मेडिकल कॉलेज के प्रथम वर्ष का रिज़ल्ट आया तो मेरी खुशी केवल मेरी नहीं रही।
माँ-पापा खुश थे। मेरी बहनें खुश थीं। प्रीति के परिवार ने मुझे बधाई दी। गाँव में जिन्हें मेरे अंक पता चले, वे पापा से कहते, “मधुकर, तुम्हारी बेटी अच्छा कर रही है।”
पापा हर बार ऐसे मुस्कुराते जैसे मैंने उन्हें फिर से दसवीं का रिज़ल्ट दिखाया हो।
मैंने खेतों में मजदूरी की थी। अब मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी। मेरे लिए यह रिज़ल्ट पापा की मेहनत और माँ के संघर्ष की जीत था। उन लोगों को जवाब भी था जिन्होंने कभी पूछा था कि गाँव की लड़की इतना पढ़कर क्या करेगी।
छुट्टियाँ शुरू हुईं तो मैं गाँव लौट आई।
घर में कदम रखते ही मेरी छोटी बहनें मेरा बैग खोलकर देखने लगीं। माँ पूछ रही थीं कि हॉस्टल में खाना ठीक मिलता है या नहीं। पापा यह जानना चाहते थे कि अगले साल की पढ़ाई कैसी होगी। इतने सवालों के बीच मुझे लगा कि अहमदनगर से घर तक का रास्ता कितना भी लंबा हो, पहुँचते ही थकान उतर जाती है।
कुछ दिन बाद मैं अपनी दोस्त और क्लासमेट प्रीति के साथ उसके खेत पर गई।
प्रीति का परिवार गाँव के संपन्न परिवारों में गिना जाता था। उनके पास काफी जमीन थी और गाँव में राशन की दुकान भी थी। उसके बड़े भाई नवल खेती और दुकान, दोनों संभालते थे।
नवल को मैं पहले से जानती थी। जब मैं गाँव में पढ़ती थी, तब उन्होंने कुछ बार मेरी मदद की थी। बाद में उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा, तो उन्होंने अपने पिता के काम में हाथ बँटाना शुरू कर दिया।
उस दिन मैं और प्रीति खेत की ओर जा रहे थे कि नवल सामने से आते दिखाई दिए। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी और वह कुछ पल रुक गए।
प्रीति ने हँसकर कहा, “विशाखा, तुम तो मेरे भैया को जानती ही हो। ये हैं मेरे बड़े भाई नवल।”
“नमस्ते,” मैंने कहा।
नवल ने नमस्ते का जवाब दिया। फिर पूछा, “अहमदनगर की पढ़ाई कैसी चल रही है?”
“अच्छी,” मैंने कहा। “पहले साल का रिज़ल्ट भी आ गया।”
“पता है। प्रीति ने घर में सबको बताया।” वह हल्के से मुस्कुराए। “बहुत अच्छे अंक आए हैं तुम्हारे।”
मैंने धन्यवाद कहा। प्रीति हमें खेत की दूसरी ओर कुछ दिखाना चाहती थी, इसलिए मैं उसके साथ चल दी। पीछे मुड़कर देखा तो नवल वहीं खड़े थे।
मुझे पहले भी कभी-कभी लगा था कि शायद वह मुझे पसंद करते हैं। लेकिन मैंने इस बारे में सोचना जरूरी नहीं समझा। उनका व्यवहार अब तक मेरे साथ ठीक रहा था। और मेरी ज़िंदगी में उस समय सबसे बड़ी जगह पढ़ाई की थी। मैं किसी प्रेम-संबंध के लिए गाँव से शहर नहीं गई थी। मैं डॉक्टर बनने गई थी।
अगले दिन मुझे कुछ सामान चाहिए था, इसलिए मैं प्रीति के परिवार की राशन की दुकान पर चली गई। वहाँ प्रीति भी थी और नवल भी।
नवल सामान निकालकर दे रहे थे। मैं जो माँगती, वह तुरंत ढूँढ देते, लेकिन बीच-बीच में उनकी नज़र मुझ पर टिक जाती। मैंने एक-दो बार उनकी ओर देखा और फिर सामान गिनने लगी। प्रीति से कॉलेज की कोई बात की, पैसे दिए और घर लौट आई।
मैं चाहती थी कि उस बात को वहीं छोड़ दूँ। मगर अगले दिन अंजली ने नदी पर मुझे रोक लिया।
हम दोनों कपड़े धोने गए थे। वह मेरे पास बैठी कपड़ों को पानी में डुबो रही थी। कुछ देर तक उसने कोई बात नहीं की, फिर अचानक बोली, “दीदी?”
“क्या?”
“प्रीति दीदी के भैया नवल आपको बहुत पसंद करते हैं।”
मेरे हाथ रुक गए। “तुझे किसने बताया?”
“उन्होंने ही कहा है।”
मैंने उसकी ओर देखा। “उन्होंने तुझसे मेरे बारे में बात की?”
अंजली ने सिर हिलाया। वह शायद मेरे जवाब का इंतज़ार कर रही थी।
“देख अंजली,” मैंने कहा, “मैं इन सब चीज़ों में नहीं पड़ना चाहती।”
“लेकिन दीदी, वो तो बस—”
“और अगर नवल तुमसे दोबारा ऐसी कोई बात करे, तो मेरी तरफ से कोई संदेश मत लेना।”
अंजली चुप हो गई। मैंने कपड़े उठाकर पास रखे और आगे कहा, “मुझे उनसे अकेले में मिलने की जरूरत नहीं है। मंदिर या कहीं और मिलने के लिए कहें, तब भी मना कर देना।”
उसने मेरी ओर देखा। “एक बार बात तो कर सकती हो।”
“जिस बात का मेरा जवाब तय है, उसके लिए मिलने क्यों जाऊँ?”
अंजली ने फिर कुछ नहीं कहा। शाम को उसने एक बार और कहा, “दीदी, एक बार मिल तो लो।” मैंने उसे देखा तो वह बात अधूरी छोड़कर चली गई।
मैं नहीं चाहती थी कि मेरी छोटी बहन मेरे और नवल के बीच संदेश लाती-जाती रहे। नवल अच्छे आदमी हों, तब भी मुझे उन्हें पसंद करना जरूरी नहीं था। यह बात मैं खुद उनसे कहना चाहती थी।
अगले दिन कुएँ पर वही मौका मिल गया।
अंजली मेरे साथ पानी लेने आई थी। नवल वहाँ आ गए। उन्होंने सीधे अंजली से पूछा, “अंजली, तुमने मेरा संदेश अपनी दीदी को नहीं बताया था क्या?”
अंजली ने मेरी ओर देखा, फिर चुप हो गई।
मैंने पानी का बर्तन नीचे रखा। “मैंने सब सुन लिया है।”
नवल मेरी ओर मुड़े। शायद उन्हें उम्मीद थी कि मैं आगे उनकी बात सुनूँगी।
मैंने कहा, “देखिए नवल, अगर आपको मुझसे कुछ कहना था, तो अब मेरा जवाब भी सुन लीजिए। मैं अभी किसी रिश्ते के बारे में नहीं सोच रही। मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर है।”
वह कुछ पल चुप रहे।
“मैंने आपको कभी—” उन्होंने कहना शुरू किया।
“मुझे पता है आपने मुझसे सीधे कुछ नहीं कहा,” मैंने उन्हें रोका। “इसीलिए मैं भी आपसे सीधे कह रही हूँ। आगे इस बात के लिए अंजली को बीच में मत लाइए। अगर फिर आपने उससे या मुझसे इस बारे में बात की, तो मैं प्रीति को बता दूँगी।”
नवल का चेहरा उतर गया। उन्होंने बहस नहीं की।
मैंने बर्तन उठाया और अंजली को साथ लेकर घर लौट आई।
“तूने पहले ही दिन मुझे सारी बात क्यों नहीं बताई?” रास्ते में मैंने उससे पूछा।
“लगा, शायद तुम उनसे बात कर लो,” अंजली बोली।
“मेरी तरफ से ऐसा फैसला मत किया कर।”
उसने धीरे से कहा, “ठीक है।”
उस दिन के बाद छुट्टियों में नवल हमारे सामने नहीं आए। मुझे पता था कि उन्हें मेरी बात से दुख पहुँचा होगा। मुझे इसका बुरा लगा, लेकिन अपना जवाब बदलने का कोई कारण नहीं था।
गाँव में लड़की और लड़के का नाम साथ जुड़ते देर नहीं लगती थी। सवाल भी अक्सर लड़की से ही पूछे जाते थे। मैं प्रीति की दोस्त थी, नवल को जानती थी और उनके परिवार का सम्मान करती थी। इसलिए मैं चाहती थी कि बात वहीं रुक जाए।
छुट्टियाँ खत्म हुईं। मैं और प्रीति वापस अहमदनगर आ गए। कॉलेज की पढ़ाई शुरू होते ही मैं अपने काम में लग गई। मेरे लिए नवल वाली बात पीछे छूट चुकी थी।
फिर एक शाम मैंने प्रीति को हॉस्टल के कमरे में रोते हुए देखा।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
वह कुछ देर तक बोल नहीं पाई। फिर बोली, “भैया ने शराब पीना शुरू कर दिया है।”
“नवल?”
“हाँ। घर से माँ का फोन आया था।”
मैं उसके पास बैठ गई। “क्यों?”
प्रीति ने आँसू पोंछे। “किसी लड़की से बहुत प्यार करते हैं। वह उनसे बात नहीं करती। घरवाले पूछते हैं तो उसका नाम भी नहीं बताते। माँ कह रही थीं कि दिन-रात परेशान रहते हैं और अब पीने भी लगे हैं।”
मेरे भीतर अचानक डर उठ खड़ा हुआ।
मैंने पूछा, “तुझे पता है वह लड़की कौन है?”
प्रीति ने सिर हिलाया। “नहीं। अगर पता होता तो उससे कम से कम बात करती। भैया अपनी हालत क्यों खराब कर रहे हैं?”
मैं चुप रही।
मुझे पूरा यकीन नहीं था कि नवल ने प्रीति को जिस लड़की के बारे में बताया है, वह मैं ही हूँ। मगर कुएँ पर हुई बात याद आ रही थी। क्या मेरे इंकार के बाद उन्होंने शराब पीना शुरू किया था? अगर प्रीति को मेरा नाम पता चला तो वह क्या सोचेगी?
मैंने अपने आप से वही बात दोहराई जो मैंने नवल से कही थी—मैंने उन्हें कोई उम्मीद नहीं दी थी। उनसे प्यार की बात नहीं की थी। शादी का वादा नहीं किया था। अपना निर्णय साफ बताया था।
फिर भी प्रीति को रोते देखकर मैं सहज नहीं रह पा रही थी। वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। उसके दुख की वजह में कहीं मेरा नाम जुड़ा है, यह सोचकर मैं बेचैन हो गई।
कुछ दिनों बाद प्रीति का जन्मदिन था। उसके परिवार ने गाँव में कार्यक्रम रखा और मुझे भी बुलाया। हम छुट्टी लेकर गए।
अगली सुबह प्रीति के घर पर नवल दिखाई दिए। वह पहले से अलग लग रहे थे। चेहरे पर थकान थी। प्रीति किसी काम से भीतर गई तो मुझे उनसे बात करने का मौका मिला।
“नवल, आप खुद को बर्बाद क्यों कर रहे हैं?” मैंने पूछा।
वह मेरी ओर देखने लगे।
“प्रीति बहुत परेशान है। घर में भी सब आपकी चिंता कर रहे हैं।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैंने आगे कहा, “एक लड़की आपसे बात नहीं करना चाहती, तो क्या ज़िंदगी खत्म हो गई? शराब पीने से आपको क्या मिलेगा? अपनी सेहत क्यों खराब कर रहे हैं? आगे बढ़िए। कभी आपको कोई अच्छी लड़की पसंद आएगी, शादी भी होगी।”
नवल ने मेरी पूरी बात सुनी। फिर बहुत शांत आवाज़ में पूछा, “विशाखा, क्या आपने कभी किसी से प्यार किया है?”
मैंने कहा, “नहीं।”
उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन उसमें खुशी नहीं थी।
“तो आप अभी नहीं समझ पाएँगी।”
इतना कहकर वह खेतों की ओर चले गए।
मैं वहीं खड़ी रह गई। मैं उनसे कहना चाहती थी कि किसी से प्यार करने का अर्थ यह नहीं होता कि उसके इंकार के बाद अपनी ज़िंदगी खत्म कर दी जाए। लेकिन वह जा चुके थे।
उसी दिन मुझे और प्रीति को अहमदनगर लौटना था। हमने बस पकड़ी। प्रीति रास्ते में अपने घर की बातें करती रही। मैं बीच-बीच में जवाब देती रही, मगर नवल का सवाल मेरे मन में घूम रहा था—क्या आपने कभी किसी से प्यार किया है?
कुछ समय बाद उनकी हालत की खबरें और चिंताजनक होने लगीं। वह शराब छोड़ नहीं पा रहे थे। तबीयत बिगड़ने पर जाँच हुई। डॉक्टरों ने बताया कि उनके लीवर पर गंभीर असर पड़ा है। उन्हें उसी मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ हम पढ़ते थे।
प्रीति और मैं कॉलेज के बाद उनसे मिलने जाती थीं।
पहले दिन प्रीति ने उनसे नाराज़ होकर कहा, “आपको हमारी ज़रा भी चिंता नहीं है?”
नवल ने नज़रें फेर लीं। वह खुद बहुत कमजोर लग रहे थे।
मैंने पास जाकर कहा, “इलाज चल रहा है। डॉक्टर जो कह रहे हैं, उसे मानिए।”
उन्होंने मेरी ओर देखा, फिर धीमे से सिर हिला दिया।
डॉक्टरों ने साफ चेतावनी दी थी कि उन्हें शराब बिल्कुल छोड़नी होगी। प्रीति रोज़ उनसे यही कहती। मैं भी समझाती कि उनके सामने अभी जीवन है, घर है और वह लोग हैं जो उन्हें ठीक देखना चाहते हैं।
कुछ दिनों बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। प्रीति को लगा अब वह संभल जाएँगे। मुझे भी यही उम्मीद थी।
लेकिन उन्होंने शराब नहीं छोड़ी।
और फिर एक दिन नवल की मौत की खबर आई।
प्रीति पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। फिर वह रोने लगी। उसकी आँखों में भाई को खोने का दर्द था, और धीरे-धीरे उस दर्द के साथ गुस्सा भी आने लगा।
“उस लड़की ने मेरे भैया की ज़िंदगी बर्बाद कर दी,” वह बार-बार कहती। “एक बार उनसे बात कर लेती तो क्या हो जाता?”
मैं उसके पास बैठी रही।
अंजली भी वहाँ थी। उसने मेरी ओर देखा। मैं उसकी ओर नहीं देख पाई। हम दोनों जानते थे कि नवल किससे बात करना चाहते थे।
प्रीति रोते-रोते उस अनजान लड़की को बददुआ देने लगी।
“वह कभी खुश न रहे। उसका कभी भला न हो।”
मैंने प्रीति का हाथ पकड़ा। उस समय वह अपने भाई के दुख में थी। मैं उससे यह नहीं कह सकी कि नवल ने अपनी ज़िंदगी के साथ जो किया, उसका फैसला मैंने नहीं लिया था। मुझे डर भी था कि मेरा नाम सुनते ही वह मुझे उसी रूप में देखेगी जिस रूप में अभी उस अनजान लड़की को देख रही है।
मैं चुप रही। मेरा सच जानने वाली अंजली भी चुप रही।
उस रात हॉस्टल लौटकर मैं बहुत देर तक जागती रही।
क्या मैंने नवल से प्यार किया था? नहीं।
क्या मैंने उन्हें कभी कोई सपना दिखाया था? नहीं।
क्या मैंने उनसे शादी का वादा किया था? नहीं।
मैंने अपना जवाब साफ शब्दों में दिया था। उनका दुख सच्चा रहा होगा। प्रीति का दुख भी सच्चा था। लेकिन मैंने किसी से उसका जीवन खत्म करने को नहीं कहा था। मैंने केवल अपनी सीमा तय की थी।
फिर भी प्रीति की बददुआ मेरे कानों में बार-बार गूँज रही थी। वह मेरी दोस्त थी। उसे कुछ पता नहीं था। उसे पता चल गया तो क्या हमारी दोस्ती बच पाएगी?
कुछ दिन बाद अंजली मेरे पास आई। वह बाकी बहनों से दूर खड़ी रही और धीमे से बोली, “दीदी, प्रीति दीदी को कभी बताओगी?”
मैंने उसकी ओर देखा। “अभी नहीं। वह अपने भाई के लिए रो रही है।”
“और बाद में?”
मेरे पास जवाब नहीं था।
अंजली ने कुछ और नहीं पूछा। वह जानती थी कि कुएँ पर मैंने नवल से क्या कहा था। यह भी जानती थी कि नवल के मन में किसके लिए प्यार था। उस समय मुझे लगा, कम से कम मेरी बहन तो मेरे बारे में गलत नहीं सोचेगी।
मैंने उस पर भरोसा किया।
वर्षों बाद, जब मेरी शादी का सच मेरे सामने आने लगा, तब मुझे यह दिन भी याद आया—प्रीति के आँसू, उसकी बददुआ और मेरे पास खड़ी अंजली की खामोशी।
क्योंकि अंजली मेरी ज़िंदगी का वह पुराना सच जानती थी, जिसे मैंने प्रीति से छिपाकर रखा था।