Azad Katha - 2 - 79 in Hindi Fiction Stories by Munshi Premchand books and stories PDF | आजाद-कथा - खंड 2 - 79

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आजाद-कथा - खंड 2 - 79

आजाद-कथा

(खंड - 2)

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद

प्रकरण - 79

इन दोनों शाहजादों में एक का नाम मिस्टर क्लार्क था और दूसरे का हेनरी! दोनों की उठती जवानी थी। निहायत खूबसूरत। शाहजादी दिन के दिन उन्हीं के पास बैठी रहती, उनकी बातें सुनने से उसका जी न भरता था। मियाँ आजाद तो मारे जलन के अपने महल से निकलते ही न थे। मगर खोजी टोह लेने के लिए दिन में कई बार यहाँ आ बैठते थे। उन दोनों को भी खोजी की बातों में बड़ा मजा आता।

एक दिन खोजी दोनों शाहजादों के पास गए, तो इत्तिफाक से शाहजादी वहाँ न थी। दोनों शाहजादों ने खोजी की बड़ी खातिर की। हेनरी ने कहा - ख्वाजा साहब, हमको पहचाना?

यह कह कर उसने टोप उतार दिया! खोजी चौंक पड़े। यह मीडा थी। बोले - मिस मीडा, खूब मिलीं।

मीडा - चुप-चुप! शाहजादी न जानने पाए। हम दोनों इसलिए आए हैं कि आजाद को यहाँ से छुड़ा ले जायँ।

खोजी - अच्छा, क्या यह भी औरत हैं?

मीडा - यह वही औरत हैं जो आजाद को पकड़ ले गई थीं।

खोजी - अक्खाह, मिस क्लारिसा! आप तो इस काबिल हैं कि आपका बायाँ कदम ले।

मीडा - अब यह बताओ कि यहाँ से छुटकारा पाने की भी कोई तदबीर है?

खोजी - हाँ, वह तदबीर बताऊँ कि कभी पट ही न पड़े! यह शाहजादी बड़ी पीनेवाली है, इसे खूब पिलाओ और जब बेहोश हो जाय तो ले उड़ो।

खोजी - ने जा कर आजाद से यह किस्सा कहा। आजाद बहुत खुश हुए। बोले - मैं दोनों की सूरत देखते ही ताड़ गया था।

खोजी - मिस क्लारिस कहीं तुम्हें दगा न दे।

आजाद - अजी नहीं, यह मुहब्बत की घातें हैं।

खोजी - अभी जरा देर में महफिल जमेगी। न कहोगे, कैसी तदबीर बताई!

खोजी ने ठीक कहा था। थोड़ी ही देर में शाहजादी ने इन दोनों आदमियों को बुला भेजा। ये लोग वहाँ पहुँचे तो शराब के दौर चल रहे थे।

शाहजादी - आज हम शर्त लगा कर पिएँगे।

हेनरी - मंजूर। जब तक हमारे हाथ से जाम न छूटे तब तक तुम भी न छोड़ो। जो पहले छोड़ दे वह हारा।

क्लार्क - (आजाद से) तुम कौन हो मियाँ, साफ बोलो!

आजाद - मैं आदमी नहीं हूँ, देवजाद हूँ। परियाँ मुझे खूब जानती हैं।

क्लारिसा -

उड़ता है मुझसे ओ सितमईजाद किस लिए,बनता है आदमी से परीजाद किस लिए?

क्लारिसा ने शाहजादी को इतनी शराब पिलाई कि वह मस्त हो कर झूमने लगी। तब आजाद ने कहा - ख्वाजा साहब, आप सच कहना, हमारा इश्क सच्चा है या नहीं। मीडा, खुद जानता है, आज का दिन मेरी जिंदगी का सबसे मुबारक दिन है। किसे उम्मेद थी कि इस कैद में तुम्हारा दीदार होगा?

खोजी - बहुत बहको न भाई, कहीं शाहजादी सुन रही हो तो आफत आ जाय।

आजाद - वह इस वक्त दूसरी दुनिया में हैं।

खोजी - शाहजादी साहब, यह सब भागे जा रहे हैं, जरा होश में तो आइए।

आजाद - अबे चुप रह नालायक। मीडा, बताओ, किस तदबीर से भागोगी? मगर तुमने तो यह रूप बदला कि खुदा की पनाह! मैं यही दिल में सोचता था कि ऐसे हसीन शाहजादे कहाँ से आ गए, जिन्होंने हमारा रंग फीका कर दिया। वल्लाह, जो जरा भी पहचाना हो। मिस क्लारिसा, तुमने तो गजब ही कर दिया। कौन जानता था कि साइबेरिया भेज कर तुम मुझे छुड़ाने आओगी!

मीडा - अब तो मौका अच्छा है; रात ज्यादा आ गई है। पहरे वाले भी सोते होंगे, देर क्यों करें।

आजाद अस्तबल में गए और चार तेज घोड़े छाँट कर बाहर लाए। दोनों औरतें तो घोड़ों पर सवार हो गईं, मगर खोजी की हिम्मत छूट गई, डरे कि कहीं गिर पड़ें तो हड्डी-पसली चूर हो जाय। बोले - भई, तुम लोग जाओ; मुझे यहीं रहने दो। शाहजादी को तसल्ली देने वाला भी तो कोई चाहिए। मैं उसे बातों में लगाए रखूँगा जिसमें उसे कोई शक न हो। खुदा ने चाहा तो एक हफ्ते के अंदर कुस्तुनतुनिया में तुमसे मिलेंगे।

यह कह कर खोजी तो इधर चले और वे तीनों आदमी आगे बढ़े। कदम-कदम पर पीछे फिर-फिर कर देखते थे कि कोई पकड़ने न आ रहा हो। सुबह होते-होते ये लोग डैन्यूब के किनारे आ पहुँचे और घोड़ों से उतर हरी-हरी घास पर टहलने लगे। एकाएक पीछे से कई सवार घोड़े दौड़ाते आते दिखाई पड़े। इन लोगों ने अपने घोड़े चरने को छोड़ दिए थे। अब भागें कैसे? दम के दम में सब के सब सवार सिर पर आ पहुँचे और इन तीनों आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। अकेले आजाद भला तीस आदमियों को क्या मुकाबला करते!

दोपहर होते-होते ये लोग शाहजादी के यहाँ जा पहुँचे। शाहजादी तो गुस्से से भरी बैठी थी। अंदर ही से कहला भेजा कि आजाद को कैद कर दो। यह हुक्म दे कर शाहजादों को देखने के लिए बाहर निकली तो शाहजादों की जगह दो शाहजादियाँ खड़ी नजर आईं? धक से रह गई। या खुदा, यह मैं क्या देख रही हूँ!

क्लारिसा - बहन, मर्द के भेस में तो तुम्हें प्यार कर चुके। अब आओ, बहनें-बहनें मिल कर प्यार करें। हम वही हैं जिनके साथ तुम शादी करने वाली हो।

शाहजादी - अरे क्लारिसा, तुम यहाँ कहाँ?

क्लारिसा - आओ गले मिलें। मुझे खौफ हैं कि कहीं तुम्हारे ऊपर कोई आफत न आ जाय। ऐसे नामी सरकारी कैदी को उड़ा लाना तुम्हें मुनासिब न था। वजीरजंग को यह खबर मिल गई है। अब तुम्हारी खैरियत इसी में है कि उस तुर्की जवान को हमारे हवाले कर दो।

शाहजादी समझ गई कि अब आजाद को रुखसत करना पड़ेगा। आजाद से जा कर बोली - प्यारे आजाद, मैंने तुम्हारे साथ जो बुराइयाँ की हैं, उन्हें माफ करना। मैंने जो कुछ किया, दिल की जलन से मजबूर हो कर किया। तुम्हारी जुदाई मुझसे बरदाश्त न होगी। जाओ, रुखसत।

यह कह कर उसने क्लारिसा से कहा - शाहजादी, खुदा के लिए उन्हें साइबेरिया न भेजना। वजीरजंग से तुम्हारी जान-पहचान है! वह तुम्हारी बात मानते हैं, अगर तुम माफ कर दोगी, तो वह जरूर माफ कर देंगे।

***