### पहचान
### सीज़न 1 — अध्याय 3
### अपने ही घर से बेदखल
अमृतसर के शरणार्थी शिविर में सुबह का उजाला फैल चुका था। तंबुओं के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगी थीं। कोई भोजन लेने के लिए खड़ा था, कोई पानी के लिए और कोई अपने बीमार परिजन के लिए दवा का इंतज़ाम करने की कोशिश कर रहा था।
यहाँ हर परिवार की अपनी त्रासदी थी। किसी ने अपना घर खोया था, किसी ने कारोबार, तो किसी ने अपने प्रियजनों को। लेकिन इन सभी के बीच एक समानता थी—हर कोई किसी तरह दोबारा जीवन शुरू करना चाहता था।
सरदार जोगिंदर सिंह का परिवार भी उन्हीं लोगों में शामिल था।
पंद्रह वर्षीय जोगिंदर सुबह जल्दी उठ जाता। वह अपने पिता को देखता, जो परिवार के सामने मजबूत बने रहने का प्रयास करते थे, लेकिन कभी-कभी उनकी आँखों में छिपी विवशता साफ दिखाई देती थी।
जोगिंदर समझ चुका था कि अब उनके जीवन में पहले जैसी सुविधाएँ नहीं रहीं। जिस परिवार के पास कभी अपना घर था, आज उसे दूसरों की सहायता पर निर्भर रहना पड़ रहा था।
एक सुबह वह भोजन की कतार में खड़ा था। उसके आगे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपने छोटे-से बर्तन में भोजन लेने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पीछे कुछ बच्चे भूख से परेशान होकर रो रहे थे।
जोगिंदर के मन में एक सवाल उठा—क्या यही जीवन है? क्या इंसान की मेहनत और वर्षों की कमाई एक दिन में बेकार हो सकती है?
उसे अपने पुराने घर की याद आई। वह आँगन याद आया, जहाँ वह अपने भाइयों के साथ खेलता था। उसे वह दिन भी याद आया जब उसके पिता ने कहा था कि परिवार सुरक्षित रहा तो वे फिर घर बना लेंगे।
उसने मन-ही-मन तय किया कि वह अपने पिता का सहारा बनेगा।
लेकिन इसके लिए उसे सबसे पहले कुछ काम खोजना था।
कुछ दिनों बाद जोगिंदर ने आसपास के इलाके में काम की तलाश शुरू की। उसकी उम्र कम थी और उसके पास कोई विशेष हुनर भी नहीं था। फिर भी वह किसी छोटे-मोटे काम से पीछे नहीं हटना चाहता था।
एक दिन उसकी मुलाकात एक दुकानदार से हुई।
“तुम्हारा नाम क्या है?” दुकानदार ने पूछा।
“जोगिंदर सिंह।”
“क्या काम कर सकते हो?”
“जो आप कहेंगे, करूँगा। सामान उठाना हो, दुकान साफ करनी हो या कोई और काम—मैं मेहनत से पीछे नहीं हटूँगा।”
दुकानदार ने उसे कुछ देर देखा।
“तुम अभी बहुत छोटे हो।”
“छोटा हूँ, लेकिन काम करना चाहता हूँ।”
दुकानदार ने उसे कुछ समय के लिए सामान व्यवस्थित करने का काम दे दिया। मजदूरी बहुत कम थी, लेकिन जोगिंदर के लिए वह केवल पैसे कमाने का साधन नहीं था। उसे लग रहा था कि वह अपने परिवार की परेशानी कम करने की दिशा में पहला कदम उठा रहा है।
शाम को जब वह शिविर लौटा, तो उसके चेहरे पर थकान थी, मगर आँखों में संतोष भी था।
उसने अपनी कमाई पिता के हाथ पर रख दी।
पिता ने पैसे देखे और फिर बेटे की ओर देखा।
“यह क्या है?”
“आज काम किया था। इसकी मजदूरी मिली है।”
पिता कुछ क्षण चुप रहे।
“बेटा, अभी तुम्हारी उम्र पढ़ने और खेलने की है।”
जोगिंदर ने धीरे से उत्तर दिया, “पढ़ूँगा भी, बाबाजी। लेकिन जब तक हमारे हालात नहीं बदलते, मैं आपकी मदद भी करूँगा।”
पिता की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
“तुम्हें केवल मेहनत नहीं करनी है, जोगिंदर। तुम्हें अपनी पढ़ाई भी पूरी करनी है। गरीबी इंसान को रोक सकती है, लेकिन अगर वह हिम्मत न हारे तो रास्ता फिर भी निकल सकता है।”
यह बात जोगिंदर के मन में बैठ गई।
समय बीतने लगा। शिविर में रहना कठिन था। गर्मी, बरसात, बीमारी और भोजन की कमी ने परिवार को कमजोर कर दिया था।
जोगिंदर ने महसूस किया कि केवल छोटी-मोटी मजदूरी करके परिवार को स्थायी सहारा देना संभव नहीं होगा। उसे ऐसा काम चाहिए था, जिसमें नियमित आमदनी हो और भविष्य सुरक्षित हो सके।
इसी दौरान उसे भारतीय सेना में भर्ती होने के बारे में पता चला।
उसके मन में विचार आया कि सेना में नौकरी मिलने से उसे नियमित वेतन, अनुशासन और आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था।
उसकी उम्र कम थी। उसे शारीरिक क्षमता, शिक्षा और भर्ती की आवश्यक शर्तों को पूरा करना था। उसने अपनी तैयारी शुरू कर दी। सुबह जल्दी उठना, दौड़ना और शरीर को मजबूत बनाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा।
वह जब भी थकता, उसे अपने पिता का चेहरा याद आता।
उसे अपनी माँ के शब्द याद आते—परिवार सुरक्षित रहना चाहिए।
और उसे अपने ताया सुखा सिंह का बंद दरवाज़ा भी याद आता।
उसके मन में किसी से बदला लेने की भावना नहीं थी। वह केवल इतना चाहता था कि एक दिन उसके परिवार को किसी के सामने मजबूर न होना पड़े।
कुछ समय बाद परिवार को शिविर से बाहर रहने का एक अधिक स्थायी ठिकाना मिला। परिस्थितियाँ धीरे-धीरे संभलने लगीं, लेकिन जीवन की कठिनाइयाँ समाप्त नहीं हुई थीं।
जोगिंदर अब पहले से अधिक गंभीर हो गया था। वह अपनी पढ़ाई जारी रखने का अवसर तलाशता और साथ ही काम भी करता।
कभी-कभी उसके पिता उससे कहते, “बेटा, हालात चाहे जैसे हों, अपने स्वाभिमान को कभी मत खोना।”
जोगिंदर उत्तर देता, “बाबाजी, मैं ऐसा जीवन बनाना चाहता हूँ कि मेरे बच्चों को वह सब न देखना पड़े, जो हमने देखा है।”
पिता यह सुनकर मुस्करा देते।
उन्हें अपने बेटे पर गर्व था।
लेकिन किसी को नहीं मालूम था कि आने वाले वर्षों में यही संकल्प एक बड़ी पारिवारिक कहानी का आधार बनेगा।
जोगिंदर सेना में भर्ती होने के लिए प्रयास कर रहा था। दूसरी ओर, सीमा के उस पार उसका छोटा भाई दर्शन सिंह अपने परिवार के साथ एक ऐसा निर्णय लेने की तैयारी में था, जो आने वाली पीढ़ियों की पहचान बदल देगा।
दर्शन को जब यह खबर मिली कि जोगिंदर को अपने ही बड़े भाई ने घर में जगह नहीं दी, तो उसके मन में गहरा आक्रोश पैदा हुआ।
उसने सोचा—अगर अपने ही लोग मुसीबत में साथ नहीं देते, तो फिर रिश्तों का अर्थ क्या रह जाता है?
उसके भीतर यह पीड़ा धीरे-धीरे एक कठोर निर्णय का रूप लेने लगी।
उसे अभी यह नहीं पता था कि उसका फैसला केवल उसका अपना जीवन नहीं बदलेगा, बल्कि एक दिन कुलवंत सिंह की कहानी में भी एक रहस्यमय मोड़ बन जाएगा।
क्योंकि कभी-कभी एक पीढ़ी का लिया हुआ निर्णय अगली पीढ़ी की नियति बन जाता है।
क्रमशः…