Dhadkane dil ki. - 1 in Hindi Love Stories by Shravan Gore books and stories PDF | धड़कने दिल की - 1

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धड़कने दिल की - 1

मुंबई शहर की सुबह की हवा में एक अजीब सी रवानी होती है. समंदर की नमी जब पुरानी इमारतों की दरारों से टकराती है, तो वक्त जैसे कुछ पलों के लिए ठहर जाता है. सेंट जेवियर्स Collage का वो विशाल, गॉथिक शैली का मुख्य द्वार हर साल हजारों सपनों को अपने भीतर समेटता है. काले- भूरे विशाल पत्थरों की ऊंची दीवारें, खिडकियों पर लगी नक्काशीदार लोहे की जालियां, और बीचो- बीच फैला हुआ वो हरा- भरा लॉन, जिसके कोने में सदियों पुराना बरगद का पेड अपनी मजबूत शाखों के साथ सीना ताने खडा था. इस बरगद के चबूतरे को सब एक ही नाम से जानते थे—कॉलेज का कट्टा. यह सिर्फ पत्थरों का चबूतरा नहीं था, बल्कि अनगिनत दोस्ती, रूठने- मनाने और अधूरी प्रेम कहानियों का मूक गवाह था.

आज नए शैक्षणिक सत्र का पहला दिन था. हर तरफ छात्र- छात्राओं की भीड उमड रही थी. कोई अपने दोस्तों को गले लगा रहा था, कोई नए टाइमटेबल की फोटो खींच रहा था, तो कोई नए चेहरों में खुद के लिए कोई हमसफर तलाशने की मासूम कोशिश कर रहा था.
इसी हलचल से बेपरवाह, उस विशाल बरगद के चबूतरे के पिछले हिस्से में एक लडका खडा था. नाम था आदित्य जोशी. सांवला- सलोना रंग, सलीके से संवारे गए बाल, बदन पर हल्के जैतून रंग का सादा खादी कुर्ता और काली जींस. उसकी आंखों में एक गहरी, शांत झील जैसा ठहराव था. गले में लटक रहा था एक पुराना एनालॉग विंटेज कैमरा, जो उसके दादाजी ने उसे तोहफे में दिया था. आदित्य कंप्यूटर साइंस के दूसरे साल में था, लेकिन उसकी रूह कोडिंग के फार्मूलों में नहीं, बल्कि तस्वीरों के जरिए अनकहे जज्बातों को कैद करने में बसती थी. उसे इंसानों की बनावटी हंसी से ज्यादा पत्तों के बीच से छनकर आती रोशनी पसंद थी.
आदित्य कैमरे के लेंस को धीरे से घुमा रहा था. धूप की एक सुनहरी किरण ठीक उस पत्थर के खंभे पर पड रही थी, जहां काई की हल्की हरी परत जमी हुई थी. वह सही फ्रेम पाने के लिए एक कदम पीछे हटा. उसने अपनी सांसें रोकीं, उंगली शटर बटन पर रखी और जैसे ही वह तस्वीर लेने वाला था—
धडाम!
एक जोरदार, अप्रत्याशित टक्कर.
टक्कर इतनी तेज थी कि आदित्य का संतुलन पूरी तरह बिगड गया. उसका पैर चबूतरे की ढलान पर फिसला. कैमरा उसके हाथ से छूटकर हवा में उछला. आदित्य के दिल की धडकन एक सेकंड के लिए रुक गई. उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, आगे की ओर झुककर हवा में हाथ लहराया और कैमरे के स्ट्रैप को अपनी उंगलियों में कसकर थाम लिया. कैमरा बच गया, लेकिन उसके ठीक पीछे से किसी के जोर से गिरने और कागजों के बिखरने की आवाज गूंज उठी.
ओह गॉड! नो, नो, नो! शिट!
एक कांपती हुई, झुंझलाई और बेहद सुरीली आवाज हवा में तैर गई. आदित्य ने संभलते हुए पीछे देखा. जमीन पर सफेद ए- फोर साइज के पन्नों, मोटी किताबों, स्टेशनरी और रंग- बिरंगे स्केच पेन्स का अंबार लगा हुआ था.
आदित्य का पारा चढ गया. उसके लिए उसका कैमरा सिर्फ एक गैजेट नहीं, उसकी सांस था. उसने मुडकर सख्त लहजे में कहा, अरे यार! दिमाग घर छोडकर आई हो क्या? थोडा देखकर नहीं चल सकतीं? अगर यह कैमरा फर्श पर गिर जाता, तो क्या तुम्हारी ये किताबें उसकी भरपाई कर पातीं?
उसने गुस्से में नीचे बिखरे कागजों को समेटने के लिए हाथ बढाया. वह सामने वाले को दो- चार खरी- खोटी और सुनाना चाहता था, लेकिन जैसे ही उसने झुककर कागज उठाते हुए अपनी नजरें ऊपर उठाईं, उसके होंठ अचानक सिल गए. उसके हलक में शब्द सूख गए.
सामने जमीन पर घुटनों के बल बैठी लडकी को देखकर वक्त की रफ्तार धीमी पड गई.
वह सिया कुलकर्णी थी.
चेहरे पर मासूमियत और आंखों में एक अजीब सी बेचैन चमक. उसके कंधे तक आते घुंघराले, भूरे बाल हवा के झोंकों से उसके चेहरे पर बिखर रहे थे. उसने हल्के बादामी और नारंगी रंग की लंबी सूती कुर्ती पहन रखी थी. उसके पतले, तराशे हुए कानों में चांदी के छोटे- छोटे झुमके लटक रहे थे, जो उसके हिलने पर हल्की सी रुनझुन पैदा कर रहे थे. उसकी सांसें तेजी से चल रही थीं और माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं. वह किसी शांत झील में अचानक उठे बवंडर जैसी लग रही थी.
सिया ने अपनी बडी- बडी आंखों से आदित्य को घूरा. उसकी आंखों में गलती का एहसास तो था, लेकिन आदित्य के रूखेपन ने उसके आत्मसम्मान को चोट पहुंचा दी थी.
पहली बात, Mister अकडू. मैंने जानबूझकर धक्का नहीं दिया! सिया ने अपने बिखरे बाल झटके से पीछे करते हुए तेज आवाज में कहा, और दूसरी बात, आपका वो कीमती कैमरा आपके हाथ में बिल्कुल सही- सलामत है! जरा नीचे देखो, नुकसान किसका हुआ है? मेरी पूरे दो हफ्तों की असाइनमेंट शीट्स मिट्टी में मिल चुकी हैं!
अगर तुम रास्ते पर दौडने के बजाय अपनी आंखें सामने रखतीं, तो यह नौबत ही नहीं आती, आदित्य ने अपने स्वर को थोडा धीमा करते हुए कहा, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी तल्खी थी.
मुझे देर हो रही थी, समझे तुम? सिया तेजी से पन्नों को समेटने लगी, उसके हाथ कांप रहे थे. प्रोफेसर कुलकर्णी का लेक्चर शुरू होने में सिर्फ चार मिनट बचे हैं. अगर मैं आज लेट हुई, तो वो मुझे पूरे सेमेस्टर के लिए इंटरनल्स में जीरो दे देंगे. अब यहां खडे- खडे मुझे जज करने के बजाय वो कोने में पडा फोल्डर उठाओगे या सिर्फ लेक्चर ही पिलाते रहोगे?
आदित्य ने एक गहरी सांस ली. लडकी जितनी खूबसूरत थी, उसकी जुबान उतनी ही तेज और तीखी थी. उसने बिना कुछ बोले पत्थर की दरार में फंसा एक गुलाबी रंग का फोल्डर निकाला और उसमें बिखरे हुए कागजात ठूंसने में उसकी मदद करने लगा. दोनों के हाथ एक ही कागज को उठाते हुए एक पल के लिए टकराए. एक हल्की सी सिहरन, एक अनजानी बिजली सी दोनों के बीच कौंध गई. सिया ने चौंककर आदित्य की तरफ देखा. आदित्य की भूरी आंखें सीधे उसकी काली पुतलियों में झांक रही थीं. कुछ सेकंड के लिए कैंपस का शोर, पत्तों की सरसराहट और प्रोफेसरों का डर सब कुछ मानो गायब हो गया.
लेकिन यह ठहराव सिर्फ कुछ पलों का था. Collage की घंटी जोर से बज उठी—टन- टन- टन.
घंटी की आवाज सुनते ही सिया किसी नींद से जागी. उसने झटके से आदित्य के हाथ से फोल्डर और किताबें छीनीं.
थैंक यू, Mister स्ट्रेंजर! और मुफ्त की सलाह है. अगली बार रास्ते के बीचों- बीच खडे होकर अपनी ये फोटोग्राफी की नौटंकी मत करना!
सिया ने अपनी भारी बैग कंधे पर लटकाई, अपनी कुर्ती को झटका और सीढियों की तरफ लगभग उडते हुए भागी. उसके चांदी के झुमके फिर से बज उठे और पलक झपकते ही वो गलियारे के मोड पर ओझल हो गई.
आदित्य वहीं घुटनों के बल बैठा रह गया. उसने अपनी बंद मुट्ठी को देखा, जिस पर अभी भी सिया के हाथों की हल्की सी ठंडक का एहसास बाकी था. वह अपनी जगह से उठा, कुर्ते की धूल झाडी और अपने कैमरे को देखा. लेंस बिल्कुल साफ था. उसने अनजाने में ही उस दिशा में देखा जहां सिया भागी थी. उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक हल्की सी, दबी हुई मुस्कान तैर गई.
बडी अजीब लडकी है. गलती भी खुद की और रौब भी खुद का, उसने बुदबुदाते हुए अपना सिर हिलाया.
आदित्य ने अपना बैग उठाने के लिए जैसे ही चबूतरे की तरफ हाथ बढाया, उसकी नजर पत्थरों के बीच दबी एक छोटी सी चीज पर पडी.
वह कोई असाइनमेंट का कागज नहीं था. वह एक गहरे भूरे रंग की, पुरानी लेदर- बाउंड डायरी थी. डायरी बहुत ज्यादा बडी नहीं थी, हथेली के आकार से थोडी ही बडी. उसके कोनों पर पीतल की नक्काशी थी और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि डायरी के किनारे एक छोटा सा, मजबूत पीतल का ताला लगा हुआ था. डायरी के पिछले कवर पर एक कोने में नीली स्याही से बहुत ही नजाकत भरी लिखावट में लिखा था:
‘सिया कुलकर्णी — लिटरेचर डिपार्टमेंट, रोल नंबर बयालीस’*
आदित्य ने डायरी हाथ में उठाई. वह काफी भारी और पुरानी लग रही थी. ऐसा लगा जैसे किसी ने उसमें अपनी पूरी जिंदगी समेट कर ताले में बंद कर दी हो.
यह तो उस तूफान की डायरी है, आदित्य ने सोचा. उसने सोचा कि जाकर उसे दे आए, लेकिन Collage की पहली घंटी बज चुकी थी और उसका अपना डेटा स्ट्रक्चर्स का लेक्चर शुरू होने वाला था. उसने सोचा कि लंच टाइम में वो लिटरेचर डिपार्टमेंट जाकर यह डायरी उसे लौटा देगा. उसने डायरी को बहुत सावधानी से अपनी बैग की सबसे सुरक्षित, अंदरूनी चेन वाली जेब में रख लिया.
दिन धीरे- धीरे आगे बढा. दोपहर के दो बज चुके थे. सूरज अब ठीक सिर पर था और धूप में तेजी आ गई थी. सेंट जेवियर्स की कैंटीन समोसे, चाय और कोल्ड कॉफी की खुशबू से महक रही थी. आदित्य अपने दोस्त कबीर और रोहन के साथ कैंटीन की तरफ बढ रहा था, तभी उसने देखा कि एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के बाहर बने बडे नोटिस बोर्ड के पास बहुत सारे छात्रों का जमावडा लगा हुआ था.
वहां का माहौल कुछ अजीब था. लोग फुसफुसा रहे थे.
आदित्य की आदत नहीं थी दूसरों के तमाशों में पडने की, लेकिन तभी उस भीड के बीच से एक जानी- पहचानी, टूटी हुई आवाज उसके कानों में पडी.
रोहन, प्लीज समझने की कोशिश कर! वो यहीं कहीं गिरी होगी! मैंने पूरा कॉरिडोर छान मारा, लाइब्रेरी का एक- एक कोना देख लिया. वो कहीं नहीं है!
यह सिया की आवाज थी. लेकिन इस बार उस आवाज में सुबह वाली हेकडी, वो चुलबुलापन या वो गुस्सा नहीं था. इस बार उसकी आवाज में एक गहरा डर, बेबसी और आंसू थे.
आदित्य भीड को चीरते हुए थोडा आगे बढा. सामने का दृश्य देखकर वह दंग रह गया.
सिया नोटिस बोर्ड के पास खडी थी. उसका चेहरा पूरी तरह सफेद पड चुका था, जैसे उसके शरीर से खून की एक- एक बूंद निचोड ली गई हो. उसकी आंखें लाल थीं और गालों पर सूखे आंसुओं के निशान साफ नजर आ रहे थे. उसके साथ उसकी सहेली तन्वी खडी थी, जो उसे संभालने की कोशिश कर रही थी.
सिया, शांत हो जा पहले. पानी पी, तन्वी ने प्लास्टिक की बोतल आगे बढाई, सिर्फ एक डायरी ही तो थी ना? मिल जाएगी यार. कोई नया असाइनमेंट होगा तो हम फिर से लिख लेंगे।
तुझे नहीं पता तन्वी! तुझे कुछ नहीं पता! सिया लगभग चिल्लाते हुए रो पडी. उसने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड लिया. उसमें कोई Collage का असाइनमेंट नहीं था! उसमें. उसमें मेरी जिंदगी का वो सच लिखा था जो अगर किसी और के हाथ लग गया, तो मैं खत्म हो जाऊंगी! मेरे पापा, मेरी फैमिली. सब बर्बाद हो जाएंगे तन्वी! अगर वो डायरी किसी गलत इंसान को मिल गई, तो मैं Collage में तो क्या, इस शहर में किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूंगी!
सिया के ये शब्द किसी भारी हथौडे की तरह आदित्य के सीने पर लगे.
आसपास खडे छात्र आपस में खुसर- फुसर करने लगे थे. Collage में बातें हवा की तरह फैलती हैं.
क्या हो सकता है उस डायरी में?
क्या कोई Love अफेयर है?
या कोई फैमिली स्कैंडल?
लोगों की घटिया फुसफुसाहट सुनकर सिया की आंखों से फिर से आंसुओं की धार बह निकली. वह असहाय होकर वहीं नोटिस बोर्ड के पास लगे बेंच पर बैठ गई और अपने चेहरे को हाथों में छुपा लिया. उसका पूरा जिस्म कांप रहा था.
भीड के पीछे खडे आदित्य के हाथ अपने आप उसके कंधे पर लटके बैग की ओर चले गए. उसकी उंगलियों ने बैग के कपडे के ऊपर से उस बंद ताले वाली डायरी के सख्त किनारों को महसूस किया.
आदित्य के दिल की धडकनें तेज हो गईं. उसके रोंगटे खडे हो गए.
उसे सुबह लगा था कि यह किसी Collage की लडकी की आम सी पर्सनल डायरी होगी, जिसमें उसने कुछ कविताएं या दोस्तों की बुराइयां लिखी होंगी. लेकिन सिया की हालत देखकर साफ था कि यह मामला कोई मामूली नहीं था. उस छोटी सी, ताले में बंद डायरी के अंदर कोई ऐसा भयानक राज दफन था, जो सिया की पूरी जिंदगी को तबाह कर सकता था.
आदित्य ने एक कदम आगे बढाया कि वह जाकर उसे डायरी लौटा दे और कहे कि वह सुरक्षित है. लेकिन तभी उसके कदम ठिठक गए.
अगर उसने इस भीड के सामने डायरी निकाली, तो ये गिद्ध जैसे लोग सिया पर और सवाल उठाएंगे. सब जान जाएंगे कि डायरी आदित्य के पास थी, और बातें बनने लगेंगी कि क्या आदित्य ने वो राज पढ लिया? क्या उस ताले को खोला गया?
आदित्य ने अपनी मुट्ठी भींच ली. उसने बैग की चेन को थोडा और कस दिया.
उसने दूर से रोती हुई सिया को देखा. उस लडकी के चेहरे की बेबसी आदित्य के दिल को अंदर तक चीर रही थी. एक अनजाना सा खिंचाव, एक अनकही जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गिरी थी.
उसे वह डायरी सिया को लौटानी थी, लेकिन अकेले में, बिना किसी को भनक लगे.
मगर सबसे बडा सवाल अब आदित्य के दिमाग में एक भारी गूंज की तरह टकरा रहा था—उस नन्हीं सी डायरी के छोटे से ताले के पीछे ऐसा कौन सा राज छुपा था, जिसने सुबह की उस चहकती, बेपरवाह चिडिया को दोपहर होते- होते एक जिंदा लाश बना दिया था? और क्या आदित्य उस डायरी को सिया तक बिना किसी नुकसान के पहुंचा पाएगा?