एपिसोड 1: वो नई दुकान
वह पुराना जाना-पहचाना रास्ता आज थोड़ा अलग लग रहा था। शाम के धुंधले उजाले में जब मैं अपने हमेशा वाले मोड़ पर पहुँचा, तो देखा कि वहाँ एक पुरानी छोटी सी दुकान थी—जो कल तक वहाँ बिल्कुल नहीं थी। दुकान के बाहर एक पुरानी पीतल की घड़ी टंगी थी, जिसकी सुई आगे नहीं, पीछे की तरफ घूम रही थी।
मैं थोड़ा हिचकिचाया, पर बिना सोचे-समझे अंदर चला गया।
अंदर एक पुराना प्याला रखा था जिसमें से अभी भी धुआँ निकल रहा था, और लकड़ी की मेज़ पर एक पुरानी चमड़े की जिल्द (leather-bound) वाली डायरी खुली हुई थी। मैं पास गया और जैसे ही नज़र डायरी पर पड़ी, मेरे होश उड़ गए।
डायरी के पहले पन्ने पर मेरा ही नाम लिखा था, और उसके नीचे आज की ही तारीख़! और उससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि उस पन्ने पर वही सब लिखा था जो मैं पिछले एक घंटे से कर रहा था... एक-एक कदम, एक-एक सोच।
घबराकर मैंने जल्दी से अगला पन्ना पलटना चाहा, पर तभी दुकान के पीछे से एक हल्की सी आवाज़ आई:
"अगले पन्ने पर क्या लिखा है, यह जानने के लिए उतावले मत हो... पहले यह बताओ, जो पीछे छूट गया, क्या उसे बदलना चाहते हो?"
दुकान के पीछे से आई उस भारी आवाज़ ने मेरे कदमों को वहीं रोक दिया। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
"कौन हो तुम?" मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा।
दुकान के अंधेरे कोने से एक लंबा, पुराने ज़माने के कपड़े पहने आदमी बाहर आया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे उसने सदियों का समय देख लिया हो। उसने अपनी पतली उँगलियों से टेबल पर रखी उस चमड़े की डायरी को छुआ।
"मैं कोई भी नहीं, बस इस दुकान का रखवाला हूँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा। "यहाँ वही लोग पहुँचते हैं जो अपनी ज़िंदगी के किसी मोड़ पर ठहरकर पीछे देखना चाहते हैं।"
उसने डायरी का पहला पन्ना पलटा।
मैंने झुककर देखा, तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। पन्ने पर मेरी बचपन की एक भूली-बिसरी तस्वीर उकेरी हुई थी—वही दिन जब मैंने अपने सबसे प्यारे दोस्त से एक छोटी सी बात पर झगड़ा करके उसका खिलौना तोड़ दिया था। उस दिन के बाद से हमारी बात हमेशा के लिए बंद हो गई थी।
आदमी ने धीरे से कहा, "यह डायरी तुम्हारे हर उस फैसले को याद रखती है जिसे तुम बदलना चाहते थे। अगर तुम चाहो, तो इस पन्ने पर लिखी बात को मिटाकर नया कल लिख सकते हो... लेकिन याद रखना, एक पन्ना बदलने से पूरी कहानी का अंत बदल जाता है।"
मैंने थरथराते हाथों से डायरी की तरफ हाथ बढ़ाया, पर तभी बाहर एक ज़ोरदार धमाका हुआ और पीतल की घड़ी की सुइयाँ तेज़ी से उल्टा घूमने लगीं...
वह आवाज़ दुकान के किसी कोने से गूँज रही थी, लेकिन वहाँ मेरे अलावा कोई और दिखाई नहीं दे रहा था। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैंने डायरी के उस पन्ने को कसकर पकड़ लिया जिस पर मेरा ही अतीत और वर्तमान दर्ज था।
मैंने काँपते हुए हाथों से पूछा, "तुम... तुम कौन हो? और तुम्हें मेरी ज़िंदगी के बारे में कैसे पता?"
दुकान के अंधेरे कोने से हल्के से कदमों की आवाज़ आई। वहाँ से एक बुज़ुर्ग बाहर आए, जिनके बाल पूरी तरह सफेद थे और आँखों में अजीब सी चमक थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं कोई नहीं, बस वक्त का एक पन्ना हूँ बेटा। यह दुकान उन लोगों के लिए है जो अपनी ज़िंदगी के किसी मोड़ पर आकर रुक जाते हैं और सोचते हैं कि काश... उन्होंने कुछ अलग किया होता।"
उन्होंने मेरी तरफ एक पुरानी धूल से ढकी तस्वीर बढ़ाई। वह तस्वीर मेरे बचपन की थी—उस दिन की, जब मैंने अपने एक बहुत पुराने दोस्त से बिना किसी वजह के बात करना हमेशा के लिए बंद कर दिया था।
बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा, "डायरी का अगला पन्ना पलटो। वहाँ सिर्फ तुम्हारा आज नहीं, बल्कि वह दिन भी लिखा है जब तुमने उस रिश्ते को खो दिया था। क्या तुम उसे वापस पाना चाहते हो?"
बुजुर्ग की वह बात सुनकर मेरे हाथ काँपने लगे। तस्वीर पर जमी धूल को मैंने धीरे से अपने अंगूठे से साफ किया। वह मेरा और रोहन का स्कूल के दिनों का एक फोटो था—वही रोहन, जिससे एक छोटी सी गलतफहमी के बाद मेरी कभी बात नहीं हुई थी। वक्त के साथ हम दोनों इतने आगे निकल गए कि एक-दूसरे के अजनबी बन गए।
मैंने उस बुजुर्ग की ओर देखा और पूछा, "क्या इसे सच में बदला जा सकता है? क्या बीता हुआ कल फिर से वापस लाया जा सकता है?"
बुजुर्ग ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी उंगली से लकड़ी की मेज़ पर रखी उस चमड़े की डायरी के बंद पन्ने की तरफ इशारा किया।
मैंने गहरी साँश ली और काँपते हाथों से डायरी का अगला पन्ना पलट दिया। पन्ना पलटते ही कमरे की हवा ठंडी हो गई। उस नए पन्ने पर जो लिखा था, उसे पढ़कर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ लिखा था—“बदलाव का रास्ता अतीत में जाने से नहीं, बल्कि वर्तमान में एक कदम उठाने से शुरू होता है। आज शाम सात बजे, रेलवे क्रॉसिंग के पास तुम्हें वही पुराना दोस्त मिलेगा।”
मैंने चौंककर दीवार पर टंगी हुई पीतल की घड़ी की तरफ देखा। सुई उल्टी दिशा में घूम रही थी, और समय ठीक शाम के छह बजकर पचपन मिनट हो रहा था! मेरे पास सिर्फ पाँच मिनट बचे थे।
छह बजकर पचपन मिनट! घड़ी की आवाज़ अब मेरे कान में हथौड़े की तरह बज रही थी। दुकान के बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ चंद कदमों की दूरी पर था, लेकिन मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।
उस बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगली उठाई और कहा, "वक्त बहते पानी की तरह है बेटा, रुकता नहीं... पर कभी-कभी मोड़ पर आकर पीछे मुड़कर देखने का मौका ज़रूर देता है। अब फैसला तुम्हारा है, चौखट पार करनी है या यहीं रुकना है।"
मैंने एक पल भी गंवाए बिना दुकान के दरवाज़े की तरफ दौड़ लगा दी। ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका मेरे चेहरे से टकराया। मैंने बाहर आकर देखा—वह अजीब सी दुकान और वो बुजुर्ग गायब हो चुके थे। वहाँ सिर्फ वही जाना-पहचाना पुराना रास्ता था, और सामने चमकती हुई शाम की धुंध।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने अपनी कलाई की घड़ी देखी—वहाँ भी ठीक छह बजकर (57) मिनट हो रहे थे। सिर्फ तीन मिनट बचे थे।
बिना कुछ सोचे मैंने रेलवे क्रॉसिंग की तरफ अपनी दौड़ और तेज़ कर दी। धूल उड़ाती हुई हवा को चीरते हुए जब मैं क्रॉसिंग के पास पहुँचा, तो सामने का नजारा देखकर मेरे कदम वहीं थम गए। रेलवे फाटक के पास एक पुराना सा कोट पहने कोई खड़ा था... और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, मेरा कलेजा धक से रह गया! वह रोहन ही था।
रेलवे क्रॉसिंग पर शाम की हल्की रोशनी में रोहन बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था, जैसा वह साढ़े सात साल पहले आखिरी बार दिखा था—बस उसके चेहरे पर वक्त की थोड़ी सी परिपक्वता और आँखों में वही पुराना अनकहा सवाल था।
हवा थम सी गई थी। मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। ऐसा लग रहा था मानो वक्त की सुई वहीं किसी ने रोक दी हो।
रोहन ने आगे बढ़कर मुझे देखा, उसके चेहरे पर एक पल के लिए हैरानी छाई और फिर उसकी आँखों के कोने भीग गए। उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे लगा था कि हम दोनों इस रास्ते पर कभी दोबारा नहीं मिलेंगे... तुमने आने में बहुत देर कर दी, यार।"
मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया था। मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही रेलवे क्रॉसिंग की तेज़ घंटी बज उठी—डिन-डिन-डिन! लाल बत्ती जलने लगी और बैरियर धीरे-धीरे नीचे आने लगा। दूर से ट्रेन के आने की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी थी।
रोहन ने बैरियर के उस पार से चिल्लाकर कहा, "एक बात बताओ... जो पुरानी डायरी तुम्हें उस दुकान में मिली थी, क्या उसके अगले पन्ने पर आज का सच लिखा है या कल का भविष्य?"
ट्रेन की तेज आवाज़ के बीच उसका यह सवाल हवा में गूंज उठा, और मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई—क्योंकि उस डायरी का अगला पन्ना तो मैंने अभी तक खोला ही नहीं था!
ट्रेन की गड़गड़ाहट और रेलवे क्रॉसिंग की घंटी का शोर मेरे कानों में गूँज रहा था। रोहन के उस तीखे सवाल ने मुझे झकझोर कर रख दिया था—“क्या उस डायरी के अगले पन्ने पर आज का सच लिखा है या कल का भविष्य?”
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने तुरंत अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला, जहाँ मैंने उस चमड़े की जिल्द वाली डायरी को संभाल कर रखा था। ट्रेन का इंजन तेजी से हमारे पास से गुजर रहा था, जिसके धुएं और शोर के बीच रोहन का चेहरा धीरे-धीरे ओझल हो रहा था।
मैंने चिल्लाकर रोहन से कुछ कहना चाहा, पर शोर में मेरी आवाज़ दब गई। ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक तेजी से गुजरते जा रहे थे—पहला डिब्बा, दूसरा, तीसरा... और जैसे ही आखिरी डिब्बा पार हुआ, रेलवे फाटक के उस पार सन्नाटा पसर गया।
रोहन वहाँ जा चुका था। वह गायब हो चुका था, ठीक वैसे ही जैसे वह पुरानी दुकान गायब हो गई थी।
मेरा दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था। मैं सड़क के किनारे एक पत्थर पर बैठ गया और काँपते हाथों से उस डायरी को बाहर निकाला। पन्ने खुद-ब-खुद हवा में पलटने लगे और आकर रुक गए उस पन्ने पर, जिसे मैंने अभी तक नहीं खोला था।
उस नए पन्ने पर स्याही अभी भी गीली थी, और वहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—“रोहन से मिलने के बाद, अब तुम्हें उस शख्स को ढूँढना होगा जिसने इस डायरी की पहली इबारत लिखी थी... और उसकी शुरुआत होगी इस शहर के सबसे पुराने चौराहे पर रखे उस टूटे हुए आईने से, जिसमें तुम्हारी परछाई नहीं दिखेगी।”
डायरी के उस नए पन्ने पर लिखी बात बार-बार मेरे दिमाग में घूम रही थी—शहर का सबसे पुराना चौराहा और वहाँ रखा वह टूटा हुआ आईना, जिसमें मेरी परछाई नहीं दिखेगी।
वक्त बर्बाद किए बिना मैं शहर के पुराने बाजार वाले मुख्य चौराहे की तरफ चल पड़ा। रात गहरी हो रही थी और चारों तरफ सन्नाटा पसर चुका था। उस पुराने चौराहे के कोने पर एक खंडहरनुमा इमारत थी, जिसके बाहर कचरे के ढेर के पास सचमुच एक बड़ा सा टूटा हुआ पुराना आईने का फ्रेम रखा हुआ था।
दिल की धड़कनें तेज थीं। मैं धीरे-धीरे उस टूटे हुए आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया।
स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी उस आईने पर पड़ रही थी। मैंने डरते-डरते अपनी नज़रें उस पर डालीं। आईने के कांच में सामने की सड़क, पेड़ और पीछे की इमारतें तो साफ़ दिखाई दे रही थीं, लेकिन जब मैंने अपनी तरफ देखा—तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उस आईने में पूरे चौराहे का अक्स था, बस वहाँ मेरा अक्स या मेरी कोई परछाई मौजूद नहीं थी!
तभी उस टूटे हुए कांच के भीतर से किसी के हँसने की आवाज़ गूँजी, और आईने की सतह पर पानी की तरह लहरें उठने लगीं—मानो वह कांच नहीं, बल्कि कोई गहरा दरवाज़ा हो जो मुझे अपने अंदर खींचने के लिए तैयार बैठा था।
टूटे हुए आईने की सतह पर उठती लहरें और अंदर से आती वह रहस्यमयी हँसी मेरे रोंगटे खड़े कर रही थी। जहाँ पूरी दुनिया का अक्स उस कांच में साफ दिख रहा था, वहीं मेरी अपनी परछाई का गायब होना इस बात का गवाह था कि मैं अब आम दुनिया के नियमों से बाहर निकल चुका था।
मैंने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ उस आईने की तरफ बढ़ाया। जैसे ही मेरी उंगलियों ने ठंडे कांच को छुआ, वह कांच किसी ठोस दीवार की तरह नहीं बल्कि पानी की तरह पिघल सा गया। एक तेज़ ठंडी हवा का झोंका आया और मुझे अपनी तरफ खींचने लगा।
इससे पहले कि मैं संभल पाता, मेरा पूरा शरीर उस आईने के भीतर समा गया।
जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैं किसी दूसरी ही दुनिया में था। चारों तरफ धुंध छाई हुई थी और बीचों-बीच वही पुरानी चमड़े की जिल्द वाली डायरी हवा में तैर रही थी। उस डायरी के पन्ने खुद-ब-खुद तेज़ी से पलट रहे थे और हर पन्ने पर मेरी ज़िंदगी के वे अनकहे लम्हे छपे थे, जिन्हें मैंने खुद भी भुला दिया था—मेरे बचपन के टूटे हुए सपने, अपनों से बिछड़ने का दर्द और वो उम्मीदें जो मैंने कहीं पीछे छोड़ दी थीं।
डायरी के ठीक ऊपर हवा में एक परछाई आकर रुकी और एक धीमी, जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी—"तुम यहाँ तक आ तो गए हो, पर इस सफर को पूरा करने के लिए तुम्हें अपनी सबसे कीमती याद की कीमत चुकानी होगी।"
हवा में तैरती हुई उस रहस्यमयी परछाई की बात सुनकर मेरा दिल एक पल के लिए थम सा गया—"इस सफर को पूरा करने के लिए तुम्हें अपनी सबसे कीमती याद की कीमत चुकानी होगी।"
मैंने उस परछाई की तरफ देखते हुए कड़े स्वर में पूछा, "कैसी कीमत? और किस याद की बात कर रहे हो तुम?"
परछाई धीरे-धीरे मुस्कुराई, और उसके चेहरे पर एक जानी-पहचानी झलक दिखाई दी—वह कोई और नहीं, बल्कि मेरा अपना ही बचपन का अक्स था, जो समय के किसी कोने में पीछे छूट गया था।
हवा में तैरती डायरी का एक पन्ना खुला और उस पर चमकती हुई नीली स्याही से एक वाक्य उभर आया—“अगर आगे बढ़ना है, तो तुम्हें अपनी उस पहली जीत की याद हमेशा के लिए भूलनी होगी, जिसने तुम्हें कभी जीने का हौसला दिया था।”
मेरे पैरों तले की ज़मीन जैसे गायब होने लगी। वह याद मेरे वजूद का सबसे कीमती हिस्सा थी। अगर मैं उसे भूल गया, तो मैं यह भी भूल जाऊंगा कि मैं कौन हूँ।
मैंने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। एक तरफ पीछे लौटने का रास्ता बंद हो चुका था, और दूसरी तरफ सामने एक ऐसा अंधेरा था जो सब कुछ मिटाने को तैयार बैठा था।
तभी उस तैरती हुई डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटने लगा और उसके कोने पर खून की तरह लाल स्याही से एक नया शब्द लिखा हुआ आया—“फैसला करो... या यहीं हमेशा के लिए कैद हो जाओ।”
और तभी... मेरे कानों में अचानक से एक ऐसी चीख गूँजी, जिसे सुनकर मेरा कलेजा काँप उठा। वह चीख मेरी अपनी ही थी, जो भविष्य के किसी अंधकारमय कोने से आ रही थी!
भविष्य के अंधकारमय कोने से गूँजती मेरी अपनी ही वह खौफनाक चीख मेरे कानों में बार-बार टकरा रही थी। हवा में तैरती डायरी के पन्ने अब और तेज़ी से फड़फड़ाने लगे थे, मानो कोई अदृश्य तूफ़ान उन पर से गुजर रहा हो।
मैंने हिम्मत जुटाई, अपने काँपते हाथों को आगे बढ़ाया और उस परछाई की आँखों में देखते हुए कहा, "अगर अपनी सबसे बड़ी जीत की याद को मिटाकर ही मुझे आगे का सच पाना है... तो मंज़ूर है!"
मेरे मुँह से यह बात निकलते ही हवा में तैरती डायरी पर एक नीली सी तेज़ चमक फैल गई। मेरे दिमाग का एक कोना अचानक से खाली सा हो गया—ऐसा लगा मानो मेरे वजूद का कोई बहुत गहरा हिस्सा, मेरा सबसे पहला गर्व, मेरी वह पहली जीत धुएँ की तरह हवा में उड़ गई हो।
लेकिन उस याद के मिटते ही, सामने का धुंधला कोहरा छंट गया।
धुंध के उस पार एक और नया रास्ता दिखाई दिया, जो सीधे एक विशाल प्राचीन द्वार की तरफ जाता था। उस द्वार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—“अब तुम पन्ने पलटने वाले नहीं, बल्कि खुद कहानी लिखने वाले बन चुके हो।”
मैंने एक लंबी साँस ली और उस द्वार की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाया ही था कि तभी मेरे पैरों के पास ज़मीन पर एक आवाज़ हुई। मैंने नीचे झुककर देखा—वहाँ वही पुरानी डायरी बंद होकर गिरी थी, लेकिन इस बार उसके कवर पर मेरा नाम सोने के अक्षरों में नहीं, बल्कि किसी और के खून से लिखा था... और वो नाम मेरा नहीं, बल्कि रोहन का था!
मेरे पैरों के पास गिरी उस पुरानी चमड़े की जिल्द वाली डायरी को देखकर मेरा दिल एक पल के लिए रुक सा गया। ज़मीन पर पड़ी उस डायरी के कवर पर सोने के अक्षरों की जगह अब ताज़ा खून से रोहन का नाम लिखा था—'रोहन'।
मैंने काँपते हाथों से झुंड से उस डायरी को उठाया। उसके पन्नों से मिट्टी और पुरानी किताबों जैसी खुशबू के साथ-साथ किसी अनहोनी की महक आ रही थी। जैसे ही मैंने डायरी का वह पन्ना खोला जिस पर रोहन का नाम लिखा था, अंदर के सारे पन्ने खाली हो चुके थे—सिवाय आखिरी पन्ने के।
उस आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक ही लाइन लिखी थी, जो रोहन के ही हाथों की लिखावट लग रही थी—“तुम जिस सच की तलाश में यहाँ तक आए हो, वह कोई खजाना नहीं... बल्कि वह कीमत है जो तुम्हें मुझे बचाने के लिए चुकानी होगी।”
तभी उस प्राचीन द्वार के ठीक सामने एक परछाई तेजी से उभरी। धुंध छंटने लगी और मैंने देखा कि रोहन ज़मीन पर बेसुध पड़ा हुआ है, और उसके चारों तरफ वही पुरानी लाल रोशनी फैल रही है जो उस दुकान के भीतर थी।
इससे पहले कि मैं दौड़कर उसकी तरफ जाता, आसमान में गूँजती हुई उसी बुजुर्ग की आवाज़ दोबारा सुनाई दी—"अब खेल बदल चुका है, बेटा। या तो रोहन को बचा लो, या इस दुनिया में हमेशा के लिए अकेले रह जाओ... फैसला तुम्हारे हाथ में है।"
बुजुर्ग की वह बात हवा में गूँजकर रह गई—"या तो रोहन को बचा लो, या इस दुनिया में हमेशा के लिए अकेले रह जाओ..."
सामने बेसुध पड़े रोहन के शरीर के चारों तरफ लाल रोशनी का दायरा तेजी से बड़ा हो रहा था। बिना एक भी पल गंवाए मैं दौड़कर रोहन की तरफ बढ़ा और उसे अपने कंधों पर उठाने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही मैंने उसे छुआ, मेरा शरीर एक तेज झटके से पीछे छिटक गया—मानो वहाँ कोई अदृश्य दीवार हो जो मुझे उसे छूने से रोक रही हो।
उसी वक्त हवा में तैरती हुई वह खून से सनी डायरी खुद-ब-खुद खुली और उसके खाली पन्नों पर एक एक करके नए शब्द उभरने लगे। इस बार वो शब्द मेरे किसी पुराने अतीत या भविष्य के नहीं थे, बल्कि एक शर्त थी—“रोहन को इस दायरे से बाहर निकालने के लिए तुम्हें अपनी सबसे गहरी और सबसे अनमोल खुशी का त्याग करना होगा... वह खुशी, जिसे तुमने बरसों की मेहनत के बाद पाया था।”
मेरे कान सुन्न हो गए। मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी... वह पल जब मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी बाधा को पार किया था और एक नई शुरुआत की थी। अगर मैंने उस खुशी को मिटा दिया, तो मेरे पास सिर्फ खालीपन बचेगा।
रोहन ने दर्द से कराहते हुए धीरे से अपनी आँखें खोलीं और फुसफुसाते हुए कहा, "मत करना... पीछे लौट जाओ..."
लेकिन मैं अपने दोस्त को यूं ही नहीं छोड़ सकता था। मैंने कड़ा फैसला लेते हुए अपनी बंद मुट्ठी खोली और डायरी के पन्नों की तरफ देखते हुए कहा, "मंज़ूर है... ले लो मेरी वो खुशी भी!"
और तभी, उस प्राचीन द्वार के अंदर से एक भयानक गड़गड़ाहट गूँजी, और ज़मीन फटने लगी!
मेरे मुँह से "मंज़ूर है" निकलते ही उस प्राचीन द्वार के अंदर से एक भयानक गड़गड़ाहट गूँजी। ज़मीन पर लंबी-लंबी दरारें पड़ने लगीं, और लाल रोशनी का वह दायरा जो रोहन को घेरे हुए था, अचानक से नीले और सुनहरे प्रकाश में बदलने लगा।
मेरे दिमाग का एक और हिस्सा सुन्न हो गया—मेरी वह सबसे बड़ी खुशी, जिसके बल पर मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दिन काटे थे, हमेशा के लिए मेरे दिल से मिट गई। उसकी जगह सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और खालीपन रह गया।
लेकिन उस त्याग का असर तुरंत दिखाई दिया। रोहन के शरीर के चारों तरफ बनी अदृश्य दीवार टूट गई, और वह संभलकर खड़ा हो गया।
उसने हैरान होकर मुझे देखा और कहा, "तुमने... तुमने ये क्या किया? तुमने अपनी सबसे बड़ी खुशी क्यों दाँव पर लगा दी?"
मैंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, "कुछ रिश्ते उस खुशी से भी ज़्यादा कीमती होते हैं, रोहन।"
इससे पहले कि रोहन कुछ और कहता, हमारे ठीक सामने फटी हुई ज़मीन के बीचों-बीच से एक पुराना, धूल से ढका हुआ संदूक बाहर आया। उस संदूक पर कोई ताला नहीं था, बल्कि उस पर वही चमड़े की डायरी बिल्कुल वैसे ही रखी थी, जैसी उस पहली दुकान में मिली थी—पर इस बार उस पर मेरा और रोहन का नाम एक साथ खुदा हुआ था।
जैसे ही मैंने आगे बढ़कर उस संदूक को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, दूर धुंध के उस पार से एक और भारी आवाज़ गूँजी—"तुम दोनों ने कीमत चुका दी है, पर याद रखो... संदूक खुलने के बाद पीछे लौटने का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा!"
संदूक खुलने के बाद पीछे लौटने का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा!"—दूर धुंध के पार से गूँजती उस भारी चेतावनी ने हवा में एक अजीब सी ठंडक घोल दी थी।
रोहन ने डरते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा, "रुको... क्या हमें सच में इसे खोलना चाहिए? अगर इसके अंदर कोई और इम्तहान हुआ तो?"
मैंने रोहन की आँखों में देखा, जहाँ डर के साथ-साथ अब एक अजीब सा विश्वास भी था। मैंने उसका हाथ हल्के से दबाया और कहा, "पीछे लौटने का रास्ता वैसे भी कहाँ बचा है रोहन? जो कुछ भी था, वह तो हम पीछे छोड़ आए हैं। अब जो है, बस यही सच है।"
मैंने आगे बढ़कर उस पुराने लकड़ी के संदूक के ढक्कन पर हाथ रखा। जैसे ही मेरी उंगलियाँ उस पर पड़ीं, संदूक खुद-ब-खुद चरमराते हुए खुल गया।
उसके अंदर कोई खजाना या सोना-चांदी नहीं था। संदूक के बीचों-बीच सिर्फ एक पुराना शीशे का आईना रखा था, जिसके अंदर एक हल्की सी रोशनी चमक रही थी। और जैसे ही हमने उस आईने में झाँककर देखा, हमारी आँखें फटी की फटी रह गईं—उस आईने के भीतर कोई और नहीं, बल्कि हमारे बचपन का वह दौर और हमारे वे सारे अधूरे सपने साफ-साफ दिखाई दे रहे थे जिन्हें हमने वक्त के साथ कहीं खो दिया था।
तभी आईने के भीतर से एक आवाज़ आई—"तुमने अपनी खुशियों और यादों की कीमत चुकाकर जो पाया है, वह कोई जादू नहीं... बल्कि तुम्हारी अपनी खोई हुई तकदीर है। अब इसे चुनो!"
"तुमने अपनी खुशियों और यादों की कीमत चुकाकर जो पाया है, वह कोई जादू नहीं... बल्कि तुम्हारी अपनी खोई हुई तकदीर है। अब इसे चुनो!"
आईने के भीतर से गूँजती उस आवाज़ ने हमारे दिलों की धड़कनों को और तेज़ कर दिया था। उस शीशे के आर-पार हमारे बचपन के वे सारे सपने, बेफिक्र हंसी और वो उम्मीदें जगमगा रही थीं जिन्हें हमने वक्त की आंधी में कहीं पीछे छोड़ दिया था।
रोहन ने मेरी तरफ देखा और काँपते हुए हाथों से कहा, "अब क्या करना होगा? क्या हमें इस आईने को छूना चाहिए?"
मैंने गहरी साँस ली और उस संदूक के अंदर रखे आईने की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया। जैसे ही मेरी हथेलियाँ उस ठंडे कांच पर पड़ीं, एक तेज़ और चमकीली रोशनी ने हम दोनों को चारों तरफ से घेर लिया। वह रोशनी किसी खौफ की नहीं, बल्कि एक अजीब सी राहत और सुकून की थी—मानो सालों का थका हुआ मुसाफिर आखिरकार अपने घर पहुँच गया हो।
रोशनी के उस सैलाब के बीच, आईने का कांच धीरे-धीरे पिघलने लगा और वह एक खुले हुए रास्ते में बदल गया। उस रास्ते के उस पार कोई डरावनी धुंध या अनजान साया नहीं था, बल्कि वही पुरानी जानी-पहचानी सुबह की धूप थी—वही रेलवे क्रॉसिंग, वही पुराना शहर और हमारे सामने खुला हुआ एक बिल्कुल नया और खूबसूरत कल।
पीछे मुड़कर देखने पर वह प्राचीन द्वार और वो रहस्यमयी दुकान अब हमेशा के लिए गायब हो चुके थे। हमारे हाथ में सिर्फ वही चमड़े की डायरी थी, जिसका आखिरी पन्ना अब पूरी तरह साफ़ और कोरा हो चुका था—जिस पर कोई पाबंदी या शर्त नहीं थी, बल्कि अपनी मर्जी से अपनी कहानी लिखने की पूरी आज़ादी थी।
रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो, अब घर चलें... और अपनी यह नई कहानी मिलकर लिखें।"
मैंने भी मुस्कुराकर सिर हिलाया और हमने उस सुनहरी धूप की तरफ अपना पहला कदम बढ़ा दिया।