Ankhan sach (Part-4) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच (भाग - 4)

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अनकहा सच (भाग - 4)

अनकहा सच___

आखिरकार कोचिंग में दिवाली की छुट्टियाँ शुरू हो ही गईं।
ओर यहां राजू के घर जाने के विचार से ही घबराहट बढ़ गई।
छुट्टी का ऐलान होते ही हितेश दौड़ता हुआ राजू के कमरे पर पहुँचा और बड़े उत्साह से बोला, "चल भाई! छुट्टियाँ लग गई हैं, अब तो निकलते हैं! कसम से, बहुत टाइम हो गया घर गए हुए... इस बार तो बड़े मज़े से दिवाली मना कर आऊँगा। कुछ दिन आराम भी मिल जाएगा यार!"
राजू ने उसकी तरफ देखा और घबराहट के साथ एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "हाँ सही है... लेकिन अभी चलना हैं क्या?
मेरा मतलब कल चलते हैं ना....
कल क्यों? एक दिन क्यों बर्बाद करना भाई?
आज ही चलेंगे रे (हितेश ने कहां)
हितेश की बातें सुनकर राजू कुछ नहीं सोच सका और ना कुछ कह सका, और फिर अपने मन में खुद को शांत करतें हुए कहा कि...
हां चलते हैं यार, ज़रा थोड़ी पैकिंग कर लूँ।"
"तूने अब तक पैकिंग नहीं की?!" हितेश ने हैरान होकर कहा, "क्या यार! मैं तो दो दिन पहले से पैकिंग करके बैठा हूँ। तू घर जाने के मामले में बड़ा ढीला है यार! ऐसा लगता है जैसे तू घर जाना ही नहीं चाहता।"
हितेश की यह बात सुनते ही राजू ने उसकी तरफ हैरान होकर देखा और घबराते हुए बात संभालते हुए बोला, "अरे ऐसा नहीं है यार... मैं जाना चाहता हूँ। बस ऐसे ही थोड़ा मन नहीं कर रहा था। सोच रहा था कि टाइम वेस्ट न हो, पढ़ाई का नुकसान हो जाएगा..."
"अरे यार, तू भी अजीब है! घर जाने में कैसा टाइम वेस्ट?" हितेश ने हँसते हुए कहा।
राजू थोड़ा सहमकर मुस्कुराया और बोला, "ठीक है, मैं पैकिंग कर लेता हूँ, फिर चलते हैं।"
सच तो यह था कि राजू का रत्ती भर भी मन नहीं था कि वह गाँव वापस जाए। लेकिन हितेश ने इतनी ज़िद कर ली थी कि राजू के पास गाँव जाने से बचने का अब कोई रास्ता नहीं बचा था।
राजू भारी मन से अपने कमरे में कपड़े बैग में डाल रहा था और हितेश अपने कमरे में था। तभी राजू का फोन बजा... स्क्रीन पर उसकी बहन का नाम चमक रहा था।
राजू ने फोन उठाकर कान से लगाया। सामने से उसकी बहन की आवाज़ आई, "आ रहे हो क्या तुम?"
राजू ने एक गहरी सांस ली और कहा, "हाँ... मन तो बिल्कुल नहीं था, पर आ रहा हूँ। हितेश ने इतनी ज़िद की कि आना ही पड़ रहा है। मना करता तो उसके सवाल बहुत बढ़ जाते, इसीलिए आना पड़ा... वैसे भी वह मुझे अपने घर ले जाना चाहता है।"
फोन के दूसरी तरफ से बहन ने थोड़ी खामोशी के बाद कहा, "कोई बात नहीं... आ जाओ, मुझे अच्छा लगेगा।"
राजू ने उदास होकर कहा, "हाँ... बस इसीलिए आ रहा हूँ। देखता हूँ... चलो, फोन रखता हूँ।"
फोन काटने के बाद राजू खिड़की से बाहर अनजाने शहर को देखने लगा। उसका जरा मन नहीं था कि वह गाँव जाए, लेकिन बस जाना था अब, आखिर मना करने की भी कोई वजह नहीं थीं उसके पास । देखा जाए तो वह गाँव तो जा रहा था, लेकिन उसका मन किसी भयानक तूफ़ान की आशंका से काँप रहा था...