Dastaan e Mohabbat..- 1 in Hindi Love Stories by sneha books and stories PDF | दास्तान ए मोहब्बत..- 1

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दास्तान ए मोहब्बत..- 1

🖤 दास्ताँ-ए-मोहब्बत 🖤

कुछ मुलाक़ातें तक़दीर का पैग़ाम बन जाती हैं,कुछ अनजान सूरतें दिल में सवाल बन जाती हैं।कहाँ मालूम था उस रात दोनों को,कि एक छोटी-सी मुलाक़ात उनकी कहानी बन जाएगी।🖤 रात के 8:40 बजे | शहर की सुनसान सड़क

रात का वक़्त था।

शहर की चमचमाती सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही कम होने लगी थी। ऊँची इमारतों के बीच से गुज़रती एक सुनसान सड़क पर काली मर्सिडीज़ तेज़ी से आगे बढ़ रही थी।

गाड़ी के अंदर बैठा शख़्स अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था।

काली शर्ट, काली पैंट, कलाई पर महँगी घड़ी, उँगली में चाँदी की अंगूठी, चौड़े कंधे और तीखे नैन-नक़्श। उसकी भूरी आँखों में ऐसा ठंडापन था, जिसे देखकर सामने वाला अपनी बात कहने से पहले भी सौ बार सोचता।

ज़ायान मिर्ज़ा।

उम्र उनतीस साल।

अंतरराष्ट्रीय माफिया की दुनिया का वह नाम, जिसके सामने बड़े-बड़े लोग भी अपनी आवाज़ धीमी कर लेते थे। उसके लिए डर का कोई मतलब नहीं था। उसे न मौत का ख़ौफ़ था, न किसी दुश्मन की धमकियों की परवाह।

वह अपनी ज़िंदगी अपने नियमों पर जीता था।

उस रात भी वह अकेला अपनी मर्सिडीज़ चला रहा था। न कोई ड्राइवर, न कोई बॉडीगार्ड।

तभी अचानक—

धाँय!

गोली की आवाज़ से रात का सन्नाटा टूट गया।

ज़ायान ने तुरंत गाड़ी पर नियंत्रण बनाए रखा। पहली गोली कार के शीशे से टकराई और दूसरी गोली उसके कंधे में जा लगी।

उसके जबड़े तन गए।

कंधे से ख़ून बहने लगा, लेकिन उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी। उसने रियर-व्यू मिरर में पीछे देखने की कोशिश की। सड़क के किनारे कुछ परछाइयाँ दिखाई दीं।

ज़ायान ने गाड़ी सड़क के किनारे रोकी और अपने घायल कंधे को दबाया।

ज़ायान: "इतनी-सी गोली से ज़ायान मिर्ज़ा को रोकने चले हैं?"

उसने अपना फ़ोन उठाया, लेकिन लगातार बहते ख़ून के कारण उसके शरीर में कमज़ोरी बढ़ने लगी।

उसने फ़ोन सीट पर रख दिया और कुछ पल अपनी आँखें बंद करके साँस सँभालने लगा।

वह अभी होश में था, मगर उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी।

उसे क्या पता था कि कुछ ही देर में उसकी ज़िंदगी में एक ऐसी लड़की आने वाली थी, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।🌙 उसी सड़क पर | माहिरा क़ुरैशी

दूसरी तरफ़, माहिरा क़ुरैशी अपनी स्कूटी से घर लौट रही थी।

उम्र उन्नीस साल।

आसमानी रंग का सलवार-क़मीज़, सफ़ेद दुपट्टा और कंधे पर छोटा-सा बैग।

कुछ देर पहले उसकी अम्मी ने उसे घर का ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए बाज़ार भेजा था। सामान ख़रीदते-ख़रीदते देर हो गई थी, इसलिए वह अब जल्दी घर पहुँचना चाहती थी।

माहिरा ज़िंदादिल लड़की थी। थोड़ी मुँहफट ज़रूर थी, लेकिन उसका दिल साफ़ था। किसी को मुसीबत में देखकर अनदेखा करना उसे नहीं आता था।

वह अपनी स्कूटी चला ही रही थी कि उसकी नज़र सड़क किनारे खड़ी काली मर्सिडीज़ पर पड़ी।

पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया, लेकिन तभी उसकी नज़र गाड़ी के पास बैठे एक आदमी पर गई।

उसकी काली शर्ट पर ख़ून लगा था।

माहिरा ने तुरंत ब्रेक लगाया।

माहिरा: "या अल्लाह!"

वह स्कूटी खड़ी करके तेज़ी से उसके पास पहुँची।

माहिरा: "सुनिए! क्या हुआ आपको?"

ज़ायान ने अपनी नज़रें उठाकर उसे देखा।

ज़ायान: "कुछ नहीं। आप जाइए यहाँ से।"

माहिरा की नज़र उसके कंधे पर गई। वहाँ से ख़ून बह रहा था।

माहिरा: "कुछ नहीं? आपको गोली लगी है!"

ज़ायान: "मुझे दिखाई दे रहा है।"

माहिरा ने हैरानी से उसे देखा।

या अल्लाह! इस आदमी को गोली लगी है या इसने कोई छोटी-सी चोट लगने की बात कही है?

माहिरा: "तो फिर आपको अस्पताल जाना चाहिए!"

ज़ायान: "आप अपने काम से काम रखिए और यहाँ से जाइए।"

माहिरा कुछ पल उसे देखती रही।

माहिरा: "मैं तो बस आपको अस्पताल जाने के लिए कह रही हूँ। आपके कंधे से ख़ून बह रहा है और आप यहाँ बैठे हैं!"

ज़ायान: "मुझे पता है मुझे क्या करना है।"

माहिरा: "तो फिर जा क्यों नहीं रहे हैं?"

ज़ायान ने उसे घूरा।

ज़ायान: "आपको हर बात का जवाब देना ज़रूरी लगता है?"

माहिरा: "और आपको हर बात पर गुस्सा करना ज़रूरी लगता है?"

ज़ायान की आँखों में सख़्ती उतर आई।

ज़ायान: "अपनी हद में रहिए।"

माहिरा ने गहरी साँस ली।

माहिरा: "देखिए, मुझे आपसे बहस करने का कोई शौक़ नहीं है। आपको गोली लगी है। आपको अस्पताल जाना चाहिए, बस!"

ज़ायान ने उठने की कोशिश की।

ज़ायान: "मैंने कहा ना, मुझे—"

लेकिन उसकी बात अधूरी रह गई।

अचानक उसके कदम लड़खड़ाए। उसने कार का सहारा लेने की कोशिश की, मगर उसका हाथ फिसल गया।

माहिरा: "अरे! संभलकर!"

वह तुरंत उसे सँभालने के लिए आगे बढ़ी।

ज़ायान ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।

अगले ही पल उसका शरीर ढीला पड़ गया।

माहिरा: "सुनिए! क्या हुआ आपको?"

ज़ायान बेहोश हो चुका था।

माहिरा ने घबराकर उसे सँभाला।

माहिरा: "या अल्लाह! अभी तो मुझसे बहस कर रहे थे और अब बेहोश हो गए!"

उसने उसके कंधे की तरफ़ देखा। ख़ून लगातार बह रहा था।

उसकी आँखों में चिंता उतर आई।

माहिरा: "देखिए, अभी आपका और मेरा बहस करने का कोई मतलब नहीं है। आपके कंधे से बहुत ख़ून बह रहा है। प्लीज़, चलिए…"

वह जानती थी कि अब एक पल की भी देर नहीं करनी चाहिए।

उसने आसपास नज़र दौड़ाई। सड़क लगभग सुनसान थी। किसी तरह राहगीरों की मदद लेकर उसने एम्बुलेंस बुलाने का इंतज़ाम किया और ज़ायान को अस्पताल पहुँचाने में मदद की।

माहिरा को नहीं पता था कि वह आदमी कौन है।

उसे बस इतना पता था कि उसकी जान ख़तरे में थी।

किसी की पहचान पूछकर मदद नहीं की जाती,इंसानियत हर बार कोई वजह नहीं माँगती।कभी किसी अजनबी के लिए उठे कदम,तक़दीर की कहानी लिख जाते हैं।🏥 रात के 9:20 बजे | अस्पताल

अस्पताल पहुँचते ही ज़ायान को इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया।

डॉक्टरों ने तुरंत उसका इलाज शुरू कर दिया।

डॉक्टर: "इनका बहुत ख़ून बह चुका है। जल्दी से जाँच कीजिए और गोली निकालने की तैयारी कीजिए!"

नर्सें तेज़ी से काम करने लगीं।

माहिरा इमरजेंसी वार्ड के बाहर खड़ी बेचैनी से दरवाज़े को देख रही थी।

उसके हाथ काँप रहे थे।

माहिरा (मन में): या अल्लाह, इन्हें ठीक कर देना। किसी की ज़िंदगी बच जाए, इससे बड़ी बात क्या होगी?

कुछ देर बाद अस्पताल के एक कर्मचारी ने ज़ायान के सामान की जाँच करते हुए उसका पहचान-पत्र देखा।

उस पर लिखा नाम पढ़ते ही कर्मचारी के चेहरे का रंग बदल गया।

कर्मचारी: "ज़ायान मिर्ज़ा?"

पास खड़ी नर्स ने नाम सुना तो उसके हाथ काँपने लगे।

नर्स: "क्या ये वही ज़ायान मिर्ज़ा हैं?"

कर्मचारी ने धीरे से सिर हिलाया।

अस्पताल के कुछ कर्मचारियों के लिए यह नाम ही डर की वजह था। मगर इलाज कर रहे डॉक्टर, जिन्हें अभी उसकी पहचान का पता नहीं था, अपना काम करते रहे।

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।

डॉक्टर: "गोली निकाल दी गई है। इनकी हालत अभी गंभीर है, लेकिन इलाज चल रहा है। इन्हें निगरानी में रखना होगा।"

माहिरा ने राहत की साँस ली।

माहिरा: "डॉक्टर साहब, ये ठीक हो जाएँगे ना?"

डॉक्टर: "हम पूरी कोशिश कर रहे हैं।"

माहिरा ने सिर हिलाया।

जब उसे यक़ीन हो गया कि ज़ायान का इलाज चल रहा है, तो उसने घर लौटने का फ़ैसला किया। उसे अम्मी की फ़िक्र होने लगी थी।

वह चुपचाप अस्पताल से बाहर निकल गई।

न उसने अपना नाम बताया, न अपना पता दिया।

उसे इनाम नहीं चाहिए था। वह तो बस एक घायल इंसान की मदद करना चाहती थी।

लेकिन उसे क्या पता था कि जिस इंसान को वह पीछे छोड़कर जा रही थी, उसकी दुनिया में किसी अजनबी का यूँ आना कोई मामूली बात नहीं थी।🖤 रात के 11:15 बजे | ज़ायान का कमरा

अस्पताल के बाहर काली गाड़ियों का एक काफ़िला आकर रुका।

उनमें से एक आदमी तेज़ी से बाहर निकला।

आदिल।

ज़ायान मिर्ज़ा का असिस्टेंट और उसका सबसे भरोसेमंद आदमी।

ज़ायान पर हुए हमले की ख़बर मिलते ही वह अस्पताल पहुँचा था। वह सीधे ज़ायान के कमरे में गया।

डॉक्टरों ने उसे बताया कि ज़ायान का इलाज हो चुका है, मगर उसे अभी आराम की ज़रूरत है।

आदिल कमरे में ज़ायान के पास बैठ गया।

कुछ देर तक वह ख़ामोशी से अपने साहब को देखता रहा।

उसके लिए ज़ायान सिर्फ़ उसका बॉस नहीं था। वह ऐसा इंसान था, जिसके लिए आदिल किसी भी हद तक जा सकता था।

रात बीतती रही।

आदिल वहीं मौजूद रहा।

फिर धीरे-धीरे ज़ायान की पलकों में हरकत हुई।

उसने आँखें खोलीं।

आदिल: "साहब! आप होश में आ गए।"

ज़ायान ने कुछ पल कमरे को देखा, फिर आदिल की तरफ़ नज़र घुमाई।

ज़ायान: "आदिल…"

आदिल: "जी, साहब। मैं यहीं हूँ।"

ज़ायान ने कुछ पल ख़ामोशी रखी, फिर पूछा—

ज़ायान: "वो लड़की कहाँ है?"

आदिल ने उलझन में उसकी तरफ़ देखा।

आदिल: "कौन-सी लड़की, साहब?"

ज़ायान की आँखों में सख़्ती उतर आई।

ज़ायान: "वही लड़की, जो मुझे अस्पताल लेकर आई थी!"

आदिल: "लेकिन साहब, बाहर तो कोई लड़की ही नहीं है। अस्पताल के कर्मचारियों को भी उसके बारे में कुछ नहीं पता।"

ज़ायान कुछ पल ख़ामोश रहा।

फिर उसने सख़्त आवाज़ में कहा—

ज़ायान: "अस्पताल के हर एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक करो। मुझे पता लगाना है कि वो लड़की कौन है, कैसी दिखती है, उसका नाम क्या है, कहाँ रहती है, उसकी उम्र कितनी है और क्या करती है। उसके घर में कौन-कौन है, किस कॉलेज में पढ़ती है, उसकी सहेलियाँ कौन हैं और उसके बारे में जो कुछ भी पता चल सकता है, मुझे सब चाहिए!"

आदिल ने सिर झुका दिया।

आदिल: "जी, साहब।"

ज़ायान ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

ज़ायान: "दस मिनट। दस मिनट में मुझे उस लड़की की पूरी जानकारी चाहिए। एक भी बात अधूरी नहीं होनी चाहिए।"

आदिल: "जैसा आप कहें, साहब।"

आदिल तुरंत कमरे से बाहर निकल गया।

ज़ायान ने सिर तकिए से टिकाया।

उसके ज़ेहन में उसी लड़की का चेहरा घूम रहा था, जो उसकी हालत देखकर परेशान हो गई थी और उसके गुस्से के बावजूद उसे अस्पताल जाने के लिए कह रही थी।

ज़ायान (मन में): बहुत बोलती हो तुम…

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

लेकिन इस बार उसकी आँखों में गुस्से के साथ एक सवाल भी था।

आख़िर वह लड़की थी कौन?⏳ दस मिनट बाद | माहिरा की पूरी जानकारी

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

आदिल: "अंदर आ सकता हूँ, साहब?"

ज़ायान: "आओ।"

आदिल कमरे में दाख़िल हुआ। उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।

आदिल: "साहब, उस लड़की की पूरी जानकारी मिल गई है।"

ज़ायान ने हाथ बढ़ाकर फ़ाइल ले ली।

पहले पन्ने पर लिखा था—

नाम — माहिरा क़ुरैशी।

उम्र — उन्नीस वर्ष।

ज़ायान की नज़र अगले पन्ने पर गई।

फ़ाइल में माहिरा के घर का पता, उसके परिवार के सदस्यों के नाम, उसके कॉलेज की जानकारी, उसकी पढ़ाई, उसकी सहेलियों और भविष्य के सपनों से जुड़ी जानकारी थी।

ज़ायान हर पन्ना ख़ामोशी से पढ़ता रहा।

आदिल उसके सामने खड़ा था।

कुछ देर बाद ज़ायान ने फ़ाइल बंद कर दी।

ज़ायान: "माहिरा क़ुरैशी…"

उसने पहली बार उस लड़की का नाम लिया।

वही लड़की, जिसने उसके सामने खड़े होकर उसकी बातों का जवाब दिया था।

वही लड़की, जिसने उसकी ज़िद के बावजूद उसे अकेला नहीं छोड़ा था।

और वही लड़की, जिसे अब तक यह पता भी नहीं था कि उसने किसकी जान बचाई है।

ज़ायान ने आदिल की तरफ़ देखा।

ज़ायान: "आदिल!"

आदिल: "जी, साहब?"

ज़ायान: "सुबह मेरी गाड़ी तैयार रखना।"

आदिल ने हैरानी से पूछा—

आदिल: "कहाँ जाना है, साहब?"

ज़ायान ने फ़ाइल पर पड़ी माहिरा की तस्वीर पर नज़र डाली।

ज़ायान: "मुझे उस लड़की के कॉलेज जाना है।"

आदिल: "जी, साहब।"

ज़ायान ने फ़ाइल अपने पास रख ली।

ज़ायान: "देखता हूँ, मिस माहिरा क़ुरैशी… तुम आख़िर हो कौन।"

एक नाम मिला था, मगर कहानी अभी अधूरी थी,एक तस्वीर मिली थी, मगर पहचान अभी अधूरी थी।वो बेख़बर थी अपने छोटे-से एहसान से,और वो बेचैन था उस अनजान इंसान से।🖤 एक तरफ़ ज़ायान, दूसरी तरफ़ माहिरा

उस रात माहिरा अपने घर लौट आई थी।

अम्मी ने देर से आने की वजह पूछी तो उसने बस इतना बताया कि रास्ते में एक घायल आदमी मिल गया था, जिसे अस्पताल पहुँचाने में देर हो गई।

उसे नहीं पता था कि वह आदमी कौन था।

न उसे उसके नाम की ख़बर थी, न उसकी दुनिया की।

उसके लिए वह बस एक घायल इंसान था, जिसकी मदद करना उसने अपना फ़र्ज़ समझा था।

दूसरी तरफ़, ज़ायान मिर्ज़ा की फ़ाइल में अब उसका नाम मौजूद था।

अगली सुबह ज़ायान उसके कॉलेज जाने वाला था।

लेकिन माहिरा को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था।

उसे क्या पता था कि जिस आदमी से उसने सड़क पर बहस की थी, वह अब उसकी ज़िंदगी में दोबारा दाख़िल होने वाला है।

कभी-कभी एक रात की मुलाक़ात,ज़िंदगी भर का सवाल बन जाती है।जिसे हम अजनबी समझकर भूल जाते हैं,वही कहानी का सबसे ख़ास किरदार बन जाता है।

जारी रहेगा… ❤️‍🔥