In to the unknown in Hindi Fiction Stories by Parakshtha books and stories PDF | In to the unknown

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In to the unknown

संयोग!!!   ब्रह्मांड में कुछ भी संयोग से नहीं होता। कम-से-कम, मनुष्य सदियों से यही मानता आया है कि हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। हर प्रश्न का कोई उत्तर, हर रहस्य के पीछे कोई सत्य और हर अनजान रास्ते के अंत में कोई ऐसी जगह होती है, जहाँ पहुँचकर सारी उलझनें सुलझ जाती हैं। लेकिन अगर कुछ प्रश्न ऐसे हों, जिनका उत्तर मिल जाने पर भी वे प्रश्न बने रहें तो?

अगर किसी रहस्य को सुलझाने के लिए तुम्हें एक ऐसे रहस्य तक पहुँचना पड़े, जिसके अस्तित्व के बारे में तुम्हें कभी पता ही न रहा हो?

और अगर इस पूरी खोज में सबसे बड़ी बाधा अज्ञान नहीं, बल्कि वह ज्ञान हो, जिस पर तुम्हें अब तक सबसे अधिक विश्वास रहा हो?

शायद तब तुम्हें पहली बार एहसास होगा कि अनजान होना और अनजान को समझ लेना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

हमारी पृथ्वी विशाल है। इसके घने जंगलों, अथाह महासागरों, बर्फ़ से ढके पर्वतों और उन प्राचीन खंडहरों में आज भी अतीत के अनगिनत निशान मौजूद हैं, जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। हमारे ऊपर फैला आकाश करोड़ों तारों से भरा है। उनमें से कुछ की रोशनी हम तक पहुँचने में वर्षों लगाती है, तो कुछ की यात्रा सदियों पुरानी होती है।

हम जिस आकाश को आज देखते हैं, वह हमेशा वर्तमान का आकाश नहीं होता।

कहीं न कहीं, इस विशाल ब्रह्मांड में, ऐसे प्रश्न मौजूद हैं जिनके उत्तर खोजने के लिए मनुष्य ने अपनी पूरी सभ्यता लगा दी है।

और फिर भी, हम नहीं जानते कि हमने कितने प्रश्न पूछने अभी बाकी रखे हैं।

हमारा अस्तित्व उस ब्रह्मांड के एक छोटे-से कोने में है, जिसकी विशालता की कल्पना करना भी हमारी समझ की सीमाओं को चुनौती देता है। हम तारों को देखते हैं, उनकी दूरियाँ मापते हैं, ग्रहों की गति का हिसाब लगाते हैं और प्रकृति के नियमों को समझने की कोशिश करते हैं। हर नई खोज हमें कुछ उत्तर देती है, लेकिन उन्हीं उत्तरों के बीच से कुछ नए प्रश्न भी जन्म लेते हैं।

शायद ज्ञान की सबसे विचित्र बात यही है,वह जितना बढ़ता है, अज्ञात की सीमा उतनी ही दूर खिसकती जाती है।

हम अक्सर सोचते हैं कि दुनिया के रहस्य कहीं बहुत दूर छिपे होंगे। किसी ऐसे द्वीप पर, जहाँ आज तक कोई नहीं पहुँचा; किसी ऐसे जंगल में, जिसकी गहराइयों को हमने अब तक नहीं जाना; या ब्रह्मांड के उस हिस्से में, जहाँ से आती रोशनी को हम केवल अपने यंत्रों की सहायता से पहचान पाते हैं।

लेकिन क्या यह भी संभव है कि कभी-कभी हम किसी रहस्य के इतने करीब हों कि उसे देख पाने के बावजूद पहचान न पाएँ?

आख़िर, किसी चीज़ का हमारी आँखों के सामने होना और उसका हमारी समझ में आना एक ही बात तो नहीं है।

एक पत्थर किसी के लिए केवल पत्थर हो सकता है, जबकि किसी दूसरे के लिए वह लाखों वर्ष पुराने इतिहास का प्रमाण हो। आकाश में दिखाई देने वाले तारों का एक समूह किसी को बिखरे हुए प्रकाश के कुछ बिंदु लग सकता है, तो किसी के लिए वह दिशाओं, दूरियों और समय को समझने का माध्यम बन सकता है।

वस्तुएँ हमेशा अपना अर्थ स्वयं प्रकट नहीं करतीं। कभी-कभी अर्थ हमारे प्रश्नों में छिपा होता है।

और कभी-कभी, हम सही प्रश्न पूछने से केवल इसलिए चूक जाते हैं, 

क्योंकि हमें लगता है कि हम उत्तर पहले से जानते हैं।

आख़िर, उस चीज़ को कोई कैसे खोज सकता है, जिसके अस्तित्व पर उसे कभी संदेह ही न हुआ हो?

शायद यही कारण है कि दुनिया के कुछ रहस्य सदियों तक अनदेखे रह जाते हैं। उन्हें छिपाने के लिए हमेशा किसी गुप्त स्थान, किसी अभेद्य दरवाज़े या किसी कठिन पहेली की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी, उनके लिए इतना ही पर्याप्त होता है कि कोई उन्हें देखने की कोशिश न करे।


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एवरमोर  कोई बहुत बड़ा शहर नहीं था। यह पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा एक ऐसा शांत कोना था, जहाँ लगता था कि वक्त आकर थोड़ा थम सा गया है। वहाँ की सड़कें पतली और खामोश थीं। घरों की ढलान वाली छतों पर अक्सर धुंध की हल्की चादर बिछी रहती, और शहर के किनारे से गुजरने वाली वो पतली नदी सर्दियों में बिल्कुल शांत हो जाती थी,मानो पानी की जगह कोई गहरा सन्नाटा बह रहा हो।

एवरमोर की सबसे बड़ी पहचान उसकी खामोशी ही थी।
वहाँ शामें बहुत चुपके से उतरती थीं। जैसे ही दूर पहाड़ियों के पीछे सूरज डूबता, आसमान का रंग धीरे-धीरे सुनहरे से नीला और फिर एक उदास से भूरे रंग में बदल जाता। रात होते-होते सारी गलियाँ खाली हो जातीं और खिड़कियों से छनती पीली रोशनी के अलावा बाहर कुछ नहीं दिखता था।
दिसंबर का महीना चल रहा था।
सुबह से ही एक सूखी और ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर पत्तियां लगभग खत्म हो चुकी थीं और सड़क किनारे जमा सूखे पत्ते हवा के हर झोंके के साथ सरसराहट करते हुए इधर-उधर उड़ रहे थे। आसमान में बादल इतने छाए हुए थे कि धूप कभी-कभी निकलती भी, तो उससे ठंड में कोई फर्क नहीं पड़ता था।
स्कूल की छुट्टी हुए काफी देर हो चुकी थी।
जंगल के किनारे वाले रास्ते पर वो अकेली चली आ रही थी। कंधे पर स्कूल बैग लटका था और दोनों हाथ जैकेट की जेबों में घुसे हुए थे। ठंड से बचने के लिए उसने अपना मुंह मफलर में अच्छी तरह लपेट रखा था। वो बस बेध्यानी में कदम बढ़ा रही थी 

हर कुछ कदमों के बाद उसके जूतों की ठोकर से कोई सूखा पत्ता उड़कर आगे चला जाता।
आज का दिन उसके लिए किसी उलझन से कम नहीं था।
स्कूल में जब बाकी बच्चे हंसते-खेलते और बातें करते हुए निकलते, तो उसे ऐसा लगता मानो वो किसी दूसरी दुनिया की है, जिसका इस दुनिया से कोई वास्ता नहीं। उसका मन किसी अजीब सी बेचैनी से भरा हुआ था।
और ऊपर से यह कड़ाके की ठंड।
उसने मफलर के अंदर ही एक लंबी सांस छोड़ी। उसके मुंह से निकलती भाप चश्मे पर जमने लगी, जिसे उसने बेमन से हाथ से साफ किया।
घर पहुँचने में अभी वक्त था। वो चाहती तो मेन मार्केट वाली पक्की सड़क से जा सकती थी, जहाँ थोड़ी बहुत चहल-पहल होती। लेकिन जंगल के किनारे वाली यह पगडंडी छोटी थी। वो इस रास्ते से पहले भी कई बार आ-जा चुकी थी।
उसे इस सन्नाटे में चलना अच्छा लगता था। यहाँ शहर का शोर-शराबा पीछे छूट जाता था और पेड़ों के बीच से सरसराती हवा के अलावा कोई आवाज नहीं होती थी।
वो अपनी ही सोच में डूबी हुई आगे बढ़ रही थी, तभी रास्ते के किनारे पड़ी एक चीज पर उसकी नजर पड़ी।
वो चलते-चलते रुक गई।
जमीन पर सूखी घास और मिट्टी के बीच लकड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था। बहुत बड़ा नहीं—लगभग उसकी बांह जितना लंबा। एक तरफ से थोड़ा मुड़ा हुआ, मैला-कुचैला और सूखा हुआ। देखने में वो किसी पेड़ की टूटी हुई डाली जैसी लग रही थी जो हवा से टूटकर नीचे गिर गई हो।
उसने एक पल के लिए उसे देखा और आगे बढ़ने लगी।
लेकिन अगले ही पल, न जाने क्यों, वो वापस मुड़ी।
लकड़ी पर कुछ बना हुआ था।
वो उसके पास गई, घुटनों के बल झुकी और उसे उठाकर अपने हाथों में ले लिया। लकड़ी बर्फ जैसी ठंडी थी।
पहली नजर में तो वो बस कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं लग रही थीं। उसने लकड़ी को हाथ में घुमाकर देखा। उसकी सतह खुरदरी थी, लेकिन उन निशानों के किनारे बहुत साफ और गहरे थे 

जैसे उन्हें किसी नुकीली चीज से जानबूझकर बहुत करीने से उकेरा गया हो।
उसने कांपती उंगली से एक रेखा को छुआ।
फिर दूसरी को।
कुछ बारीक लाइनें एक छोटे से गोल घेरे के आसपास ऐसे बनी थीं जैसे किसी पहिए की तीलियां हों। बाकी लाइनें उस घेरे से बाहर की तरफ किसी लहर की तरह फैल रही थीं। जब उसने लकड़ी को थोड़ा तिरछा करके देखा, तो उसे लगा कि ये बिखरी हुई लाइनें अकेली नहीं हैं, बल्कि किसी बड़े और छिपे हुए पैटर्न का हिस्सा हैं।

“ये क्या चीज है...?” उसने खुद से बुदबुदाया।
उसने लकड़ी को दूसरी तरफ पलटा। उस तरफ भी कुछ निशान थे, लेकिन वे पहले वाले से बिल्कुल अलग और थोड़े तीखे थे।
तभी जंगल की तरफ से ठंडी हवा का एक तेज झोंका आया और उसके बाल उड़कर चेहरे पर आ गए। उसने बाल कान के पीछे किए और दोबारा उस लकड़ी को गौर से देखने लगी।
वो नहीं जानती थी कि ये निशान किसने बनाए थे और न ही ये पता था कि वो लकड़ी वहाँ कब से पड़ी थी।
लेकिन एक बात उसे परेशान कर रही थी

ये निशान किसी इत्तेफाक का नतीजा नहीं लग रहे थे। इनमें कोई न कोई पैटर्न जरूर था।
उसने बिना देर किए अपना बैग उतारा और उसमें से अपनी छोटी सी डायरी निकाल ली। उस डायरी में वो अक्सर अपने अजीब सपने, अनसुने सवाल या रास्ते में मिलने वाली अजीब चीजें लिखती-बनाती रहती थी।

उसने डायरी का एक सादा पन्ना खोला और पेंसिल से उन निशानों को छापने की कोशिश करने लगी।
उसने कई बार रेखाएं खींचीं। फिर डायरी को थोड़ा दूर करके देखा और जमीन पर पड़ी लकड़ी से मिलाया।
उसके स्केच में कुछ गड़बड़ थी।
लकड़ी पर जो गहराई और डिजाइन दिख रहा था, वो उसके पन्ने पर वैसा उतर नहीं रहा था।
उसने रबर से मिटाया और फिर से कोशिश की।
लेकिन वही नतीजा निकला।
उसने झल्लाकर पेंसिल नीचे रखी, लकड़ी को दोनों हाथों में उठाया और उसे अपनी आंखों के सामने सीधा किया। फिर डायरी के चित्र को देखा।
शायद वो एंगल गलत समझ रही थी।या शायद पैटर्न को देखने का तरीका गलत था।
उसने अपने हाथों में पकड़ी लकड़ी को धीरे से थोड़ा सा घुमा दिया।
और उसी पल… उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
निशान वही थे। लकड़ी भी वही थी।
लेकिन जैसे ही देखने का एंगल बदला, उन रेखाओं का मतलब ही बदल गया। जो निशान पहले बस बेतरतीब लाइनें लग रहे थे, अब वो किसी नक्शे या किसी प्राचीन डिजाइन की तरह साफ दिखने लगे।
वो कुछ पलों के लिए बिल्कुल चुपचाप खड़ी रही।

आसपास का सन्नाटा और गहरा हो गया था।

उसने डायरी बंद की, लकड़ी को मफलर में लपेटकर अपने बैग में सुरक्षित रख लिया।


वो तेज़ी से अपने घर की तरफ़ बढ़ने लगी। तभी अचानक हवा और भी तेज़ हो गई, और रास्ते के किनारे खिले लिली के फूल उस सर्द हवा के झोंकों में बुरी तरह लहराने लगे।








यह कहानी मेरे 350 जेन्युइन फॉलोअर्स पूरे होने पर ही प्रकाशित की जाएगी।







एक छोटी-सी बात, अपने पाठकों के लिए,

मेरे लिए लिखना सिर्फ़ कहानियाँ लिख देना नहीं है। इके पीछे बहुत-सा समय, मेहनत, कल्पना और भावनाएँ होती हैं। और जब कोई मेरी लिखी कहानी पढ़कर उस पर अपनी प्रतिक्रिया देता है, अपने विचार साझा करता है या बस कुछ शब्दों में यह बता देता है कि उसे कहानी कैसी लगी, तो वह मेरे लिए बहुत मायने रखता है।

मैं जानती हूँ कि हर पाठक के पास हर अध्याय पर टिप्पणी करने का समय नहीं होता, और मैं इसकी अपेक्षा भी नहीं करती। लेकिन जब बहुत-से लोग पढ़ते हैं और फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो कभी-कभी लिखते रहने की प्रेरणा कम होने लगती है। एक लेखक के लिए यह जानना भी ज़रूरी होता है कि उसकी कहानी पाठकों तक पहुँच रही है या नहीं।

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मैं चाहती हूँ कि यहाँ पाठकों और लेखकों के बीच एक ऐसा रिश्ता बने, जो किसी अपेक्षा या मजबूरी पर नहीं, बल्कि कहानियों के प्रति सच्ची रुचि और आपसी सम्मान पर टिका हो।

पढ़ने, साथ बने रहने और मेरी कल्पना की दुनिया को थोड़ा-सा समय देने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया।