इसकी आंखें मध्यम से बड़ी, उभरी हुई और पुतलियां ऊर्ध्वाधर होती हैं, जो इसे कम रोशनी और रात में सटीक शिकार करने में सक्षम बनाती हैं।
फुरसा खतरे की स्थिति में अन्य सांपों की तरह हवा फेंककर फुंकार नहीं मारता। यह अपने शरीर को अंग्रेजी के 'C' या 8 की आकृति में मोड़कर लगातार गोल-गोल घूमता है। इस दौरान यह अपने शरीर के खुरदुरे, आरी जैसे शल्कों को आपस में तेजी से रगड़ता है। शल्कों के घर्षण से सूखी लकड़ी पर आरी चलने या सैंडपेपर रगड़ने जैसी तीखी, तेज आवाज पैदा होती है। यह आवाज दूर तक सुनाई देती है और सामने वाले को चेतावनी देती है कि वह तुरंत पीछे हट जाए।
यह भारत के सबसे तेज हमला करने वाले जीवों में गिना जाता है। कुंडली मारे हुए यह अपने शरीर को स्प्रिंग की तरह उछालकर डंक मारता है। यह एक ही बार में कई बार लगातार प्रहार करने की क्षमता रखता है।
यह अत्यधिक शुष्क इलाकों, रेगिस्तानी मिट्टी, कटीली झाड़ियों, चट्टानी ढलानों, और सूखी घास के मैदानों में रहता है। दिन के समय यह पत्थरों के नीचे, लकड़ी के लट्ठों, गिरे हुए पत्तों या कैक्टस की जड़ों के बीच छुपा रहता है।
फुरसा मुख्य रूप से बिच्छू, कनखजूरे टिड्डे, मकड़ियां, मेंढक, छिपकलियां और छोटे चूहों का शिकार करता है। यह बिच्छू जैसे जहरीले जीवों को भी आसानी से खा जाता है।
फुरसा भी सजीव प्रजक होता है। मादा फुरसा सीधे जीवित बच्चों को जन्म देती है। एक बार में यह 4 से लेकर 15 तक बच्चों को जन्म देती है। जन्म के समय बच्चे लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और पैदा होते ही पूर्ण विषदंत और घातक जहर से लैस होते हैं।
फुरसा का विष मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और प्रो-कोगुलेंट होता है, जो खून के संचार तंत्र पर तेजी से प्रहार करता है।
यह फुरसा के जहर का मुख्य मेटालोप्रोटीनेज एंजाइम है। यह सीधे रक्त के 'प्रोथ्रोम्बिन' को सक्रिय करके उसे 'मेइथ्रोम्बिन' में बदल देता है, जिससे रक्त वाहिकाओं के भीतर छोटे-छोटे अनियंत्रित थक्के बनने लगते हैं।
पूरे शरीर में थक्के बनने की प्रक्रिया में रक्त के सारे क्लॉटिंग फैक्टर और प्लेटलेट्स खत्म हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, खून का थक्का जमने की क्षमता पूरी तरह शून्य हो जाती है और खून पानी की तरह पतला हो जाता है।
ये एंजाइम केशिकाओं और रक्त धमनियों की आंतरिक दीवारों को छलनी कर देते हैं।
से 30 मिनट: काटने के स्थान पर तेज जलन और तेज दर्द। घाव से लगातार पानी जैसा पतला खून बहना जो पट्टी बांधने पर भी नहीं रुकता।
1 से 6 घंटे: काटे गए अंग पर भारी सूजन और नीले-काले चकत्ते पड़ना।
6 से 24 घंटे (व्यापक आंतरिक रक्तस्राव): मरीज के शरीर की हर प्राकृतिक ओपनिंग से खून रिसने लगता है। मसूड़ों से खून आना, नाक से लगातार नकसीर फूटना उल्टी में खून आना और पेशाब का रंग गहरा लाल या काला हो जाना
आंतों और पेट में भारी आंतरिक ब्लीडिंग होना। मस्तिष्क के अंदर नस फटने से इंट्राक्रेनियल हेमोरेज होना, जिससे मरीज बेहोश हो जाता है और पक्षाघात से मृत्यु हो जाती है।
रक्त कोशिकाओं के टूटने और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रक्तचाप गिर जाता है, जिससे गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं।
भारत में सभी जहरीले सर्पदंश के कुल मामलों में से लगभग 25% से 30% काटने के मामले फुरसा के दर्ज होते हैं। पश्चिमी और दक्षिणी भारत के ग्रामीण इलाकों में खेतों में नंगे पांव चलने वाले मजदूर इसके सबसे बड़े शिकार बनते हैं।
फुरसा के काटने की पुष्टि के लिए मरीज का 2 मिलीलीटर खून एक साफ, सूखी कांच की परखनली में रखकर 20 मिनट तक छोड़ा जाता है। यदि 20 मिनट बाद परखनली को तिरछा करने पर खून नहीं जमता और बहता रहता है, तो यह 'अकोगुलोपैथी' का स्पष्ट प्रमाण है।
यह इस विष का एकमात्र मुख्य एंटीडोट है। अस्पताल पहुंचते ही ASV को सामान्य सलाइन के साथ इंट्रावीनस (IV) ड्रिप द्वारा दिया जाता है। जब तक 20-मिनट थक्का परीक्षण सामान्य नहीं हो जाता, तब तक इसकी खुराक दोहराई जाती है।
रक्त में खत्म हो चुके फाइब्रिनोजेन और क्लॉटिंग फैक्टर्स को दोबारा बहाल करने के लिए प्लाज्मा चढ़ाया जाता है।
घाव को एंटीसेप्टिक से साफ रखा जाता है। इसमें चीरा लगाना या टाइट पट्टी बांधना पूरी तरह प्रतिबंधित है क्योंकि इससे अत्यधिक रक्तस्राव होकर मरीज शॉक में जा सकता है।
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बीक्डसी स्नेक
बीक्ड सी स्नेक समुद्री सर्पों की दुनिया में सबसे विषैले, आक्रामक और जैविक रूप से उन्नत जीवों में शीर्ष स्थान रखता है। यह सर्प मुख्य रूप से महासागरीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में पाया जाता है और समुद्री सर्पदंश से होने वाली मौतों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार माना जाता है।
उद्विकास के दृष्टिकोण से, इस सर्प के पूर्वज भूमि पर रहने वाले इलापिड सर्प ही थे (जैसे नाग और क्रेट)। लाखों वर्षों की उद्विकास प्रक्रिया के दौरान, इन्होंने खुद को पूरी तरह से समुद्री वातावरण में ढाल लिया। इनके शरीर में श्वसन तंत्र, लवण उत्सर्जन, और तैरने की क्षमता में अद्वितीय रूपांतरण हुए हैं।
इस सर्प की सबसे प्रमुख पहचान इसकी ऊपरी थूथन है। इसके ऊपरी जबड़े का अगला भाग नीचे की ओर झुका और नुकीला होता है, जो पक्षी की चोंच जैसा दिखाई देता है। यह चोंच इसे समुद्र की तलहटी में जमा कीचड़ और पत्थरों की दरारों में छिपे शिकार को बाहर निकालने में मदद करती है।
इसकी पूंछ दोनों ओर से चपटी और चप्पू के आकार की होती है। यह पूंछ जल में तैरते समय पतवार और पतवार चालन दोनों का काम करती है, जिससे यह जल के भीतर अत्यधिक गति और सटीकता से मुड़ सकता है।
इसके नथुने थूथन के ऊपर स्थित होते हैं। जल में गोता लगाते समय इसके नथुने विशेष मांसपेशियों से बंद हो जाते हैं, जिससे जल अंदर नहीं जा पाता। इसका दायां फेफड़ा अत्यधिक लंबा होता है, जो शरीर के पिछले हिस्से तक फैला रहता है। यह फेफड़ा ऑक्सीजन संचय करने के साथ-साथ जल में सर्प के संतुलन और प्लवन को नियंत्रित करता है। यह एक बार सांस लेकर जल के भीतर 2 से 3 घंटे तक बिना बाहर आए रह सकता है। इसके अलावा, यह अपनी त्वचा के माध्यम से जल में घुली ऑक्सीजन का लगभग 20% हिस्सा अवशोषित कर लेता है।
समुद्री जल के अत्यधिक नमक को शरीर से बाहर निकालने के लिए इसकी जीभ के नीचे विशेष ग्रंथियां होती हैं, जो रक्त से अतिरिक्त सोडियम और क्लोराइड को छानकर बाहर फेंक देती हैं।
वयस्क सर्प की लंबाई 1.1 मीटर से 1.5 मीटर तक होती है। इसका रंग आमतौर पर गहरा जैतून-सलेटी या नीला-सलेटी होता है, जिस पर 40 से 55 गहरे रंग के बैंड बने होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ ये बैंड हल्के पड़ जाते हैं और पूरा शरीर एकसमान सलेटी दिखने लगता है।
भारत के तटीय क्षेत्र (बंगाल की खाड़ी, अरब सागर, मन्नार की खाड़ी), पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, और फारस की खाड़ी।
थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और सिंगापुर के तटीय जल।
ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तटीय समुद्री क्षेत्र।
यह खुले और गहरे समुद्र के बजाय 5 से 20 मीटर तक की गहराई वाले उथले तटीय जल में रहना पसंद करता है।
नदियों के मुहाने, मैंग्रोव के दलदली क्षेत्र और मटमैले या कीचड़युक्त पानी इसके प्राथमिक शिकार स्थल हैं। धुंधले पानी में इसकी दृष्टि से अधिक इसकी सूंघने और जल में कंपन महसूस करने की क्षमता काम आती है।
यह सर्प एक अत्यधिक विशिष्ट शिकारी है। इसका मुख्य आहार कैटफिश की विभिन्न प्रजातियां हैं।
इसके अलावा यह पफरफिश, बॉटम-ड्वेलिंग गोबीज़ और छोटे स्क्विड का भी शिकार करता है।
कैटफिश के शरीर पर तीखे और जहरीले कांटे होते हैं, जो किसी भी शिकारी के लिए जानलेवा हो सकते हैं। यह सर्प इस खतरे से निपटने के लिए विशेष रणनीति अपनाता है।
अपनी सूंघने की तीक्ष्ण क्षमता और जीभ के माध्यम से जल में रसायनों को पहचानकर तलहटी में छिपी कैटफिश को ढूंढता है।
अपनी चोंच जैसी थूथन से यह कैटफिश को सिर की तरफ से मजबूती से पकड़ता है और तुरंत अपने विषदंत गड़ा देता है।
इसका अति-घातक विष कैटफिश के तंत्रिका तंत्र को कुछ ही सेकंडों में पंगु बना देता है, जिससे मछली अपने कांटों का उपयोग नहीं कर पाती। इसके बाद यह सर्प शिकार को पूरा निगल जाता है।
इसके ऊपरी जबड़े के अगले हिस्से में छोटे और स्थिर विषदंत होते हैं, जिनकी लंबाई लगभग 2 से 4 मिलीमीटर होती है। यद्यपि दांत छोटे होते हैं, लेकिन इनकी बनावट विष को गहराई तक पहुंचाने में सक्षम होती है।
यह तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों के बीच के संपर्क को पूरी तरह बंद कर देता है, जिससे शरीर में पक्षाघात (लकवा) हो जाता है।
यह सीधे शरीर की मांसपेशियों के ऊतकों को घोलना और नष्ट करना शुरू कर देता है, जिससे मांसपेशियां टूटने लगती हैं।
इसका LD50 मान 0.112 मिलीग्राम/किग्रा से 0.13 मिलीग्राम/किग्रा के बीच होता है।
यह भारतीय कोबरा के विष से लगभग 4 से 8 गुना अधिक जहरीला है।
इसके एक डंक में औसतन 7.9 से 9.0 मिलीग्राम विष निकलता है।
एक वयस्क इंसान की जान लेने के लिए इसका केवल 1.5 से 3.0 मिलीग्राम विष ही पर्याप्त है। इसका अर्थ यह है कि इसका एक पूर्ण डंक 4 से 5 इंसानों को मारने के लिए काफी है।
यद्यपि अधिकांश समुद्री सर्प शांत स्वभाव के होते हैं, लेकिन बीक्ड सी स्नेक को अत्यधिक आक्रामक माना जाता है। जल में छेड़े जाने, अनजाने में पैर पड़ जाने, या मछली पकड़ने वाले जालों में फंसने पर यह बिना चेतावनी दिए बार-बार और आक्रामकता से काटता है।
सर्पदंश का स्थान अक्सर दर्द रहित होता है और निशान बहुत छोटे होते हैं, जिससे पीड़ित को शुरुआत में गंभीरता का अहसास नहीं होता।
मांसपेशियों में अत्यधिक दर्द, अकड़न और कमजोरी शुरू होती है। जबड़े जमने लगते हैं और आंखों की पलकें झुक जाती हैं।
टूटी हुई मांसपेशियों का प्रोटीन गुर्दों के माध्यम से छनने लगता है, जिससे पेशाब का रंग गहरा लाल या काला हो जाता है। यह स्थिति गुर्दे खराब होने (किडनी फेलियर) का कारण बनती है।
रक्त में पोटेशियम का स्तर अत्यधिक बढ़ जाने से हृदय गति रुक सकती है। सांस लेने वाली मांसपेशियों के पंगु होने से दम घुटने के कारण मृत्यु हो जाती है।
प्रभावित अंग को बिना हिलाए तुरंत स्थिर किया जाना चाहिए और दबाव पट्टी बांधी जानी चाहिए।
पॉलीवेलेंट सी स्नेक एंटीवेनम का समय पर उपयोग ही इसका एकमात्र सटीक इलाज है। यदि समय पर एंटीवेनम न मिले और श्वसन सहायता (वेंटिलेटर) न दी जाए, तो मृत्यु दर 50% से अधिक हो जाती है।
इस सर्प से प्रभावित होने वाले 90% से अधिक लोग तटीय क्षेत्रों के मछुआरे होते हैं। जब बड़े जाल पानी से बाहर खींचे जाते हैं, तो उनमें बीक्ड सी स्नेक फंसकर आ जाते हैं। जाल से मछलियां अलग करते समय यह डंक मार देता है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सर्पों से होने वाली मौतों और गंभीर रूप से घायलों के कुल मामलों में अकेले बीक्ड सी स्नेक की हिस्सेदारी 75% से 90% तक दर्ज की गई है।
यह साप अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है। अंडे देने के लिए जमीन पर आना इसके लिए कठिन होता, इसलिए इसने गर्भाशय में ही भ्रूण विकास की प्रणाली अपनाई।
संभोग की प्रक्रिया पूरी तरह जल में होती है।
मादा में गर्भावस्था की अवधि लगभग 4 से 6 महीने की होती है।
एक मादा एक बार में 5 से 15 बच्चों को जन्म देती है।
जन्म के समय बच्चों की लंबाई 20 से 30 सेंटीमीटर होती है।
नवजात बच्चे जन्म के क्षण से ही पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं और उनके पास वयस्कों जितना ही घातक विष होता है।
इनका औसतन जीवनकाल 7 से 12 वर्ष का होता है।
यह सर्प समुद्री खाद्य श्रृंखला में एक प्रमुख शिकारी की भूमिका निभाता है। यह कैटफिश और अन्य तली में रहने वाली प्रजातियों की जनसंख्या को नियंत्रित रखता है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी का संतुलन बना रहता है।
इसे मुख्य रूप से बड़े समुद्री पक्षी (जैसे समुद्री चील), बड़ी शार्क और खारे पानी के मगरमच्छों द्वारा शिकार बनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की सूची में इसे कम से कम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, व्यावसायिक मत्स्य पालन के जालों में गलती से फंसने, तटीय प्रदूषण और मैंग्रोव के विनाश के कारण स्थानीय स्तर पर इनकी आबादी पर असर पड़ रहा है।
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सिंध करैत
भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे भीषण न्यूरोटॉक्सिक विषधर, रात का अदृश्य महारथी
सिंध करैत को प्राणीशास्त्र में बुंगारस सिंदानस कहा जाता है। यह इलापिडे कुल के 'बुंगारस' (करैत) वंश का एक अत्यंत दुर्लभ, विशाल और विनाशकारी विषैला सर्प है। वैज्ञानिक नाम में शामिल 'सिंदानस' शब्द पाकिस्तान के ऐतिहासिक 'सिंध' प्रांत से लिया गया है, जहाँ से इसे पहली बार वैज्ञानिक रूप से खोजा और वर्गीकृत किया गया था।
ऐतिहासिक रूप से इसे अक्सर 'सामान्य करैत' की ही एक उप-प्रजाति या रूप समझ लिया जाता था। परंतु 20वीं सदी के उत्तरार्ध में इसके शल्क रीढ़ की हड्डी के आकार, विशाल लंबाई और इसके जहर की असाधारण मारक क्षमता के गहन विश्लेषण के बाद इसे एक स्वतंत्र और पूर्ण प्रजाति का दर्जा दिया गया। यह मुख्य रूप से पाकिस्तान (सिंध, पंजाब), उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग) और अफगानिस्तान के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क भूभागों में पाया जाता है।
जीवनकाल
प्राकृतिक, शुष्क और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र में सिंध करैत का औसतन जीवनकाल 12 से 18 वर्ष होता है। अनुकूल परिस्थितियों में यह 20 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
यह सामान्य करैत की तुलना में काफी लंबा और अधिक मोटा होता है। एक पूर्ण वयस्क सिंध करैत की औसत लंबाई 1.2 मीटर से 1.6 मीटर (4 से 5.2 फीट) तक होती है। राजस्थान के थार रेगिस्तान और सिंध के इलाकों में इसके कुछ विशाल नमूने 1.8 मीटर (6 फीट) तक लंबे दर्ज किए गए हैं। इसका भार 1.2 से 2.2 किलोग्राम तक होता है।
इसके पूरे शरीर का आधार रंग गहरा चमकीला काला या गहरा नीला-काला होता है।
इसके शरीर पर पतली, जोड़े में बनी सफेद या हल्की पीली आड़ी धारियां होती हैं। ये धारियां पूंछ की तरफ स्पष्ट होती हैं, जबकि सिर के पास कभी-कभी धुंधली होती हैं।
इसके रीढ़ (पीठ के बीचों-बीच) के शल्क सामान्य करैत की तुलना में काफी चौड़े और षट्कोणीय आकार के होते हैं।
पेट का निचला भाग पूरी तरह से मटमैला सफेद या हल्का पीला होता है।
इसका सिर सपाट होता है और गर्दन से अलग नहीं दिखता। आंखें छोटी, पूरी तरह से काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में स्थित विषदंत लगभग 2.5 से 3.5 मिलीमीटर लंबे और खोखले होते हैं।
यह शुष्क रेतीले मैदानों, थार रेगिस्तान के किनारों, कृषि क्षेत्रों (जैसे बाजरा, गेहूं और कपास के खेत), पत्थरों की दरारों, दीमक के पुराने टीलों, चूहों के बिलों और ग्रामीण इलाकों में बने मिट्टी के पक्के-कच्चे मकानों में रहना पसंद करता है।
पसंद: नम मिट्टी, अंधेरी जगहें, चूहों की गंध और रात की ठंडक।
नापसंद: सीधी धूप, दोपहर की भीषण गर्मी और अत्यधिक तेज रोशनी।
दिन में यह अत्यंत सुस्त और डरपोक रहता है। यदि दिन में इसे छेड़ा जाए, तो यह काटता नहीं है; बल्कि अपने फन को शरीर की कुंडली के नीचे छिपा लेता है और एक गेंद की तरह गोल बन जाता है।
सूर्यास्त के बाद यह पूरी तरह से जागृत और अत्यंत सक्रिय शिकारी बन जाता है। यह भोजन की तलाश में कई किलोमीटर तक रेंगता है और अक्सर इंसानी बस्तियों व घरों के भीतर प्रवेश कर जाता है।
सिंध करैत मुख्य रूप से अन्य सांपों को खाने वाला (सांप-भक्षी) जीव है।
इसका सबसे पसंदीदा भोजन अन्य छोटे सांप (चाहे वे विषैले हों या गैर-विषैले), जैसे अंधा सांप, रैट स्नेक, और यहां तक कि अपनी ही प्रजाति के छोटे करैत हैं।
सांपों के अलावा यह रेगिस्तानी चूहों, छिपकलियों, तोड्स और छोटे पक्षियों का शिकार भी करता है।
रात के सन्नाटे में यह अपनी जीभ से हवा में रसायन सूंघकर शिकार को ट्रैक करता है। शिकार के पास पहुंचते ही यह अचानक हमला करता है और अपने तीखे विषदंत गड़ाकर शिकार को कसकर पकड़ लेता है। यह तब तक शिकार को दबाए रखता है जब तक कि इसका शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन शिकार को 30 से 60 सेकंड में पंगु न कर दे। इसके बाद यह शिकार को सिर की तरफ से धीरे-धीरे निगल जाता है।
इनका संभोग काल वसंत और शुरुआती गर्मी (मार्च से मई) के दौरान होता है। इस दौरान नर करैत मादा को रिझाने के लिए आपस में मल्ल-युद्ध करते हैं।
अंडे देना : मादा सिंध करैत मई से जुलाई के बीच मिट्टी के बिलों, दीमक के टीलों या नमी वाले गड्ढों में 8 से 14 सफेद, लंबे और लचीले अंडे देती है।
अंडों की देखभाल: मादा अंडों के पास रहकर लगभग 50 से 65 दिनों तक उनकी सुरक्षा करती है।
अंडों से निकलने वाले नवजात बच्चे 25 से 30 सेमी लंबे होते हैं। जन्म के पहले क्षण से ही वे पूर्ण विकसित विष ग्रंथियों और घातक जहर से लैस होते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में सिंध करैत के काटने के हादसों को "साइलेंट डेथ" (अदृश्य मौत) कहा जाता है।
उत्तर-पश्चिम भारत (राजस्थान, गुजरात), मध्य प्रदेश और पाकिस्तान के सिंध व पंजाब प्रांतों में इसके डंक के प्रतिवर्ष 1,500 से 3,000 मामले सामने आते हैं।
यह रात में इंसानों के शरीर की गर्मी और गंध महसूस करके जमीन पर सो रहे लोगों की खाट या रजाई में चुपचाप घुस जाता है। नींद में जब इंसान थोड़ा सा भी करवट लेता है या इसका शरीर दबता है, तो यह बिना फुंकारे चुपचाप डंक मार देता है।
इसके काटने से दर्द नहीं होता, जिसके कारण सो रहा इंसान सोचता है कि उसे किसी चींटी, मच्छर या पिसु ने काटा है और वह सोता रहता है। यदि समय पर इलाज न मिले, तो इसके दंश से मृत्यु दर 80% से 90% तक होती है। प्रतिवर्ष इसके कारण औसतन 500 से 1,000 लोगों की मौत दर्ज की जाती है।
सिंध करैत का विष पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सभी सांपों (किंग कोबरा, रसेल वाइपर, नाग) में सबसे ज्यादा विषैला और प्राणघातक माना जाता है।
अत्यधिक तीव्र प्री-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन
यह तंत्रिका कोशिकाओं के अंतिम छोर को पूरी तरह से नष्ट कर देता है, जिससे संदेश तंत्रिका से मांसपेशी तक पहुँच ही नहीं पाता।
पोस्ट-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन
यह मांसपेशियों के रिसेप्टर्स को ब्लॉक करता है।
मायोटॉक्सिन्स: यह मांसपेशियों की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है।
जहर की क्षमता
इसका विषैलापन लगभग 0.09 mg/kg से 0.11 mg/kg के बीच होता है। यह भारतीय नाग से लगभग 5 से 8 गुना अधिक विषैला है।
इसका केवल 1 मिलीग्राम (एक बूंद का छोटा सा हिस्सा) शुद्ध जहर एक वयस्क स्वस्थ इंसान को मारने के लिए काफी है।
0 - 2 घंटे: डंक मारने वाली जगह पर कोई जलन, सूजन या दर्द नहीं होता। केवल दो बहुत सूक्ष्म निशान होते हैं।
2 - 4 घंटे: पेट में भयानक ऐंठन, उल्टी, जोड़ों में असहनीय दर्द, भारी सुस्ती और थकावट शुरू होती है।
4 - 8 घंटे: तंत्रिका तंत्र का पतन। पलकें झुक जाती हैं धुंधला दिखाई देने लगता है, आवाज चली जाती है, लार निगलने में असमर्थता होती है।
मृत्यु का कारण: फेफड़ों को चलाने वाला डायफ्राम पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाता है। मरीज की सांसें पूरी तरह रुक जाती हैं और ऑक्सीजन की कमी से दिल की धड़कन बंद हो जाती है।
सिंध करैत के काटने पर घरेलू इलाज या झाड़-फूंक 100% मौत का कारण बनती है। केवल आधुनिक चिकित्सा ही जान बचा सकती है।
भारत में मिलने वाला मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम इसके विष को बेअसर करने में प्रभावी है।
हालांकि, इसके जहर का प्री-सिनेप्टिक घटक तंत्रिकाओं को नष्ट कर देता है, इसलिए मरीज को 20 से 30 Vials तक ASV की भारी खुराक सलाइन ड्रिप से देनी पड़ती है।
चूंकि सांस नली और फेफड़े बंद हो जाते हैं, इसलिए मरीज को तुरंत वेंटिलेटर पर रखकर कृत्रिम सांस देना ही जिंदगी बचाने का सबसे पहला और मुख्य तरीका है। मरीज तब तक वेंटिलेटर पर रहता है जब तक कि उसका शरीर नई तंत्रिका कोशिकाएं न बना ले।
काटे गए अंग को बिना किसी कसने वाले बैंड के स्थिर रखा जाता है ताकि जहर तेजी से न फैले।
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कैस्पियन कोबरा (सेंट्रल एशियन कोबरा
मध्य एवं दक्षिण-पश्चिम एशिया का सबसे आक्रामक, अत्यधिक विषैला और प्राणघातक सर्प-सम्राट
कैस्पियन कोबरा, जिसे प्राणीशास्त्र में मध्य एशियाई नाग कहा जाता है, इलापिडे कुल का एक अत्यंत दुर्दांत और शक्तिशाली विषधर सदस्य है। इसे आमतौर पर 'सेंट्रल एशियन कोबरा', 'ऑक्सस कोबरा' या 'लद्दाखी नाग' भी कहा जाता है। 'Naja' शब्द संस्कृत के 'नाग' से लिया गया है, जबकि 'oxiana' शब्द प्राचीन 'ऑक्सस नदी' के नाम पर आधारित है, जिसके आसपास के भूभाग में यह ऐतिहासिक रूप से बहुतायत में पाया जाता है।
ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, कैस्पियन कोबरा को विश्व भर की कोबरा प्रजातियों में सबसे अधिक न्यूरोटॉक्सिक और खतरनाक माना जाता है। यह भारत के सुदूर उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के ऊपरी हिस्सों) से लेकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और ईरान तक फैला हुआ है। प्राचीन ग्रीक और फारसी इतिहास में इस सांप का संदर्भ उच्च पर्वतीय दर्रों के रक्षक के रूप में मिलता है। ठंडे पर्वतीय और शुष्क पथरीले इलाकों के अनुकूल ढला यह सांप अपनी श्रेणी का अकेला योद्धा है जो भीषण ठंड और ऊंचाई को भी सहन कर लेता है।
जीवनकाल
प्राकृतिक, शुष्क और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में कैस्पियन कोबरा का औसतन जीवनकाल 15 से 20 वर्ष होता है। अनुकूल और नियंत्रित वातावरण में यह 22 से 25 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
यह मध्यम से बड़े आकार का अत्यंत गठीला और शक्तिशाली सांप है। एक पूर्ण वयस्क कैस्पियन कोबरा की औसत लंबाई 1.0 मीटर से 1.5 मीटर (3.5 से 5 फीट) तक होती है। उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के अनुकूल इलाकों में इसके कुछ विशाल नमूने 1.9 मीटर (6.2 फीट से अधिक) तक लंबे दर्ज किए गए हैं। इसका भार 1.5 से 3 किलोग्राम के बीच होता है।
खतरा महसूस होने पर यह अपने शरीर के एक-तिहाई हिस्से को सीधे खड़ा कर फन फैला लेता है। इसके फन के पिछले हिस्से पर भारतीय नाग जैसा 'चश्मा' या मोनोकल्ड कोबरा जैसा 'O-मार्क' बिल्कुल नहीं होता—यह पूरी तरह से एकरंग या हल्की धुंधली पट्टियों वाला होता है।
इसके शरीर का रंग उम्र के साथ बहुत तेजी से बदलता है:
बच्चों की त्वचा का रंग हल्का पीला या बादामी होता है और पूरे शरीर पर गहरे भूरे या काले रंग की 20 से 30 स्पष्ट पट्टियां बनी होती हैं।
जैसे-जैसे सांप वयस्क होता है, ये पट्टियां धुंधली हो जाती हैं और शरीर का रंग एकसमान पीला-भूरा, चॉकलेट ब्राउन, तांबई या गहरा भूरा हो जाता है। पेट का निचला भाग मटमैला पीला या सफेद होता है।
इसकी आंखें मध्यम आकार की और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में आगे की तरफ 6 से 7 मिलीमीटर लंबे खोखले विषदंत होते हैं, जो सीधे मजबूत विष ग्रंथियों से जुड़े रहते हैं।
क्या पसंद करता है
शुष्क, पत्थरीले और रेतीले पर्वतीय इलाके, चट्टानों की दरारें और पुराने खंडर।
नदी घाटियों के आसपास की सूखी झाड़ियां और समुद्र तल से 3,000 मीटर (10,000 फीट) तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र।
दीमक के टीले, चूहों के बिल और पत्थरों के ढेर जहां इसे पर्याप्त नमी और छिपने की जगह मिलती है।
वसंत और गर्मियों की धूप सेकना
क्या नापसंद करता है
अत्यधिक घने वर्षावन और दलदली भूमि।
कड़ाके की बर्फबारी वाली ठंड (सर्दियों में यह 4 से 5 महीने के लिए भूमिगत बिलों में शीतनिद्रा यानी में चला जाता है)।
इंसानी उपस्थिति का शोरगुल और दखलंदाजी।
व्यवहार:
सामान्य कोबरा प्रजातियों की तुलना में कैस्पियन कोबरा अत्यंत आक्रामक, साहसी और तेज-तर्रार माना जाता है। यह इंसानों को देखकर तुरंत भागने के बजाय फन फैलाकर आक्रामक रुख अपना लेता है। यह लगातार फुंकारता है और सेकंड के सौवें हिस्से में बार-बार तीखे प्रहार करता है। यह पीछे हटने के बजाय शिकार या विरोधी का पीछा करने के लिए भी जाना जाता है।
कैस्पियन कोबरा एक कुशल और बहुमुखी मांसाहारी शिकारी है।
इसका सबसे पसंदीदा भोजन पहाड़ी चूहे, गिलहरियां और छोटे स्तनधारी जीव हैं।
इसके अलावा यह पक्षी, पक्षियों के अंडे, तोड्स मेंढक, छिपकलियां और छोटे सांपों (अन्य प्रजातियों) का भक्षण भी बड़े चाव से करता है।
यह सूंघने की तीखी क्षमता और दृष्टि का उपयोग करके शिकार को खोजता है। शिकार को देखते ही यह उस पर तेजी से प्रहार कर अपने विषदंत गड़ा देता है। इसका जहर इतना तीव्र होता है कि छोटा चूहा या पक्षी 2 से 5 सेकंड के भीतर पंगु होकर दम तोड़ देता है। इसके बाद यह शिकार को आसानी से पूरा निगल जाता है।
संभोग काल: शीतनिद्रा से बाहर निकलने के बाद, यानी अप्रैल से मई के दौरान इनका संभोग काल होता है। इस दौरान नर कोबरा मादा के लिए आपस में युद्ध भी करते हैं।
अंडे देना : मादा कैस्पियन कोबरा जुलाई से अगस्त के बीच पत्थरों की दरारों, मिट्टी के गड्ढों या बिलों में 8 से 19 (औसतन 12 से 15) सफेद, लचीले अंडे देती है।
अंडों की रक्षा: मादा अंडों के पास रहकर लगभग 60 से 70 दिनों तक उनकी सुरक्षा करती है।
अंडों से निकलने वाले नवजात बच्चे 25 से 35 सेमी लंबे होते हैं। जन्म लेते ही वे पूर्ण रूप से विकसित जहर, फन और आक्रामक व्यवहार से लैस होते हैं।
मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में कैस्पियन कोबरा के काटने के हादसे सबसे गंभीर चिकित्सा आपातकाल माने जाते हैं।
पूरे मध्य एशिया (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, भारत के उत्तरी हिस्से) को मिलाकर प्रतिवर्ष इसके काटने के 2,500 से 4,000 प्रत्यक्ष मामले दर्ज किए जाते हैं।
यह दुनिया के सबसे जानलेवा सांपों में से एक है। यदि समय पर एंटी-वेनम और वेंटिलेटर सपोर्ट न मिले, तो इसके काटने से मृत्यु दर 70% से 80% तक होती है। औसतन प्रतिवर्ष इसके कारण 300 से 600 लोगों की मृत्यु दर्ज की जाती है।
हादसों की मुख्य वजह: यह सांप अक्सर पत्थरों के ढेरों या झाड़ियों के बीच छिपकर बैठता है। जब लकड़ियां बिनने वाले ग्रामीण, चरवाहे या पर्वतारोही अनजाने में इसके पास से गुजरते हैं या इसका रास्ता रोकते हैं, तो यह बिना किसी झिझक के सीधा जानलेवा हमला कर देता है।
कैस्पियन कोबरा का जहर पूरे एशियाई कोबरा वंश में सबसे ज्यादा विषैला और तीव्र माना जाता है।
जहर के मुख्य घटक:
तीव्र अल्फा-न्यूरोटॉक्सिन्स
यह तंत्रिका कोशिकाओं के रिसेप्टर्स को सेकंडों में ब्लॉक कर देता है।
साइटोटॉक्सिन्स : यह कोशिकाओं की संरचना को नष्ट करता है और स्थानीय ऊतकों में सड़न पैदा करता है।
कार्डियोटॉक्सिन्स : यह सीधे हृदय की मांसपेशियों को लकवाग्रस्त कर देता है।
जहर की क्षमता
इसका विषैलापन लगभग 0.21 mg/kg है, जो इसे भारतीय स्पेक्टेकल्ड कोबरा से भी कई गुना अधिक विषैला बनाता है।
एक पूर्ण विकसित कैस्पियन कोबरा अपने एक ही दंश में औसतन 100 से 150 मिलीग्राम (शुष्क भार) विष उड़ेल देता है। यह मात्रा एक ही बार में 20 से अधिक स्वस्थ इंसानों को मारने के लिए पर्याप्त होती है।
मानव शरीर पर क्रमिक और विनाशकारी असर:
0 - 15 मिनट (अत्यंत तीव्र शुरुआत): डंक मारने वाली जगह पर दो तीखे दांतों के निशान बनते हैं। वहां असहनीय दर्द और भयानक सूजन शुरू हो जाती है।
15 - 30 मिनट (तंत्रिका पतन): इसका न्यूरोटॉक्सिन बहुत तेजी से काम करता है। मरीज को चक्कर आने लगते हैं, आंखों की पलकें भारी होकर बंद होने लगती हैं धुंधला दिखाई देने लगता है, अत्यधिक लार बहती है और जीभ व गला पंगु होने लगते हैं।
30 - 45 मिनट (श्वसन व हृदय विफलता): विष फेफड़ों को चलाने वाले डायफ्राम और छाती की मांसपेशियों को पूरी तरह लकवाग्रस्त कर देता है। मरीज का सांस लेना बंद हो जाता है और ब्लड प्रेशर तेजी से गिरता है।
मृत्यु का मुख्य कारण: यदि मरीज को तुरंत कृत्रिम सांस न मिले, तो काटने के 45 मिनट से 2 घंटे के भीतर श्वसन विफलता और कार्डियक अरेस्ट से मृत्यु हो जाती है।
कैस्पियन कोबरा के डंक मारने पर समय ही जिंदगी और मौत के बीच का अंतर तय करता है।
मध्य एशियाई देशों (जैसे रूस, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान) में निर्मित विशेष 'सेंट्रल एशियन कोबरा एंटी-वेनम' इसके खिलाफ सबसे सटीक काम करता है।
भारत में मिलने वाला मानक पॉलीवैलेंट ASV भी इसके न्यूरोटॉक्सिक असर को बेअसर करने में काफी हद तक प्रभावी होता है।
मरीज के अस्पताल पहुंचते ही 10 से 20 सलाइन ड्रिप के माध्यम से नसों में दी जाती हैं।
मरीज को तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेटर या एम्बू-बैग पर डालकर कृत्रिम सांस देना अनिवार्य है।
नियोस्टिग्माइन और एट्रोपिन: न्यूरोमस्कुलर ब्लॉक को बेअसर करने के लिए ये जीवनरक्षक इंजेक्शन दिए जाते हैं।
एंटीबायोटिक्स व सर्जिकल सफाई: घाव के संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।
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येलो-बेलीड सी स्नेक
यह अद्भुत और अत्यंत विषैला जीव महासागरों का एक अनूठा शिकारी है। थल पर रहने वाले साँपों से यह बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसका संपूर्ण जीवन गहरे समुद्र की लहरों के बीच ही बीतता है।
इस साप का ऊपरी हिस्सा (पीठ) गहरा काला या गहरा भूरा होता है, जबकि निचला हिस्सा (पेट) चमकीला पीला होता है। काले और पीले रंग का यह तीखा विभाजन इसे पानी में एक प्राकृतिक छलावरण प्रदान करता है। ऊपर से देखने पर यह समुद्र की गहराई में समाया हुआ दिखता है और नीचे से देखने पर सूर्य की रोशनी में छिप जाता है।
इसकी पूँछ चपटी और पतली होती है, जो किसी नाव के पतवार या पतवारदार चप्पू की तरह काम करती है। इसी पूँछ की मदद से यह पानी में तेज़ी से तैरता है और आगे-पीछे दोनों दिशाओं में गति कर सकता है।
इसकी औसतन लंबाई 25 से 35 इंच (लगभग 60 से 90 सेंटीमीटर) होती है। मादा साँप नर की तुलना में आकार में थोड़ी बड़ी होती हैं।
अन्य समुद्री जीवों की तरह इसके पास गिल्स नहीं होते। यह फेफड़ों से ही हवा में साँस लेता है। इसकी नथुने सिर के सबसे ऊपरी हिस्से पर होते हैं, जिन पर विशेष वाल्व लगे होते हैं। जब यह पानी में गोता लगाता है, तो ये वाल्व बंद हो जाते हैं ताकि पानी फेफड़ों में न जाए। यह एक बार हवा भरकर पानी के भीतर 1 से 3 घंटे तक रह सकता है।
यह दुनिया में सबसे व्यापक रूप से फैले साँपों में से एक है। यह केवल एक स्थान या तट तक सीमित नहीं है, बल्कि दो बड़े महासागरों में फैला हुआ है।
यह भारत के तटीय क्षेत्रों (जैसे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी), श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान, ओमान, पूर्वी अफ़्रीका के तटों और ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी व पश्चिमी समुद्री इलाकों में बहुतायत में पाया जाता है।
यह दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, फ़िलीपींस, वियतनाम), चीन, जापान के दक्षिणी तटीय भागों और अमेरिका के पश्चिमी तटों (जैसे मैक्सिको, कोस्टा रिका और कैलिफ़ोर्निया) तक फैला हुआ है।
यह पेलाजिक जीव है, जिसका अर्थ है कि यह खुले महासागर के ऊपरी पानी में रहता है। यह तटीय मूंगे की चट्टानों के बजाय बहती समुद्री धाराओं और शैवाल के बहाव के साथ तैरना पसंद करता है।
येलो-बेलीड सी स्नेक का ज़हर अत्यंत तीव्र और विनाशकारी होता है। इसका विष न्यूरोटॉक्सिक और मायोटॉक्सिक का संयोजन है।
मायोटॉक्सिन: यह घटक शरीर की मांसपेशियों को तेज़ी से तोड़ता है। इसके कारण मायोग्लोबिन प्रोटीन टूटने लगता है और गुर्दे पर असर पड़ता है, जिससे मूत्र का रंग लाल-भूरा हो जाता है।
न्यूरोटॉक्सिन: यह तंत्रिका तंत्र के संदेशों को रोक देता है, जिससे पक्षाघात होता है। इसके ज़हर से सांस लेने वाली मांसपेशियाँ काम करना बंद कर देती हैं, जिससे पीड़ित की मृत्यु हो जाती है।
इसका LD50 मान अत्यंत कम (लगभग 0.23 mg/kg) है, जो इसे दुनिया के सबसे ज़हरीले साँपों की सूची में शामिल करता है। हालाँकि, यह इंसानों के प्रति आक्रामक नहीं होता और बहुत कम मात्रा में ज़हर छोड़ता है। इसके काटने की घटनाएँ बेहद दुर्लभ हैं, जो मुख्य रूप से मछुआरों के जाल में फँसने पर ही होती हैं।
यह जरायुज जीव है, यानी यह अंडे नहीं देता बल्कि सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है। मादा समुद्र के पानी में ही बच्चों को जन्म देती है। एक बार में यह 2 से 6 बच्चों को जन्म दे सकती है। जन्म के समय बच्चे लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और जन्म लेते ही पूरी तरह स्वतंत्र और विषैले होते हैं।
जंगली वातावरण में इसकी औसत आयु लगभग 5 से 10 वर्ष मानी जाती है। यह शिकार के लिए बहुत अनोखी तकनीक अपनाता है। यह पानी की सतह पर लकड़ी के टुकड़े की तरह शांत तैरता रहता है। छोटी मछलियाँ इसे छाया समझकर इसके नीचे आश्रय लेने आती हैं। जैसे ही मछली पास आती है, यह झटके से अपनी गर्दन घुमाकर उसे दबोच लेता है और अपना घातक ज़हर उतार देता है। समुद्र के खारे पानी में रहने के बावजूद यह नमक वाला पानी नहीं पीता। जब समुद्र की सतह पर भारी बारिश होती है, तो ताज़े मीठे पानी की एक पतली परत बन जाती है। यह साँप उसी समय सतह पर आकर पानी पीता है।
इस साँप के पेट की पट्टियाँ बहुत छोटी होती हैं, जो इसे समुद्र में तैरने में तो मदद करती हैं, लेकिन ज़मीन पर पकड़ बनाने में पूरी तरह असमर्थ बनाती हैं। यदि लहरें इसे खींचकर सूखी रेत या तट पर फेंक देती हैं, तो यह सीधा रेंग भी नहीं पाता और धूप व डिहाइड्रेशन के कारण जल्द ही इसकी मृत्यु हो जाती है।
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ब्लैक-बैंडेड सीक्रेट
प्रशांत महासागर और कोरल रीफ पारिस्थितिकी का अत्यंत विषैला, उभयचर समुद्री सर्प
ब्लैक-बैंडेड सी क्रेट, जिसे वैज्ञानिक भाषा में (लाटिकाउडा सेमीफैसिआटा) कहा जाता है, नाग-कुल या सर्राफ के 'लाटिकाउडिनाए' उप-कुल का एक अत्यंत विशिष्ट जीव है। जापान और ताइवान में इसे स्थानीय भाषा में 'इराबू' या 'इराबू उमीहेबी' के नाम से जाना जाता है। चीनी भाषा में इसे 'चाइनीज सी स्नेक' भी कहते हैं। यह लैटिन भाषा के शब्दों Latus (चौड़ा/व्यापक) और Cauda (पूंछ) के मेल से बना है। इसका अर्थ है "चौड़ी या चपटी पूंछ वाला जीव" यह लैटिन के Semi (आधा/आंशिक) और Fasciata (धारियां/बैंड्स) से बना है, जो इसके शरीर पर बनी काली धारीदार आकृतियों को दर्शाता है।
वर्ष 1804 में डच प्राकृतिक वैज्ञानिक राइनवार्ड और बाद में जॉर्ज क्युवियर तथा जाकोब रेइनहार्ड्ट जैसे यूरोपीय प्राणीशास्त्रियों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से लाए गए नमूनों के आधार पर इसका वर्गीकरण किया। शुरुआत में इसे सामान्य समुद्री सांपों के साथ रखा गया था, लेकिन इसकी जमीन पर चलने की क्षमता और अद्वितीय शल्कों की वजह से इसे वंश में अलग दर्जा दिया गया।
यह मुख्य रूप से पश्चिमी प्रशांत महासागर और पूर्वी हिंद महासागर के उष्णकटिबंधीय तथा उप-उष्णकटिबंधीय जल क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता है: (विशेषकर रयुक्यु द्वीप समूह, ओकिनावा), ताइवान, और दक्षिण-पूर्वी चीन के तटीय क्षेत्र। जहाँ इनकी बहुत बड़ी आबादी है), इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, और सिंगापुर। पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप, और उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया के महान अवरोधक प्रवाल भित्ति के उत्तरी हिस्से। यह समुद्र में बहुत दूर खुले पानी के बजाय तट के निकट स्थित प्रवाल भित्तियों चट्टानी गुफाओं, और उथले तटीय पारिस्थितिक तंत्र में रहना पसंद करता है।
प्राकृतिक समुद्री आवास में इसका औसत जीवनकाल 12 से 18 वर्ष होता है। प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों के बावजूद यह 20 वर्ष तक जीवित रह सकता है। एक स्वस्थ वयस्क की सामान्य लंबाई 80 सेमी से 120 सेमी (लगभग 2.5 से 4 फीट) होती है। कुछ बड़ी मादाओं की कुल लंबाई 150 सेमी (5 फीट) तक दर्ज की गई है। (इस प्रजाति में मादाएं नर की तुलना में बड़ी और भारी होती हैं)। इसका वजन 500 ग्राम से 1.2 किलोग्राम तक हो सकता है। इसके शरीर का मुख्य रंग नीला-ग्रे, पीला-हरा या हल्का भूरा होता है। इसके पूरे शरीर पर 30 से 50 गहरे काले या भूरे रंग के बैंड्स बने होते हैं। इसके शरीर के शल्क चिकने और चमकदार होते हैं, जो पानी में घर्षण को न्यूनतम करने में मदद करते हैं।
सच्चे समुद्री सांपों के विपरीत, जो पानी से बाहर आने पर असहाय हो जाते हैं, ब्लैक-बैंडेड सी क्रेट एक उभयचर समुद्री सांप है। इसके पेट पर जमीन पर पाए जाने वाले सांपों की तरह चौड़े शल्क होते हैं, जिनकी मदद से यह चट्टानों और सूखी जमीन पर आसानी से रेंग सकता है। इसकी पूंछ साइड से पूरी तरह चपटी होती है, जो इसे समुद्र में अत्यधिक कुशल तैराक बनाती है। इसके नथुने सिर के ऊपर की तरफ होते हैं। पानी के अंदर गोता लगाते ही इनमें मौजूद मांसपेशीय वॉल्व नथुनों को सील कर देते हैं, जिससे फेफड़ों में पानी नहीं जाता। यह पानी के अंदर रहते हुए अपनी त्वचा के जरिए भी कुछ प्रतिशत ऑक्सीजन अवशोषित कर सकता है, जिससे यह 1 से 2 घंटे तक पानी के नीचे गोता लगा सकता है।
यह समुद्र में 0 से 20 मीटर की गहराई पर बने कोरल रीफ, चट्टानी दरारों, और तटीय गुफाओं में रहता है। इसे मीठे पानी की भी आवश्यकता होती है, जिसके लिए यह तटीय चट्टानों पर जमा वर्षा के पानी को पीने के लिए समुद्र से बाहर आता है।
जब यह समुद्र के ठंडे पानी में भोजन की तलाश करके थक जाता है, तो यह शारीरिक तापमान बढ़ाने और भोजन पचाने के लिए सूखी चट्टानों, द्वीपों या तटीय गुफाओं पर धूप सेंकने आता है।
यद्यपि यह दिन में भी घूमता देखा जा सकता है, लेकिन इसका मुख्य शिकार अभियान शाम ढलने और रात के समय शुरू होता है।
यह एक अत्यधिक विशिष्ट शिकारी है। इसका मुख्य आहार है: मुख्य रूप से ईल मोरे ईल और कॉंगर ईल) तथा कोरल रीफ की चट्टानों में छिपी छोटी मछलियां कभी-कभी यह चट्टानों के बीच छिपे समुद्री जीवों के अंडे भी खाता है।
यह अपने शिकार (विशेष रूप से ईल) को पकड़ने के लिए अत्यंत चतुर रणनीति अपनाता है: यह कोरल रीफ की संकरी दरारों और सुराखों में अपना पतला सिर घुसाकर छिपकर बैठी ईल की गंध सूंघता है। जब यह ईल को ढूंढ लेता है, तो उसे अत्यंत तीव्र गति से डंक मारता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि कई बार बड़ी शिकारी मछलियां (जैसे पीली गोटफिश और ट्रेवेली इस सांप के साथ मिलकर शिकार करती हैं। जब सांप ईल को चट्टान की दरार से बाहर भगाता है, तो बाहर खुली जगह पर शिकारी मछलियां उसे पकड़ने की कोशिश करती हैं, और जो ईल अंदर भागती है उसे सांप दबोच लेता है।
ज्यादातर समुद्री सांप पानी में ही सीधे बच्चों को जन्म देते हैं, लेकिन लाटिकाउडा वंश के सभी सी क्रेट्स अंडे देने के लिए पूरी तरह से जमीन पर निर्भर होते हैं। इनका संभोग काल पानी के पास तटीय गुफाओं या पत्थरों के बीच होता है। मादा समुद्र से निकलकर सूखी, अंधेरी और नमी वाली समुद्री गुफाओं या चट्टानों की दरारों में जाती है। मादा एक बार में 4 से 8 सफेद, लंबे अंडे देती है। लगभग 4 से 5 महीने के ऊष्मायन काल के बाद अंडों से सपेले बाहर आते हैं। नवजात बच्चे जन्म लेते ही लगभग 25 से 30 सेमी लंबे होते हैं और तुरंत समुद्र में जाकर तैरने तथा शिकार करने के लिए तैयार होते हैं।
ब्लैक-बैंडेड सी क्रेट का विष दुनिया के सबसे घातक न्यूरोटॉक्सिक विषों में से एक माना जाता है। यह न्यूरोटॉक्सिन और मायोटॉक्सिन का एक भयावह जैविक मिश्रण है। लगभग 0.11 mg/kg से 0.18 mg/kg होता है।
यह विष किसी भी सामान्य भारतीय कोबरा या रसेल वाइपर की तुलना में 5 से 10 गुना अधिक जहरीला होता है।
इराबुटॉक्सिन्स : यह इस सांप के विष का सबसे प्रमुख पोस्ट-सिनैप्टिक न्यूरोटॉक्सिक घटक है। यह तंत्रिका कोशिकाओं के 'एसिटाइलकोलीन रिसेप्टर्स' को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है, जिससे मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले सभी विद्युत संकेत रुक जाते हैं।
मायोटॉक्सिन्स : यह कंकाल की मांसपेशियों के रेशों को गलाना और तोड़ना शुरू कर देता है। इसके विषदंत छोटे (लगभग 2-3 मिमी) होते हैं। जब यह काटता है, तो काटी गई जगह पर शुरुआत में कोई तेज दर्द या सूजन नहीं होती, जिससे पीड़ित को लगता है कि मामूली खरोंच आई है। 1 से 2 घंटे के भीतर प्रभाव: मांसपेशियों में दर्द और कमजोरी, पलकों का झुकना जबड़ों का लॉक होना और बोलने या निगलने में असमर्थता।
मायोग्लोबिनेरिया : मायोटॉक्सिन के कारण टूटी हुई मांसपेशियों का प्रोटीन (मायोग्लोबिन) रक्त में मिलकर गुर्दों तक पहुंचता है, जिससे मूत्र का रंग गहरा लाल या भूरा/काला हो जाता है और किडनी फेलियर हो सकता है। यदि तुरंत इलाज न मिले, तो फेफड़ों की मांसपेशियों के पंगु हो जाने से दम घुटने के कारण मृत्यु हो जाती है।
अत्यधिक जहरीला होने के बावजूद यह सांप बहुत शांत स्वभाव का माना जाता है। यह इंसानों को देखकर खुद दूर भागने की कोशिश करता है और बिना वजह हमला नहीं करता। ज्यादातर दुर्घटनाएं तब होती हैं जब गोताखोर या मछुआरे इसे गलती से हाथ से दबा देते हैं, या रात के समय जब यह जमीन पर विश्राम कर रहा होता है और इस पर किसी का पैर पड़ जाता है।
यह सांप इंसानी गतिविधियों और शिकार की वजह से संकट का सामना कर रहा है: जापान (विशेषकर ओकिनावा) और ताइवान में इस सांप का मांस एक पारंपरिक स्वादिष्ट व्यंजन माना जाता है। इसे सुखाकर और धुएं में पकाकर 'इराबू जिरू' बनाया जाता है, जिसे स्वास्थ्य और सहनशक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। इसके सुंदर धारीदार चमड़े का उपयोग पर्स, बेल्ट और जूते बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिसके कारण फिलीपींस और अन्य देशों में इसका अत्यधिक शिकार किया गया है। कोरल रीफ का विनाश और तटीय गुफाओं पर मानवीय अतिक्रमण से इसके अंडे देने के स्थल नष्ट हो रहे हैं।
इसके काटने पर सी स्नेक एंटीवेनम अत्यधिक प्रभावी होता है। यदि विशिष्ट इराबू एंटीवेनम उपलब्ध न हो, तो ऑस्ट्रेलियाई पॉलीवैलेंट सी स्नेक ASV का उपयोग किया जाता है। मरीज को तुरंत कृत्रिम श्वसन पर रखा जाना अनिवार्य है जब तक कि एंटीवेनम असर न दिखा दे। गुर्दों को सुरक्षित रखने के लिए IV फ्लूइड्स दिए जाते हैं ताकि मायोग्लोबिन प्रोटीन बाहर निकल सके।
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पर्शियन गल्फ सी स्नेक
महासागर का चप्पू-नुमा पूंछ वाला अत्यधिक विषैला समुद्री न्यूरोटॉक्सिक सर्प
पर्शियन गल्फ सी स्नेक, जिसे वैज्ञानिक जगत में (हाइड्रोफिस लैपेमॉइड्स) कहा जाता है, सर्राफ कुल के 'हाइड्रोफिनाए' उप-कुल का एक पूर्णतः समुद्री विषधर है।
यह नाम इसकी निकटवर्ती प्रजाति Hydrophis lapemides से समानता के आधार पर रखा गया है। वर्ष 1849 में वैज्ञानिक जॉन एडवर्ड ग्रे ने पहली बार इस प्रजाति का वर्णन किया। इसे कई बार Chitulia lapemoides वंश में भी वर्गीकृत किया गया है।
यह मुख्य रूप से हिंद महासागर और मध्य पूर्व के समुद्री तटों पर पाया जाता है: ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, कतर, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब के तटीय जल। भारत के पश्चिमी और पूर्वी तटीय क्षेत्र (गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, तमिलनाडु और ओडिशा), पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश। म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया के तटीय क्षेत्र।
समुद्री वातावरण में पर्शियन गल्फ सी स्नेक का औसत जीवनकाल 8 से 12 वर्ष होता है। वयस्क सांप की लंबाई 80 सेमी से 110 सेमी (लगभग 2.5 से 3.5 फीट) होती है। कुछ बड़े नमूने 120 सेमी से 130 सेमी तक दर्ज किए गए हैं। इसका वजन 300 ग्राम से 600 ग्राम तक होता है।
इसकी पूंछ वर्टिकली चपटी होती है, जो समुद्र में तैरते समय पतवार या चप्पू की तरह काम करती है। इसका अगला हिस्सा पतला होता है ताकि पानी में कम घर्षण हो, जबकि शरीर का पिछला हिस्सा चौड़ा होता है। शरीर का रंग जैतूनी-हरा, पीला-ग्रे या मटमैला सफेद होता है, जिस पर 35 से 55 तक गहरे काले या भूरे रंग की पट्टियां बनी होती हैं।
यह एक सरीसृप है, इसलिए इसके पास फेफड़े होते हैं और इसे सांस लेने के लिए सतह पर आना पड़ता है। पानी के अंदर गोता लगाते समय इसके नथुने विशेष वॉल्व से अपने आप बंद हो जाते हैं, जिससे पानी फेफड़ों में प्रवेश नहीं कर पाता।
यह अपनी त्वचा से भी कुछ मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित करने में सक्षम होता है।
यह खुले गहरे समुद्र के बजाय तटीय उथले पानी में रहता है। यह समुद्र तल में 10 मीटर से 50 मीटर की गहराई तक रेतीले या कीचड़दार तल, कोरल रीफ (प्रवाल भित्तियों) और मुहाने वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है। यह सांप स्वभाव से बहुत शांत होता है और इंसानों पर तब तक हमला नहीं करता जब तक कि इसे मछली पकड़ने के जाल में गलती से दबा या छेड़ा न जाए। यह दिन और रात दोनों समय शिकार की तलाश में पानी की गहराई में तैरता रहता है।
यह पूरी तरह से मांसाहारी जीव है। इसके आहार में शामिल हैं: मुख्य रूप से चपटी मछलियां ईल और तली में रहने वाली छोटी मछलियां। कभी-कभी यह चट्टानों में छिपे अंडों को भी खाता है। अधिकांश समुद्री सांपों की तरह, पर्शियन गल्फ सी स्नेक अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है। मादा पानी के अंदर ही 2 से 6 जीवित बच्चों को जन्म देती है। जन्म के समय बच्चे लगभग 25 से 30 सेमी लंबे होते हैं और तैरने व शिकार करने में पूरी तरह सक्षम होते हैं।
पर्शियन गल्फ सी स्नेक का विष अत्यधिक शक्तिशाली और प्राथमिक रूप से न्यूरोटॉक्सिक तथा मायोटॉक्सिक होता है। पोस्ट-सिनैप्टिक न्यूरोटॉक्सिन्स यह तंत्रिका तंत्र के संकेतों को रोककर मांसपेशियों को पंगु बनाता है।
मायोटॉक्सिन्स मांसपेशियों के ऊतकों को नष्ट करता है, जिससे मसल प्रोटीन रक्त में मिलकर किडनी को नुकसान पहुंचाता है। इसका काटना अक्सर दर्द रहित होता है, जिससे इंसान को तुरंत अहसास नहीं होता। मांसपेशियों में जकड़न, पलकों का झुकना बोलने और निगलने में कठिनाई। सांस लेने वाली मांसपेशियों का पैरालिसिस और डार्क/ब्राउन यूरिन होना।
हादसे बहुत दुर्लभ हैं। अधिकांश मामले तब होते हैं जब मछुआरे अपने जालों से मछलियां अलग कर रहे होते हैं और गलती से सांप पर हाथ पड़ जाता है। इसके इलाज के लिए विशिष्ट सी स्नेक एंटीवेनम का उपयोग किया जाता है। यदि सी स्नेक एंटीवेनम उपलब्ध न हो, तो गंभीर मामलों में एलैपिड पॉलीवैलेंट एंटीवेनम के साथ सपोर्टिव वेंटिलेटर केयर दी जाती है।
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हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर
दक्षिण भारत और श्रीलंका के जंगलों का छोटा, घातक और अप्रत्याशित विषधर
हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र में हंप-नोस्ड पिट वाइपर कहा जाता है, वाइपरीडे कुल के क्रोटेलिने उपकुल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और खतरनाक विषधर है। स्थानीय भाषाओं में इसे दक्षिण भारत (केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु) में 'चोना पांबू' या 'थोंडन पांबू' और श्रीलंका में 'मडिल्ला' कहा जाता है। शब्द का अर्थ प्राचीन ग्रीक में एक प्रकार के विषैले सर्प से है, जबकि इसका साधारण नाम 'हम्प-नॉज्ड' इसके थूथन पर उभरे हुए विशेष उभार (मस्से या गांठ जैसी संरचना) के कारण पड़ा है।
ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से, इस सांप को लंबे समय तक एक "मामूली" या कम विषैला सांप माना जाता था। परंतु, हाल के दशकों में हुए विषाक्तता और प्राणीशास्त्रीय अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि यह दक्षिण भारत और श्रीलंका में किडनी फेलियर और मौतों का एक बहुत बड़ा, उपेक्षित कारण है। यह पश्चिमी घाट के सदाबहार जंगलों, इलायची, चाय और रबड़ के बागानों में सदियों से अपना प्राकृतिक आवास बनाए हुए है।
दक्षिण भारत और श्रीलंका के कुछ विशेष क्षेत्रों में यह सांप रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के बाद सबसे ज्यादा इंसानी हादसों के लिए जिम्मेदार है।
श्रीलंका में अस्पतालों में आने वाले कुल सर्पदंश के मामलों में 22% से 40% मामले अकेले हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर के होते हैं। भारत के केरल और कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्रों में प्रतिवर्ष इसके काटने के 5,000 से 8,000 प्रत्यक्ष मामले दर्ज किए जाते हैं।
उचित और समय पर इलाज मिलने पर मृत्यु दर 1% से 3% के बीच रहती है। परंतु, यदि मरीज के गुर्दे प्रभावित हो जाएं और डायलिसिस समय पर न मिले, तो यह आंकड़ा 10% से अधिक हो जाता है। इसके कारण दक्षिण भारत और श्रीलंका को मिलाकर प्रतिवर्ष औसतन 200 से 500 लोगों की मृत्यु दर्ज की जाती है।
मौतों से भी बड़ा आंकड़ा इसके दंश के कारण होने वाली अपंगता का है। इसके काटने से डंक वाले स्थान के ऊतक सड़ जाते हैं जिससे लगभग 10% से 15% मरीजों की उंगलियां या हाथ-पैर के हिस्से काटने पड़ते हैं।
इसका अत्यंत छोटा आकार और पत्तियों के बीच छिपने की कला। बागानों में जब मजदूर गिरे हुए पत्तों को साफ करते हैं, चाय या इलायची की पत्तियां तोड़ते हैं या नंगे पांव चलते हैं, तो पत्तियों के नीचे छिपा यह सांप दब जाने पर तुरंत प्रहार करता है।
प्राकृतिक वर्षावनों और नम वातावरणीय परिस्थितियों में इसका औसतन जीवनकाल 10 से 14 वर्ष होता है।
यह आकार में काफी छोटा लेकिन सुगठित सांप है। वयस्क नर की लंबाई आमतौर पर 30 से 45 सेमी (1 से 1.5 फीट) होती है, जबकि मादाएं थोड़ी बड़ी होती हैं और 55 सेमी (लगभग 1.8 फीट) तक बढ़ सकती हैं। इसका वजन 100 से 300 ग्राम के बीच होता है।
इसकी सबसे प्रमुख पहचान इसके थूथन (नाक के अग्र भाग) पर ऊपर की ओर मुड़ा हुआ एक छोटा सा उभार या गांठ होता है, जो इसे अन्य सभी पिट वाइपर प्रजातियों से अलग बनाता है।
इसका सिर गर्दन से काफी चौड़ा और स्पष्ट त्रिकोणीय होता है। इसकी आंख और नथुने के बीच एक गहरी लॉरियल पिट होती है, जो इंफ्रारेड सेंसर की तरह काम करती है। यह अंधेरे में भी शिकार के शरीर की गर्मी (0.003°C तक के अंतर) को महसूस कर सटीक निशाना लगाता है।
इसकी त्वचा का रंग भूरा, धूसर, ईंट जैसा लाल या पीलापन लिए हुए होता है। इसकी पीठ पर दो लाइनों में बारी-बारी से बने चौकोर या त्रिकोणीय गहरे भूरे रंग के धब्बे होते हैं। इसका यह रंग सूखी पत्तियों, सड़ी हुई लकड़ियों और गीली मिट्टी में इसे पूरी तरह अदृश्य बना देता है।
अत्यधिक नमी वाले स्थान, जैसे सदाबहार वन सूखी पत्तियों के ढेर सड़े हुए पेड़ के तने, पत्थरों की दरारें और चाय/रबड़/इलायची के घने बागान।
छायादार और अंधेरे वाले इलाके जहां सूरज की सीधी धूप न पड़ती हो।
सुबह तड़के और रात का समय (मुख्य रूप से रात्रिचर)।
अत्यधिक सूखा, तेज धूप और खुली रेतीली जगहें।
इंसानी शोरगुल और बार-बार होने वाला कंपन।
बहुत अधिक तापमान (ज्यादा गर्मी होने पर यह जमीन के नीचे नमी वाले बिलों में छिप जाता है)।
यह एक मांसाहारी शिकारी है। इसके मुख्य भोजन में मेंढक (विशेषकर ट्री फ्रॉग), छिपकलियां (गैको व स्किंक), छोटे चूहे, कनखजूरे और कभी-कभार छोटे सांप शामिल हैं।
इसका चयापचय काफी धीमा होता है। यह 10 से 12 दिनों में केवल एक बार भोजन करता है।
यह शिकार का पीछा नहीं करता। यह पत्तियों के बीच चुपचाप छिपकर बैठता है और अपनी पूंछ के पिछले हिस्से को कीड़े की तरह हिलाकर शिकार को आकर्षित करता है जैसे ही शिकार पास आता है, यह अचानक हमला कर देता है।
यह अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे बच्चों को जन्म देता है।
संभोग काल आमतौर पर मानसून से पहले होता है। मादा का गर्भाधान काल 4 से 5 महीने का होता है।
जुलाई से अक्टूबर के बीच मादा एक समय में 4 से 18 जीवित बच्चों को जन्म देती है। पैदा होते ही बच्चे 13 से 15 सेमी लंबे होते हैं और उनमें पहले सेकंड से ही पूर्ण विकसित विष और प्रहार करने की क्षमता होती है।
हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर का जहर एक जटिल और अत्यंत विनाशकारी जैविक मिश्रण है। यह मुख्य रूप से साइटोटॉक्सिक हीमोटॉक्सिक और नेफ्रोटॉक्सिक होता है।
यह कोशिकाओं को तोड़ता है और गंभीर सूजन व दर्द पैदा करता है।
यह मांसपेशियों के ऊतकों को तुरंत घोलना शुरू कर देता है।
ये घटक सीधे गुर्दे की सूक्ष्म नलिकाओं को नष्ट करते हैं।
काटने के तुरंत बाद सुई चुभने जैसा भीषण दर्द होता है, जो तेजी से असहनीय जलन में बदल जाता है। डंक के स्थान पर तुरंत भारी सूजन आ जाती है।
घाव का रंग नीला या काला पड़ने लगता है। काटे गए अंग पर खून और पानी से भरे फफोले बनने लगते हैं। घाव से लगातार मटमैला खून बहता रहता है क्योंकि जहर खून जमने के तंत्र को बाधित करता है।
मरीज को उल्टी, पेट में तेज दर्द, मसूड़ों से खून आना और रक्तचाप में भारी गिरावट का सामना करना पड़ता है।
यह इस सांप के जहर का सबसे खतरनाक पहलू है। जहर के कारण गुर्दे की नलिकाएं बंद हो जाती हैं और पेशाब बनना बंद हो जाता है। यदि समय पर मरीज को डायलिसिस न मिले, तो किडनी फेलियर और मल्टी-ऑर्गन फेलियर से मरीज की मृत्यु हो जाती है।
हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर का इलाज चिकित्सा जगत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है:
भारत और श्रीलंका में उपलब्ध मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम
(जो नाग, करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के लिए बनता है) हम्प-नॉज्ड पिट वाइपर के जहर पर बिल्कुल भी काम नहीं करता।
इसके लिए कोई विशिष्ट एंटी-वेनम व्यावसायिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसका इलाज पूरी तरह से 'सहायक चिकित्सा' पर निर्भर करता है।
चूंकि जहर सीधे गुर्दों पर हमला करता है, इसलिए यदि मरीज का पेशाब बंद होने लगे या क्रिएटिनिन स्तर बढ़े, तो तुरंत आपातकालीन डायलिसिस शुरू किया जाता है ताकि शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकल सकें।
सड़े हुए मांस और ऊतकों को सर्जनों द्वारा काटकर अलग किया जाता है ताकि सेप्सिस (गंभीर संक्रमण) न फैले।
घाव में बैक्टीरियल इन्फेक्शन को रोकने के लिए उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाइयां और टिटनेस का टीका दिया जाता है।
मरीज के इलेक्ट्रोलाइट्स और रक्तचाप को स्थिर रखने के लिए विशेष तरल पदार्थ दिए जाते हैं।
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मोनोकल्ड कोबरा
पूर्वोत्तर भारत का अत्यधिक विषैला, आक्रामक और ऊतक-विनाशक विषधर
मोनोकल्ड कोबरा, जिसे वैज्ञानिक जगत में मोनोकल नाग के नाम से जाना जाता है, इलापिडे कुल का एक अत्यंत आक्रामक और खतरनाक विषधर सदस्य है। हिंदी भाषी और पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्रों में इसे 'एकचश्मा नाग', 'गोल फन वाला नाग' या 'पद्म गोखरा' (पश्चिम बंगाल में) कहा जाता है। वैज्ञानिक नाम में मौजूद काऊथिया शब्द बंगाली भाषा के शब्द 'कौतिया' या 'गोखरा' से ही लिया गया है।
ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से, यह सांप भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा), पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों में पाया जाता है। पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के मैदानी व दलदली इलाकों के इतिहास में यह सांप खेतों में काम करने वाले किसानों और ग्रामीण आबादी के लिए हमेशा से सबसे बड़ा खतरा रहा है। सामान्य स्पेक्टेकल्ड कोबरा (Naja naja) की तुलना में मोनोकल्ड कोबरा स्वभाव से अधिक चिड़चिड़ा, त्वरित हमलावर और शारीरिक रूप से अत्यधिक आक्रामक माना जाता है।
पूर्वोत्तर भारत (विशेषकर असम, त्रिपुरा और नागालैंड) और पश्चिम बंगाल में सर्पदंश से होने वाली मौतों और गंभीर अपंगता के मामलों में मोनोकल्ड कोबरा पहले स्थान पर आता है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल को मिलाकर प्रतिवर्ष मोनोकल्ड कोबरा के डंक मारने के 15,000 से अधिक प्रत्यक्ष मामले अस्पतालों में दर्ज किए जाते हैं।
उचित और त्वरित इलाज न मिलने की स्थिति में इसके काटने से मृत्यु दर 10% से 15% तक होती है। पूर्वोत्तर भारत में इसके कारण प्रतिवर्ष 1,500 से 2,500 लोगों की मृत्यु दर्ज की जाती है।
इस सांप के दंश की सबसे भयावह खासियत इसका 'साइटोटॉक्सिक' प्रभाव है। इसके काटने के कारण हर साल 3,000 से अधिक लोग अपने हाथ, पैर या उंगलियां गंवा देते हैं क्योंकि जहर डंक वाली जगह के मांस और मांसपेशियों को पूरी तरह सड़ा देता है।
इसके हमले की सबसे ज्यादा घटनाएं मानसून के महीनों (मई से अक्टूबर) में होती हैं, जब धान के खेतों में पानी भर जाता है और किसान नंगे पांव जलभराव वाले खेतों में रोपाई या कटाई कर रहे होते हैं।
प्राकृतिक जंगलों में मोनोकल्ड कोबरा का औसतन जीवनकाल 15 से 20 वर्ष होता है। अनुकूल परिस्थितियों और नियंत्रित माहौल (जैसे चिड़ियाघर या संरक्षण केंद्रों) में यह 25 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
एक पूर्ण व्यस्क मोनोकल्ड कोबरा की औसत लंबाई 1.2 मीटर से 1.5 मीटर (4 से 5 फीट) तक होती है। हालांकि, दलदली और भोजन से समृद्ध वातावरण में इसके कुछ नमूनों की लंबाई 2.3 मीटर (7.5 फीट) तक दर्ज की गई है। इसका भार आमतौर पर 1.5 से 3 किलोग्राम तक होता है।
इसकी सबसे बड़ी और मुख्य पहचान इसके फन के पीछे बना निशान है। स्पेक्टेकल्ड कोबरा के फन पर जहां 'चश्मे' जैसी दो आंखों की आकृति होती है, वहीं मोनोकल्ड कोबरा के फन के पिछले हिस्से पर एक गोलाकार रिंग, अंडाकार घेरा या 'O' के आकार का एक ही निशान होता है। इसी कारण इसे 'मोनोकल्ड कोबरा' कहा जाता है।
इसका रंग निवास स्थान के अनुसार बहुत तेजी से बदलता है। यह पीले-भूरे, गहरे बादामी, जैतुनी भूरे, या पूरी तरह से स्याह काले रंग का हो सकता है। पेट का निचला हिस्सा हल्का पीला या मटमैला सफेद होता है जिस पर गले के पास दो काले धब्बे होते हैं।
इसकी आंखें मध्यम आकार की, पुतलियां गोल और दृष्टि बहुत तीखी होती है। इसके ऊपरी जबड़े में आगे की तरफ 6 से 7 मिलीमीटर लंबे खोखले विषदंत होते हैं, जो सीधे विष ग्रंथि से जुड़े होते हैं।
इसे अत्यधिक नमी वाले स्थान पसंद आते हैं। यह दलदली भूमि, धान के खेतों, नदियों व पोखरों के किनारों, मैंग्रोव जंगलों, और बांस के झुरमुटों में अपना ठिकाना बनाता है। यह तैरने में बेहद कुशल होता है और घंटों पानी में बिता सकता है।
यह एक मांसाहारी और बेहद फुर्तीला शिकारी है। इसके आहार में मुख्य रूप से चूहे, मेंढक, छिपकलियां, छोटी मछलियां, पक्षी, उनके अंडे और कभी-कभार छोटे सांप शामिल होते हैं। यह रात और दिन दोनों समय शिकार कर सकता है।
इनका संभोग काल मुख्य रूप से ठंड के मौसम के अंत में (जनवरी से मार्च) होता है।
मादा मोनोकल्ड कोबरा अप्रैल से जून के बीच मिट्टी के बिलों, दीमक के टीलों या सड़े हुए पेड़ के तनों के नीचे 10 से 30 (कभी-कभी 35 तक) सफेद अंडे देती है।
मादा अंडों के आसपास रहकर उनकी सुरक्षा करती है। अंडे सेने में लगभग 55 से 65 दिन का समय लगता है।
अंडों से बाहर निकलने वाले नवजात बच्चे 20 से 30 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। वे जन्म के पहले सेकंड से ही पूर्ण विकसित जहर, फन और तीखे विषदंतों से लैस होते हैं।
जब इसे खतरा महसूस होता है, तो यह अपने शरीर के एक-तिहाई हिस्से को सीधा खड़ा कर लेता है, फन फैलाता है और बहुत तेज आवाज में फुंकारता है। यह सामान्य कोबरा से ज्यादा तेजी से और बार-बार डंक मारता है।
मोनोकल्ड कोबरा का विष एक अत्यंत जटिल और घातक जैविक मिश्रण है। इसमें दो मुख्य प्रकार के टॉक्सिन बहुत उच्च सांद्रता में पाए जाते हैं:
यह तंत्रिका कोशिकाओं के रिसेप्टर्स को ब्लॉक करके दिमाग और मांसपेशियों के बीच के संदेश को पूरी तरह काट देता है।
यह इस सांप के जहर का सबसे खतरनाक पहलू है। यह कोशिकाओं, ऊतकों और मांसपेशियों को तुरंत घोलना और नष्ट करना शुरू कर देता है।
डंक मारने वाली जगह पर दो दांतों के निशान बनते हैं। वहां तुरंत असहनीय जलन और भयानक दर्द शुरू होता है। काटे गए अंग का रंग लाल से बदलकर गहरा नीला या काला पड़ने लगता है।
साइटोटॉक्सिन के कारण घाव के आसपास का मांस तेजी से सड़ने लगता है। घाव से बदबूदार तरल और खून रिसने लगता है। सूजन पूरे हाथ या पैर में तेजी से फैल जाती है।
न्यूरोटॉक्सिन के असर से आंखों की पलकें भारी होकर गिर जाती हैं धुंधला दिखाई देने लगता है, अत्यधिक लार बहती है, और मरीज का जीभ व गला काम करना बंद कर देता है, जिससे बोलना व निगलना नामुमकिन हो जाता है।
विष फेफड़ों को चलाने वाली छाती की मांसपेशियों और डायफ्राम को पंगु बना देता है। यदि मरीज को समय पर इलाज न मिले, तो 1 से 4 घंटे के भीतर सांस पूरी तरह रुकने से मरीज की मौत हो जाती है।
मोनोकल्ड कोबरा के दंश से बचने के लिए केवल और केवल आधुनिक मेडिकल अस्पताल ही एकमात्र विकल्प है।
भारत में उपलब्ध पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम (ASV) मोनोकल्ड कोबरा के न्यूरोटॉक्सिक असर को बेअसर करने में पूरी तरह सक्षम और प्रभावी है।
मरीज को अस्पताल पहुंचते ही ASV की 10 Vials (शीशियां) सलाइन ड्रिप के माध्यम से नसों में दी जाती हैं। यदि लक्षण शांत नहीं होते, तो 1 से 2 घंटे बाद अतिरिक्त खुराक दी जाती है।
यदि मरीज को सांस लेने में असमर्थता हो रही है, तो उसे तुरंत कृत्रिम श्वसन पर रखा जाता है।
सड़ते हुए घाव में बैक्टीरिया के संक्रमण को रोकने के लिए उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं।
विष से सड़े हुए मृत मांस को डॉक्टर सर्जरी करके बाहर निकालते हैं। घाव ठीक होने के बाद शरीर के दूसरे हिस्से से चमड़ी लेकर वहां लगाई जाती है।
घाव पर चीरा बिल्कुल न लगाएं, रस्सी कसकर न बांधें और झाड़-फूंक में समय न गंवाएं।
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अंडमान कोबरा
अंडमान कोबरा, जिसे प्राणीशास्त्र की भाषा में अण्डमान नाग कहा जाता है, इलापिडे कुल का एक अत्यंत विशिष्ट और स्थानिक विषधर है। यह संपूर्ण विश्व में केवल और केवल भारत के केंद्र शासित प्रदेश अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में ही पाया जाता है। स्थानीय द्वीपीय भाषाओं में इसे 'अंडमानी नाग' या 'द्वीप कोबरा' कहा जाता है।
वैज्ञानिक नामकरण की दृष्टि से, 'Naja' शब्द संस्कृत के 'नाग' शब्द से उद्भूत है, जबकि 'sagittifera' एक लैटिन शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है "तीर का निशान धारण करने वाला" यह नाम इसके फन के पिछले हिस्से पर बनी तीर या त्रिशूल जैसी अनूठी आकृति के कारण दिया गया है।
ऐतिहासिक रूप से, लंबे समय तक इसे भारतीय मैदानी कोबरा (Naja naja) या मोनोकल्ड कोबरा की ही एक उप-प्रजाति या भौगोलिक किस्म मान लिया गया था। परंतु, 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आधुनिक जेनेटिक विश्लेषण तथा आकारिकी विज्ञान के आधार पर सरीसृप विशेषज्ञों ने यह सिद्ध किया कि अंडमान द्वीप समूह का यह कोबरा मुख्य भूमि के सभी नागों से आनुवंशिक और विष-वैज्ञानिक दृष्टि से पूरी तरह भिन्न एक स्वतंत्र प्रजाति है।
अंडमान की स्वदेशी जनजातियों (जैसे जारवा और ओंगे) के इतिहास में इस सांप का उल्लेख एक शांत लेकिन बेहद शक्तिशाली वंशीय रक्षक के रूप में मिलता है। घने वर्षावनों और तटीय इलाकों में यह सांप हजारों वर्षों से द्वीप के पारिस्थितिक तंत्र का शीर्ष शिकारी बना हुआ है।
अंडमान के नम, उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के प्राकृतिक आवास में अंडमान कोबरा का औसतन जीवनकाल 15 से 20 वर्ष होता है। यदि इसे सुरक्षित वातावरण या सर्प संरक्षण केंद्र में रखा जाए, तो यह 22 से 25 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
यह एक मध्यम से बड़े आकार का सुगठित सांप है। एक पूर्ण वयस्क अंडमान कोबरा की औसत लंबाई 0.9 मीटर से 1.5 मीटर (3 से 5 फीट) तक होती है। अनुकूल वनीय परिवेश और प्रचुर भोजन की उपलब्धता में इसके कुछ असाधारण नमूने 1.8 मीटर (6 फीट) तक लंबे दर्ज किए गए हैं। इसका शारीरिक भार आमतौर पर 1.2 किलोग्राम से लेकर 2.5 किलोग्राम तक होता है।
आम नागों की भांति यह भी खतरा महसूस होने पर अपनी ग्रीवा पसलियों को फैलाकर चौड़ा फन प्रदर्शित करता है। इसके फन के पिछले हिस्से की संरचना इसकी मुख्य पहचान है। इस पर स्पेक्टेकल्ड कोबरा जैसा 'चश्मा' या मोनोकल्ड कोबरा जैसा 'O-रिंग' नहीं होता, बल्कि एक V-आकार या तीर के अग्रभाग जैसी तीखी आकृति बनी होती है।
इसकी त्वचा का रंग अत्यंत आकर्षक और परिवर्तनशील होता है। वयस्कों का रंग हल्का पीलापन लिए भूरा, जैतुनी हरा, गहरा बादामी या पूरी तरह स्याह काला हो सकता है। इसके पूरे शरीर पर छोटे-छोटे पीले, सफेद या हल्के धब्बे और धारियां बनी होती हैं। पेट का निचला हिस्सा मटमैला पीला या सफेद होता है, जिस पर गले के पास काले रंग के दो से तीन स्पष्ट बैंड (पट्टियां) मौजूद होते हैं।
इसकी आंखें मध्यम से बड़ी होती हैं और पुतलियां पूरी तरह गोल होती हैं, जो इसके मुख्य रूप से दिन में सक्रिय रहने का संकेत देती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में आगे की तरफ स्थित विषदंत स्थिर, खोखले और लगभग 6 से 8 मिलीमीटर लंबे होते हैं, जो सीधे विष ग्रंथियों से जुड़े रहते हैं।
अंडमान के घने सदाबहार और अर्ध-सदाबहार वर्षावन।
तटीय मैंग्रोव (मैंग्रोव दलदल) और नदियों/नालों के किनारे की नम मिट्टी।
धान के खेत, नारियल और सुपारी के बागान जहां चूहों की संख्या अधिक होती है।
दीमक के पुराने टीले, गिरे हुए विशाल पेड़ों के तने और पत्थरों की दरारें जो इसे सुरक्षित आश्रय प्रदान करती हैं।
अत्यधिक सूखा और सीधी कड़क धूप (यह डिहाइड्रेशन से बचने के लिए छायादार स्थानों में रहता है)।
इंसानी आबादी का अत्यधिक शोरगुल और मशीनों का कंपन।
ठंडे तापमान वाले क्षेत्र (यह केवल उष्णकटिबंधीय आर्द्र वातावरण में ही फल-फूल सकता है)।
अंडमान कोबरा स्वभाव से एक शर्मीला और प्रादेशिक जीव है। यह इंसानों से आमना-सामना होने पर सबसे पहले चुपचाप खिसकने या झाड़ियों में छिपने का प्रयास करता है। लेकिन जब इसे किसी कोने में घेर लिया जाता है या इसका रास्ता रोका जाता है, तब यह अत्यंत आक्रामक रूप धारण कर लेता है। यह अपने शरीर के आगे के एक-तिहाई हिस्से को सीधा खड़ा कर लेता है, फन फैलाता है और बहुत तेज गति से 'हिस' की चेतावनी भरी फुंकार छोड़ता है। यदि चेतावनी को अनदेखा किया जाए, तो यह बिना हिचकिचाहट के बार-बार तीखे प्रहार करता है।
अंडमान कोबरा एक बेहद फुर्तीला और कुशल मांसाहारी शिकारी है। यह द्वीप के पारिस्थितिक तंत्र में छोटे जीवों की आबादी को नियंत्रित करने में मुख्य भूमिका निभाता है।
इसका सबसे पसंदीदा भोजन द्वीप पर पाए जाने वाले चूहे और छोटे स्तनधारी जीव हैं।
चूहों के अलावा यह मेंढक, तोड्स छिपकलियां (विशेषकर मॉनिटर लिजार्ड/गोह के छोटे बच्चे), पक्षी और उनके घोंसलों से अंडे खाता है। कभी-कभार भोजन की कमी होने पर यह छोटे गैर-विषैले सांपों का भक्षण भी कर लेता है।
यह मुख्य रूप से एक सक्रिय शिकारी है जो सूंघने की तीखी क्षमता और तेज दृष्टि की मदद से शिकार को खोजता है। शिकार दिखते ही यह उस पर तेजी से झपटता है और अपने विषदंत गड़ाकर जहर उड़ेल देता है। इसके बाद यह शिकार को छोड़ देता है। जहर के प्रभाव से जब शिकार कुछ ही सेकंडों में पंगु होकर दम तोड़ देता है, तब यह उसे पूरा का पूरा निगल जाता है।
इनका प्रजनन काल मुख्य रूप से सर्दियों के अंत और वसंत ऋतु (जनवरी से मार्च) के दौरान होता है।
मादा अंडमान कोबरा अप्रैल से जून के बीच मिट्टी के बिलों, दीमक के टीलों या सड़े हुए पेड़ों की खोखली जड़ों में 10 से 25 सफेद, नरम चमड़े जैसे अंडे देती है।
मादा अंडों के पास रहकर तब तक पहरा देती है जब तक कि वे पक न जाएं। अंडों से बच्चे निकलने की अवधि लगभग 55 से 65 दिनों की होती है।
अंडों से बाहर निकलने वाले बच्चे 25 से 30 सेमी लंबे होते हैं। वे जन्म लेते ही पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और उनके पास पहले सेकंड से ही घातक जहर और हमला करने की कला मौजूद होती है।
अंडमान कोबरा का मुख्य निवास स्थान केवल अंडमान द्वीप समूह (जैसे पोर्ट ब्लेयर, उत्तर और मध्य अंडमान, दक्षिण अंडमान) तक ही सीमित है, इसलिए इसके हादसों का आंकड़ा मुख्य भूमि के सांपों की तुलना में भौगोलिक रूप से सीमित है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रतिवर्ष अंडमान कोबरा के दंश के लगभग 150 से 300 मामले दर्ज किए जाते हैं। इनमें से अधिकांश घटनाएं किसानों, कृषि मजदूरों, जंगलों में लकड़ी या जड़ी-बूटी इकट्ठा करने वालों और निर्माण कार्य में लगे मजदूरों के साथ होती हैं।
द्वीपीय स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार और एंटी-वेनम की उपलब्धता के कारण प्रतिवर्ष इसके कारण होने वाली इंसानी मौतों की संख्या औसतन 2 से 8 के बीच सीमित रहती है। परंतु, यदि मरीज सुदूर द्वीप में हो और उसे 2 घंटे के भीतर अस्पताल न पहुंचाया जाए, तो इसकी मृत्यु दर 20% से अधिक हो सकती है।
यह सांप ग्रामीण इलाकों में मुर्गियों, बत्तखों और चूहों के लालच में अक्सर पोल्ट्री फार्मों और घरों के बाड़ों में घुस जाता है। यहां सुरक्षात्मक प्रहार में यह प्रतिवर्ष सैकड़ों पालतू मुर्गियों, कुत्तों, बिल्लियों और छोटे मवेशियों (बकरियों व बछड़ों) को डंक मारकर मौत के घाट उतार देता है।
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बैंडेड करैत
भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया का रहस्यमयी, पीला-काला नाग-भक्षी एवं अत्यंत विषैला सर्प-सम्राट
बैंडेड करैत, जिसे प्राणीशास्त्र की भाषा में धारीदार करैत कहा जाता है, इलापिडे कुल का एक अत्यंत विशिष्ट और आकर्षक विषधर है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे 'अहिराज' (सांपों का राजा) या 'पट्टेदार करैत' कहा जाता है। शब्द तेलुगु भाषा के शब्द 'बंगारम' से उद्भूत है, जिसका अर्थ "सोना" या "पीला रंग" होता है। वहीं लैटिन शब्द का शाब्दिक अर्थ "धारियों या पट्टियों वाला" होता है।
ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से, भारतीय लोककथाओं और जंगलों में रहने वाले समुदायों के बीच 'अहिराज' को एक रहस्यमयी जीव माना गया है। प्राचीन काल से ही इसे अन्य सांपों को खाने वाले शिकारी के रूप में जाना जाता है। यह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार), मध्य भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया) में व्यापक रूप से पाया जाता है।
जीवनकाल प्राकृतिक वर्षावनों, आर्द्र क्षेत्रों और कृषि भूमियों में बैंडेड करैत का औसतन जीवनकाल 12 से 18 वर्ष होता है। यदि इसे सुरक्षित और अनुकूल वातावरण में रखा जाए, तो यह 20 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
लंबाई एवं शारीरिक भार: यह करैत वंश की सबसे बड़ी प्रजाति है। एक पूर्ण वयस्क बैंडेड करैत की औसत लंबाई 1.2 मीटर से 1.8 मीटर (4 से 6 फीट) तक होती है। अनुकूल वातावरण में इसके असाधारण नमूने 2.13 मीटर (7 फीट) तक लंबे दर्ज किए गए हैं। इसका वजन आमतौर पर 1 से 2.5 किलोग्राम तक होता है।
इसकी सबसे बड़ी पहचान इसका अनूठा शारीरिक आकार है। इसका शरीर गोल न होकर त्रिभुजाकार होता है। इसकी रीढ़ की हड्डी काफी उभरी हुई और तीखी होती है, जो इसे अन्य सभी सांपों से पूरी तरह अलग बनाती है।
इसके पूरे शरीर पर चमकीले पीले (या मटमैले सफेद) और गहरे काले रंग की बराबर चौड़ाई वाली एकांतर पट्टियां बनी होती हैं। ये पट्टियां पेट के निचले हिस्से तक पूरी तरह गोल घूमती हैं। इसका सिर चौड़ा और हल्का चपटा होता है, जिसके ऊपर पीले रंग का तीर जैसा निशान होता है।
इसकी पूंछ का सिरा तीखा न होकर गोल और कुंद होता है। आंखें छोटी, पूरी तरह काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं, जो इसके मुख्य रूप से निशाचर होने का संकेत देती हैं।
पसंद
दीमक के पुराने टीले, चूहे के बिल और पत्थरों व लकड़ियों के ढेर।
दलदली इलाके, धान के खेत, नदियां, नाले और तालाबों के किनारे (जहां इसे नमी और पर्याप्त शिकार मिलता है)।
समुद्र तल से 2,300 मीटर तक की ऊंचाई वाले आर्द्र और उष्णकटिबंधीय वर्षावन।
क्या नापसंद करता है
अत्यधिक सूखा, रेतीला और कड़क धूप वाला वातावरण।
दिन का उजाला (दिन के समय यह पूरी तरह से निष्क्रिय रहता है)।
इंसानी शोरगुल और सीधी दखलंदाजी।
दिन के समय: दिन के उजाले में यह सांप अत्यंत सुस्त, डरपोक और निष्क्रिय रहता है। यदि दिन में इसे छेड़ा जाए, तो यह काटने के बजाय अपने सिर को अपने ही शरीर की कुंडली के नीचे छुपा लेता है और अपनी पूंछ को हिलाकर चेतावनी देता है। दिन में यह बहुत ही दुर्लभ मामलों में काटता है।
रात के समय: सूर्यास्त होते ही यह पूरी तरह बदल जाता है। रात में यह एक अत्यंत फुर्तीला, आक्रामक और घातक शिकारी बन जाता है। रात के अंधेरे में छेड़े जाने पर यह बिना झिझक के तीखा हमला करता है।
मुख्य आहार: इसका सबसे पसंदीदा भोजन अन्य सांप हैं। यह गैर-विषैले सांपों (जैसे धामनके साथ-साथ अत्यंत विषैले सांपों (जैसे कोबरा और अन्य करैत) को भी आसानी से मारकर खा जाता है।
सांपों की अनुपलब्धता में यह मेंढक, तोड्स, छिपकलियों, मछलियों और कभी-कभार छोटे चूहों व पक्षियों के अंडों का भक्षण करता है।
रात में यह सूंघने की तीव्र क्षमता की मदद से शिकार के निशानों का पीछा करता है। शिकार मिलते ही यह अपनी मजबूत पकड़ में उसे जकड़ लेता है और अपने विषदंत गड़ा देता है। इसका जहर शिकार के तंत्रिका तंत्र को तुरंत पंगु बना देता है, जिसके बाद यह उसे सिर की तरफ से निगलना शुरू कर देता है।
प्रजनन चक्र : इनका संभोग काल वसंत ऋतु (मार्च से मई) के दौरान होता है। इस दौरान नर करैत मादा के लिए आपसी कुश्ती करते हैं।
अंडे देना मादा बैंडेड करैत मई से जुलाई के बीच पत्तीदार कचरे, मिट्टी के गड्ढों या बिलों में 4 से 14 सफेद, लंबे अंडे देती है।
मादा अंडों के पास रहकर लगभग 60 दिनों तक उनकी सुरक्षा करती है।
अंडों से निकलने वाले बच्चे लगभग 30 से 35 सेमी लंबे होते हैं। जन्म के समय से ही उनके शरीर पर पीली-काली पट्टियां और घातक जहर मौजूद होता है।
अन्य करैत प्रजातियों (जैसे कॉमन करैत) की तुलना में बैंडेड करैत के इंसानों को काटने के मामले अपेक्षाकृत कम दर्ज किए जाते हैं।
पूरे पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रतिवर्ष इसके काटने के औसतन 500 से 1,000 मामले दर्ज किए जाते हैं।
यह सांप दिन में बिल्कुल आक्रामक नहीं होता और रात में भी इंसानी बस्तियों के भीतर घुसने के बजाय मुख्य रूप से खेतों और जल निकायों के पास शिकार की तलाश करता है।
मृत्यु दर : यदि इलाज न मिले तो इसके काटने से मृत्यु दर 10% से 20% तक होती है। यद्यपि इसका विष बहुत शक्तिशाली है, लेकिन यह एक बार में कोबरा की तुलना में कम मात्रा में जहर छोड़ता है। इसके कारण होने वाली वार्षिक मौतों की संख्या औसतन 20 से 50 के बीच रहती है।
हादसों की मुख्य वजह: रात के समय नंगे पैर खेतों या दलदली इलाकों में काम करने वाले किसान और रात में जाल डालकर मछली पकड़ने वाले मछुआरे अक्सर अनजाने में इस पर पैर रख देते हैं, जिससे यह बचाव में काट लेता है।
बैंडेड करैत का जहर मुख्य रूप से न्यूरोटॉक्सिक होता है।
यह मुख्य रूप से तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों के बीच के संचार तंत्र को पूरी तरह से ठप कर देता है।
कार्डियोटॉक्सिन्स : यह हृदय की कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है।
इसका विषैलापन लगभग 1.2 mg/kg से 2.4 mg/kg के बीच होता है।
एक वयस्क बैंडेड करैत अपने एक दंश में औसतन 20 से 60 मिलीग्राम (शुष्क भार) विष छोड़ता है। हालांकि यह मात्रा कॉमन करैत से कम विषैली है, फिर भी यह एक ही बार में 3 से 5 स्वस्थ इंसानों को मारने के लिए पर्याप्त होती है।
डंक मारने की जगह पर दर्द और सूजन बहुत मामूली या न के बराबर होती है (जिसके कारण मरीज अक्सर इसे अनदेखा कर देता है)।
विष धीरे-धीरे तंत्रिका तंत्र को ब्लॉक करता है। मरीज को भारी पेट दर्द, उल्टी, पेट में ऐंठन, आंखों की पलकों का गिरना धुंधला दिखना और निगलने में तकलीफ शुरू होती है।
सांस लेने में भारी कठिनाई होती है क्योंकि छाती की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं।
सांस रुकने और ऑक्सीजन की कमी से मरीज की मृत्यु हो जाती है।
भारत में मिलने वाला पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम बैंडेड करैत के विष को बेअसर करने में प्रभावी होता है।
थाइलैंड और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसके लिए विशेष भी उपलब्ध है।
मरीज को तुरंत 10 Vials ASV सलाइन के साथ दिए जाते हैं।
सांस लेने में तकलीफ होते ही मरीज को वेंटिलेटर या कृत्रिम श्वसन सहायता पर रखा जाना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
इंजेक्शन: यह दवा मांसपेशियों की पक्षाघात स्थिति को कम करने में मदद करती है।
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ब्लैक करैत
ब्लैक करैत को प्राणीशास्त्र में बुंगारस नाइगर कहा जाता है। यह इलापिडे कुल का एक अत्यंत विषैला और दुर्लभ सर्प है। वैज्ञानिक नाम में शामिल 'बुंगारस' शब्द तेलुगु भाषा के 'बंगारम' (जिसका अर्थ सोना या पीला होता है) से लिया गया है, जबकि 'नाइगर' एक लैटिन शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ "गहरा काला" होता है।
ऐतिहासिक रूप से इसे अक्सर भारतीय सामान्य करैत या अन्य काले रंग के गैर-विषैले सांपों (जैसे काला सुंदरी सांप) की किस्म समझ लिया जाता था। परंतु 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जर्मन-ब्रिटिश प्राणीशास्त्री अल्बर्ट गुंथर ने इसकी शारीरिक संरचना और रीढ़ की हड्डियों के अध्ययन के आधार पर इसे एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में नामांकित किया। यह मुख्य रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, पश्चिम बंगाल के तराई क्षेत्र, उत्तराखंड के कुछ भाग) के साथ-साथ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में पाया जाता है।
शारीरिक बनावट, आकार, जीवनकाल और पहचान
प्राकृतिक वनीय वातावरण में ब्लैक करैत का औसतन जीवनकाल 10 से 15 वर्ष होता है।
एक वयस्क ब्लैक करैत की औसत लंबाई 0.8 मीटर से 1.2 मीटर (लगभग 3 से 4 फीट) होती है। अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों में इसके कुछ नमूने 1.4 मीटर (साढ़े चार फीट से अधिक) तक दर्ज किए गए हैं। इसका भार आमतौर पर 800 ग्राम से 1.5 किलोग्राम तक होता है।
इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी त्वचा का रंग है। इसके पूरे शरीर पर बिना किसी बैंड या धब्बे के एकसमान चमकीला गहरा काला या गहरा नीला-काला रंग होता है। इसकी केंचुली और शल्क इतने चिकने और चमकदार होते हैं कि रात में टॉर्च की रोशनी में यह मोम की तरह चमकता है। पेट का निचला हिस्सा पूरी तरह से मटमैला सफेद या हल्का पीला होता है।
इसका सिर गर्दन से बहुत अलग नहीं दिखता और शरीर के साथ पूरी तरह सुगठित रहता है। आंखें छोटी, पूरी तरह से काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में स्थित विषदंत बहुत छोटे (लगभग 2 से 3 मिलीमीटर) लेकिन बेहद तीखे होते हैं।
पसंद, नापसंद
यह नमी वाले उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय वनों, पर्वतीय तराई क्षेत्रों, बांस के जंगलों, चाय के बागानों, धान के खेतों और नदियों के निकटतम स्थानों में रहना पसंद करता है। यह समुद्र तल से 100 मीटर से लेकर 1,500 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है।
इसे नम मिट्टी, पत्तियों के सड़ते हुए ढेर, लकड़ी के लट्ठों के नीचे की जगह, दीमक के टीले और चूहों के बिल अत्यंत प्रिय हैं। यह कड़क धूप, सूखे वातावरण और सीधे तेज प्रकाश से सख्त नफरत करता है।
दिन के समय: यह अत्यधिक सुस्त, सीधा और शांत रहता है। दिन में छेड़े जाने पर यह काटने के स्थान पर अपने सिर को शरीर के नीचे छिपाकर एक गोलाकार कुंडली बना लेता है।
रात के समय: रात होते ही यह बेहद सतर्क और सक्रिय शिकारी में बदल जाता है। रात में जब इंसान सो रहे होते हैं, तब यह भोजन की तलाश में कच्ची झोपड़ियों, तंबुओं और घरों के भीतर दबे पांव घुस जाता है।
भोजन, शिकार तकनीक और प्रजनन विज्ञान
ब्लैक करैत मुख्य रूप से सांप-भक्षी (ओफियोफैगस) जीव है।
मुख्य शिकार: इसका पसंदीदा भोजन अन्य छोटे सांप (चाहे वे विषैले हों या गैर-विषैले), अंधे सांप (ब्लाइंड स्नेक) और करैत वंश के ही छोटे बच्चे हैं।
द्वितीयक शिकार: सांपों के अलावा यह छोटे चूहे, छिपकलियों, मेंढकों और पक्षियों के अंडों को भी अपना शिकार बनाता है।
शिकार करने की तकनीक: रात में यह अपनी सूंघने की क्षमता से शिकार को ढूंढता है। शिकार मिलते ही यह बहुत धीरे से उसके पास पहुंचता है और अपने तीखे दांतों से उसे दबा लेता है। यह शिकार को तुरंत छोड़ने के बजाय तब तक दबाए रखता है जब तक कि इसका न्यूरोटॉक्सिक जहर शिकार के तंत्रिका तंत्र को पूरी तरह से सुन्न न कर दे। इसके बाद यह शिकार को सिर की तरफ से पूरा निगल जाता है।
इनका संभोग काल वसंत ऋतु (मार्च से मई) के बीच होता है।
मादा ब्लैक करैत मई से जुलाई के दौरान सड़ी हुई पत्तियों के ढेर, मिट्टी के गड्ढों या पत्थरों की दरारों में 6 से 12 सफेद, लंबे और नरम अंडे देती है।
मादा अंडों के पास रहकर तब तक पहरा देती है जब तक कि बच्चे बाहर न निकल आएं।
लगभग 50 से 60 दिनों के भीतर अंडों से 20 से 25 सेमी लंबे बच्चे बाहर निकलते हैं। जन्म के समय से ही इनमें पूरा जहर और शिकार करने की क्षमता मौजूद होती है।
पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश और नेपाल के ग्रामीण इलाकों में ब्लैक करैत के डंक मारने की घटनाएं अत्यंत गंभीर मानी जाती हैं।
पूर्वोत्तर भारत और नेपाल के तराई क्षेत्रों को मिलाकर इसके डंक मारने के प्रतिवर्ष 800 से 1,500 मामले सामने आते हैं।
इसके अधिकांश हादसे रात में 12 बजे से सुबह 4 बजे के बीच होते हैं। यह जमीन पर सो रहे लोगों के शरीर की गर्मी महसूस करके उनके बिस्तर या रजाई में घुस जाता है। नींद में जब इंसान थोड़ा सा भी करवट लेता है या इसका शरीर दबता है, तो यह बिना कोई फुंकार दिए या चेतावनी दिए चुपचाप डंक मार देता है।
इसके काटने से मृत्यु दर 70% से 80% तक होती है। इसके डंक का निशान इतना छोटा होता है कि सो रहा इंसान समझता है कि उसे किसी चींटी या मच्छर ने काटा है, जिसके कारण वह सोता रह जाता है और सुबह तक उसकी मौत हो जाती है।
ब्लैक करैत का विष पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सांपों में सबसे तीव्र न्यूरोटॉक्सिक विषों में से एक माना जाता है
यह तंत्रिका कोशिकाओं के अंतिम छोर (नर्व एंडिंग्स) को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है, जिससे मस्तिष्क से संदेश मांसपेशियों तक पहुंचना बंद हो जाते हैं।
मांसपेशियों के रिसेप्टर्स को ब्लॉक करता है।
यह कुछ हद तक मांसपेशियों की कोशिकाओं को गलाने का काम करता है।
इसका विषैलापन (सूक्ष्मतम जानलेवा खुराक - एलडी50) लगभग 0.10 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम होता है, जो इसे किंग कोबरा से भी कई गुना अधिक विषैला बनाता है।
इसका केवल 1 से 2 मिलीग्राम शुद्ध जहर एक वयस्क इंसान को मारने के लिए काफी होता है।
0 - 1 घंटा: काटने वाले स्थान पर कोई दर्द नहीं होता, न ही कोई सूजन या लालिमा आती है। केवल हल्का सा चींटी काटने जैसा निशान रहता है।
1 - 3 घंटे: मरीज को पेट में तेज ऐंठन, उल्टी, जोड़ों में दर्द और भारी सुस्ती आने लगती है।
3 - 6 घंटे: तंत्रिका तंत्र पूरी तरह पतन की ओर जाने लगता है। पलकें झुक जाती हैं, धुंधला दिखाई देने लगता है, आवाज बंद हो जाती है और निगलने में असमर्थता होती है।
फेफड़ों को चलाने वाली मांसपेशियां पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाती हैं, जिससे श्वसन विफलता (सांस रुक जाना) और ऑक्सीजन की कमी से दिल की धड़कन बंद हो जाती है।
एंटी-वेनम (ASV): भारत में उपलब्ध मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम इसके विष के खिलाफ असरदार होता है, बशर्ते इसे शुरुआती कुछ घंटों में ही दे दिया जाए। मरीज को तुरंत सलाइन ड्रिप के जरिए 10 से 20 शीशियां दी जाती हैं।
इसका न्यूरोटॉक्सिन सांस की नली और फेफड़ों की मांसपेशियों को पंगु बना देता है, इसलिए मरीज की जान बचाने के लिए उसे तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखना सबसे जरूरी कदम होता है। वेंटिलेटर की मदद से शरीर से जहर का असर समाप्त होने तक मरीज को सांस दी जाती है।
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वॉल्स करैत
भारतीय उपमहाद्वीप के सरीसृप वर्ग में इलापिडे कुल के सर्पों का एक अत्यंत विशिष्ट और प्रामाणिक स्थान है। इस कुल के अंतर्गत आने वाले सर्प अपने अत्यंत तीव्र न्यूरोटॉक्सिक (तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाले) विष के लिए जाने जाते हैं। इसी कुल के अंतर्गत 'करैत' वंश यानी आता है। इस वंश की एक अत्यधिक विषैली, रहस्यमयी और शर्मीली प्रजाति है—वॉल्स करैत जिसका वैज्ञानिक नाम Bungarus walli है।
इस प्रजाति का नामकरण 20वीं सदी के महान ब्रिटिश सर्पविज्ञानी के वैज्ञानिक योगदान के सम्मान में किया गया था। फ्रैंक वॉल ने भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सर्पों का गहन वर्गीकरण और शारीरिक अध्ययन किया था। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि उत्तर और उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों में पाया जाने वाला यह करैत अपने शारीरिक शल्कों की व्यवस्था आकार और उदर संरचना के मामले में साधारण करैत से अलग है।
वैज्ञानिक दृष्टि से वॉल्स करैत को पारिस्थितिकी तंत्र का एक अत्यंत कुशल और शांत शिकारी माना जाता है। हालाँकि, रात के समय इसकी अत्यधिक सक्रियता और इसके विष की सूक्ष्म व दर्दहीन प्रकृति के कारण यह मानव जीवन के लिए एक अदृश्य ख़तरे के रूप में भी जाना जाता है।
वॉल्स करैत एक मध्यम से बड़े आकार का बेलनाकार साप है। इसकी शारीरिक संरचना इसे अपनी ही प्रजाति के अन्य साँपों से अलग और विशिष्ट बनाती है।
एक पूर्ण वयस्क वॉल्स करैत की औसत लंबाई 1.0 मीटर से 1.2 मीटर (3.3 से 4 फीट) के बीच होती है। अनुकूल वातावरण में कुछ दुर्लभ नमूने 1.65 मीटर (लगभग 5.4 फीट) तक दर्ज किए गए हैं।
इसका शरीर बेलनाकार होता है, लेकिन रीढ़ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा थोड़ा उभरा हुआ होता है, जिससे इसका अनुप्रस्थ काट हल्का त्रिकोणीय दिखाई देता है।
इसकी पीठ का मुख्य रंग गहरा इस्पाती-काला या अत्यधिक गहरा चमकदार भूरा-काला होता है। इस गहरे रंग के ऊपर पूरे शरीर पर सफ़ेद या हल्के पीले रंग की पतली दोहरी धारियाँ बनी होती हैं। ये धारियाँ शरीर के अगले हिस्से की तुलना में पूँछ की ओर अधिक स्पष्ट और चौड़ी होती हैं।
इसके पेट की तरफ की त्वचा पूरी तरह सफ़ेद, क्रीम या हल्की पीली होती है, जिस पर कोई धब्बा नहीं होता।
मध्य-पृष्ठीय शल्क रीढ़ की हड्डी के ठीक ऊपर स्थित शल्कों की पंक्ति अत्यधिक चौड़ी और षट्कोणीय होती है। यह वंश की प्राथमिक पहचान है।
पृष्ठीय शल्क पंक्तियाँ शरीर के मध्य भाग में शल्कों की 17 या 19 पंक्तियाँ होती हैं। उदर शल्क इसके पेट के नीचे 192 से 208 तक चौड़े शल्क पाए जाते हैं। पुच्छीय शल्क पूँछ के निचले भाग में 30 से 40 तक अविभाजित शल्क होते हैं।
वॉल्स करैत का सिर छोटा और चपटा होता है। यह गर्दन से बहुत स्पष्ट रूप से अलग दिखाई नहीं देता, जिससे इसका शरीर एक सुव्यवस्थित धारारेखीय रूप लेता है। इसकी आँखें आकार में छोटी, पूरी तरह काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं। यह संरचना इसके पूर्णतः रात्रिचर होने का प्रमाण है।
इसके दाँत मुँह के ऊपरी भाग में सबसे आगे स्थित होते हैं । ये दाँत नलिकाकार, छोटे (लगभग 1.5 से 2 मिलीमीटर) और स्थिर होते हैं।
वॉल्स करैत मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उपजाऊ और नम मैदानी क्षेत्रों तक सीमित है। इसका भौगोलिक फैलाव निम्नलिखित क्षेत्रों में है: भारत: उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, झारखंड और उत्तराखंड के तराई क्षेत्र।
नेपाल: दक्षिण नेपाल का सम्पूर्ण तराई मैदानी भाग।
बांग्लादेश: पद्मा, मेघना और ब्रह्मपुत्र नदियों के उपजाऊ जलोढ़ मैदानी क्षेत्र।
यह साप सूखे या अत्यधिक पथरीले इलाकों के बजाय नमी और पर्याप्त छिपने की जगह वाले वातावरण को प्राथमिकता देता है: जलोढ़ मिट्टी वाले क्षेत्र, विशेष रूप से धान, गेहूं और गन्ने के खेत जहाँ चूहों और अन्य छोटे जीवों की भरमार होती है। नदियों, नहरों, तालाबों और दलदली इलाकों के निकटवर्ती नम तट। ग्रामीण क्षेत्रों में पुरानी ईंटों के ढेर, मिट्टी की दरारें, गोबर की खाद के गड्ढे, दीमक के पुराने टीले और कच्चे मकानों की दीवारें।
प्रजनन विज्ञान एवं जीवन चक्र: वॉल्स करैत एक अंडज सरीसृप है। इसके संभोग की प्रक्रिया वसंत ऋतु के अंत से ग्रीष्मकाल की शुरुआत (मार्च से मई) के दौरान होती है। शीतनिद्रा की अवधि समाप्त होने के बाद नर और मादा सक्रिय होते हैं। संभोग के पश्चात मादा के शरीर में अंडों का विकास होता है। इस दौरान मादा अधिक नमी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करती है।
मादा एक बार में 6 से 14 चमकदार सफ़ेद, बेलनाकार और लचीले आवरण वाले अंडे देती है। अंडे देने के लिए ऐसी जगह चुनी जाती है जहाँ तापमान स्थिर रहे और नमी का स्तर सही हो—जैसे दीमक के टीले, सड़ी-गली पत्तियों का ढेर या मिट्टी के नीचे बनी दरारें। अंडे देने के बाद मादा अक्सर अंडों के चारों ओर कुंडलबनाकर बैठती है और जब तक अंडे पक नहीं जाते, वह उनकी सुरक्षा करती है।
इंक्यूबेशन की अवधि पर्यावरण के तापमान और आर्द्रता के आधार पर 50 से 65 दिनों की होती है। अंडों से बाहर निकलते समय सपोले लगभग 20 से 26 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। जन्म के प्रथम सेकंड से ही इन सपोलों के पास पूर्ण विकसित विष ग्रंथियाँ और तीखे विषदंत होते हैं। इनका विष रासायनिक रूप से वयस्क सर्प जितना ही घातक और विषैला होता है।
दिन के उजाले में वॉल्स करैत अत्यंत सुस्त, शांत और लगभग निष्क्रिय रहता है। यदि इसे दिन में छेड़ा जाए या धूप के संपर्क में लाया जाए, तो यह आक्रामक होने या काटने के बजाय अपने सिर को अपने ही शरीर के कुंडल के नीचे छिपा लेता है और झटकेदार हरकतें करता है। सूर्यास्त होते ही यह पूरी तरह सक्रिय हो जाता है। रात 10 बजे से तड़के 3 बजे के बीच यह अपने शिकार की तलाश में निकलता है। रात के समय यह अत्यंत सतर्क और तेज़ी से गति करने वाला जीव बन जाता है।
वॉल्स करैत मुख्य रूप से एक ओफ़ियोफेगस जीव है, जिसका अर्थ है कि इसका मुख्य आहार अन्य साप हैं: छोटे गैर-विषैले सर्प (जैसे अंधा साप चेकर्ड कीलबैक), और यहाँ तक कि अपनी ही प्रजाति के छोटे करैत। छोटे कृंतक (चूहे), मेंढक, छिपकलियाँ और अन्य सरीसृपों के अंडे।
वॉल्स करैत अपने शिकार को खोजने के लिए अपनी द्विशाखी जीभ और वोमेरोनेसल अंग का उपयोग करता है, जिससे यह हवा और ज़मीन पर मौजूद रासायनिक गंधों को पहचानता है। शिकार के पास पहुँचने पर यह बिना फन फैलाए या फुंकार मारे तेज़ी से प्रहार करता है और अपने छोटे दाँतों से शिकार को दबोचकर विष इंजेक्ट कर देता है। विष कुछ ही मिनटों में शिकार के तंत्रिका तंत्र को ठप कर देता है, जिससे वह निश्चेष्ट हो जाता है। इसके बाद वॉल्स करैत शिकार को सिर की तरफ से साबुत निगल लेता है।
वॉल्स करैत का विष मुख्य रूप से अत्यधिक शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन्स का जैविक मिश्रण है। इसमें दो मुख्य रासायनिक घटक पाए जाते हैं: प्री-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन (यह विष घटक तंत्रिका छोरों को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है। इसके कारण तंत्रिका आवेगों को आगे भेजने वाले न्यूरोट्रांसमीटर रासायनिक पदार्थ 'एसेटाइलकोलीन' का स्राव पूरी तरह रुक जाता है।
पोस्ट-सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन यह घटक मांसपेशियों के रिसेप्टर्स पर जाकर जुड़ जाता है और बचे-खुचे तंत्रिका संकेतों को मांसपेशियों तक पहुँचने से रोकता है।
वॉल्स करैत के दाँत अत्यधिक छोटे होते हैं। रात के समय जब यह ज़मीन पर या कच्चे मकानों में सोते हुए इंसानों को काटता है: इसके काटने का अहसास केवल एक मच्छर या चींटी के काटने जितना मामूली होता है।
दंश स्थान पर न तो कोई स्थानीय दर्द होता है, ना ही सूजन, लालिमा या बड़ा घाव बनता है।
इस कारण अधिकांश पीड़ित नींद में ही रहते हैं और उन्हें अहसास तक नहीं होता कि उन्हें सर्प ने काटा है। यही कारण है कि इसे "रात का ख़ामोश कातिल" भी कहा जाता है। 0 से 2 घंटे: पेट में हल्का दर्द, उल्टी या जी मिचलाना, गले में हल्की खराश।
2 से 4 घंटे: टोसिस पलकों का भारी होना और गिरना), दोहरी दृष्टि4 से 6 घंटे: बोलने में कठिनाई, थूक न निगल पाना, गर्दन की मांसपेशियों का ढीला पड़ना 6 से 10 घंटे: हाथ-पैरों में पूर्ण पक्षाघात श्वसन मांसपेशियों का ठप होना।10 से अधिक घंटे: रेस्पिरेटरी फेलियर (दम घुटने) के कारण कार्डियक अरेस्ट और मृत्यु भारतीय पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम इसका प्राथमिक और प्रभावी उपचार है। श्वसन पक्षाघात शुरू होने पर रोगी को तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना अनिवार्य होता है, जब तक कि एंटी-वेनम शरीर के विष को बेअसर न कर दे।जीवन काल, मृत्यु के कारण एवं पारिस्थितिक महत्व प्राकृतिक वातावरण में: 10 से 15 वर्ष। संरक्षित वातावरण में: 15 से 18 वर्ष तक। अज्ञानता और भय के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इंसानों द्वारा इसे मार दिया जाना। रात के समय भोजन की तलाश में सड़कें पार करते समय यह वाहनों के नीचे आ जाता है। नेवला चील, बाज, और बड़ा किंग कोबरा इसके मुख्य प्राकृतिक शत्रु हैं। कृषि में अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग और नमी वाले प्राकृतिक आवासों का सूखना।
वॉल्स करैत खाद्य श्रृंखला में एक उच्च-स्तरीय शिकारी की भूमिका निभाता है। यह अन्य साँपों और चूहों की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखता है, जिससे फसलों का बचाव होता है और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बना रहता है।
वॉल्स करैत बनाम कॉमन करैत रीढ़ के शल्क: अत्यधिक बड़े, चौड़े और स्पष्ट षट्कोणीय।
धारियों का पैटर्न: चौड़ी और स्पष्ट दोहरी धारियाँ।
उदर शल्क संख्या: 192 से 208 तक।
प्राकृतिक आवास: अत्यधिक नम, तराई और जलोढ़ क्षेत्र।
मुख्य फैलाव: उत्तर-पूर्वी भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश, नेपाल और बांग्लादेश।
कॉमन करैत: रीढ़ के शल्क: बड़े षट्कोणीय शल्क।
धारियों का पैटर्न: पतली और जोड़े में बनी सफेद धारियाँ।
उदर शल्क संख्या: 194 से 234 तक।
प्राकृतिक आवास: शुष्क और नम दोनों प्रकार के मैदानी क्षेत्र।
मुख्य फैलाव: सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक।
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मालाबार पिट वाइपर
मालाबार पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र में Trimeresurus malabaricus कहा जाता है, वाइपरीडे कुल का एक अत्यंत विशिष्ट और स्थानिक विषधर है। यह केवल भारत के पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखलाओं—महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के घने व नम पर्णपाती जंगलों में ही पाया जाता है। स्थानीय भाषाओं में इसे 'मालाबार हरा सांप' या 'पहाड़ी पिट वाइपर' कहा जाता है।
ऐतिहासिक रूप से, पश्चिमी घाट के स्थानीय आदिवासी और बागान मजदूर इस सांप से बेहद डरते रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह छलावरण का बेजोड़ उस्ताद है। यह मौसम, तापमान और अपने परिवेश के अनुसार अपनी त्वचा का रंग बदलने की क्षमता रखता है, जिससे इसे पहचान पाना लगभग असंभव हो जाता है।
मालाबार पिट वाइपर के दंश का मुख्य शिकार दक्षिण-पश्चिम भारत के वे लोग होते हैं जो पश्चिमी घाट के दुर्गम इलाकों में रहते हैं या काम करते हैं।
भारत में प्रतिवर्ष मालाबार पिट वाइपर के काटने के 3,000 से 5,000 मामले दर्ज किए जाते हैं। ये हादसे मुख्य रूप से कॉफी, चाय, इलायची और सुपारी के बागानों में काम करने वाले मजदूरों और पश्चिमी घाट में ट्रेकिंग करने वाले लोगों के साथ होते हैं।
सही समय पर अस्पताल पहुंचने पर इससे मृत्यु दर 2% से भी कम है। औसतन प्रतिवर्ष इसके कारण 5 से 10 मौतें दर्ज की जाती हैं।
हालांकि इससे मृत्यु दर कम है, लेकिन इसके काटने से ऊतकों का गलना और भयानक सूजन होना एक बड़ी समस्या है। सही इलाज न मिलने पर लगभग 15% मरीजों के काटे गए अंग की मांसपेशियां हमेशा के लिए अक्रिय हो जाती हैं।
यह सांप चाय और इलायची के पौधों की पत्तियों, छोटे पत्थरों के बीच या पगडंडियों के किनारे टहनियों पर बैठा रहता है। मजदूर जब पत्तियां तोड़ते हैं या नंगे पैर वहां से गुजरते हैं, तो अनजाने में इस पर हाथ या पैर पड़ जाता है।
जीवनकाल पश्चिमी घाट के प्राकृतिक और नम वातावरण में इसका औसत जीवनकाल 12 से 16 वर्ष होता है।
यह एक मध्यम आकार का सांप है। व्यस्क नर की लंबाई 60 से 75 सेमी (2 से 2.5 फीट) और मादा की लंबाई 1.05 मीटर (3.5 फीट तक) हो सकती है। इसका वजन लगभग 300 से 700 ग्राम तक होता है।
रंग बदलने का अनूठा छलावरण: इस सांप की रंगत अत्यंत विविधतापूर्ण होती है। एक ही प्रजाति होने के बावजूद यह हरा, पीला, भूरा, नारंगी, मटमैला या पूरी तरह से चॉकलेट रंग का हो सकता है। इसकी पीठ पर भूरे या काले रंग के धब्बों की एक सुंदर ज़िग-ज़ैग श्रृंखला बनी होती है।
इसकी आंख और नथुने के बीच एक अत्यंत संवेदनशील इंफ्रारेड गड्ढा होता है। यह अँधेरे में भी अपने शिकार के शरीर से निकलने वाली ऊष्मा (गर्मी) को भांपकर सटीक प्रहार कर सकता है।
इसका सिर गर्दन से काफी चौड़ा और त्रिकोणीय होता है। इसकी आंखें बिल्ली की तरह लंबवत होती हैं, जो इसके मुख्य रूप से रात में सक्रिय रहने का संकेत देती हैं।
यह मुख्य रूप से चट्टानी नालों के पास, जलप्रपातों के आसपास की झाड़ियों, सदाबहार जंगलों और कृषि बागानों में रहता है। यह जमीन और छोटे पौधों दोनों पर समान रूप से सक्रिय रहता है।
यह एक मांसाहारी शिकारी है। इसके मुख्य आहार में मेंढक (विशेषकर ट्री फ्रॉग), छिपकलियां (गैको), छोटे पक्षी और चूहे शामिल हैं।
इसका मेटाबॉलिज्म धीमा होता है। यह एक बार बड़ा शिकार करने के बाद 10 से 15 दिनों तक बिना कुछ खाए शांत रह सकता है।
यह अपनी पूंछ को टहनी से लपेटकर घंटों बिल्कुल स्थिर बैठता है। जैसे ही कोई शिकार इसके पास से गुजरता है, यह सेकंड के सौवें हिस्से में झपट्टा मारकर अपना जहर उसमें उड़ेल देता है।
यह अंडे देने के बजाय सीधे बच्चों को जन्म देता है।
मादा का गर्भाधान काल लगभग 4 से 5 महीने का होता है। यह मानसून के दौरान (जुलाई से सितंबर) एक समय में 6 से 15 जीवित बच्चों को जन्म देती है।
पैदा होते ही बच्चे शिकार करने और जहर छोड़ने में पूरी तरह सक्षम होते हैं।
मालाबार पिट वाइपर का जहर मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक घटकों का मिश्रण होता है।
यह रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी झिल्ली को तोड़ता है, जिससे अंदरूनी रिसाव होता है।
यह कोशिकाओं और ऊतकों की संरचना को नष्ट करता है, जिससे भयंकर दर्द और सूजन होती है।
डंक मारने वाली जगह पर तुरंत तीखा और असहनीय दर्द शुरू होता है। घाव के आसपास की त्वचा का रंग लाल से बदलकर गहरा नीला या काला होने लगता है।
सूजन बहुत तेजी से पूरे हाथ या पैर में फैल जाती है। काटे गए हिस्से पर पानी और खून से भरे फफोले बनने लगते हैं।
साइटोटॉक्सिन के प्रभाव से डंक के आसपास का मांस गलना शुरू हो जाता है। मरीज को उल्टी, चक्कर आना और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होती है।
यदि अत्यधिक मात्रा में जहर चला जाए, तो शरीर के थक्के जमने का तंत्र प्रभावित हो सकता है, जिससे मसूड़ों और घाव से रक्तस्राव हो सकता है।
भारत में उपलब्ध मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम (ASV) मुख्य रूप से 'बिग फोर' के लिए है। मालाबार पिट वाइपर के जहर पर यह पूर्ण रूप से बेअसर नहीं है, लेकिन इसका असर सीमित होता है।
यदि मरीज में सिस्टमिक लक्षण (अंदरूनी रक्तस्राव या ब्लड प्रेशर में भारी गिरावट) दिखे, तभी डॉक्टर सावधानीपूर्वक ASV का प्रयोग करते हैं।
दर्द कम करने के लिए एनाल्जेसिक दवाएं दी जाती हैं (एस्पिरिन जैसी दवाइयों से बचा जाता है क्योंकि वे खून पतला करती हैं)।
सड़े हुए घाव में संक्रमण रोकने के लिए ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।
यदि डंक वाली जगह का मांस सड़ जाता है, तो सर्जनों द्वारा सड़े हुए ऊतकों को निकालकर सफाई की जाती है ताकि इंफेक्शन न फैले।
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बैम्बू पिट वाइपर
भारत के वनीय क्षेत्रों का अदृश्य, ऊष्मा-संवेदी और हीमोटॉक्सिक विषधर
बैम्बू पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र में Trimeresurus gramineus कहा जाता है, वाइपरिडे कुल के क्रोटेलिने उपकुल का एक अत्यंत विशिष्ट और सुंदर विषधर है। हिंदी में इसे 'हरा बांस सांप', 'बांस का नागा' या मराठी व दक्षिणी भाषाओं में 'हिरवा घोणस' कहा जाता है। 'Trimeresurus' शब्द ग्रीक भाषा के तीन शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है त्रिकोणीय सिर और पूंछ की विशेष बनावट, जबकि का अर्थ घास या हरे वनस्पति रंग से है।
ऐतिहासिक रूप से यह पश्चिमी घाट पूर्वी घाट, मध्य भारत के सतपुड़ा-विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं और दक्षिण भारत के नम पर्णपाती तथा बांस के जंगलों में सदियों से निवास कर रहा है। ग्रामीण और जनजातीय इतिहास में इसे एक 'छलावा' माना जाता रहा है क्योंकि पेड़ों की पत्तियों और बांस की टहनियों के बीच यह इस तरह रच-बस जाता है कि खुली आंखों से इसे देख पाना लगभग नामुमकिन होता है।
बैम्बू पिट वाइपर इंसानों के लिए अत्यंत घातक 'रसेल वाइपर' जितना विनाशकारी तो नहीं है, परंतु इसके डंक मारने की आवृत्ति दक्षिण और मध्य भारत के पहाड़ी व वनीय क्षेत्रों में बहुत अधिक है।
भारत में प्रतिवर्ष बैम्बू पिट वाइपर के काटने के 8,000 से 12,000 मामले दर्ज किए जाते हैं। इनमें से अधिकांश घटनाएं बगान कार्यकर्ताओं (चाय, कॉफी, इलायची), बांस काटने वाले मजदूरों और ट्रेकर्स के साथ होती हैं।
इस सांप के दंश से होने वाली मृत्यु दर 1% से भी कम (अत्यंत कम) है। समय पर प्राथमिक उपचार मिलने पर प्रतिवर्ष इसके कारण होने वाली मौतों की संख्या औसतन 5 से 15 के बीच ही सीमित रहती है।
यद्यपि इससे मृत्यु कम होती है, परंतु इसका जहर डंक मारने वाले अंग को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर देता है। लगभग 20% मामलों में काटे गए हाथ या पैर की उंगलियों में सड़न और स्थायी अपंगता आ जाती है।
यह सांप पेड़ों की डालियों पर इंसान के चेहरे या हाथ के स्तर पर बैठा रहता है। जब कोई मजदूर या यात्री बांस या पत्ती तोड़ते समय अनजाने में इसके पास हाथ ले जाता है, तो यह तुरंत हमला कर देता है।
जंगलों में बैम्बू पिट वाइपर का औसत जीवनकाल 10 से 15 वर्ष होता है। सुरक्षित वातावरण या प्रयोगशालाओं में यह 18 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
यह एक मध्यम आकार का सांप है। व्यस्क नर की लंबाई आमतौर पर 2 फीट (60 सेमी) और मादा की लंबाई 2.5 से 3 फीट (75 से 90 सेमी) तक होती है। इसका वजन काफी हल्का, लगभग 300 से 800 ग्राम तक होता है।
इसका सिर गर्दन की तुलना में बहुत चौड़ा और स्पष्ट रूप से त्रिकोणीय होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी आंख और नथुने के बीच स्थित एक गड्ढा (Pit) है। यह गड्ढा एक अत्यधिक संवेदनशील इंफ्रारेड/हीट-सेंसिंग अंग है, जो 0.003 डिग्री सेल्सियस जितने सूक्ष्म तापमान अंतर को भी भांप लेता है। इसके जरिए यह घुप अंधेरे में भी शिकार के शरीर की गर्मी से उसकी सटीक लोकेशन जान लेता है।
इसकी पीठ का रंग चमकीला तोते जैसा हरा या घास जैसा हरा होता है। पेट का निचला हिस्सा हल्का पीला या मटमैला हरा होता है। इसकी पूंछ का आखिरी सिरा हल्का लाल, जंग के रंग का या भूरा होता है।
इसकी आंखें बिल्ली की तरह लंबवत होती हैं जो मुख्य रूप से रात्रिचर जीवनशैली का संकेत हैं। इसके पास सोलेनोग्लाइफस विषदंत होते हैं—अर्थात इसके लंबे (8 से 10 मिमी) विषदंत मुंह बंद होने पर मुड़कर तालू से चिपक जाते हैं और काटते समय बाहर निकल आते हैं।
यह मुख्य रूप से पेड़ों, झाड़ियों, बांस के झुरमुटों और चाय-कॉफी के बागानों में रहता है। इसकी पूंछ पकड़ बनाने वाली होती है, जिसकी मदद से यह टहनियों को कसकर जकड़ लेता है।
यह मुख्य रूप से छोटे पक्षी, उनके अंडे, मेंढक, छिपकलियां (गैको), और छोटे चूहे खाता है।
इसका मेटाबॉलिज्म धीमा होता है। एक पूर्ण व्यस्क वाइपर को 15 से 20 दिनों में केवल एक बार भोजन (अपने वजन का लगभग 20-30%) करने की आवश्यकता होती है।
यह 'अंबुश शिकारी' है। यह टहनी पर घंटों स्थिर बैठकर शिकार के गुजरने का इंतजार करता है। जैसे ही कोई शिकार पास आता है, यह अपनी इंफ्रारेड पिट से उसकी गर्मी भांपकर सेकंड के सौवें हिस्से में प्रहार कर देता है।
बैम्बू पिट वाइपर अन्य सामान्य सांपों की तरह अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे बच्चों को जन्म देता है।
मादा के शरीर के भीतर ही अंडे विकसित होते हैं। वर्षा ऋतु (जुलाई से अक्टूबर) के दौरान मादा एक समय में 6 से 11 जीवित बच्चों को जन्म देती है।
जन्म के समय बच्चे लगभग 15 से 20 सेमी लंबे होते हैं और पैदा होते ही शिकार करने तथा जहर छोड़ने में पूरी तरह सक्षम होते हैं।
बैम्बू पिट वाइपर का जहर मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक घटकों का मिश्रण है।
यह कोशिकाओं की झिल्ली को नष्ट करता है और भयानक सूजन पैदा करता है।
यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों को तोड़कर अंदरूनी रक्तस्राव उत्पन्न करता है।
यह रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को गड़बड़ा देता है।
काटने के तुरंत बाद सुई चुभने जैसा तीखा दर्द होता है, जो धीरे-धीरे असहनीय जलन में बदल जाता है। डंक के स्थान पर तेजी से नीले रंग का घेरा बनने लगता है।
सूजन तेजी से पूरे हाथ या पैर में फैल जाती है। काटे गए स्थान से मटमैला खून और पानी जैसा तरल रिसना शुरू हो जाता है।
घाव के आसपास की त्वचा काली पड़ने लगती है मरीज को उल्टी, चक्कर आना और डंक वाले स्थान के आसपास की लसीका ग्रंथियों में तेज दर्द अनुभव होता है।
यदि जहर सीधे किसी बड़ी नस में चला जाए, तो शरीर के अंदरूनी हिस्सों से रक्तस्राव और गुर्दे पर दबाव बढ़ सकता है।
बैम्बू पिट वाइपर के दंश के इलाज में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य को समझना बेहद जरूरी है:
भारत में निर्मित मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम (ASV) मुख्य रूप से 'बिग फोर' (नाग, करैत, रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर) के लिए बनाया जाता है। यह बैम्बू पिट वाइपर के विष पर पूर्णतः सटीक काम नहीं करता, लेकिन गंभीर मामलों में क्रॉस-न्यूट्रलाइजेशन के लिए इसका सीमित उपयोग किया जाता है।
चूंकि इसका जहर ज्यादातर स्थानीय सूजन और दर्द पैदा करता है, इसलिए डॉक्टर मुख्य रूप से दर्द निवारक (Paracetamol - NSAIDs जैसे एस्पिरिन से बचा जाता है क्योंकि वे रक्तस्राव बढ़ाती हैं) और सूजन कम करने वाली दवाएं देते हैं।
घाव में सड़न या बैक्टीरियल इन्फेक्शन को रोकने के लिए व्यापक स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।
गंभीर एलर्जिक रिएक्शन और ऊतकों के विनाश को रोकने के लिए दिया जाता है।
अत्यधिक सूजन के कारण जब हाथ-पैर में खून का दौरा बंद होने लगता तो डॉक्टर सर्जिकल चीरा लगाकर दबाव कम करते हैं।
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वाइट-लिप्ड पिट वाइपर
वाइट-लिप्ड पिट वाइपर एशियाई हरी पिट वाइपर प्रजातियों में सबसे महत्वपूर्ण, व्यापक और जटिल सरीसृपों में से एक है। यह जीव वाइपरिडे परिवार के क्रोटेलिने उप-कुल के अंतर्गत आता है। इसके जन्म के प्रथम क्षण से लेकर वृद्धावस्था और मृत्यु तक, इसके शरीर रचना, कोशिकीय स्तर पर विष की क्रियाविधि, शिकार की बायोमैकेनिक्स और जीवन चक्र का एक-एक बिंदु यहाँ पूर्ण गहराई के साथ प्रस्तुत है।
लाखों वर्षों के उद्विकास के दौरान इस सर्प ने अपने डीएनए संरचना में ऐसे परिवर्तन किए, जिससे यह जमीन के बजाय वृक्षीय जीवन में महारत हासिल कर सके। इसके शल्कों का ढांचा और शरीर का आकार इस तरह विकसित हुआ कि यह पेड़ों की टहनियों पर अपने वजन को समान रूप से बांट सके। इसकी रीढ़ की हड्डी के कशेरुक अत्यधिक लचीले होते हैं, जो इसे हवा में 180 डिग्री तक मुड़ने की क्षमता देते हैं।
इसके थूथन के निचले हिस्से से लेकर गर्दन तक फैली सफेद/हल्की पीली पट्टी केवल सुंदरता के लिए नहीं है। यह छलावरण का कार्य करती है, जो पत्तियों के बीच से छनकर आने वाली रोशनी में इसके सिर की रूपरेखा को तोड़ देती है, जिससे शिकार या शिकारी इसके सिर को पहचान नहीं पाते। नथुने और आंख के बीच स्थित लोरिएल पिट के भीतर एक पतली तापीय झिल्ली होती है, जो त्रि-आयामी (3D) इंफ्रारेड चित्र बनाती है।
यह अंग 0.003°C से भी सूक्ष्म तापीय परिवर्तन को भांप लेता है।
जब कोई चूहा या पक्षी पास से गुजरता है, तो उसके शरीर की गर्मी इस झिल्ली पर पड़ती है, और तंत्रिकाएंसीधे मस्तिष्क के ऑप्टिक टेक्टम को संदेश भेजती हैं। सर्प आंखें बंद होने पर भी शिकार की सटीक दूरी और आकार देख सकता है।
इसकी आंख में सुनहरी-पीली परितारिका होती है। दिन के समय इसकी वर्टिकल पुतली लेंस को अत्यधिक प्रकाश से बचाती है, जबकि रात में यह पूरी तरह गोल होकर उपलब्ध न्यूनतम प्रकाश को अवशोषित करती है।
इसकी लाल-भूरी पूंछ में विशेष मांसपेशियों का जाल होता है।
यह पूंछ टहनी के चारों ओर एक मजबूत शिकंजा बना सकती है। यह सर्प को केवल अपनी पूंछ के सहारे पूरा शरीर हवा में लटकाकर शिकार पर झपट्टा मारने की अनुमति देती है।
वाइट-लिप्ड पिट वाइपर का विष केवल एक रसायन नहीं, बल्कि कई एंजाइमों और प्रोटीनों का एक विनाशकारी जैविक कॉकटेल है:
इसके ऊपरी जबड़े में दो बड़े, खोखले विषदंत होते हैं जो हिंज की तरह काम करते हैं।
आराम की स्थिति में ये दांत मुंह की छत के समानांतर मुड़े रहते हैं। काटते समय, इसके ऊपरी जबड़े की हड्डियां90 डिग्री के कोण पर घूमती हैं, जिससे दांत सीधे बाहर निकल आते हैं और इंजेक्शन की तरह विष को गहराई में मांसपेशियों तक पहुंचा देते हैं।
यह एंजाइम रक्त वाहिकाओं की दीवारों को घोल देता है, जिससे पूरे शरीर में अंदरूनी रक्तस्राव शुरू हो जाता है।
यह रक्त के फ़ाइब्रिनोजेन पर हमला करके उसे छोटे-छोटे बेकार थक्कों में बदल देता है, जिससे शरीर का सारा थक्का बनाने वाला तत्व खत्म हो जाता है और रक्त पूरी तरह से पानी जैसा पतला हो जाता है यह कोशिकाओं की बाहरी झिल्ली को नष्ट करता है, जिससे तीव्र सूजन, दर्द और दंश स्थान के आसपास के ऊतक गलना शुरू हो जाते हैं।
0 से 15 मिनट: दंश स्थान पर अत्यंत तीव्र जलन, सूजन और घाव से लगातार खून बहना।
1 से 6 घंटे: सूजन बढ़कर पूरे हाथ या पैर में फैल जाती है। त्वचा नीली-काली पड़ने लगती है और खून से भरे छाले बनने लगते हैं। मसूड़ों, नाक और पेशाब में खून आने लगता है। यदि विष की मात्रा अधिक हो और इलाज न मिले, तो आंतरिक रक्तस्राव, रक्तचाप में गिरावट और गुर्दे की विफलता हो सकती है।
इस सर्प का मेटाबॉलिज्म अत्यंत धीमा होता है। यह एक बार अपने वजन का 30% भोजन पचाने के लिए अपनी शारीरिक ऊर्जा का उपयोग करता है। भोजन निगलने के बाद इसके शरीर का तापमान और आंतरिक अंग (जैसे जिगर और आंतें) अस्थायी रूप से बड़े हो जाते हैं ताकि भोजन जल्दी पच सके।
यह बांस के झुरमुटों में खुद को 'S' शेप में मोड़कर घंटों स्थिर रहता है। कम उम्र के सर्प अपनी लाल-भूरी पूंछ के सिरे को किसी कीड़े या इल्ली की तरह हिलाते हैं। जैसे ही कोई मेंढक इसे खाने आता है, वाइपर सेकंड के 1/20वें हिस्से में उस पर वार कर देता है। पेड़ों पर पक्षी या छिपकली को पकड़ते समय यह विष इंजेक्ट करके शिकार को हवा में ही टांग कर रखता है, ताकि वह जमीन पर गिरकर गायब न हो जाए।
यह अंडों के बजाय सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है। मादा के शरीर के भीतर एक विशेष प्लेसेंटा जैसी संरचना होती है, जो भ्रूण को ऑक्सीजन और पोषण प्रदान करती है।
संभोग के बाद मादा 4 से 6 महीने तक पेट में भ्रूण का पोषण करती है। मानसून (जून-सितंबर) के दौरान मादा 7 से 16 जीवित बच्चों को जन्म देती है।
जन्म के समय शिशु 18 से 24 सेमी लंबे होते हैं।
जन्म के पहले मिनट से ही इनके विषदंत पूर्णतः विकसित होते हैं और विष की तीव्रता वयस्कों के बराबर होती है। जंगली वातावरण में इनका जीवनकाल 10 से 12 वर्ष का होता है।
उम्र बढ़ने के साथ इनकी त्वचा का हरा रंग थोड़ा मंद पड़ जाता है और शिकार करने की गति धीमी हो जाती है।
क्रस्टेड साप चील, बड़े उल्लू, किंग कोबरा, बान्डेड क्रेट और नेवले इनका मुख्य शिकार करते हैं।
मैंग्रोव और बांस के जंगलों की कटाई। चाय बागानों में अनजाने में पैर पड़ जाने पर डंक मारने के कारण डरवश इंसानों द्वारा मार दिया जाना। अत्यधिक नमी के कारण त्वचा में फंगल इंफेक्शन और श्वास संबंधी परजीवियों का फैलना।
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रेड-टेल्डपिट वाइपर
वैज्ञानिक नाम ट्राइमेरेसुरस एरिथ्रुरस दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के घने जंगलों, मैंग्रोव और दलदली इलाकों में पाया जाने वाला एक अत्यंत विषैला सांप है। यह विषैले सांपों के विपेरिडे परिवार और क्रोटालिनाए उप-परिवार से संबंध रखता है।
इस प्रजाति की सबसे प्रमुख पहचान इसकी चमकीली हरी काया और उसकी पूंछ का लाल-भूरा या ईंट जैसा रंग है। नीचे इसकी जीवन शैली, जहर, शिकार करने के तरीके और पारिस्थितिक तंत्र से जुड़ी हर बारीक जानकारी दी गई है।
रेड-टेल्ड पिट वाइपर मध्यम आकार का विषैला सांप है, जिसकी शारीरिक बनावट इसे मुख्य रूप से पेड़ों और झाड़ियों पर रहने के लिए अनुकूल बनाती है।
इसका सिर चौड़ा, चपटा और स्पष्ट रूप से त्रिकोणीय होता है, जो गर्दन से अलग दिखाई देता है। यह त्रिकोणीय आकार जहर की ग्रंथियों की उपस्थिति के कारण होता है।
इसकी आंखें मध्यम आकार की होती हैं और पुतलियां लंबवत होती हैं, जो इसे कम रोशनी और रात के अंधेरे में शिकार तलाशने में मदद करती हैं।
इसकी नासिका और आंख के बीच एक संवेदनशील गड्डा होता है। इसे 'पिट' कहते हैं। यह अंग आसपास के जीवों के शरीर की गर्मी को भांप लेता है।
शरीर का रंग आमतौर पर गहरा हरा या हल्का चमकीला हरा होता है। पेट की तरफ का हिस्सा हल्का पीलापन लिए हरा होता है।
इसकी पूंछ का अंतिम हिस्सा लाल, ईंट जैसा भूरा या नारंगी होता है। यह पूंछ पकड़ बनाने वाली होती है, जिससे यह टहनियों को मजबूती से लपेटकर पकड़ सकता है।
वयस्क नर आमतौर पर 50 से 60 सेमी लंबे होते हैं, जबकि मादाएं आकार में बड़ी होती हैं और 75 सेमी से लेकर 1 मीटर (लगभग 100 सेमी) तक बढ़ सकती हैं।
रेड-टेल्ड पिट वाइपर मुख्य रूप से आर्द्र, उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
पूर्वोत्तर भारत के राज्यों (जैसे असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल के तराई इलाकों) में पाया जाता है।
विशेष रूप से सुंदरबन मैंग्रोव और चटगाँव के पहाड़ी वन क्षेत्रों में।
देश के तटीय और मध्य जंगलों में इसकी भारी उपस्थिति है।
यह सांप मुख्य रूप से एक वृक्षीय जीव है, जिसका अर्थ है कि यह अपना अधिकांश जीवन पेड़ों, झाड़ियों, बांस के झुंडों और घनी वनस्पतियों पर बिताता है। यह तटीय मैंग्रोव जंगलों (जैसे सुंदरबन) और नदी के किनारे वाले दलदली इलाकों में सबसे ज्यादा पाया जाता है। यह आमतौर पर समुद्र तल से लेकर 1,000 से 1,200 मीटर की ऊंचाई वाले पहाड़ी वनों तक पाया जाता है। जंगलों की कटाई के कारण यह कभी-कभी चाय के बागानों, खेत-खलिहानों और गांवों से सटे झाड़ीदार इलाकों में भी देखा जाता है।
रेड-टेल्ड पिट वाइपर की जीवन शैली धैर्य, घात लगाने और उत्कृष्ट छलावरण पर आधारित है। यह मुख्य रूप से निशाचर जीव है। दिन के समय यह पेड़ों की घनी पत्तियों या टहनियों के बीच चुपचाप कुंडली मारकर बैठा रहता है। इसका हरा रंग इसे पत्तियों के बीच इस तरह छिपा देता है कि किसी इंसानी आंख या शिकार के लिए इसे देखना लगभग असंभव हो जाता है। शाम ढलते ही यह सक्रिय हो जाता है और शिकार की तलाश में टहनियों पर नीचे की ओर लटकता है। यह सक्रिय रूप से शिकार का पीछा नहीं करता, बल्कि घात लगाकर हमला करता है।
जब कोई छोटा जीव पास से गुजरता है, तो चेहरे पर मौजूद थर्मल पिट्स उस जीव की शारीरिक गर्मी को दर्ज कर लेते हैं। घने अंधेरे में भी यह पिट अंग की मदद से शिकार की सटीक दूरी और आकार का अंदाजा लगा लेता है। यह अपने शरीर के अगले हिस्से को 'S' आकार में मोड़कर बहुत तेज गति से हमला करता है। इसके दो लंबे, खोखले दांत शिकार की त्वचा में धंसते हैं और जहर की ग्रंथि से सीधे शिकार के ऊतकों में ज़हर इंजेक्ट कर देते हैं।
रेड-टेल्ड पिट वाइपर एक मांसाहारी जीव है। इसके आहार में शामिल हैं: छोटे स्तनधारी (चूहे, छछूंदर)
मेंढक और पेड़ पर रहने वाले ट्री-फ्रॉग छोटी छिपकलियां और गेको कभी-कभी छोटे पक्षी और उनके अंडे
रेड-टेल्ड पिट वाइपर का जहर जैविक रूप से अत्यंत जटिल मिश्रण है, जो मुख्य रूप से हेमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक होता है।
हेमोटॉक्सिन यह जहर रक्त कोशिकाओं को नष्ट करता है, थक्के जमने की प्रक्रिया को बिगाड़ देता है और शरीर के भीतर अंदरूनी रक्तस्राव पैदा करता है।
साइटोटॉक्सिन यह ऊतकों और कोशिकाओं को तेजी से गलाना और नष्ट करना शुरू कर देता है, जिससे काटी गई जगह पर नेक्रोसिस हो जाता है।
यदि यह सांप किसी इंसान को काट ले, तो निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं: तुरंत (0-15 मिनट)काटी गई जगह पर तीव्र दर्द, जलन और तेजी से सूजन का बढ़ना। 1 से 3 घंटेकाटी गई जगह की त्वचा का काला या नीला पड़ना और लगातार खून का बहना। 3 से 12 घंटेमसूड़ों से खून आना, उल्टी में खून आना, ब्लड प्रेशर का तेजी से गिरना। गंभीर स्थितिसमय पर इलाज न मिलने पर किडनी फेलियर और शरीर के अंदर भारी रक्तस्राव। हालांकि इसका जहर दर्दनाक होता है, लेकिन सही समय पर चिकित्सीय देखभाल मिलने पर यह आमतौर पर जानलेवा साबित नहीं होता। इसकी मृत्यु दर कोबरा या करैत की तुलना में कम है।
लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है कि पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों या चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूर अक्सर पेड़ों की टहनियों को छांटते समय गलती से इसे छू लेते हैं, जिससे यह रक्षात्मक होकर काट लेता है।
रेड-टेल्ड पिट वाइपर की प्रजनन प्रणाली इसे कई अन्य सांपों से अलग बनाती है। यह सांप अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे बच्चों को जन्म देता है। मादा अपने शरीर के भीतर ही अंडों को विकसित करती है और जब बच्चे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं, तो वह उन्हें जन्म देती है। इनका प्रजनन काल आमतौर पर मानसून के मौसम (मई से सितंबर) के आसपास होता है। एक मादा एक बार में 6 से 20 बच्चों को जन्म दे सकती है। जन्म के समय बच्चे लगभग 15 से 20 सेमी लंबे होते हैं। जन्म से ही इनके अंदर जहर ग्रंथि और विषैले दांत पूरी तरह कार्यशील होते हैं, जिसका अर्थ है कि नवजात बच्चा भी उतना ही विषैला होता है जितना कि वयस्क सांप। रेड-टेल्ड पिट वाइपर खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चूहों और अन्य कुतरने वाले जीवों की आबादी को नियंत्रित रखता है, जिससे फसलों को नुकसान होने से बचाव होता है। यह खुद बड़े पक्षियों (जैसे चील और बाज) तथा बड़े सांपों (जैसे किंग कोबरा) का भोजन बनता है।
IUCN (International Union for Conservation of Nature) की रेड लिस्ट में इसे कम से कम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, निम्नलिखित कारणों से इसकी स्थानीय आबादी पर दबाव बढ़ रहा है: मैंग्रोव जंगलों की कटाई और शहरीकरण। अज्ञानता और डर के कारण इंसानों द्वारा इन्हें देखाते ही मार दिया जाना।
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हिमालयन पिट वाइपर
मध्य एवं पश्चिमी हिमालय की बर्फीली चोटियों, चीड़ के जंगलों और उच्च पर्वतीय ढलानों का तापीय-संवेदी हीमोटॉक्सिक विषधर हिमालयन पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र की अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण प्रणाली में (ग्लोयडियस हिमालयानस) कहा जाता है, वाइपरिडे कुल के 'क्रोटालिने' उप-कुल का एक अत्यंत विशिष्ट और शीतल-सहनशील पर्वतीय विषधर है।
वंश नाम (Gloydius): यह नाम अमेरिकी सरीसृप-विज्ञानी डॉ. हॉवर्ड के. ग्लोयड के सम्मान में दिया गया है, जिन्होंने पिट वाइपर प्रजातियों के वर्गीकरण पर ऐतिहासिक काम किया था। यह इसके भौगोलिक मूल स्थान—महान हिमालय पर्वत शृंखला—को दर्शाता है।
19वीं सदी के मध्य में (वर्ष 1864 में) प्रसिद्ध ब्रिटिश प्राणीशास्त्री अल्बर्ट गुंथर ने शिमला और आसपास की हिमालयी पहाड़ियों से एकत्रित किए गए नमूनों के आधार पर पहली बार इसका वैज्ञानिक वर्णन किया था। शुरुआत में इसे Ancistrodon या Agkistrodon वंश में रखा गया था, लेकिन 20वीं सदी के अंत में जब जीनोमिक अध्ययन और शल्क-संरचना के सूक्ष्म अंतर सामने आए, तो इसे एशियाई पिट वाइपर के समर्पित वंश में स्थानांतरित कर दिया गया।
हिमालयन पिट वाइपर विश्व के सबसे ऊंचे स्थानों पर पाए जाने वाले सांपों में से एक है:
भारत: जम्मू और कश्मीर, लद्दाख के निचले वैली क्षेत्र, हिमाचल प्रदेश (कुल्लू, मनाली, शिमला, चंबा), उत्तराखंड (गढ़वाल और कुमाऊं मंडल)।
अंतरराष्ट्रीय फैलाव: उत्तरी पाकिस्तान की हजारा व स्वात घाटियां और पश्चिमी नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र।
यह मुख्य रूप से समुद्र तल से 1,500 मीटर से 4,900 मीटर (5,000 से 16,000 फीट) की अत्यधिक ऊंचाई तक पाया जाता है। वृक्ष-रेखा के ऊपर, जहाँ बर्फ जमा रहती है, वहाँ भी पत्थरों के नीचे यह जीवित रहने में सक्षम है।
अत्यधिक विषम और ठंडे पर्वतीय जलवायु में हिमालयन पिट वाइपर का औसत जीवनकाल 12 से 16 वर्ष होता है। लंबी शीतनिद्रा के कारण इनका मेटाबॉलिज्म धीमा रहता है, जिससे ये लंबी आयु प्राप्त करते हैं। यह एक मध्यम आकार का, भारी और सुगठित स्थलीय सांप है।
एक स्वस्थ वयस्क की लंबाई 45 सेमी से 65 सेमी (लगभग 1.5 से 2.2 फीट) होती है। कुछ दुर्लभ बड़े नमूने 85 सेमी से 90 सेमी (लगभग 3 फीट) तक दर्ज किए गए हैं। इसका वजन 120 ग्राम से 300 ग्राम के बीच होता है।
इसका आधार रंग भूरा, मटमैला जैतून या भूरा-ग्रे होता है। इसके पीठ पर गहरे भूरे या काले रंग के चौकोर/आड़े धब्बों का पैटर्न होता है।
यह रंग-रूप सूखी पत्तियों, चीड़ की सुइयों काई और ग्रेनाइट पत्थरों के बीच इसे पूरी तरह अदृश्य बना देता है। इसका निचला भाग मटमैला सफेद, पीलापन लिए हुए या धब्बेदार काला होता है।
इसका सिर गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग, चौड़ा और भाले के फलक जैसा त्रिकोणीय होता है। सिर के ऊपरी हिस्से पर बड़ी ढाल जैसी शल्कें होती हैं।
आंखें मध्यम आकार की होती हैं, जिनमें सीधी ऊर्ध्वाधर पुतली होती है, जो रात के अंधेरे में शिकार ढूँढने में मदद करती है।
आंख और नथुने के बीच एक गहरा गड्डा होता है। यह एक उच्च-क्षमता वाला थर्मो-रिसेप्टर अंग है, जो आसपास के जीवों के शरीर से निकलने वाली इंफ्रारेड गर्मी को भांपकर रात के अंधेरे में शिकार का सटीक खाका बनाता है।
इसके ऊपरी जबड़े में दो तीखे, खोखले और हिंग वाले विषदंत होते हैं। मुंह बंद रहने पर ये पीछे मुड़ जाते हैं और हमला करते समय 180 डिग्री के कोण पर सीधे बाहर निकल आते हैं।
यह देवदार, चीड़ और ओक के पर्वतीय वनों, ढलानों, चट्टानी पत्थरों के ढेरों और पहाड़ी खेती के किनारों पर रहता है।
पसंद: ठंडा पर्वतीय तापमान (10°C से 22°C), शुष्क पत्थरों के नीचे की दरारें, और सुबह की हल्की धूप।
नापसंद: अत्यधिक गर्मी (30°C से अधिक), सीधा पानी का जमाव और तेज शोरगुल। अक्टूबर से मार्च के दौरान, जब हिमालय में बर्फबारी होती है, यह सांप पत्थरों की गहराई या बिलों में चला जाता है और 5-6 महीने तक पूरी तरह निष्क्रिय होकर सोता रहता है।
वसंत और गर्मी के मौसम में यह सुबह के समय पत्थरों पर बैठकर धूप सेकता है ताकि अपने शरीर का तापमान बढ़ा सके। दोपहर की गर्मी में यह पत्थरों के नीचे छिपता है और शाम/रात के समय शिकार के लिए निकलता है।
पहाड़ी चूहे छोटी छिपकलियों और जमीन पर घोंसला बनाने वाले छोटे पक्षी।
द्वितीयक आहार: छोटे मेंढक और कभी-कभार कीड़े-मकोड़े।
यह शिकार का पीछा करने के बजाय किसी पत्थर या पत्तियों के ढेर में छिपकर बैठ जाता है। जैसे ही कोई चूहा या छिपकली पास से गुजरती है, यह लोरियल पिट से उसकी गर्मी महसूस करता है और स्प्रिंग की तरह झपटकर डंक मारता है। यह शिकार को तुरंत छोड़ देता है और जहर के असर से शिकार के शांत होने के बाद उसकी गंध को ट्रैक करके उसे निगल लेता है।
शीतनिद्रा से बाहर निकलने के बाद (अप्रैल से मई) इनका संभोग काल होता है।
अंडे न देकर सीधे बच्चों को जन्म देना: अत्यधिक ठंड के कारण अंडे बाहर सुरक्षित नहीं रह सकते, इसलिए यह प्रजाति ओवोविविपारस है। मादा के शरीर के भीतर ही भ्रूण का विकास होता है।
जन्म प्रक्रिया: जुलाई से सितंबर के बीच मादा 4 से 10 पूर्ण विकसित बच्चों को जन्म देती है।
जन्म के समय बच्चे 13 से 16 सेमी लंबे होते हैं और जन्म के पहले पल से ही आत्मनिर्भर, विषैले और शिकार करने में सक्षम होते हैं।
पहाड़ी इलाकों में इसके काटने के प्रतिवर्ष लगभग 100 से 250 मामले दर्ज किए जाते हैं। ये हादसे मुख्य रूप से मवेशी चराने वाले चरवाहों, जड़ी-बूटी इकट्ठा करने वाले स्थानीय ग्रामीणों और ट्रैकिंग करने वाले पर्यटकों के साथ होते हैं। यह स्वभाव से शांत और शर्मीला सांप है। जब तक इस पर सीधे पैर न पड़े या इसे पकड़ा न जाए, यह डंक नहीं मारता। इसके काटने से मृत्यु की संभावना काफी कम (1% से 3%) होती है, लेकिन यह शरीर को गंभीर स्थानीय नुकसान पहुंचा सकता है।
हिमालयन पिट वाइपर का विष मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक होता है
स्नेक वेनम मेटलोप्रोटीनेसेज (SVMPs): यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों को नुकसान पहुँचाता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव होता है।
प्रोटोलाइटिक एंजाइम्स: यह कोशिकाओं और ऊतकों को तोड़ता है।
प्रोथ्रोम्बिन एक्टिवेटर्स: यह रक्त के प्राकृतिक थक्का जमने के तंत्र को बाधित करता है। इसका विषैलापन लगभग 1.2 mg/kg से 2.0 mg/kg के बीच होता है।
यह जहर नाग या करैत की तुलना में कम मारक है, लेकिन यह काटे गए स्थान के आसपास के मांस को गलाने की पूरी क्षमता रखता है।
डंक मारते ही भयानक जलन, असहनीय दर्द और सूजन शुरू होती है। घाव के आसपास की त्वचा नीली-काली पड़ने लगती है और छाले निकल आते हैं। मसूड़ों से हल्का खून आना, चक्कर आना और ब्लड प्रेशर गिरना। यदि सही इलाज न मिले, तो घाव में सड़न हो सकती है।
भारत में निर्मित मानक पॉलीवैलेंट ASV इस प्रजाति के खिलाफ आंशिक रूप से ही काम करता है। हालांकि गंभीर लक्षणों में डॉक्टर ASV का उपयोग करते हैं।
एंटीबायोटिक्स, पेनकिलर्स (एस्पिरिन को छोड़कर) और घाव की सफाई। यदि रक्तस्राव नियंत्रित न हो, तो प्लाज्मा या प्लेटलेट्स दिए जाते हैं। मरीज को शांत रखें और प्रभावित अंग को लकड़ी या पट्टी से पूरी तरह स्थिर करें।
कोई टाइट पट्टी न बांधें और न ही घाव पर चीरा लगाएं।
मरीज को तुरंत नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाएं।
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पोप्सपिट वाइपर
पोप्स पिट वाइपर विशाल एशियाई हरी पिट वाइपर प्रजातियों में सबसे अद्वितीय, रहस्यमयी और विषैले वृक्षाश्रयी (पेड़ों पर रहने वाले) सर्पों में गिना जाता है। इस सर्प का नाम प्रसिद्ध अमेरिकी सरीसृप विज्ञानी क्लिफोर्ड एच. पोप और उनकी पत्नी सारा एच. पोप के सम्मान में रखा गया था। यह सर्प वाइपरिडे परिवार के क्रोटेलिने उप-कुल का सदस्य है। जन्म के क्षण से लेकर वृद्धावस्था और मृत्यु तक, इसके जीवन के प्रत्येक पहलू का वैज्ञानिक और गहन विवरण यहाँ दिया गया है।
उद्विकास के दृष्टिकोण से, यह प्रजाति उच्च आर्द्रता वाले पर्वतीय वनों में रहने के लिए अनुकूलित हुई है। इसके डीएनए संरचना में और जैसे निकटवर्ती वाइपरों से भिन्नता पाई जाती है, विशेषकर इसके शरीर के मध्य भाग में उपस्थित 21 पंक्तियों वाले शल्कों और जननांग की बनावट में।
इसका सिर पीछे की ओर अत्यधिक चौड़ा और आगे की ओर नुकीला (त्रिकोणीय) होता है, जो गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देता है। इसकी आंखें गहरी लाल या नारंगी-लाल रंग की होती हैं (वयस्क चरण में) और इनकी पुतलियां लंबवत होती हैं, जो इसे रात के अंधेरे में उत्कृष्ट दृष्टि प्रदान करती हैं।
नथुने और आंख के ठीक मध्य में स्थित 'लोरिएल पिट' एक अत्याधुनिक तापीय संवेदक अंग है। यह अंग 0.003 डिग्री सेल्सियस तक के सूक्ष्म तापमान अंतर और गर्म खून वाले शिकार (जैसे स्तनधारी या पक्षी) से निकलने वाली इंफ्रारेड तरंगों को पहचान सकता है। यह क्षमता इसे बिना किसी प्रकाश के भी सटीक दूरी पर हमला करने योग्य बनाती है।
मादा का शरीर तोते जैसा चमकीला चूने जैसा हरा होता है, और इसके शरीर के निचले हिस्से (पेट की रेखा) पर एक पतली सफेद पट्टी होती है।
नर का रंग अधिक गहरा घास जैसा हरा होता है। नर के सिर से लेकर पेट के निचले हिस्से तक दोहरे रंग की एक स्पष्ट रेखा होती है (ऊपर सफेद और नीचे लाल/नारंगी)।
इसकी पूंछ का अंतिम भाग पार्श्व रूप से चपटा, अत्यधिक लचीला और जंग लगे लोहे जैसे लाल-भूरे रंग का होता है। यह पूंछ पेड़ों की पतली से पतली टहनी को भी शिकंजे की तरह जकड़ सकती है।
एक पूर्ण वयस्क की कुल लंबाई 77 से 90 सेंटीमीटर तक होती है। मादाएं शारीरिक रूप से भारी और लंबी होती हैं।
उत्तर-पूर्वी राज्य—असम (खासी पहाड़ियों की ऐतिहासिक सीमाएँ), मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग क्षेत्र।
उत्तरी म्यांमार, उत्तर व उत्तर-पश्चिम थाईलैंड, लाओस, वियतनाम और मलेशियाई प्रायद्वीप के पर्वतीय क्षेत्र।
यह मुख्य रूप से समुद्र तल से 500 से 2,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सदाबहार पर्वतीय वर्षावनों में निवास करता है।
इसे पानी की अत्यधिक आवश्यकता होती है, इसलिए यह अक्सर ठंडे पहाड़ी झरनों, बांस के घने झुरमुटों और झाड़ियों में धरातल से 1 से 4 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है।
यह सर्प अंडे नहीं देता। मादा के शरीर के अंदर ही भ्रूण का पोषण होता है। संभोग की प्रक्रिया शरद ऋतु में होती है, जिसके बाद गर्भावस्था लगभग 5 से 6 महीने तक चलती है।
भारत और थाईलैंड के क्षेत्रों में मादाएं वसंत और मानसून की शुरुआत (अप्रैल से जून) में बच्चों को जन्म देती हैं।
एक मादा एक बार में औसतन 10 से 15 जीवित बच्चों को जन्म देती है।
नवजात शिशु जन्म लेते ही लगभग 18 सेंटीमीटर (7 इंच) लंबे होते हैं।
नवजात बच्चों का रंग वयस्कों से थोड़ा भिन्न हो सकता है और उनकी आंखें गहरी लाल नहीं होतीं।
जन्म के प्रथम मिनट से ही शिशु के पास पूरी तरह से विकसित खोखले विषदंत और सक्रिय विष ग्रंथियां होती हैं। इनका विष वयस्क के विष जितना ही हीमोटॉक्सिक होता है।
यह साप एक सख्त मांसाहारी जीव है। इसके मुख्य भोजन में ट्री-फ्रॉग (वृक्षीय मेंढक), छिपकलियां (विशेष रूप से गीको), छोटे चूहे, गिलहरियां और पेड़ों पर घोंसला बनाने वाले छोटे पक्षियों के बच्चे शामिल हैं। एक वयस्क सर्प को अपनी उपापचयी क्रियाओं को बनाए रखने के लिए 10 से 20 दिनों में केवल एक बार पर्याप्त भोजन की आवश्यकता होती है।
यह केवल निष्क्रिय रूप से बैठकर प्रतीक्षा नहीं करता। जब कोई मेंढक या छिपकली इसके पास होती है, तो यह अपनी लाल-भूरी पूंछ के सिरे को किसी केंचुए या इल्ली की तरह धीरे-धीरे हिलाता है। शिकार इस पूंछ को भोजन समझकर आगे बढ़ता है और वाइपर का शिकार बन जाता है।
शिकार के करीब आते ही यह अपने शरीर को 'S' आकार में मोड़कर सेकंड के 1/20वें हिस्से में वार करता है। यह शिकार को काटकर तुरंत छोड़ देता है ताकि शिकार इसे नुकसान न पहुंचा सके। विष के कारण जब शिकार कुछ ही दूरी पर दम तोड़ देता है, तो यह अपनी जीभ से रसायनों को सूंघकर शिकार तक पहुंचता है और उसे सिर की तरफ से पूरा निगल जाता है।
हालिया उच्च-स्तरीय प्रोटिओमिक अध्ययनों से पोप्स पिट वाइपर के विष के जटिल प्रोटीन घटकों का पता चला है:
इसके ऊपरी जबड़े में और खोखले विषदंत होते हैं, जो सामान्य स्थिति में मुंह की छत से चिपके रहते हैं और काटते समय 90 डिग्री पर बाहर निकल आते हैं।
स्नेक वेनम मेटलॉप्रोटीनिएसिस (SVMP - 48% से 60%): यह मुख्य एंजाइम है जो पीड़ितों की रक्त वाहिकाओं को तोड़ता है, जिससे ऊतकों में अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव और सूजन होती है।
स्नेक C-टाइप लेक्टिन 19%): यह रक्त के प्लेटलेट्स पर हमला करता है, जिससे थक्का जमने की क्षमता नष्ट हो जाती है।
सिरिन प्रोटीएसेज (SVSP - ~14%): यह फ़ाइब्रिनोजेन को नष्ट करके रक्त को पूरी तरह से पतला कर देता है।
फॉस्फोलिपेस A2 (PLA2 - 5.4%): यह मांसपेशियों की कोशिकाओं में जलन, दर्द और मांसपेशियों के विनाश के लिए जिम्मेदार है।
दंश के स्थान पर तुरंत असहनीय दर्द, अत्यधिक सूजन और त्वचा का काला पड़ना
मसूड़ों, नाक और घाव से लगातार अनियंत्रित रक्तस्राव।
भारत में उपलब्ध 'बिग फोर' पॉलीवेलेंट एंटीवेनम इसके विष पर असरदार नहीं होता, क्योंकि यह विशेष रूप से पिट वाइपर के लिए नहीं बना है। रोगी के इलाज के लिए सहायक चिकित्सा और विशिष्ट सी स्नेक या पिट वाइपर एंटीवेनम की आवश्यकता होती है।
जंगली वातावरण में यह सर्प औसतन 9 से 12 वर्ष तक जीवित रहता है।
सफेद पेट वाली समुद्री चील, सर्प चील और बड़े उल्लू। किंग कोबरा और बान्डेड क्रेट, जो इसे पेड़ों से खींचकर खा जाते हैं।
नेवले और जंगली बिल्लियां।
अत्यधिक नमी वाले क्षेत्रों में रहने के कारण इनमें फंगल स्किन इंफेक्शन और श्वास संबंधी फेफड़ों का संक्रमण मृत्यु का बड़ा कारण बनता है।
मानवजनित कारण: वनों का विनाश, जलवायु परिवर्तन से गिरता नमी का स्तर, और ग्रामीणों द्वारा गलती से पैर पड़ जाने पर रक्षात्मक रूप से काटने के बाद भयवश इसे मार दिया जाना।
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जर्डन्स पिट वाइपर
जर्डन्स पिट वाइपर उच्च पर्वतीय क्षेत्रों और ठंडे वर्षावनों में पाया जाने वाला एशियाई वाइपर परिवार का एक अत्यंत विशिष्ट, अत्यंत विषैला और शारीरिक रूप से जटिल सर्प है। इसका नामकरण 19वीं सदी के प्रसिद्ध ब्रिटिश प्राकृतिक वैज्ञानिक थॉमस कावेरहिल जर्डन के सम्मान में किया गया था। यह सर्प अपनी जटिल त्वचा संरचना, उच्च पर्वतीय अनुकूलन और हीमोटॉक्सिक विषदंत प्रणाली के लिए जाना जाता है।
प्रोटोबोथ्रोप्स पूर्व में यह ट्राइमेरेसुरस वंश में वर्गीकृत था।
प्रोटोबोथ्रोप्स जर्डोनी मूल रूप से भारत, म्यांमार और चीन में पाई जाने वाली चीन के कुछ क्षेत्रों में लाल/पीले पैटर्न वाली वियतनाम के उच्च पर्वतीय भागों में उद्विकास के दृष्टिकोण से, जर्डन्स पिट वाइपर ने मैदानी उष्णकटिबंधीय वाइपरों से अलग होकर ठंडे, उच्च-ऊंचाई वाले पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में जीवित रहने के लिए खुद को विकसित किया है।
इसका सिर अत्यधिक चौड़ा, चपटा और स्पष्ट रूप से त्रिकोणीय होता है। इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर छोटे-छोटे शल्क होते हैं, जिन पर काले और पीले रंग की जटिल नक्काशीदार आकृतियां बनी होती हैं।
इसकी आंखें मध्यम आकार की होती हैं, जिनकी पुतलियां लंबवत होती हैं। यह इसे मुख्य रूप से निशाचर शिकार के लिए सक्षम बनाती हैं।
नथुने और आंख के ठीक बीच में एक गहरा गड्ढा होता है। यह एक उच्च-संवेदनशील थर्मो-रिसेप्टर अंग है जो अंधेरे में भी गर्म खून वाले जीवों (स्तनधारियों/पक्षियों) से निकलने वाली इंफ्रारेड ऊष्मा तरंगों को भांप लेता है।
इसका मुख्य आधार रंग पीला-हरा, जैतून-हरा या भूरा-सलेटी होता है।
इसकी पीठ पर बड़े, लाल-भूरे या काले रंग के हीरे के आकार के धब्बे होते हैं, जिनके किनारे चमकीले पीले या सुनहरे रंग की रेखा से घिरे होते हैं।
यह पैटर्न इसे ठंडे जंगलों की सड़ी-गली पत्तियों, काई और चट्टानों के बीच पूरी तरह से अदृश्य बना देता है।
एक वयस्क जर्डन्स पिट वाइपर की कुल लंबाई औसतन 90 से 140 सेंटीमीटर (लगभग 3 से 4.5 फीट) होती है।
इसकी पूंछ का अंतिम भाग आंशिक रूप से पकड़ बनाने योग्य होता है, जो इसे झाड़ियों और कम ऊंचाई वाले पेड़ों की टहनियों पर सहारा देता है।
उत्तर-पूर्वी राज्य — असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर।
अंतरराष्ट्रीय: उत्तरी म्यांमार, दक्षिण-पश्चिम चीन (तिब्बत, युन्नान, सिचुआन), नेपाल, भूटान और वियतनाम।
यह साप कम ऊंचाई वाले मैदानी इलाकों के बजाय समुद्र तल से 1,200 मीटर से 3,000 मीटर (4,000 से 10,000 फीट) की अत्यधिक ऊंचाई वाले ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करता है।
यह बांस के जंगलों, पर्वतीय आर्द्र सदाबहार वनों, चट्टानी दरारों, और पर्वतीय धाराओं/झरनों के पास पाई जाने वाली घनी झाड़ियों में रहना पसंद करता है।
यह कम तापमान और अत्यधिक नमी को आसानी से सहन कर सकता है, जहाँ अन्य सरीसृप निष्क्रिय हो जाते हैं।
जर्डन्स पिट वाइपर एक जरायुज साप है। यह अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है।
संभोग की प्रक्रिया वसंत ऋतु में होती है। मादा में गर्भावस्था की अवधि लगभग 4 से 6 महीने तक चलती है।
मादा ग्रीष्मकाल के अंत में या मानसून के दौरान (जुलाई से सितंबर) एक बार में 4 से 12 जीवित बच्चों को जन्म देती है।
जन्म के समय नवजात शिशु लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर लंबे होते हैं।
नवजात शिशु जन्म के पहले सेकंड से ही पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं।
उनके पास जन्म से ही पूर्णतः विकसित खोखले विषदंत और विष ग्रंथियां होती हैं। शिशु का विष भी वयस्कों जितना ही हीमोटॉक्सिक और घातक होता है।
छोटे स्तनधारी जीव (जैसे चूहे, छिपकलियां, और पर्वतीय गिलहरियां)।
मेंढक (विशेषकर पर्वतीय धाराओं के पास पाए जाने वाले ट्री-फ्रॉग)।
छोटे पक्षी और उनके अंडे।
जर्डन्स पिट वाइपर एक धैर्यवान शिकारी है। यह शिकार का पीछा करने के बजाय किसी रास्ते या चट्टान की दरार के पास खुद को समेटकर घंटों बिना हिले-डुले बैठा रहता है।
जब कोई शिकार इसके पास से गुजरता है, तो यह अपने लोरियल पिट की मदद से उसकी शारीरिक गर्मी और दिशा का सटीक आकलन करता है।
यह सेकंड के एक छोटे हिस्से में तेजी से हमला करता है और अपने लंबे मुड़े हुए विषदंतों को शिकार के शरीर में गड़ाकर विष छोड़ देता है।
शिकार में विष प्रवाहित करने के बाद यह उसे छोड़ देता है। विष शिकार के आंतरिक ऊतकों को तुरंत घोलना शुरू कर देता है।
शिकार के शांत होने पर सर्प अपनी जीभ से रसायनों को सूंघकर उसे ढूंढता है और सिर की तरफ से पूरा निगल जाता है। एक बार बड़ा शिकार करने के बाद इसे 2 से 3 सप्ताह तक दोबारा भोजन की आवश्यकता नहीं होती।
इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे, खोखले और मुड़े हुए विषदंत होते हैं, जो बिल्कुल सिरिंज की सुई की तरह काम करते हैं।
जब मुंह बंद होता है, तो ये दांत मुंह की छत के समानांतर मुड़ जाते हैं, और हमला करते समय 90 डिग्री के कोण पर बाहर निकल आते हैं।
प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम
यह विष दंश के स्थान पर मांसपेशियों और कोशिकाओं के ऊतकों को घोलना और नष्ट करना शुरू कर देता है।
एंटी-कोएगुलेंट टॉक्सिन
यह रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को पूरी तरह बाधित कर देता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है।
दंश स्थान पर तुरंत तेज जलन और असहनीय दर्द।
प्रभावित अंग में तेजी से सूजन आना, त्वचा का रंग लाल-काला पड़ना और छाले होना।
ऊतकों का सड़ना मसूड़ों, नाक या घाव से लगातार खून बहना।
समय पर इलाज न मिलने पर गुर्दे खराब होना और अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव से मृत्यु।
भारत में उपलब्ध सामान्य 'पॉलीवेलेंट एंटीवेनम' मुख्य रूप से नाग, क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के लिए होता है। प्रजाति के विष पर यह आंशिक रूप से ही काम करता है।
इसका इलाज मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा रक्तस्राव रोधी दवाओं और घाव के प्रबंधन द्वारा किया जाता है।
जंगली और ठंडे पर्वतीय वातावरण में इसका औसत जीवनकाल 10 से 15 वर्ष के बीच होता है।
यद्यपि यह ठंडे वातावरण का जीव है, लेकिन अत्यधिक बर्फबारी या लंबे समय तक तापमान शून्य से नीचे रहने पर हाइपोथर्मिया से इसकी मौत हो सकती है।
त्वचा के फंगल इंफेक्शन और श्वास संबंधी परजीवी।
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण, वनों की कटाई और ग्रामीणों द्वारा डर के कारण इसे मार दिया जाना।
जर्डन्स पिट वाइपर उच्च पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण शिकारी की भूमिका निभाता है। यह कुतरने वाले जीवों (चूहों और कृंतकों) की आबादी को नियंत्रित रखता है, जिससे जंगलों और कृषि क्षेत्रों का संतुलन बना रहता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की सूची में इसे कम से कम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि इसकी आबादी विशाल पर्वतीय श्रृंखलाओं में फैली हुई है।
हालांकि, तराई और मध्यम-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आवास के नुकसान और वनों की कटाई से इसकी स्थानीय आबादी पर असरपड़ रहा है।
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गुंथर्स पिट वाइपर
पूर्वोत्तर भारत और सिक्किम के उच्च पर्वतीय वर्षावनों की हरी-भरी छतरी में छिपा तापीय-संवेदी हीमोटॉक्सिक विषधर
गुंथर्स पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र की अंतर्राष्ट्रीय भाषा में (ट्राइमे्रेसुरस गुंथेरी) कहा जाता है, वाइपरिडे कुल के 'क्रोटा लिने' उप-कुल का एक अत्यंत विशिष्ट, वृक्षवासी और दुर्लभ विषधर है।
यह तीन प्राचीन यूनानी शब्दों के मेल से बना है: (तीन), (भाग/खंड) और (पूंछ)। इसका अर्थ इसकी पूंछ के निचले शल्कों की खास तीन-भागों वाली बनावट से है।
यह नाम 19वीं सदी के दुनिया के जाने-माने ब्रिटिश-जर्मन प्राणीशास्त्री और हर्पेटोलॉजिस्ट डॉ. अल्बर्ट गुंथर के प्रति वैज्ञानिक सम्मान प्रकट करता है। डॉ. गुंथर ने ब्रिटिश म्यूजियम में काम करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया के सरीसृपों का गहरा वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सिक्किम और पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम पहाड़ी जंगलों से एकत्रित किए गए नमूनों के आधार पर वैज्ञानिक समाज ने पहली बार इस प्रजाति को पहचाना। लंबे समय तक इसे हरित पिट वाइपर समूह की अन्य प्रजातियों (जैसे Trimeresurus gramineus या Trimeresurus albolabris) की ही एक उप-प्रजाति या क्षेत्र-विशेष भिन्नता समझा जाता रहा। लेकिन 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी के आणविक जीव विज्ञान और शल्क-संरचना के अध्ययन ने यह साबित कर दिया कि गुंथर्स पिट वाइपर एक पूरी तरह से स्वतंत्र, आनुवंशिक रूप से अलग और अद्वितीय पर्वतीय प्रजाति है।
गुंथर्स पिट वाइपर भारतीय उपमहाद्वीप के अत्यंत सीमित और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में ही पाया जाता है: भारत: सिक्किम के पूर्वी व पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र, उत्तरी पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग और कलिम्पोंग की पहाड़ियां), और पूर्वोत्तर भारत के कुछ चुनिंदा सदाबहार पर्वतीय वन।
अंतरराष्ट्रीय फैलाव: नेपाल के पूर्वी हिस्से की सीमावर्ती पहाड़ियां और भूटान के आर्द्र सदाबहार वर्षावन। यह मुख्य रूप से समुद्र तल से 800 मीटर से 2,200 मीटर (2,600 से 7,200 फीट) की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है।
प्राकृतिक पर्वतीय वर्षावनों में गुंथर्स पिट वाइपर का औसत जीवनकाल 10 से 15 वर्ष होता है। प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों या भोजन की उपलब्धता के आधार पर यह 18 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
यह एक मध्यम आकार का, लेकिन अत्यंत सुगठित और लचीला वृक्षवासी सांप है।
एक स्वस्थ वयस्क गुंथर्स पिट वाइपर की सामान्य लंबाई 50 सेमी से 80 सेमी (लगभग 1.6 से 2.6 फीट) होती है।
घने वर्षावनों में इसके विशाल मादा नमूने 90 सेमी (3 फीट) तक पाए गए हैं। (इस प्रजाति में मादाएं नर सांपों की तुलना में आकार और वजन में बड़ी होती हैं)।
इसका औसत वजन 150 ग्राम से 350 ग्राम के बीच होता है।
इसका मुख्य रंग गहरा पन्ना हरा घास जैसा हरा या हल्का पीला-हरा होता है। यह रंग इसे घनी पत्तियों, काई और पेड़ों की शाखाओं के बीच पूरी तरह अदृश्य बना देता है।
इसका निचला भाग हल्का चमकीला हरा, मटमैला पीला या सफेद-हरा होता है।: शरीर के दोनों किनारों पर एक पतली, हल्की पीली या सफेद-गुलाबी रेखा गर्दन से शुरू होकर पूंछ की ओर जाती है, जो इसे पेड़ों की डालियों के बीच और बेहतर छलावरण देती है।
इसकी पूंछ का पिछला एक-तिहाई हिस्सा जंग लगा लाल, भूरा या ईंट जैसा लाल होता है। यह पूंछ अत्यधिक मजबूत, लचीली और प्रीहेंसाइल होती है—यानी यह पेड़ की शाखाओं को लपेटकर हाथ की उंगलियों की तरह कसकर पकड़ सकती है।
इसका सिर गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग, भाले के फलक जैसा चौड़ा और त्रिकोणीय होता है। यह आकार इसके सिर के पिछले हिस्से में मौजूद विशाल विष ग्रंथियों के कारण बनता है।
आंखें मध्यम आकार की, सुनहरी-पीली या कांस्य रंग की होती हैं, जिनमें एकदम सीधी ऊर्ध्वाधर पुतली होती है। यह पुतली रात के घने अंधेरे में बेहतरीन दृष्टि प्रदान करती है।
इसकी प्रत्येक आंख और नथुने के ठीक बीच में एक गहरा गड्डा होता है। यह कोई कान या नथुना नहीं है, बल्कि एक अत्यधिक विकसित थर्मो-रिसेप्टर अंग है। यह अंग 0.003 डिग्री सेल्सियस जितने सूक्ष्म तापीय बदलाव को भी भांप लेता है। इसके सहारे यह रात के सन्नाटे में बिना देखे केवल शिकार की शारीरिक गर्मी से उसकी सटीक दूरी और आकार का खाका अपने दिमाग में बना लेता है।
वाइपर परिवार का सदस्य होने के नाते इसके पास सरीसृप जगत के सबसे उन्नत विषदंत होते हैं। इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे, बेहद तीखे और खोखले विषदंत होते हैं जो हिंग वाले होते हैं। जब मुंह बंद रहता है, तो ये दांत मुंह की छत के समानांतर पीछे मुड़ जाते हैं। लेकिन शिकार पर हमला करते ही मुंह 180 डिग्री तक खुलता है और ये दांत किसी सिरिंज की तरह आगे की ओर सीधे खड़े हो जाते हैं।
गुंथर्स पिट वाइपर पूरी तरह से पर्वतीय वर्षावनों और नम पर्णपाती जंगलों का निवासी है।
घने बांस के झुरमुट, बड़े पत्तों वाले पेड़, चाय के बागानों की झाड़ियां, और पर्वतीय झरनों व नालों के किनारे लटकती हुई लताएं।
पसंद: उच्च आर्द्रता (70% से 90% नमी), मध्यम ठंडा तापमान (15°C से 24°C), घनी हरियाली, रात का अंधेरा और बहते पानी की आवाज।
नापसंद: सीधी धूप, तेज शुष्क हवाएं, 30°C से अधिक का तापमान, और जमीन पर बिना किसी आवरण के रहना।
दिन के समय यह पेड़ों की पतली टहनियों पर अपनी पूंछ की लपेट बनाकर कुंडल मारे बैठा रहता है। इसका हरा रंग इसे पत्तियों में ऐसा मिला देता है कि इसे 1 फीट की दूरी से भी पहचान पाना लगभग नामुमकिन होता है। दिन में यह हिलता-डुलता नहीं है ताकि चील, बाज या अन्य शिकारी पक्षियों की नज़र इस पर न पड़े। सूरज ढलते ही यह जागृत होता है। यह एक स्थान पर अपनी पूंछ को लपेटकर घंटों बिना हिले-डुले बैठता है और रास्ते से गुजरने वाले शिकार का इंतजार करता है। इसे "एम्बुश प्रेडेटर" कहा जाता है।
यह एक शुद्ध मांसाहारी शिकारी है जो अपने से छोटे और मध्यम आकार के जीवों को खाता है। पेड़ों पर रहने वाले मेंढक छोटी छिपकलियां और पेड़ों पर घोंसला बनाने वाले छोटे पक्षी। छोटी प्रजातियों के चूहे और कभी-कभार छोटे सांप।
पहचान: रात के समय जब कोई पेड़ का मेंढक या चूहा पास से गुजरता है, तो गुंथर्स पिट वाइपर की आंखें और लोरियल पिट उस जीव की शारीरिक गर्मी को पकड़ लेते हैं। यह अपनी पूंछ को टहनी से कसकर जकड़े रहता है और अपने शरीर के अगले आधे हिस्से को 'S' आकार में मोड़कर स्प्रिंग की तरह छोड़ता है। यह सेकंड के 20वें हिस्से में शिकार पर प्रहार करता है और अपने लंबे सोलेनोग्लाइफ़स विषदंत शिकार के शरीर में गहराई तक गड़ाकर हीमोटॉक्सिक जहर छोड़ देता है। चूंकि यह पेड़ों पर शिकार करता है, इसलिए यह शिकार को डंक मारकर छोड़ता नहीं है (क्योंकि शिकार नीचे गिर जाएगा), बल्कि उसे अपने मुंह में दबाए रखता है जब तक कि जहर शिकार को पूरी तरह बेबस न कर दे। इसके बाद यह उसे पूरा निगल जाता है। यह 10 से 15 दिनों में केवल एक बार ही बड़ा शिकार करता है।
मानसून से ठीक पहले (अप्रैल से जून) के महीनों में इनका प्रजनन काल होता है। नर सांप मादा की गंध को ट्रैक करते हुए उस तक पहुंचते हैं।
गुंथर्स पिट वाइपर अधिकांश अन्य सांपों की तरह अंडे नहीं देता। मादा के शरीर के भीतर ही अंडे विकसित और पोषित होते हैं।
अगस्त से अक्टूबर (मानसून के अंत) में मादा 6 से 12 जीवित, पूर्ण विकसित बच्चों को जन्म देती है।
जन्म लेते ही बच्चे लगभग 15 से 18 सेमी लंबे होते हैं। उनके शरीर का रंग वयस्कों की तुलना में अधिक चमकीला होता है और उनकी पूंछ का सिरा अत्यधिक लाल-भूरा होता है, जिसे वे कीड़े की तरह हिलाकर छोटी छिपकलियों को आकर्षित करते हैं (इसे कहा जाता है)। जन्म के पहले मिनट से ही इनमें विष ग्रंथियां और तीखे विषदंत पूरी तरह सक्रिय होते हैं।
गुंथर्स पिट वाइपर से इंसानी हादसों की संख्या काफी कम है। पूर्वोत्तर भारत और सिक्किम में इसके डंक मारने के प्रतिवर्ष लगभग 30 से 70 मामले ही सामने आते हैं।
ये घटनाएं मुख्य रूप से चाय के बागानों में पत्तियां तोड़ने वाले मजदूरों, इलायची और बांस की खेती करने वाले स्थानीय किसानों, और वनों में काम करने वाले लकड़ी कटाई करने वालों के साथ होती हैं। जब कोई व्यक्ति बिना देखे टहनी या झाड़ी को पकड़ता है, तो झाड़ी में छिपा सांप बचाव में हाथ या चेहरे पर डंक मार देता है।
इसके डंक से होने वाली सीधे मौतों की संख्या बहुत कम (0% से 2%) है। हालांकि इसका जहर शरीर को अत्यधिक गंभीर नुकसान पहुंचाता है, लेकिन यदि प्राथमिक उपचार और सही चिकित्सा मिले, तो मृत्यु की संभावना नगण्य होती है।
गुंथर्स पिट वाइपर का विष मुख्य रूप से एक शक्तिशाली हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक मिश्रण है।
स्नेक वेनम मेटलोप्रोटीनेसेज (SVMPs): यह एंजाइम रक्त वाहिकाओं की दीवारों को तोड़ देता है, जिससे अंदरूनी रक्तस्राव शुरू होता है।
सेरिन प्रोटीनेसेज : यह शरीर के प्राकृतिक रक्त थक्का जमाने वाले घटकों को नष्ट कर देता है, जिससे रक्त का थक्का जमना पूरी तरह बंद हो जाता है।
हयालोरोनिडेस : यह एंजाइम जहर को आसपास के ऊतकों में तेजी से फैलाने में मदद करता है।
इसका विषैलापन लगभग 1.5 mg/kg से 2.5 mg/kg के बीच होता है।
यह करैत या कोबरा के न्यूरोटॉक्सिक जहर जितना तीव्र विषैला नहीं है, लेकिन इसकी साइटोटॉक्सिक प्रकृति के कारण यह काटे गए स्थान के मांस और ऊतकों को पूरी तरह गलाने में सक्षम है।
डंक मारते ही डंक वाले स्थान पर बिच्छू के काटने से भी दस गुना तेज, भयानक जलन और दर्द शुरू होता है। काटे गए हिस्से पर तुरंत नीले और काले रंग के धब्बे पड़ने लगते हैं।
सूजन तेजी से पूरे हाथ या पैर में फैलने लगती है। घाव से निरंतर पतला रक्त रिसाव जारी रहता है जो जमना बंद हो जाता है। साइटोटॉक्सिक असर के कारण काटे गए स्थान के आसपास की कोशिकाएं और मांसपेशियां गलने लगती हैं। मरीज को उल्टी, चक्कर आना, मसूड़ों से खून आना, और पेशाब में खून आने की शिकायत होती है। रक्तचाप तेजी से गिरता है। यदि समय पर इलाज न मिले, तो घाव में सड़न पैदा हो जाती है, जिससे कई बार प्रभावित अंग को सर्जरी करके काटना पड़ सकता है। अत्यधिक रक्तस्राव से किडनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
भारत में उपलब्ध मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम केवल चार प्रमुख सांपों (नाग, सामान्य करैत, रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर) के विष से बनता है। यह मानक ASV गुंथर्स पिट वाइपर के विष के खिलाफ 100% प्रभावी नहीं होता। हालांकि, गंभीर रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर इसे देते हैं, लेकिन इसका असर सीमित रहता है।
चूंकि विशिष्ट एंटी-वेनम की सीमाएं हैं, इसलिए इसका इलाज मुख्य रूप से सपोर्टिव केयर पर निर्भर करता है: मरीज के शरीर में रक्त थक्का जमने की क्षमता को बहाल करने के लिए फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (FFP) और प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। सड़न और इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स और घाव की नियमित सफाई की जाती है। भयानक दर्द को नियंत्रित करने के लिए मजबूत दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं (एस्पिरिन जैसी दवाएं नहीं दी जातीं क्योंकि वे रक्त को और पतला करती हैं)। मरीज को शांत रखें और प्रभावित अंग पर कोई टाइट पट्टी न बांधें, क्योंकि इससे मांस गलने की प्रक्रिया और तेज हो जाएगी।
घाव को चीरा न लगाएं और न ही बर्फ या बिजली का झटका दें।
मरीज को तुरंत नजदीकी बड़े अस्पताल ले जाएं जहां रक्त चढ़ाने और सर्जिकल देखभाल की सुविधा उपलब्ध हो।
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कामरूप पिट वाइपर
कामरूप पिट वाइपर भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, विशेष रूप से असम और उसके आसपास के जैव विविधता वाले जंगलों में पाया जाने वाला एक अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ विषैला सर्प है। यह सर्प 'वाइपरिडे' परिवार के 'क्रोटेलिने' पिट वाइपर) उप-कुल से संबंधित है। भारत का उत्तर-पूर्वी हिस्सा अपनी अनूठी जैव विविधता के लिए जाना जाता है, और इसी क्षेत्र के कामरूप जिले के नाम पर इस प्रजाति का नामकरण किया गया है।
यह साप एशियाई ग्रीन पिट वाइपर परिसर का हिस्सा है। उद्विकास और आनुवंशिक दृष्टि से यह प्रजाति अन्य हरी पिट वाइपर प्रजातियों (जैसे Trimeresurus albolabris या Trimeresurus gramineus) से काफी समानता रखती है, परंतु इसके शल्क रंग पैटर्न और डीएनए संरचना में सूक्ष्म अंतर हैं जो इसे एक स्वतंत्र प्रजाति का दर्जा देते हैं।
कामरूप पिट वाइपर का सिर चपटा, त्रिकोणीय और गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देता है। त्रिकोणीय सिर वाइपर परिवार की एक प्रमुख पहचान है, जो इसकी बड़ी विष ग्रंथियों को समायोजित करता है।
इसके चेहरे पर आंख और नथुने के बीच एक विशेष गड्ढा होता है। यह एक अत्यंत संवेदनशील थर्मो-रिसेप्टर अंग है। यह सर्प को अंधेरे में भी अपने शिकार (जैसे छोटे स्तनधारी या पक्षी) के शरीर से निकलने वाली इंफ्रारेड ऊष्मा को महसूस करने में सक्षम बनाता है। इसके कारण यह पूर्ण अंधकार में भी शिकार पर सटीक हमला कर सकता है।
इसके शरीर का मुख्य रंग गहरा हरा, जैतून-हरा या पीला-हरा होता है।
इसकी पीठ पर हल्के और गहरे रंग के धब्बे या पट्टियां होती हैं, जो इसे वर्षावनों की पत्तियों और झाड़ियों में छलावरण प्रदान करती हैं।
इसका पेट हल्का पीला या सफेद-हरा होता है।
इसकी पूंछ का अंतिम भाग लचीला और मजबूत होता है, जो पेड़ों की टहनियों और झाड़ियों को मजबूती से पकड़ सकता है। यह विशेषता इसे एक कुशल वृक्षाश्रयी जीव बनाती है।
वयस्क कामरूप पिट वाइपर की लंबाई औसतन 60 से 90 सेंटीमीटर तक होती है। मादाएं आमतौर पर नरों की तुलना में थोड़ी अधिक लंबी और भारी होती हैं।
यह साप मुख्य रूप से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों, विशेषकर असम (कामरूप जिला और आसपास के तराई वाले क्षेत्र), मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के जंगलों तक सीमित है।
यह अत्यधिक नमी वाले सदाबहार और अर्ध-सदाबहार जंगलों में रहना पसंद करता है।
बांस के जंगलों, चाय के बागानों की सीमाओं और घनी झाड़ियों में यह आसानी से घुल-मिल जाता है।
यह मुख्य रूप से कम से मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ी और मैदानी वन क्षेत्रों में पाया जाता है।
कामरूप पिट वाइपर का प्राथमिक भोजन छोटे चूहे, छिपकलियां (जैसे गीको और कैलोट्स), मेंढक और कभी-कभी छोटे पक्षी होते हैं।
यह साप शिकार का पीछा करने के बजाय एक ही स्थान पर घंटों स्थिर बैठकर शिकार का इंतजार करता है।
यह पेड़ों की शाखाओं या घनी झाड़ियों पर अपनी पूंछ की मदद से लिपटकर बैठ जाता है।
जैसे ही कोई शिकार इसके पास से गुजरता है, यह अपने लोरियल पिट की मदद से उसकी शारीरिक गर्मी को भांप लेता है और सेकंड के एक छोटे से हिस्से में बिजली की तेजी से हमला करता है।
यह शिकार को काटकर तुरंत अपने मुड़े हुए विषदंतों के माध्यम से विष अंदर पहुंचा देता है। विष शिकार को तुरंत पंगु बना देता है और उसके आंतरिक ऊतकों को पचाना शुरू कर देता है। शिकार के शांत होने के बाद सर्प उसे पूरा निगल जाता है।
कामरूप पिट वाइपर का विष मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक होता है।
यह रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव होने लगता है।
यह दंश स्थान के आसपास की कोशिकाओं और ऊतकों को नष्ट कर देता है, जिससे अत्यधिक सूजन और ऊतकों का सड़ना शुरू हो जाता है।
इसके ऊपरी जबड़े में लंबे, खोखले और मुड़े हुए विषदंत होते हैं, जो इंजेक्शन की सुई की तरह काम करते हैं। जब मुंह बंद होता है, तो ये दांत मुंह की छत से चिपके रहते हैं, और हमला करते समय 90 डिग्री के कोण पर बाहर निकल आते हैं।
दंश के स्थान पर तुरंत तेज जलन और असहनीय दर्द।
प्रभावित अंग में तेजी से सूजन आना और रंग नीला/काला पड़ना।
घाव से लगातार खून बहना (क्योंकि रक्त थक्का नहीं जमा पाता)।
समय पर इलाज न मिलने पर स्थानीय ऊतकों का नष्ट होना और कभी-कभी अंग गंवाने की नौबत आ जाना।
हालांकि, इसका विष आमतौर पर इंसानों के लिए रसेल वाइपर या नाग जितना तुरंत जानलेवा नहीं होता, फिर भी यह गंभीर चिकित्सीय आपातकाल पैदा कर सकता है।
कामरूप पिट वाइपर आमतौर पर शर्मीले स्वभाव का होता है और इंसानों से दूर रहने की कोशिश करता है। यह तभी हमला करता है जब इस पर अनजाने में पैर पड़ जाए, इसे पकड़ने का प्रयास किया जाए या यह पूरी तरह से असुरक्षित महसूस करे।
उत्तर-पूर्वी भारत में चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर, लकड़ी काटने वाले ग्रामीण और जंगलों में जाने वाले स्थानीय लोग इसके काटने का मुख्य शिकार बनते हैं।
भारत में उपलब्ध सामान्य पॉलीवेलेंट एंटीवेनम मुख्य रूप से नाग, क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के लिए बनाया जाता है। पिट वाइपर के विष पर यह आंशिक रूप से ही प्रभावी होता है।
इलाज के लिए मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर सहायक चिकित्सा घाव की देखभाल और रक्तस्राव को नियंत्रित करने वाली दवाओं का उपयोग किया जाता है।
अन्य कई वाइपरों की तरह, कामरूप पिट वाइपर भी सीधे जीवित बच्चों को जन्म देता है (अंडे नहीं देता)।
इनका प्रजनन काल आमतौर पर मानसून के महीनों (मई से सितंबर) के दौरान होता है, जब वातावरण में आर्द्रता अधिक होती है और शिकार आसानी से उपलब्ध होता है।
मादा एक बार में 6 से 15 बच्चों को जन्म दे सकती है।
नवजात बच्चे जन्म के समय लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबे होते हैं।
जन्म के समय से ही बच्चों में विषदंत और पूर्णतः विकसित विष ग्रंथियां होती हैं, जिससे वे पैदा होते ही शिकार करने में सक्षम होते हैं।
कामरूप पिट वाइपर जंगलों और कृषि क्षेत्रों के आसपास कुतरने वाले जीवों (जैसे चूहों) और कीड़ों की आबादी को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह खाद्य श्रृंखला का एक अनिवार्य हिस्सा है।
उत्तर-पूर्वी भारत में जंगलों की कटाई, शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण इनके रहने के प्राकृतिक स्थान नष्ट हो रहे हैं।
अज्ञानता और डर के कारण इंसानों द्वारा देखे जाने पर इन्हें अक्सर मार दिया जाता है।
वैज्ञानिक रूप से इस प्रजाति पर शोध अभी भी जारी है। इसे भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन इसके सीमित भौगोलिक दायरे के कारण इसके आवास का संरक्षण अत्यधिक आवश्यक है।
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खसी हिल्स पिट वाइपर
पूर्वोत्तर भारत की चेरापूंजी और खसी पहाड़ियों के अति-वर्षा वाले सदाबहार वनों का तापीय-संवेदी हीमोटॉक्सिक विषधर
खसी हिल्स पिट वाइपर, जिसे प्राणीशास्त्र की अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण प्रणाली में (ट्राइमे्रेसुरस खसिएंसिस) कहा जाता है, वाइपरीडे कुल के 'क्रोटालिने' उप-कुल का एक अत्यंत विशिष्ट और पर्वतीय पारिस्थितिकी वाला विषधर है।
Trimeresurus' शब्द यूनानी भाषा के (तीन), (भाग) और (पूंछ) से मिलकर बना है। वर्गीकरण के आधुनिक अध्ययनों में इसे कुछ वैज्ञानिक वंश में भी वर्गीकृत करते हैं, जहाँ का अर्थ आद्य और का अर्थ गड्ढे वाला सिर होता है।
यह नाम मेघालय की प्रसिद्ध 'खसी पहाड़ियों' (Khasi Hills) के नाम पर रखा गया है, जो इस जीव की प्राथमिक प्राकृतिक खोज स्थली 19वीं सदी के उत्तरार्ध में (वर्ष 1890 के दशक में) प्रसिद्ध ब्रिटिश हर्पेटोलॉजिस्ट जॉर्ज अल्बर्ट बाउलेंगर ने लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में पूर्वोत्तर भारत के असम और मेघालय से लाए गए नमूनों का अध्ययन करते हुए पहली बार इस प्रजाति को एक स्वतंत्र स्वरूप के रूप में पहचाना था। शुरुआत में इसे अन्य एशियाई पिट वाइपर्स के साथ मिला दिया गया था, लेकिन सिर के शल्कों की अनोखी गिनती और पूंछ की बनावट के कारण इसे अलग प्रजाति का दर्जा दिया गया। भारत: यह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—विशेषकर मेघालय (खसी हिल्स, गारो हिल्स, जयंतिया हिल्स, चेरापूंजी और मासिनराम के आसपास के अति-वर्षा वाले क्षेत्र), असम, नागालैंड, और मिजोरम के पहाड़ी वनों में पाया जाता है।
भारत के अलावा यह सीमावर्ती उत्तरी म्यांमार और दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के तराई-पर्वतीय जंगलों तक फैला हुआ है। यह समुद्र तल से 800 मीटर से 2,000 मीटर (2,600 से 6,500 फीट) की ऊंचाई वाले उप-उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वनों में निवास करता है। अत्यधिक नमी और ठंडे पर्वतीय माहौल में खसी हिल्स पिट वाइपर का औसतन जीवनकाल 10 से 14 वर्ष होता है। प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों या भोजन की उपलब्धता के आधार पर यह 15 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
यह एक मध्यम आकार का, सुगठित और हल्का-मध्यम भार वाला पिट वाइपर है।
एक स्वस्थ वयस्क की सामान्य लंबाई 50 सेमी से 75 सेमी (लगभग 1.6 से 2.5 फीट) होती है।
कुछ दुर्लभ बड़े मादा नमूनों की लंबाई 85 सेमी (लगभग 2.8 फीट) तक दर्ज की गई है। (मादाएं आकार में नर से बड़ी होती हैं)।
इसका वजन 120 ग्राम से 300 ग्राम के बीच होता है।
इसका आधार रंग गहरा जैतूनी हरा भूरा-हरा, या तांबे जैसा लाल-भूरा होता है। शरीर पर गहरे रंग के धब्बों या आड़ी रेखाओं की श्रृंखला बनी होती है।
इसकी पूंछ का पिछला सिरा जंग लगे लाल या भूरे रंग का होता है। यह पूंछ अत्यधिक मजबूत और लपेटदार होती है, जो पेड़ों और झाड़ियों की टहनियों को कसकर जकड़ने में सक्षम है।
इसका सिर गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग, चौड़ा और भाले के फलक जैसा त्रिकोणीय होता है। सिर पर छोटे-छोटे खुरदरे शल्क होते हैं।
आंखें मध्यम आकार की, सुनहरी या भूरी होती हैं, जिनमें ऊर्ध्वाधर पुतली होती है जो रात के सन्नाटे में देखने में मदद करती है।
आंख और नथुने के ठीक बीच में एक गहरा गड्डा होता है। यह एक उच्च-क्षमता वाला इंफ्रारेड तापीय-संवेदी अंग है, जो आसपास के जीवों के शरीर से निकलने वाली गर्मी को भांपकर रात के अंधेरे में शिकार का सटीक खाका बनाता है।
इसके पास ऊपरी जबड़े में दो तीखे, खोखले और हिंग वाले विषदंत होते हैं। मुंह बंद रहने पर ये पीछे मुड़ जाते हैं और हमला करते समय 180 डिग्री के कोण पर सीधे बाहर निकल आते हैं।
यह मेघालय और पूर्वोत्तर के अति-वर्षा वाले नम सदाबहार वनों बांस के झुरमुटों, पर्वतीय झरनों के किनारे लटकती लताओं और चाय/इलायची के बागानों में रहता है।
पसंद: अत्यधिक आर्द्रता मध्यम ठंडा तापमान (14°C से 22°C), घनी हरियाली, और रात का अंधेरा। नापसंद: सीधी तेज धूप, सूखा वातावरण, 30°C से अधिक का तापमान, और सीधा मानवीय हस्तक्षेप।
यह पेड़ों की निचली शाखाओं, झाड़ियों और जमीन पर सूखी पत्तियों व पत्थरों के नीचे दोनों जगह रह सकता है। यह शिकार का पीछा करने के बजाय घंटों एक जगह शांत बैठकर इंतजार करता है और जैसे ही कोई जीव पास से गुजरता है, उस पर झपट पड़ता है। पेड़ों और पत्थरों पर रहने वाले मेंढक छोटी छिपकलियां और छोटे पर्वतीय चूहे। छोटी प्रजातियों के पक्षी और उनके अंडे। यह रात में टहनी या पत्थर पर छिपकर बैठता है।
लोरियल पिट के जरिए शिकार की शारीरिक गर्मी को ट्रैक करता है।
अचानक स्प्रिंग की तरह झपटकर शिकार के शरीर में अपने लंबे विषदंत गाड़ देता है।
पेड़ों पर शिकार करते समय यह शिकार को मुंह में कसकर दबाए रखता है जब तक कि जहर के असर से शिकार शांत न हो जाए, फिर उसे निगल जाता है।
यह 10 से 15 दिनों में एक बार शिकार करता है। वसंत और मानसून के शुरुआती समय (अप्रैल से जून) में इनका प्रजनन काल होता है। मानसून के उत्तरार्ध (अगस्त से अक्टूबर) में मादा 5 से 12 जीवित बच्चों को जन्म देती है। जन्म लेते ही बच्चे लगभग 14 से 17 सेमी लंबे होते हैं और पहले पल से ही पूरी तरह आत्मनिर्भर, विषैले और शिकार करने में सक्षम होते हैं।
पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में चाय और इलायची की खेती करने वाले मजदूरों तथा वनों में लकड़ियां व बांस इकट्ठा करने वाले ग्रामीणों के साथ इसके आमने-सामने होने की घटनाएं होती हैं। इसके डंक मारने के सालाना 20 से 60 मामले दर्ज किए जाते हैं। इसके काटने से मृत्यु की संभावना बहुत कम (1% से भी कम) होती है, लेकिन यह शरीर के प्रभावित हिस्से को गंभीर स्थानीय नुकसान पहुंचाता है।
खसी हिल्स पिट वाइपर का विष मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक और साइटोटॉक्सिक होता है। यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों को तोड़कर अंदरूनी रक्तस्राव पैदा करता है। यह कोशिकाओं और मांसपेशियों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाता है। यह डंक वाले स्थान पर तीव्र दर्द और सूजन पैदा करता है। लगभग 1.4 mg/kg से 2.2 mg/kg के बीच होता है। यह जहर नाग या करैत की तुलना में कम मारक है, लेकिन काटे गए स्थान के मांस को गलाने और रक्तस्राव पैदा करने की पूरी क्षमता रखता है। डंक मारते ही असहनीय दर्द, तेज जलन और अत्यधिक सूजन शुरू होती है। काटे गए स्थान की त्वचा नीली-काली पड़ने लगती है और छाले पड़ जाते हैं। मसूड़ों या घाव से लगातार खून बहना, चक्कर आना और ब्लड प्रेशर गिरना। समय पर सही इलाज न मिलने पर घाव में सड़न हो सकती है। भारत में निर्मित मानक पॉलीवैलेंट ASV मुख्य रूप से भारत के मुख्य भूभाग के चार बड़े सांपों के खिलाफ बनता है। खसी हिल्स पिट वाइपर के विष के खिलाफ यह ASV पूरी तरह प्रभावी नहीं होता (केवल आंशिक प्रतिक्रिया दिखाता है)।
एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं (एस्पिरिन को छोड़कर) और घाव की सफाई। यदि अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा हो, तो प्लेटलेट्स या प्लाज्मा दिया जाता है। मरीज को शांत रखें और प्रभावित अंग को बिल्कुल न हिलाएं।
घाव पर टाइट पट्टी न बांधें और न ही चीरा लगाएं।
मरीज को तुरंत नजदीकी बड़े अस्पताल ले जाएं जहां ICU और सर्जिकल सुविधाएं उपलब्ध हों।
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अण्डमान पिटवाइपर
ट्राइमेरेसुरस कैंटोरी) भारत के बंगाल की खाड़ी स्थित अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह का एक अत्यंत दुर्लभ, स्थानिक (एंडेमिक) और असाधारण रूप से विषैला सरीसृप है। यह वाइपरिडे कुल और क्रोटेलिने उपकुल का सदस्य है। इस जीव की जैव-संरचना, शिकार तकनीक, प्रजनन प्रणाली और विष का रासायनिक संयोजन इसे सरीसृप विज्ञान (हर्पेटोलॉजी) की दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट बनाता है।
वैज्ञानिक नाम ट्राइमेरेसुरस कैंटोरी डेनमार्क के प्रसिद्ध प्राकृतिक वैज्ञानिक और ईस्ट इंडिया कंपनी के चिकित्सक डॉक्टर थियोडोर एडवर्ड कैंटोर के सम्मान में रखा गया है। ऐतिहासिक रूप से इस प्रजाति को ट्रिगोनोसेफालस कैंटोरी, लैकेसिस कैंटोरिस तथा क्रिप्टोलाइट्रोप्स कैंटोरी जैसे विभिन्न वैज्ञानिक नामों से वर्गीकृत किया गया था। वर्तमान में आधुनिक आनुवंशिकी प्रणाली के तहत इसे ट्राइमेरेसुरस वंश में रखा गया है।
इस सांप की शारीरिक बनावट इसे एक अत्यंत घातक और अदृश्य शिकारी बनाती है।
इसका सिर ऊपर से चौड़ा और तीर की नोक या त्रिकोणाकार (लेंस-हेडेड) दिखता है। सिर का यह आकार विष ग्रंथियों (वीनम ग्लैंड्स) के बड़े आकार के कारण होता है, जो आंखों के ठीक पीछे स्थित होती हैं। सिर और पतली गर्दन के बीच स्पष्ट विभाजन होता है।
एक वयस्क अण्डमान पिट वाइपर की कुल लंबाई (नाक से पूंछ तक) औसतन 60 सेंटीमीटर से 115 सेंटीमीटर (लगभग 2 से 3.8 फीट) तक होती है। मादा सांपों का आकार, लंबाई और मोटाई नर सांपों की तुलना में काफी अधिक होती है।
इस प्रजाति में वर्ण भिन्नता (कलर मॉर्फ्स) प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। इनका शरीर हल्के हरे, गहरे भूरे, जैतूनी या मटमैले रंग का होता है। हरे रंग की किस्मों पर पीले धब्बे और भूरी किस्मों पर गहरे रंग के चकत्ते पाए जाते हैं। इसके सिर के प्रत्येक पार्श्व (किनारे) पर आंख के नीचे से ऊपरी होंठ के ऊपर तक एक क्रीम या हल्के पीले रंग की रेखा जाती है। शरीर की निचली शल्क पंक्ति (वेंट्रल स्केल्स) पर भी हल्के रंग की पट्टी होती है। पेट का भाग हल्का हरा, मटमैला या क्रीम रंग का होता है जिस पर भूरे बिंदु होते हैं।
इसके शरीर के ऊपरी शल्क (डॉर्सल स्केल्स) खुरदरे और उभरे हुए होते हैं। मध्य-शरीर पर इनकी 27 से 31 पंक्तियां होती हैं। पेट के निचले हिस्से के वेंट्रल शल्क 174 से 184 और पूंछ के निचले शल्क (सबकॉडल्स) 55 से 76 होते हैं, जो दो भागों में विभाजित होते हैं।
इसकी पूंछ अत्यधिक मजबूत, संकुचित और लचीली होती है। यह पेड़ों और झाड़ियों की टहनियों पर लपेटकर पकड़ बनाने (प्रिहेंसाइल टेल) का काम करती है।
इस सांप के सिर पर नासाछिद्र (नॉस्ट्रिल) और आंख के ठीक बीचों-बीच दोनों तरफ एक गहरा गड्डा होता है, जिसे लॉरियल पिट कहते हैं।
यह गड्डा एक अत्यधिक संवेदनशील इंफ्रारेड ऊष्मा संवेदक अंग है। इसके भीतर स्थित तंत्रिकाएं (नर्व्स) वातावरण में 0.003 डिग्री सेल्सियस जितने सूक्ष्म तापमान परिवर्तन को भी दर्ज कर लेती हैं। इस तंत्र के कारण यह अंधेरे में भी किसी भी जीवित स्तनधारी या पक्षी के शरीर से निकलने वाली ऊष्मा को सटीक चित्र के रूप में महसूस कर लेता है।
यह प्रजाति विशेष रूप से निकोबार द्वीप समूह की स्थानिक निवासी है और अण्डमान द्वीप समूह के सघन वनों में पाई जाती है। यह समुद्र तल से लेकर 200 मीटर तक की ऊंचाई वाले उष्णकटिबंधीय वर्षावनों, मैंग्रोव दलदलों, नारियल के बागानों और ग्रामीण झाड़ियों वाले क्षेत्रों में निवास करता है। यद्यपि यह मुख्य रूप से एक वृक्षीय सांप है जो छोटी झाड़ियों और बांस के पेड़ों पर रहता है, परंतु यह रात में शिकार की तलाश में जमीन पर, पत्तियों के ढेर में तथा इंसानी बस्तियों के आसपास भी विचरण करता है।
अण्डमान पिट वाइपर पूरी तरह से एक रात्रिकालीन (नॉक्टर्नल) शिकारी है। इसके मुख्य भोजन में छोटे स्तनधारी जीव (जैसे चूहे), विभिन्न प्रकार की छिपकलियां (गीको), मेंढक और छोटे पक्षी शामिल हैं। यह सक्रिय रूप से शिकार को खोजने के बजाय घात लगाकर हमला (सिथ एंड वेट) करता है। यह टहनी पर खुद को स्थिर कर लेता है और अपने पिट्स के सहारे शिकार के करीब आने की प्रतीक्षा करता है। शिकार के संपर्क में आते ही यह प्रति सेकंड कई मीटर की रफ्तार से झपट्टा मारता है। इसके पास हिंग्ड फैंग्स होते हैं। ये लंबे, खोखले और मुड़ने वाले विषैले दांत होते हैं जो मुंह बंद होने पर तालू की तरफ मुड़ जाते हैं और काटते समय 90 डिग्री के कोण पर बाहर निकल आते हैं। दांत शरीर में धंसते ही विष ग्रंथियों से सिरिंज की तरह विष सीधा मांसपेशियों में पहुंच जाता है। यह शिकार को बिना चबाए पूरा निगल जाता है। इसके पाचन तंत्र में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक एसिड और शक्तिशाली प्रोटियोलिटिक एंजाइम शिकार की हड्डियों और मांसपेशियों को गला देते हैं। एक बार बड़ा आहार लेने के बाद इसकी चयापचय (मेटाबॉलिज्म) दर बेहद धीमी हो जाती है, जिससे यह कई सप्ताह तक बिना भोजन के जीवित रह सकता है।
अण्डमान पिट वाइपर की प्रजनन क्रिया अधिकांश अंडज सरीसृपों से भिन्न होती है। यह सांप अंडे नहीं देता, बल्कि सीधे बच्चों को जन्म देता है। मादा अपने गर्भाशय में ही झिल्लीदार अंडों को धारण करती है। भ्रूण मादा के शरीर के भीतर ही पोषण प्राप्त करता है। मानसून के दौरान या उसके तुरंत बाद मादा एक समय में 6 से 15 जीवित बच्चों को जन्म देती है। जन्म के समय बच्चे लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। वे प्रिकॉशियल (जन्म से ही आत्मनिर्भर) होते हैं। जन्म के समय ही उनके पास विष ग्रंथियां और पूर्ण विकसित विषैले दांत होते हैं। प्राकृतिक वातावरण में इनका जीवनकाल 10 से 15 वर्ष तक होता है।
अण्डमान पिट वाइपर अत्यधिक विषैला जीव है और इसका विष मुख्य रूप से हीमोटोक्सिक और साइटोटोक्सिक घटकों का मिश्रण होता है। इसके विष में स्नेक वीनम मेटालोप्रोटीनेज, सेरीन प्रोटीनेज, फॉस्फोलिपेज ए-2 और एल-अमीनो एसिड ऑक्सीडेज जैसे जटिल प्रोटीन एंजाइम पाए जाते हैं। मेटालोप्रोटीनेज ऊतकों (टिश्यूज) को नष्ट करता है और रक्त वाहिकाओं को तोड़ता है, जिससे शरीर के भीतर आंतरिक रक्तस्राव होता है। सेरीन प्रोटीनेज रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया (कोएगुलोपैथी) को बाधित करता है। इसके काटने पर तीव्र जलन, अत्यधिक सूजन, ब्लीडिंग, चक्कर आना, रक्तचाप में गिरावट और दंश के स्थान पर ऊतकों का काला पड़कर गलना (नेक्रोसिस) शुरू हो जाता है। समय पर चिकित्सा और एंटी-वेनम न मिलने पर यह दंश घातक साबित हो सकता है।
द्वीप पारिस्थितिकी तंत्र में सीमित भौगोलिक विस्तार के कारण इस सांप की आबादी पर लगातार संकट बना हुआ है। वनों का विनाश, द्वीपों पर बढ़ता पर्यटन और ढांचागत निर्माण इसके आवास को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह जीव चूहों और अन्य कुतरने वाले जीवों की आबादी को नियंत्रित कर द्वीपों के खाद्य तंत्र का संतुलन बनाए रखने में प्राथमिक भूमिका निभाता है।
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ब्राउन स्पोटेड पिट वाइपर
एशियाई पर्वतीय वनों का आक्रामक, ऊतक-नाशक और तापीय-संवेदीहीमोटॉक्सिक विषधर
ब्राउन स्पोटेड पिट वाइपर, जिसे अंतर्राष्ट्रीय प्राणीशास्त्र वर्गीकरण में (प्रोटोबोथ्रोप्स म्यूक्रोस्क्वामेटस) कहा जाता है, वाइपरीडे कुल के 'क्रोटालिनाए' उप-कुल का एक विशाल और आक्रामक पिट वाइपर है। इसे 'पॉइन्टेड-स्केल्ड पिट वाइपर' या 'ब्राउन स्पोटेड हब्बू' के नाम से भी जाना जाता है।
यह ग्रीक शब्दों Proto (प्राथमिक या मूल) और Bothrops (गड्ढेदार या लोरियल पिट वाला सिर) से मिलकर बना है। लैटिन भाषा के Mucro (तीखा सिरा) और Squama (शल्क/Scale) से बना है, जिसका अर्थ है "तीखे या नुकीले सिरों वाले शल्कों वाला सांप"। वर्ष 1865 में ब्रिटिश प्राणीशास्त्री अल्बर्ट गुंथर ने पहली बार इसका विवरण वैज्ञानिक जगत के सामने रखा। शुरुआत में इसे Trimeresurus वंश में रखा गया था। हालांकि, बाद में इसके सिर के ऊपर मौजूद छोटे शल्कों और आनुवंशिक (Genetic DNA) संरचना के आधार पर इसे Protobothrops वंश में स्थानांतरित किया गया।
यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में व्यापक रूप से पाया जाता है: भारत: पूर्वोत्तर भारत के राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर) और पश्चिम बंगाल के तराई व पहाड़ी क्षेत्रों में। चीन: मध्य और दक्षिणी चीन (सुआन, गुआंग्डोंग, गुआंग्शी, युन्नान, फ़ुजियान और हैनान द्वीप)। यह ताइवान के प्रमुख विषैले सांपों ("Big Six") में से एक माना जाता है। उत्तरी व मध्य म्यांमार, उत्तरी वियतनाम, लाओस, और थाईलैंड के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र।
ब्राउन स्पोटेड पिट वाइपर का औसत जीवनकाल 12 से 18 वर्ष होता है। प्रतिकूल वातावरण और भोजन की उपलब्धता के आधार पर यह 20 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है। यह अन्य एशियाई ग्रीन पिट वाइपर्स की तुलना में काफी लंबा और भारी शरीर वाला सांप होता है। एक वयस्क की लंबाई 80 सेमी से 120 सेमी (लगभग 2.5 से 4 फीट) होती है। ताइवान और दक्षिणी चीन में कुछ बड़े मादा नमूने 150 सेमी (5 फीट) तक दर्ज किए गए हैं। (मादाएं आकार और भार में नर से बड़ी होती हैं)। एक वयस्क का वजन 300 ग्राम से 800 ग्राम के बीच होता है।
इसका आधार रंग हल्का भूरा, मटमैला पीला, या भूरा-ग्रे होता है। इसकी पीठ पर गहरे भूरे या काले रंग के आड़े-तिरछे चौकोर/अंडेदार धब्बों की एक लंबी श्रृंखला होती है, जिनके किनारे हल्के पीले या सफेद रंग से घिरे होते हैं। इसके शरीर के शल्क खुरदरे और नुकीले होते हैं। इसके सिर पर आंख के पीछे से गर्दन तक एक गहरी भूरी पट्टी बनी होती है।
इसका सिर गर्दन की तुलना में बहुत चौड़ा, भारी और भाले के फलक जैसा त्रिकोणीय होता है। आंखें मध्यम आकार की होती हैं, जिनमें ऊर्ध्वाधर पुतली होती है। आंख और नथुने के बीच एक गहरा गड्डा होता है, जो अंधेरे में शिकार की शारीरिक गर्मी को भांपने में मदद करता है।
यह समुद्र तल से लेकर 2,200 मीटर (7,200 फीट) की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों, बांस के झुरमुटों, कृषि खेतों, चाय के बागानों और कई बार इंसानी बस्तियों व पुराने घरों की दरारों में शरण लेता है।
यह मुख्य रूप से रात के समय सक्रिय होता है। दिन में यह झाड़ियों, सूखे पत्तों या पत्थरों के नीचे छिपा रहता है।
यद्यपि यह अपना अधिकांश समय जमीन पर बिताता है, लेकिन भोजन की तलाश में यह झाड़ियों और छोटे पेड़ों पर भी आसानी से चढ़ जाता है। यह प्रजाति अन्य कई पिट वाइपर्स की तुलना में अधिक उत्तेजक और आक्रामक होती है। जब इसे खतरा महसूस होता है, तो यह अपने शरीर को 'S' आकार में मोड़कर तेज गति से डंक मारती है।
यह एक कुशल शिकारी है और इसके मुख्य आहार में शामिल हैं: चूहे, छछूंदर और छोटे खरगोश। पक्षी, छिपकलियां, मेंढक और कभी-कभार अन्य छोटे सांप।
एशियाई पिट वाइपर्स के विपरीत, जो सीधे बच्चों को जन्म देते हैं ब्राउन स्पोटेड पिट वाइपर अंडे देता है। मादा ग्रीष्मकाल (मई से जुलाई) में 5 से 25 अंडे देती है। मादा अक्सर अंडों के पास कुंडली बनाकर बैठती है और उनकी सुरक्षा करती है जब तक कि उनसे बच्चे बाहर न निकल आएं। लगभग 40 से 50 दिनों के बाद अंडों से बाहर निकलने वाले बच्चे 20 से 25 सेमी लंबे होते हैं और जन्म से ही पूरी तरह विषैले होते हैं।
ब्राउन स्पोटेड पिट वाइपर का विष अत्यंत जटिल, शक्तिशाली और मुख्य रूप से हीमोटॉक्सिक तथा साइटोटॉक्सिक होता है। यह रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचाकर आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव पैदा करता है। यह कोशिकाओं की झिल्ली को नष्ट करता है और सूजन तथा दर्द पैदा करता है। यह फाइब्रिनोजेन को तोड़कर रक्त के प्राकृतिक थक्का जमने के तंत्र को बाधित करता है। डंक मारते ही तेज जलन, असहनीय दर्द और काटी गई जगह पर अत्यधिक सूजन। जहर ऊतकों को गलाना शुरू कर देता है, जिससे काटी गई जगह का मांस काला पड़कर सड़ने लगता है। मसूड़ों, नाक और घाव से लगातार खून बहना। किडनी फेलियर और अचानक ब्लड प्रेशर का गिरना।
ताइवान और दक्षिणी चीन में यह सांप कृषि क्षेत्रों में काम करने वाले किसानों के लिए गंभीर खतरा बनता है। ताइवान में सर्पदंश के मामलों में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
ताइवान और चीन में इस विशिष्ट सांप के जहर से बचाव के लिए समर्पित मोनोवैलेंट एंटीवेनम निर्मित किया जाता है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में इसके काटने पर सहायक चिकित्सा घाव की सफाई, एंटीबायोटिक्स और स्थिति के अनुसार पॉलीवैलेंट ASV का उपयोग किया जाता है।
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मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक
एशिया के घने जंगलों का शर्मीला, खूबसूरत और प्राणघातक विषधर
मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक को प्राणीशास्त्र में Sinomicrurus macclellandi कहा जाता है। यह इलापिडे कुल का एक अत्यंत विषैला और दुर्लभ सांप है। इसके वैज्ञानिक नाम में शामिल 'Sinomicrurus' शब्द का अर्थ है "एशियाई छोटा पूंछ वाला कोरल सांप", जबकि 'macclellandi' नाम 19वीं सदी के ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रसिद्ध प्रकृतिवादी और ईस्ट इंडिया कंपनी के डॉक्टर जॉन मैकक्लेलैंड के सम्मान में रखा गया था।
ऐतिहासिक रूप से इसे ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बर्मा के घने जंगलों में खोजा गया था। लंबे समय तक इसे बेहद शर्मीला और इंसानों से दूर रहने वाला जीव माना जाता रहा। यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग/तराई क्षेत्र), नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, दक्षिणी चीन, वियतनाम, थाईलैंड और ताइवान के पर्वतीय वर्षावनों में पाया जाता है।
प्राकृतिक वनीय पारिस्थितिक तंत्र में मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक का औसतन जीवनकाल 10 से 15 वर्ष होता है।
यह कोबरा और करैत कुल का एक छोटे से मध्यम आकार का अत्यंत सुंदर और बेलनाकार सांप है। एक पूर्ण वयस्क मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक की औसत लंबाई 40 सेमी से 80 सेमी (1.3 से 2.6 फीट) होती है। बहुत ही दुर्लभ परिस्थितियों में इसके कुछ नमूने 1 मीटर (3.2 फीट) तक दर्ज किए गए हैं। इसका भार आमतौर पर 100 ग्राम से 300 ग्राम के बीच होता है।
इसके शरीर का आधार रंग चमकीला लाल, गहरा नारंगी या लाल-भूरा होता है। पूरे शरीर पर पतली, नियमित दूरी पर बनी काली रिंग्स (पट्टियां) होती हैं, जो इसे अत्यंत आकर्षक और चेतावनी भरा रूप देती हैं।
इसका सिर छोटा और गोलाकार होता है। इसके सिर के ठीक पीछे और आंखों के बीच एक बहुत ही स्पष्ट सफेद या हल्का पीला आड़ा बैंड होता है, जो इसकी सबसे बड़ी पहचान है।
इसका पेट मटमैले सफेद या हल्के पीले रंग का होता है, जिस पर काले आयताकार धब्बे या पट्टियां बनी होती हैं।
इसका सिर गर्दन से अलग नहीं दिखता और बेलनाकार शरीर के साथ पूरी तरह सुगठित रहता है। आंखें बहुत छोटी, काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में स्थित विषदंत बहुत छोटे (लगभग 1.5 से 2 मिलीमीटर) लेकिन बेहद तीखे और मजबूत होते हैं।
यह समुद्र तल से 500 मीटर से लेकर 2,000 मीटर की ऊंचाई वाले आर्द्र पर्वतीय वनों, बांस के घने जंगलों, चाय के बागानों, सड़ी हुई पत्तियों की परतों और नमी वाली मिट्टी के नीचे रहना पसंद करता है।
पसंद: अत्यधिक नमी, नम मिट्टी, पत्थरों और सड़े हुए लट्ठों के नीचे का अंधकार, सड़ी-गली पत्तियों का ढेर।
नापसंद: सीधी तेज धूप, सूखा मौसम, खुला मैदान और अत्यधिक गर्मी।
यह एक 'फोसोरियल' यानी मिट्टी और पत्तियों के नीचे दबकर रहने वाला सांप है। यह अपना अधिकांश जीवन पत्तियों के ढेर और मिट्टी के नीचे गुप्त रूप से बिताता है।
यह बहुत ही शांत और शर्मीला सांप है। खतरा महसूस होने पर यह इंसानों पर हमला करने के बजाय भागने की कोशिश करता है। यदि इसे चारों तरफ से घेर लिया जाए, तो यह अपने शरीर को समेटकर अपनी पूंछ को ऊपर उठा लेता है और पूंछ के निचले लाल हिस्से को दिखाकर शिकारी को चेतावनी देता है कि यह विषैला है। यह केवल तभी काटता है जब इस पर गलती से पैर पड़ जाए या इसे कसकर पकड़ा जाए।
मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक मुख्य रूप से सांप-भक्षी और अंध-जीव भक्षी होता है।
इसका सबसे पसंदीदा भोजन छोटे सांप (जैसे ब्लाइंड स्नेक या अंधे सांप, अन्य छोटे गैर-विषैले व विषैले सांप) और बिना पैर वाली छिपकलियां हैं।
छोटे मेंढक, केंचुए और छिपकलियों के छोटे बच्चे।
यह पत्तियों के ढेर के अंदर अपनी तीखी सूंघने की क्षमता से शिकार को खोजता है। शिकार मिलते ही यह बहुत धीरे से उस पर झपटता है और अपने तीखे छोटे विषदंत गड़ाकर शिकार को कसकर दबा लेता है। इसका विष शिकार के तंत्रिका तंत्र को सेकंडों में पंगु बना देता है, जिसके बाद यह उसे सिर की तरफ से धीरे-धीरे पूरा निगल जाता है। यह सप्ताह में 1 से 2 बार ही शिकार करता है।
इनका संभोग काल वसंत ऋतु (मार्च से मई) के बीच होता है।
मादा मई से जुलाई के दौरान सड़ी हुई पत्तियों के ढेर, पत्थरों की दरारों या नमी वाले मिट्टी के बिलों में 4 से 10 सफेद, लंबे और नरम अंडे देती है।
मादा अंडों के आसपास ही रहकर उनकी सुरक्षा करती है।
लगभग 50 से 60 दिनों के भीतर अंडों से 15 से 20 सेमी लंबे बच्चे बाहर निकलते हैं। जन्म के समय से ही इनमें पूरा जहर और शिकार करने की क्षमता मौजूद होती है।
मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक के इंसानों को काटने के मामले अत्यंत दुर्लभ हैं, लेकिन जब भी हादसे होते हैं, वे बेहद खतरनाक और जानलेवा साबित होते हैं।
चूंकि यह घने जंगलों में पत्तियों के नीचे रहता है, इसलिए इसके काटने के प्रतिवर्ष 50 से 100 मामले ही दर्ज किए जाते हैं। ये हादसे ज्यादातर चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों, जड़ी-बूटी इकट्ठा करने वाले आदिवासियों और वैज्ञानिकों के साथ होते हैं।
यदि समय पर चिकित्सा न मिले, तो इसके काटने से मृत्यु दर 40% से 50% तक होती है। इसके डंक का निशान इतना छोटा होता है कि शुरुआती घंटों में मरीज को दर्द का अहसास तक नहीं होता।
मैकक्लेलैंड्स कोरल स्नेक का विष अत्यंत तीव्र न्यूरोटॉक्सिक होता है।
यह सीधे तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले विद्युतीय संकेतों को पूरी तरह से रोक देता है।
मायोटॉक्सिन
यह मांसपेशियों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है।
इसका केवल 2 से 5 मिलीग्राम शुद्ध जहर एक वयस्क स्वस्थ इंसान को मारने के लिए काफी होता है।
0 - 30 मिनट: काटने वाले स्थान पर नगण्य दर्द होता है, न ही कोई खास सूजन या लालिमा आती है।
1 - 2 घंटे: मरीज को सुस्ती, चक्कर आना, जोड़ों में थकावट और पेट में ऐंठन शुरू होती है।
2 - 6 घंटे: तंत्रिका तंत्र का पतन शुरू होता है। आंखें झुक जाती हैं धुंधला दिखाई देने लगता है, बोलने और निगलने में कठिनाई होती है।
फेफड़ों को चलाने वाली मांसपेशियां और डायफ्राम पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाते हैं, जिससे श्वसन विफलता और ऑक्सीजन की कमी से मरीज की मृत्यु हो जाती है।
इस सांप के काटने पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए कोई विशिष्ट मोनोवैलेंट एंटी-वेनम उपलब्ध नहीं है, और न ही भारतीय मानक पॉलीवैलेंट ASV इसके विष पर पूरी तरह से काम करता है।
चूंकि इसका न्यूरोटॉक्सिन फेफड़ों को पंगु बना देता है, इसलिए मरीज की जान बचाने का एकमात्र अचूक तरीका उसे तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखना है।
मरीज को वेंटिलेटर पर रखकर कृत्रिम सांस दी जाती है जब तक कि शरीर से जहर का असर पूरी तरह समाप्तन हो जाए।
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स्लेंडर कोरल स्नेक
भारतीय उपमहाद्वीप की लाल-गुलाबी सुंदरता, पत्थरों के नीचे छिपा गुप्त विषधर और रात का शांत साइलेंट किलर
स्लेंडर कोरल स्नेक, जिसे प्राणीशास्त्र की वैज्ञानिक भाषा में (कैलिओफिस मेलानुरस) कहा जाता है, इलापिडे कुल के 'कैलिओफिस' (एशियाई कोरल सर्प) वंश का एक अत्यंत दुर्लभ, सूक्ष्म, शर्मीला और रहस्यमयी विषधर सदस्य है।
वंश नाम की व्युत्पत्ति प्राचीन ग्रीक (यूनानी) भाषा के दो शब्दों से हुई है: (कैलॉस) जिसका अर्थ होता है "अत्यंत सुंदर" या "मनमोहक", और (ओफिस) जिसका अर्थ होता है "सर्प"। अर्थात इसका शाब्दिक अर्थ "अत्यंत सुंदर सर्प" है।
प्रजाति नाम भी दो लैटिन/ग्रीक शब्दों के संयोजन से बना है: (मेलान) जिसका अर्थ होता है "गहरा काला" और (यूरा) जिसका अर्थ होता है "पूंछ"। अर्थात इसका शाब्दिक अर्थ "काली पूंछ वाला सुंदर सांप" है।
ऐतिहासिक खोज और पहचान का इतिहास:
19वीं सदी के मध्य में (वर्ष 1839 में) ब्रिटिश प्रकृतिवादी और प्राणीशास्त्री थॉमस कॉलिंगवुड जेर्डन और बाद में महान सर्प-विज्ञानी अल्बर्ट गुंथर ने दक्षिण भारत के पथरीले जंगलों में अध्ययन के दौरान इस अद्भुत जीव को खोजा और पहली बार इसका वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक रूप से, 19वीं सदी में इस सांप को अक्सर 'ब्लाइंड स्नेक' (अंधा सांप) या गैर-विषैला 'कुकरी स्नेक' समझकर अनदेखा कर दिया जाता था, क्योंकि इसका आकार अत्यधिक पतला और छोटा होता है। लेकिन जब इसके विषदंतों और विष ग्रंथियों का सूक्ष्म एक्स-रे और शारीरिक विच्छेदन किया गया, तो सर्प-वैज्ञानिक यह देखकर हैरान रह गए कि यह आकार में छोटा होने के बावजूद सीधे कोबरा और करैत का निकटतम रिश्तेदार है और इसके शरीर में बेहद शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिक विष ग्रंथियां मौजूद हैं।
स्लेंडर कोरल स्नेक मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का एक मूल निवासी है:
यह भारत के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रों में फैला हुआ है। दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना), मध्य भारत (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़), पश्चिमी भारत (गुजरात, राजस्थान के नम पथरीले इलाके) और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों (उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के तराई क्षेत्र)।
भारत के अलावा यह संपूर्ण श्रीलंका में (समुद्र तल से लेकर 1,500 मीटर तक की ऊंचाई वाले शुष्क व आर्द्र क्षेत्रों में) और बांग्लादेश के कुछ तराई इलाकों में पाया जाता है।
जीवनकाल :
प्राकृतिक वनीय और मिट्टी के नीचे के पर्यावरण में स्लेंडर कोरल स्नेक का औसतन जीवनकाल 8 से 12 वर्ष होता है। प्रतिकूल मौसम और इंसानी हस्तक्षेप न होने पर यह 14 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है।
यह भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सभी विषैले सांपों (Cobra, Krait, Viper) में सबसे पतला और छोटा होता है।
एक पूर्ण वयस्क स्लेंडर कोरल स्नेक की सामान्य लंबाई 25 सेमी से 35 सेमी (लगभग 10 इंच से 1.1 फीट) होती है। यह आकार में पेंसिल या बड़ी सुई जितना ही पतला होता है।
अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे श्रीलंका के दक्षिणी वनों या पश्चिमी घाटों) में इसके कुछ दुर्लभ नमूने 40 सेमी से 45 सेमी (1.5 फीट) तक दर्ज किए गए हैं।
एक स्वस्थ वयस्क का वजन मात्र 15 ग्राम से 40 ग्राम तक होता है, जिसके कारण यह हाथ पर रखने पर भी भारहीन महसूस होता है।
इसके पीठ और शरीर का मुख्य आधार रंग हल्का भूरा, बादामी, हल्का तांबई या ईंट जैसा लाल-भूरा होता है। शरीर की हर एक शल्क पर छोटा सा काला बिंदु होता है, जिससे पूरे शरीर पर पतली-पतली काली बिंदियों वाली रेखाएं बनी दिखाई देती हैं।
इसकी सबसे बड़ी और खूबसूरत पहचान इसका पेट है। इसका निचला हिस्सा पूरी तरह से चमकीले प्रवाल लाल मखमली गुलाबी या गहरे नारंगी रंग का होता है। जब यह सांप पलटता है, तो इसका पेट किसी जलते हुए कोयले या लाल रिबन की तरह चमकता है।
इसका सिर छोटा, चपटा और जेट-ब्लैक (गहरे काले) रंग का होता है। सिर के पिछले हिस्से पर दो बहुत ही स्पष्ट पीले या हल्के नारंगी रंग के धब्बे होते हैं, जो इसे अन्य सभी छोटे सांपों से तुरंत अलग पहचान देते हैं।
इसकी पूंछ का सिरा पूरी तरह से जेट-ब्लैक होता है और पूंछ के निचले हिस्से पर दो बहुत स्पष्ट सफेद या पीले बिंदु होते हैं।
इसके शरीर पर शल्क बेहद चिकने, मोमी और चमकदार होते हैं, जिससे इसे मिट्टी और पत्तियों के नीचे रेंगने में कोई घर्षण महसूस नहीं होता।
इसके मध्य-शरीर में शल्कों की 13 कतारें होती हैं।
इसका सिर बेलनाकार शरीर के साथ पूरी तरह सुगठित रहता है; सिर और गर्दन के बीच कोई स्पष्ट अलगाव नहीं दिखता।
आंखें अत्यंत सूक्ष्म, काली और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इनकी दृष्टि कमजोर होती है क्योंकि यह अपना अधिकांश जीवन अंधेरे में बिताता है।
इसके ऊपरी जबड़े में स्थित दो तय विषदंत बहुत छोटे (1.0 मिलीमीटर से 1.5 मिलीमीटर) होते हैं। छोटे होने के बावजूद ये विषदंत खोखले होते हैं और सीधे विष ग्रंथि से जुड़े रहते हैं।
स्लेंडर कोरल स्नेक एक 'फोसोरियल' यानी भूमिगत/मिट्टी के नीचे रहने वाला जीव है।
सड़ी-गली पत्तियों की घनी परते सड़ती हुई लकड़ियों और खोखले तनों के नीचे की नम जगहें।
पत्थरों के ढेर, चट्टानों की संकरी दरारें, और दीमक के टीले।
पुराने बगीचे, चाय और नारियल के बागान, और खेतों के किनारों पर बनी मिट्टी की मेड़ें।
पसंद: हल्की नमी, ढीली और नम मिट्टी, पत्थरों के नीचे का गहरा अंधकार, चींटियों व दीमकों की गंध, और रात का सन्नाटा।
नापसंद: सीधी तेज धूप, कड़ाके की गर्मी, सूखा वातावरण, पानी से लबालब भरा क्षेत्र और सीधी तेज रोशनी।
यह दुनिया के सबसे शर्मीले और सीधे सांपों में से एक है। यह इंसानों या किसी बड़े जीव से सामना होने पर कभी आक्रामक होकर आगे बढ़कर हमला नहीं करता। इसका पहला प्रयास मिट्टी या पत्तियों के नीचे घुसकर गायब होने का होता है।
जब इसे चारों तरफ से घेर लिया जाता है या छेड़ा जाता है, तो यह काटने की कोशिश करने के बजाय अपनी काली पूंछ को हवा में ऊपर उठाकर गोल मोड़ लेता है । पूंछ को मोड़कर यह उसके निचले हिस्से के चमकीले प्रवाल-लाल और काले रंग को शिकारी के सामने प्रदर्शित करता है। सर्प-विज्ञान में इसे "एपोसेमैटिक सिग्नल" या चेतावनी भरा प्रदर्शन कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है: "मैं विषैला और खतरनाक हूँ, मुझे मत छुओ!"
यह केवल तभी डंक मारता है जब इस पर नंगे पैर जोर से पैर पड़ जाए या इसे हाथों से कसकर दबाया/भींचा जाए।
स्लेंडर कोरल स्नेक मुख्य रूप से एक विशेष अंध-जीव और सर्प भक्षी है।
इसका 80% से अधिक आहार अंधे सांप छोटे भू-सांप और अन्य पतली प्रजातियों के नवजात सांप होते हैं।
सांपों के अलावा यह बिना पैर वाली छिपकलियों छोटे केंचुआ रूपी जीवों, और कभी-कभार छोटी छिपकलियों के अंडों का भक्षण करता है।
यह आंखों से देखने के बजाय अपनी दोधारी जीभ का उपयोग करके मिट्टी और पत्तियों के भीतर गंध के रसायनों को ट्रैक करता है।
यह जमीन में रेंग रहे अंधे सांपों की गंध को सूंघकर उनका पीछा करता है।
जैसे ही शिकार सामने आता है, यह अचानक उस पर झपटकर अपने छोटे विषदंत गड़ा देता है।
यह अपने शिकार को अपने जबड़ों से कसकर दबाए रखता है। इसका विष शिकार के छोटे तंत्रिका तंत्र को मात्र 10 से 30 सेकंड में पूरी तरह पंगु बना देता है। शिकार के शांत होते ही यह उसे सिर की तरफ से धीरे-धीरे निगलना शुरू कर देता है।
यह सप्ताह में केवल 1 या 2 बार ही छोटा शिकार करता है और एक बार बड़ा भोजन करने के बाद कई दिनों तक मिट्टी के नीचे विश्राम करता है।
वसंत ऋतु से शुरुआती गर्मी (मार्च से मई) के दौरान इनका संभोग काल होता है। नर सांप सूंघकर मादा की गंध से उसका पीछा करता है।
अंडे देना : संभोग के लगभग 40 से 50 दिनों बाद, यानी मई से जुलाई के दौरान मादा स्लेंडर कोरल स्नेक सड़ी हुई पत्तियों की निचली परतों, पत्थरों की दरारों या नम मिट्टी के बिलों में 2 से 6 सफेद, बहुत छोटे, लंबे और लचकदार अंडे देती है। अंडों की संख्या कम होना इस प्रजाति की दुर्लभता का एक मुख्य कारण है।
मादा अंडों के आसपास रहकर उनकी देखरेख करती है ताकि चींटियां या अन्य कीड़े अंडों को नुकसान न पहुंचाएं।
लगभग 50 से 60 दिनों के ऊष्मायन के बाद अगस्त या सितंबर में अंडों से 10 सेमी से 12 सेमी लंबे नन्हे सपेले बाहर आते हैं। ये सपेले जन्म के समय पेंसिल की रिफिल जितने पतले होते हैं, लेकिन जन्म के पहले ही पल से इनके पास विष ग्रंथियां और पूर्ण सक्रिय न्यूरोटॉक्सिन मौजूद होता है।
स्लेंडर कोरल स्नेक से इंसानों का सामना होना और इसका इंसानों को काटना अत्यंत दुर्लभ घटनाओं में आता है।
संपूर्ण भारत और श्रीलंका को मिलाकर इसके काटने के प्रतिवर्ष मात्र 20 से 50 प्रत्यक्ष मामले ही दर्ज किए जाते हैं।
ये हादसे आमतौर पर चाय/कॉफी के बागानों में काम करने वाले मजदूरों, जंगलों में जड़ी-बूटियां बिनने वाले आदिवासियों, नर्सरी में मिट्टी खोदने वाले मालियों और सर्प-विशेषज्ञों के साथ होते हैं जो इसे गैर-विषैला समझकर उठाने की गलती कर बैठते हैं।
चूंकि इसका मुंह अत्यधिक छोटा और विषदंत मात्र 1 से 1.5 मिमी लंबे होते हैं, इसलिए यह इंसान के जूते, मोटे कपड़ों या दस्तानों को पार करके त्वचा में जहर नहीं छोड़ पाता। यह केवल इंसान की उंगलियों की पतली त्वचा या पैर के पंजों पर ही डंक मार सकता है।
बिना इलाज के इसके काटने से मृत्यु दर 20% से 30% तक आंकी गई है। हालांकि, दर्ज मामलों में मौतों की संख्या बहुत कम (प्रतिवर्ष 0 से 5) है, लेकिन इसके विष को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है।
यद्यपि स्लेंडर कोरल स्नेक का आकार छोटा होता है, लेकिन इसका विष जैव-रासायनिक दृष्टि से कोबरा और करैत के विष जितना ही शुद्ध और मारक होता है।
अल्फा व बीटा-न्यूरोटॉक्सिन्स
यह इसका प्राथमिक घटक है, जो सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर प्रहार करता है और मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले विद्युतीय संकेतों को ब्लॉक करता है।
मायोटॉक्सिन्स - कुछ मात्रा में): यह मांसपेशियों के प्रोटीन को नुकसान पहुंचाता है।
फॉस्फोलिपेज A2 यह कोशिकाओं की झिल्ली को नष्ट करता है और जलन पैदा करता है।
इसका विषैलापन लगभग 0.4 mg/kg से 0.8 mg/kg के बीच मापा गया है। यह जहर मारकता के मामले में भारतीय नाग के समान ही घातक है।
इसका विष ग्रंथियों का आकार छोटा होने के कारण यह एक बार में बहुत कम मात्रा (लगभग 1 मिलीग्राम से 3 मिलीग्राम) जहर ही छोड़ पाता है। लेकिन यह छोटी सी मात्रा भी एक छोटे बच्चे या कमजोर व्यक्ति की जान लेने के लिए काफी है।
काटने वाली जगह पर बहुत हल्का सा सुई चुभने जैसा अहसास होता है। स्थानीय स्तर पर हल्का दर्द, थोड़ी सूजन और लालिमा आती है।
विष रक्त में घुलने के बाद तंत्रिकाओं पर असर दिखाने लगता है। मरीज को चक्कर आने लगते हैं, सुस्ती और सिरदर्द होता है। पेट में ऐंठन और जी मिचलाना शुरू होता है।
आंखों की पलकें भारी होकर गिरने लगती हैं।
गले की मांसपेशियां पंगु होने लगती हैं, जिससे लार निगलना मुश्किल हो जाता है।
फेफड़ों को चलाने वाले डायफ्राम पर असर पड़ने लगता है, जिससे सांस फूलने लगती है।
यदि जहर पर्याप्त मात्रा में चला गया हो और इलाज न मिले, तो श्वसन विफलता से मृत्यु हो सकती है।
स्लेंडर कोरल स्नेक के दंश के इलाज में सबसे बड़ी चिकित्सा चुनौती यह है कि इसकी प्रजाति के लिए कोई विशेष मोनोवैलेंट एंटी-वेनम निर्मित नहीं होता।
भारत में उपलब्ध मानक पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम नाग और करैत के खिलाफ बनता है। चूंकि स्लेंडर कोरल स्नेक इलापिडे कुल का ही सदस्य है, इसलिए पॉलीवैलेंट ASV इसके विष पर आंशिक रूप से काम करता है, लेकिन इसके लिए ASV की अधिक मात्रा की आवश्यकता हो सकती है।
चूंकि विशिष्ट एंटी-वेनम की सीमाएं हैं, इसलिए इसके इलाज में 'सपोर्टिव मेडिकल केयर' सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है:
यदि मरीज को सांस लेने में दिक्कत शुरू होती है, तो उसे तुरंत अस्पताल में इंट्यूबेट करके मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रख दिया जाता है। वेंटिलेटर मरीज के फेफड़ों को तब तक कृत्रिम सांस देता रहता है जब तक कि शरीर से जहर का असर पूरी तरह से बेअसर या निष्कासित न हो जाए।
नियोस्टिग्माइन इंजेक्शन
तंत्रिका संकेतों को बहाल करने और मांसपेशियों के पक्षाघात को बेअसर करने के लिए ये इंजेक्शन दिए जाते हैं।
मरीज को शांत रखें और पीड़ित अंग को बिल्कुल न हिलाएं।
घाव को चीरा न लगाएं, न ही कसकर पट्टियां बांधें।
मरीज को बिना देर किए निकटतम बड़े अस्पताल (जहाँ ICU व वेंटिलेटर की सुविधा हो) पहुँचाएँ।
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कैस्पियन कोबरा (सेंट्रल एशियन कोबरा
मध्य एवं दक्षिण-पश्चिम एशिया का सबसे आक्रामक, अत्यधिक विषैला और प्राणघातक सर्प-सम्राट
कैस्पियन कोबरा, जिसे प्राणीशास्त्र में Naja oxiana कहा जाता है, इलापिडे कुल का एक अत्यंत दुर्दांत और शक्तिशाली विषधर सदस्य है। इसे आमतौर पर 'सेंट्रल एशियन कोबरा', 'ऑक्सस कोबरा' या 'लद्दाखी नाग' भी कहा जाता है। 'Naja' शब्द संस्कृत के 'नाग' से लिया गया है, जबकि 'oxiana' शब्द प्राचीन 'ऑक्सस नदी' के नाम पर आधारित है, जिसके आसपास के भूभाग में यह ऐतिहासिक रूप से बहुतायत में पाया जाता है।
ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, कैस्पियन कोबरा को विश्व भर की कोबरा प्रजातियों में सबसे अधिक न्यूरोटॉक्सिक और खतरनाक माना जाता है। यह भारत के सुदूर उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के ऊपरी हिस्सों) से लेकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और ईरान तक फैला हुआ है। प्राचीन ग्रीक और फारसी इतिहास में इस सांप का संदर्भ उच्च पर्वतीय दर्रों के रक्षक के रूप में मिलता है। ठंडे पर्वतीय और शुष्क पथरीले इलाकों के अनुकूल ढला यह सांप अपनी श्रेणी का अकेला योद्धा है जो भीषण ठंड और ऊंचाई को भी सहन कर लेता है।
जीवनकाल
प्राकृतिक, शुष्क और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में कैस्पियन कोबरा का औसतन जीवनकाल 15 से 20 वर्ष होता है। अनुकूल और नियंत्रित वातावरण में यह 22 से 25 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
यह मध्यम से बड़े आकार का अत्यंत गठीला और शक्तिशाली सांप है। एक पूर्ण वयस्क कैस्पियन कोबरा की औसत लंबाई 1.0 मीटर से 1.5 मीटर (3.5 से 5 फीट) तक होती है। उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के अनुकूल इलाकों में इसके कुछ विशाल नमूने 1.9 मीटर (6.2 फीट से अधिक) तक लंबे दर्ज किए गए हैं। इसका भार 1.5 से 3 किलोग्राम के बीच होता है।
खतरा महसूस होने पर यह अपने शरीर के एक-तिहाई हिस्से को सीधे खड़ा कर फन फैला लेता है। इसके फन के पिछले हिस्से पर भारतीय नाग जैसा 'चश्मा' या मोनोकल्ड कोबरा जैसा 'O-मार्क' बिल्कुल नहीं होता—यह पूरी तरह से एकरंग या हल्की धुंधली पट्टियों वाला होता है।
इसके शरीर का रंग उम्र के साथ बहुत तेजी से बदलता है:
बच्चों की त्वचा का रंग हल्का पीला या बादामी होता है और पूरे शरीर पर गहरे भूरे या काले रंग की 20 से 30 स्पष्ट पट्टियां बनी होती हैं।
जैसे-जैसे सांप वयस्क होता है, ये पट्टियां धुंधली हो जाती हैं और शरीर का रंग एकसमान पीला-भूरा, चॉकलेट ब्राउन, तांबई या गहरा भूरा हो जाता है। पेट का निचला भाग मटमैला पीला या सफेद होता है।
इसकी आंखें मध्यम आकार की और गोल पुतलियों वाली होती हैं। इसके ऊपरी जबड़े में आगे की तरफ 6 से 7 मिलीमीटर लंबे खोखले विषदंत होते हैं, जो सीधे मजबूत विष ग्रंथियों से जुड़े रहते हैं।
क्या पसंद करता है
शुष्क, पत्थरीले और रेतीले पर्वतीय इलाके, चट्टानों की दरारें और पुराने खंडर।
नदी घाटियों के आसपास की सूखी झाड़ियां और समुद्र तल से 3,000 मीटर (10,000 फीट) तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र।
दीमक के टीले, चूहों के बिल और पत्थरों के ढेर जहां इसे पर्याप्त नमी और छिपने की जगह मिलती है।
वसंत और गर्मियों की धूप सेकना
क्या नापसंद करता है
अत्यधिक घने वर्षावन और दलदली भूमि।
कड़ाके की बर्फबारी वाली ठंड (सर्दियों में यह 4 से 5 महीने के लिए भूमिगत बिलों में शीतनिद्रा यानी में चला जाता है)।
इंसानी उपस्थिति का शोरगुल और दखलंदाजी।
व्यवहार:
सामान्य कोबरा प्रजातियों की तुलना में कैस्पियन कोबरा अत्यंत आक्रामक, साहसी और तेज-तर्रार माना जाता है। यह इंसानों को देखकर तुरंत भागने के बजाय फन फैलाकर आक्रामक रुख अपना लेता है। यह लगातार फुंकारता है और सेकंड के सौवें हिस्से में बार-बार तीखे प्रहार करता है। यह पीछे हटने के बजाय शिकार या विरोधी का पीछा करने के लिए भी जाना जाता है।
कैस्पियन कोबरा एक कुशल और बहुमुखी मांसाहारी शिकारी है।
इसका सबसे पसंदीदा भोजन पहाड़ी चूहे, गिलहरियां और छोटे स्तनधारी जीव हैं।
इसके अलावा यह पक्षी, पक्षियों के अंडे, तोड्स मेंढक, छिपकलियां और छोटे सांपों (अन्य प्रजातियों) का भक्षण भी बड़े चाव से करता है।
यह सूंघने की तीखी क्षमता और दृष्टि का उपयोग करके शिकार को खोजता है। शिकार को देखते ही यह उस पर तेजी से प्रहार कर अपने विषदंत गड़ा देता है। इसका जहर इतना तीव्र होता है कि छोटा चूहा या पक्षी 2 से 5 सेकंड के भीतर पंगु होकर दम तोड़ देता है। इसके बाद यह शिकार को आसानी से पूरा निगल जाता है।
संभोग काल: शीतनिद्रा से बाहर निकलने के बाद, यानी अप्रैल से मई के दौरान इनका संभोग काल होता है। इस दौरान नर कोबरा मादा के लिए आपस में युद्ध भी करते हैं।
अंडे देना : मादा कैस्पियन कोबरा जुलाई से अगस्त के बीच पत्थरों की दरारों, मिट्टी के गड्ढों या बिलों में 8 से 19 (औसतन 12 से 15) सफेद, लचीले अंडे देती है।
अंडों की रक्षा: मादा अंडों के पास रहकर लगभग 60 से 70 दिनों तक उनकी सुरक्षा करती है।
अंडों से निकलने वाले नवजात बच्चे 25 से 35 सेमी लंबे होते हैं। जन्म लेते ही वे पूर्ण रूप से विकसित जहर, फन और आक्रामक व्यवहार से लैस होते हैं।
मध्य एशिया और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में कैस्पियन कोबरा के काटने के हादसे सबसे गंभीर चिकित्सा आपातकाल माने जाते हैं।
पूरे मध्य एशिया (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, भारत के उत्तरी हिस्से) को मिलाकर प्रतिवर्ष इसके काटने के 2,500 से 4,000 प्रत्यक्ष मामले दर्ज किए जाते हैं।
यह दुनिया के सबसे जानलेवा सांपों में से एक है। यदि समय पर एंटी-वेनम और वेंटिलेटर सपोर्ट न मिले, तो इसके काटने से मृत्यु दर 70% से 80% तक होती है। औसतन प्रतिवर्ष इसके कारण 300 से 600 लोगों की मृत्यु दर्ज की जाती है।
हादसों की मुख्य वजह: यह सांप अक्सर पत्थरों के ढेरों या झाड़ियों के बीच छिपकर बैठता है। जब लकड़ियां बिनने वाले ग्रामीण, चरवाहे या पर्वतारोही अनजाने में इसके पास से गुजरते हैं या इसका रास्ता रोकते हैं, तो यह बिना किसी झिझक के सीधा जानलेवा हमला कर देता है।
कैस्पियन कोबरा का जहर पूरे एशियाई कोबरा वंश में सबसे ज्यादा विषैला और तीव्र माना जाता है।
जहर के मुख्य घटक:
तीव्र अल्फा-न्यूरोटॉक्सिन्स
यह तंत्रिका कोशिकाओं के रिसेप्टर्स को सेकंडों में ब्लॉक कर देता है।
साइटोटॉक्सिन्स : यह कोशिकाओं की संरचना को नष्ट करता है और स्थानीय ऊतकों में सड़न पैदा करता है।
कार्डियोटॉक्सिन्स : यह सीधे हृदय की मांसपेशियों को लकवाग्रस्त कर देता है।
जहर की क्षमता
इसका विषैलापन लगभग 0.21 mg/kg है, जो इसे भारतीय स्पेक्टेकल्ड कोबरा से भी कई गुना अधिक विषैला बनाता है।
एक पूर्ण विकसित कैस्पियन कोबरा अपने एक ही दंश में औसतन 100 से 150 मिलीग्राम (शुष्क भार) विष उड़ेल देता है। यह मात्रा एक ही बार में 20 से अधिक स्वस्थ इंसानों को मारने के लिए पर्याप्त होती है।
मानव शरीर पर क्रमिक और विनाशकारी असर:
0 - 15 मिनट (अत्यंत तीव्र शुरुआत): डंक मारने वाली जगह पर दो तीखे दांतों के निशान बनते हैं। वहां असहनीय दर्द और भयानक सूजन शुरू हो जाती है।
15 - 30 मिनट (तंत्रिका पतन): इसका न्यूरोटॉक्सिन बहुत तेजी से काम करता है। मरीज को चक्कर आने लगते हैं, आंखों की पलकें भारी होकर बंद होने लगती हैं धुंधला दिखाई देने लगता है, अत्यधिक लार बहती है और जीभ व गला पंगु होने लगते हैं।
30 - 45 मिनट (श्वसन व हृदय विफलता): विष फेफड़ों को चलाने वाले डायफ्राम और छाती की मांसपेशियों को पूरी तरह लकवाग्रस्त कर देता है। मरीज का सांस लेना बंद हो जाता है और ब्लड प्रेशर तेजी से गिरता है।
मृत्यु का मुख्य कारण: यदि मरीज को तुरंत कृत्रिम सांस न मिले, तो काटने के 45 मिनट से 2 घंटे के भीतर श्वसन विफलता और कार्डियक अरेस्ट से मृत्यु हो जाती है।
कैस्पियन कोबरा के डंक मारने पर समय ही जिंदगी और मौत के बीच का अंतर तय करता है।
मध्य एशियाई देशों (जैसे रूस, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान) में निर्मित विशेष 'सेंट्रल एशियन कोबरा एंटी-वेनम' इसके खिलाफ सबसे सटीक काम करता है।
भारत में मिलने वाला मानक पॉलीवैलेंट ASV भी इसके न्यूरोटॉक्सिक असर को बेअसर करने में काफी हद तक प्रभावी होता है।
मरीज के अस्पताल पहुंचते ही 10 से 20 सलाइन ड्रिप के माध्यम से नसों में दी जाती हैं।
मरीज को तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेटर या एम्बू-बैग पर डालकर कृत्रिम सांस देना अनिवार्य है।
नियोस्टिग्माइन और एट्रोपिन: न्यूरोमस्कुलर ब्लॉक को बेअसर करने के लिए ये जीवनरक्षक इंजेक्शन दिए जाते हैं।
एंटीबायोटिक्स व सर्जिकल सफाई: घाव के संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।
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कैनटर्स सी स्नेक
हाइड्रोफिस कैंटोरिस या माइक्रोसेफालोफिस कैंटोरिस) हिंद-प्रशांत महासागरीय तटीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक अत्यंत जटिल, अत्यधिक विषैला और शारीरिक रूप से अद्वितीय जलचर सरीसृप है। यह सांप सरीसृप वर्ग के स्क्वामाटा गण, एलापिडे कुल और हाइड्रोफिने उपकुल का सदस्य है।
इस प्रजाति का द्विपद नामकरण 19वीं शताब्दी के दानिश प्राकृतिक वैज्ञानिक डॉ. थियोडोर एडवर्ड कैंटोर के सम्मान में किया गया था। वर्गीकरण विज्ञान (टैक्सोनॉमी) में इस प्रजाति का वर्गीकरण इतिहास काफी जटिल रहा है: जीव विज्ञानियों के बीच इसके वंश को लेकर दो मत रहे हैं। पारंपरिक वर्गीकरण इसे ट्राइ ट्राइब के हाइड्रोफिस वंश में रखता है, जबकि इसका अत्यधिक छोटा सिर और पतली गर्दन जैसी विशिष्ट पहचान के कारण कई आधुनिक टैक्सोनॉमिस्ट इसे माइक्रोसेफालोफिस (जिसका शाब्दिक अर्थ 'छोटा सिर वाला सांप' होता है) वंश के अंतर्गत वर्गीकृत करते हैं।
कैनटर्स सी स्नेक की शारीरिक संरचना में दो अलग-अलग हिस्से स्पष्ट दिखाई देते हैं, जो इसे अन्य अधिकांश समुद्री सांपों से अलग करते हैं। इसका सिर अत्यंत छोटा, संकरा और सुई के अग्रभाग जैसा नुकीला होता है। सिर का घेरा इसके शरीर के सबसे मोटे हिस्से के घेरे का केवल एक-चौथाई या एक-पांचवां भाग ही होता है। गर्दन का शुरुआती हिस्सा अत्यंत पतला और तार जैसा होता है। एक पूर्ण विकसित वयस्क कैनटर्स सी स्नेक की कुल लंबाई 1.1 मीटर से 1.8 मीटर (लगभग 3.5 से 6 फीट) तक होती है। इसका शरीर दो भागों में बंटा होता है: पहला भाग (आगे का एक-तिहाई हिस्सा) अत्यधिक पतला और बेलनाकार होता है, जबकि दूसरा भाग (पीछे का दो-तिहाई हिस्सा) अचानक बहुत भारी, चौड़ा और अत्यधिक मांसल हो जाता है। पानी में तैरने के लिए इसकी पूंछ पार्श्व रूप से (अगल-बगल से) पूरी तरह चपटी होती है। यह एक प्राकृतिक पतवार और चप्पू का काम करती है, जिससे यह पानी के भीतर तेज गति से दिशा बदल सकता है। इसके शरीर पर छोटे, खुरदरे और एक-दूसरे पर चढ़े हुए (ओवरलैपिंग) शल्क होते हैं।
सिर के ऊपर शील्ड्स (स्क्यूट्स) का विशिष्ट विन्यास होता है।
मध्य-शरीर पर पृष्ठ शल्कों (डॉर्सल स्केल्स) की 23 से 35 पंक्तियां पाई जाती हैं।
पेट के वेंट्रल शल्क बेहद छोटे और अस्पष्ट होते हैं क्योंकि इसे जमीन पर रेंगने की आवश्यकता नहीं होती।
शरीर के पतले अग्रभाग का रंग पीलापन लिए हुए जैतूनी या गहरा भूरा होता है जिस पर गहरे काले रंग के चक्र (रिंग्स) बने होते हैं। पिछले मोटे हिस्से का रंग ऊपरी सतह पर जैतूनी-धूसर (ओलिव-ग्रे) और निचले हिस्से पर मटमैला पीला होता है। पूरे शरीर पर सिर से पूंछ तक 60 से 90 के बीच काले या गहरे जैतूनी रंग के छल्ले बने होते हैं।
जमीन से पूरी तरह से समुद्र के खारे पानी में जीवन अपनाने के लिए इस सांप ने असाधारण शारीरिक और जैविक बदलाव किए हैं: इसका दाहिना फेफड़ा अत्यधिक लंबा होकर पूंछ के पास तक फैला होता है। यह फेफड़ा न केवल ऑक्सीजन भंडारण का कार्य करता है, बल्कि एक वैस्कुलर हाइड्रोस्टैटिक अंग की तरह काम करता है, जो इसे समुद्र की अलग-अलग गहराइयों में प्लवनशीलता (बायोएंसी) नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके नथुने (नॉस्ट्रिल्स) थूथन के ऊपर स्थित होते हैं। इनमें विशेष उत्तक-निर्मित वाल्व लगे होते हैं। जैसे ही यह पानी में गोता लगाता है, जलदाब के कारण ये वाल्व पूरी तरह बंद हो जाते हैं, जिससे पानी फेफड़ों में प्रवेश नहीं कर पाता। यह अपनी जटिल त्वचा के नीचे मौजूद सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं के माध्यम से पानी में घुली हुई लगभग 20% तक ऑक्सीजन को सीधे अवशोषित कर सकता है और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकाल सकता है। इस क्षमता के कारण यह बिना सांस लिए 2 से 3 घंटे तक समुद्र की गहराई में रह सकता है। समुद्री जल का सेवन करने से शरीर में नमक की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इससे निपटने के लिए इसके निचले जबड़े (जीभ के शीथ के नीचे) में एक रूपांतरित सबलिंगुअल ग्रंथि होती है। यह ग्रंथि रक्त से अत्यधिक सांद्रित सोडियम क्लोराइड (नमक) को छानकर बाहर निकालती है।
यह सांप विशेष रूप से उत्तरी और पूर्वी हिंद महासागर तथा उसके आसपास के उष्णकटिबंधीय समुद्री जलक्षेत्रों में सीमित है। यह भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तणीय क्षेत्रों (जैसे मन्नार की खाड़ी, बंगाल की खाड़ी, ओडिशा और सुंदरबन के मैंग्रोव क्षेत्र), श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया के तटीय समुद्रों में पाया जाता है। यह खुले गहरे महासागरों की तुलना में तटीय उथले पानी (इन्नर शेल्फ रीजन) में रहना पसंद करता है, जहां पानी की गहराई 10 से 40 मीटर तक होती है। यह मुख्य रूप से समुद्र के तलीय भाग (बेंथिक जोन) में पाया जाता है जहां रेतीला या कीचड़ भरा तल होता है। इसके अलावा तटीय खाड़ियों (एस्टुअरी), नदियों के मुहाने और मूंगे की चट्टानों (कोरल रीफ) के आसपास इसका मुख्य निवास स्थान होता है।
कैनटर्स सी स्नेक का शारीरिक विकास उसके विशेष भोजन को पकड़ने के लिए ही हुआ है। इसका मुख्य भोजन केवल और केवल समुद्र के तलीय छिद्रों में रहने वाली पतली इल मछलियां (जैसे ओफिचथिडे और कांग्रिडे परिवार की बाम मछलियां) तथा गोबी प्रजाति की छोटी पेंदे की मछलियां हैं। समुद्र के तल में मौजूद चट्टानों की पतली दरारों, कोरल रीफ की गलियों और रेत के भीतर बने इल मछलियों के गहरे सुराखों में कोई सामान्य बड़े सिर वाला जीव प्रवेश नहीं कर सकता। कैनटर्स सी स्नेक अपने सुई जैसे पतले सिर और तार जैसी गर्दन को इन बारीक सुराखों के भीतर बहुत गहराई तक घुसा देता है। इसके ऊपरी जबड़े के अग्रभाग में छोटे, स्थिर और अंदर से खोखले विषैले दांत (फैंग्स) होते हैं। जैसे ही इसका सिर बिल के भीतर इल मछली को छूता है, यह तुरंत अपने फैंग्स गाड़कर विष की खुराक छोड़ देता है। संकरे बिल में इल मछली के पास भागने का स्थान नहीं होता। इसका विष कुछ ही सेकंड में मछली के तंत्रिका तंत्र को ठप कर देता है, जिससे वह पानी में तड़पे बिना पंगु हो जाती है। शिकार के शांत होने के बाद, यह उसे सिर की तरफ से धीरे-धीरे निगलना शुरू करता है। इसका पिछला मोटा शरीर पाचन क्रिया के लिए आवश्यक बड़े आमाशय और पाचक अंगों को धारण करता है। इसके पाचक रस में अत्यधिक सांद्र हाइड्रोक्लोरिक एसिड होता है जो मछली के शल्क और हड्डियों को पूरी तरह गला देता है।
समुद्री जीवन शैली के कारण इसकी प्रजनन प्रणाली पूरी तरह से जल-केंद्रित है। यह सांप अंडे देने के लिए कभी भी जमीन पर नहीं आता। यह पूरी तरह से ओवोविविपेरस है। मादा के शरीर में गर्भाशय के भीतर ही झिल्लीदार अंडों का निषेचन और विकास होता है। भ्रूण को अंडे की जर्दी (यॉक) से ही पोषण मिलता है। इनकी प्रजनन प्रक्रिया वर्ष में एक बार, मुख्य रूप से गर्म समुद्री तापमान के मौसम में होती है। गर्भावधि लगभग 5 से 7 महीने तक चलती है। मादा एक समय में 3 से 8 पूरी तरह से विकसित बच्चों को सीधे समुद्र के पानी में जन्म देती है। जन्म के समय नवजात बच्चों की लंबाई लगभग 30 से 45 सेंटीमीटर होती है। जन्म लेते ही वे स्वतंत्र रूप से तैरने, अपने वाल्व बंद कर गोता लगाने और तुरंत शिकार करने में सक्षम होते हैं। उनके विषैले दांत और विष ग्रंथि जन्म के पहले मिनट से ही पूर्ण कार्यशील होते हैं। प्राकृतिक समुद्री वातावरण में इनका जीवनकाल औसतन 9 से 13 वर्ष तक होता है।
कैनटर्स सी स्नेक का विष जैविक रूप से अत्यधिक परिष्कृत और घातक होता है। इसके विष में मुख्य रूप से तीन घटक पाए जाते हैं: अल्फा-न्यूरोटॉक्सिन: यह घटक तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) के एसिटाइलकोलीन रिसेप्टर्स को ब्लॉक कर देता है, जिससे मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले सभी विद्युत संकेत रुक जाते हैं। मायोटॉक्सिन (फास्फोलिपेज ए-2): यह घटक सीधे मांसपेशियों के तंतुओं (मायोसाइट्स) को नष्ट करता है, जिससे कंकाल की मांसपेशियां गलने लगती हैं। नेफ्रोटॉक्सिन: यह गुर्दे की कार्यप्रणाली को सीधे नुकसान पहुंचाता है।
इसके काटने पर शुरुआती दर्द बहुत ही कम या नगण्य होता है, जिसके कारण पीड़ित को शुरुआत में अहसास भी नहीं होता।
मायोटॉक्सिन के प्रभाव से मांसपेशियां टूटकर रक्त में घुलने लगती हैं, जिससे पेशाब का रंग गहरा भूरा या काला हो जाता है। 30 मिनट से 2 घंटे के भीतर पलकों का झुकना (टोसिस), जबड़े का बंद होना (ट्रिसमस), निगलने में कठिनाई और बोलने में असमर्थता शुरू हो जाती है। अंततः डायाफ्राम की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं, जिससे सांस रुकने से मौत हो जाती है।
यह सांप इंसानों के प्रति अत्यंत शांत और गैर-आक्रामक होता है। यह कभी भी बिना उकसावे के नहीं काटता। दंश की 95% घटनाएं तब होती हैं जब मछुआरे रात के समय नेट या बोट में फंसे सांप को हाथ से निकालने का प्रयास करते हैं।
कैनटर्स सी स्नेक तटीय समुद्री खाद्य जाल (फूड वेब) में एक उच्च-स्तरीय शिकारी (एपेक्स मेसोप्रेडेटर) के रूप में कार्य करता है। यह तटीय इलाकों में इल मछलियों की अत्यधिक बढ़ती आबादी को नियंत्रित रखकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखता है।
वर्तमान में इसे गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है: बॉटम ट्रॉलिंग और गिलनेटिंग के दौरान यह अक्सर मछली पकड़ने वाले जालों में फंस जाता है। जब जाल घंटों तक पानी के नीचे रहते हैं, तो सांस न ले पाने के कारण यह पानी में ही दम घुटने से मर जाता है। तटीय क्षेत्रों में बहाए जाने वाले औद्योगिक रसायनों, भारी धातुओं और माइक्रोप्लास्टिक के जमाव से इसकी प्रजनन क्षमता और त्वचा के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। मूंगे की चट्टानों के क्षरण (कोरल ब्लीचिंग) और तटीय विकास के कारण इल मछलियों के प्राकृतिक बिल नष्ट हो रहे हैं, जिससे इसके भोजन की उपलब्धता कम हो रही है।
Hello, I am Dr, Sodha Iqbal Kasam.
UPSC Educator | Content Specialist | Digital Author 90 ebook's)
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