यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                        :  प्रकरण - 24 :

बिभूति को मिलने की ख्वाहिश मेरे दिल में एक दिये की तरह जलती रही थी.. ना तो वह कभी बुझी थी ना तो उस की रौशनी मंद हुई थी. उम्मीद की किरणों के उजाले में वह सदैव जीवंत रही थी.

एक बार मेरी तबियत ख़राब थी. उस वक़्त मैंने कृष्णा को गुजारिश की थी.

" मुझे बिभूति से बात करनी हैं."

उस दिन इतवार था. सुबह के दस बज गये थे. फिर भी मैं बिस्तर में लेटा था. कृष्णा ने मेरे कहने पर बिभूति को वीडियो कोल लगाया था.

उस बेचारी को कुछ मालूम नहीं था. इतनी देर तक मुझे बिस्तर में देखकर उस ने एक दादी मा की तरह डांट दिया था.

" क्या बडे पापा! दस बज गये और आप कुम्भ कर्ण की तरह सोये हुए हो. "

उस पर कृष्णा ने उसे जानकारी दी थी.

" तुम्हारे बडे पापा की तबियत कुछ ज्यादा ख़राब हो गई हैं. वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे हैं. "

यह सुनकर उस ने मेरी माफ़ी मांगी थी.. और जल्द ठीक हो जाने की ईश्वर को प्रार्थना की थी.

उसी समय अमरिका से म्युझिका का फोन आया था.

मेरी तबियत के बारे में सुनकर वह भी चिंतित हो गई थी.

उस ने अपनी आदत के मुताबिक, दादी मा के अंदाज में अपना ख्याल रखने की मुझे हिदायत दी थी.

इतने साल के बाद भी उस का प्यार तनिक भी कम नहीं हुआ था. उन की बेटी रिधिमा ने भी मेरा हाल चाल पूछा था. उस से मानो क़ोई जादू या चमत्कार हो गया था.

मुझ में काफ़ी सुधार आ गया था.

वह अमरिका में साहित्य क्षेत्र से जुडी हुई थी.

मैंने उसे बताया था:

" मैं अपनी जीवनी के आधारित उपन्यास लिख रहा हूं. "

" यह तो अच्छी बात हैं? क्या नाम पसंद किया हैं? "

' यादों की सहेलगाह '

" दादू! मम्मी ने मुझे सब कुछ बताया हैं.. यह हमारा सौभाग्य हैं जो भगवान ने आप को हमारी जिंदगी में भेज दिया हैं. "

" यह मेरी भी खुशनसीबी हैं, भगवान ने मुझे तुम्हारी मम्मी का उपहार दिया हैं, जिस ने मुझे हरदम उस के दादू होने का ऐसा एहसास दिलाया हैं.. "

" दादू! मैं साहित्य में पी एच डी कर रही हूं. मेरा यहाँ लेखकों और प्रकाशको साथ ज्यादा उठना बैठना होता हैं..आप को क़ोई मदद की आवश्यकता हो तो जरूर मुझे बताइयेगा. यहाँ प्रकाशन कार्य सरल हैं और अच्छा पुरस्कार भी मिलता हैं !"

" अच्छा किया बेटा. तूने मुझे बता दिया.. मेरा सारा तनाव यह सुनकर कम हो गया हैं . यहाँ, लोगो पैसे देकर पुस्तक या अख़बार पढने की आदत नहीं हैं. लोग मांगकर किताब या अख़बार पढ़ लेते हैं . सब से बड़ी अफ़सोस जनक बात हैं . यहाँ क़ोई ऐसा वेतन भी नहीं मिलता जो किसी को लेखन कार्य को व्यवसाय बनाने की हिम्मत प्रदान कर सके.

" हमारा भारत बहुत से मुआमले में आगे निकल गया हैं, लेकिन संकुचित मानसिकता की वजह से वह जरूरी चीजों में पिछवाड़े पीछे रह गया हैं. "

" मेरे घर वालों को भी मेरा लिखना पसंद नहीं. क्यों की उस से क़ोई आमदनी नहीं होती हैं. "

" सही हैं! ज़ब आप क़ोई काम में इतना जुड़ जाते हो तो कम से कम गुजारे के लिये तो पैसे चाहिये.. वह न मिले तो विरोध करना सहज हो जाता हैं.

" मैं भी यही मानता हूं. लेकिन मैं क्या करुं? भगवान ने मेरे हिस्से में यही काम छोडा हैं. मैंने ना जाने कितनी लघु कथा ये लिखी हैं, जो प्रकाशित भी हुई है लेकिन पैसों के मुआमले में मुझे नाकामी ही हाथ आई हैं.. "

" क़ोई बात नहीं उपन्यास का लेखन कार्य समापन होने तक आप की बेहतरीन कहानी भेजते रहियेगा.."

" लेकिन वह गुजराती या हिंदी में हैं. "

" क़ोई बात नहीं. आप मुझे भेज दो. मैं उन का अंग्रेजी में अनुवाद कर लूंगी. "

और मैंने ' मीनू मास्टर', 'आश्रित ' ' ओह मा तु? '' फ्लोरा डिसोजा ', और ' खल नायक ' कहानिया तुरंत मोबाईल के जरिये रिधिमा को पोस्ट कर दी थी. जो तीन महिने के भीतर पांच विधविध सामायिक में प्रकाशित हुई थी जिस का मुझे अच्छा खासा पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था.

इस सफलता ने मुझे रातो रात दोबारा मुझे जवान कर दिया था.

सब से पहले उस ने ' मीनू मास्टर ' कहानी की सराहना की थी.

पिता की आँखों के सामने एक जवान बेटी दम तोड़ देती हैं., इस बात ने उस के घर वालों को तो रुलाया था, साथ में म्युझिका और रिधिमा की आँखों में भी आंसू लडी बरसाई थी.

ज़ब एक कहानी का कथा बीज किसी को रुलाता हैं, उसे ही वास्तव में टेलंट कहां जाता हैं, उसे कला का बेनमुन नमूना माना जाता हैं..

कहानी के अंत में बारे में उस ने बखूबी से कहां था:

" दम तोड़ने के समय अपने पति को दूसरी शादी के लिये मिन्नत करना यह अपने आप में बड़ी महानता हैं. दुनिया में उस से बढ़कर कुछ नहीं होता. "

मरते दम तक उसे एक बात का अफ़सोस रहा था.

उस की लापरवाही की बजह से उस का भाई अपाहिज हो गया था. यह बात उसे अपराधी होने का निरंतर एहसास करा रही थी. उस में क़ोई वजूद नहीं था. हकीकत में वह ईश्वर की मर्जी थी.

उस की जिद के कारण उसे दूसरी लड़कियो की तरह भाई मिला था, जिसे वह राखी बांधना चाहती थी..लेकिन उस ने सुंदर को उस के काबिल नहीं रखा था.

हादसे में उस के दोनों हाथ कुहनी के नीचे से कट गये थे. जिस की वजह से वह अपने भाई को राखी बाँधने के लायक नहीं रही थी.

उसे राखी का झूनून था.. ओबसेशन था..

कभी भैया यह बहना ना पास होगीकहीं परदेस बैठी उदास होगी... (2)बहना उदास होगी मिलने की आश होगीजाने कौन बिछड़ जाये कभी भाई बहना

और उस की बहन बिछड़ गई थी.

यह एक भारी सदमा था.

भाई के साथ हादसा हुआ था.. उस में उस का इतना ही दोष था. वह राखी दिलाने के लिये उस के भाई के साथ जा नहीं पाई थी. उसे दूसरों के भरोसे छोड़ दिया था और एक खटारे ने उसे कुचल दिया था.

इस वजह से उस के दोनों हाथों को गहरी चोट लगी थी. जिस ने उसे सदा के लिये उसे अपाहिज कर दिया था.

यह बात सुनकर रिधिमा के संवेदनशील दिल को बहुत संताप हुआ था.

             00000000 ( क्रमशः )