आखर चौरासी - 1

आखर चौरासी

‘‘ सन् उन्नीस सौ चौरासी के सिख विरोधी दंगे को केन्द्र में रख कर लिखे गए इस मार्मिक उपन्यास को दरअसल साम्प्रदायिक उन्मादों से होते आ रहे ऐतिहासिक खून-खराबों का एक प्रतीक भी समझा जाना चाहिए, क्योंकि दंगाई कभी भी समुदाय निरपेक्ष नहीं होते। वे एक ही साथ समूचे समाज की हत्या करते हैं। ‘आखर चौरासी’ में कमल ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दूर-दराज के शहरों तक फैली सिख विरोधी लपटों को जिस प्रांजलता के साथ प्रस्तुत किया है, वह उनके लिए एक भोगा हुआ यथार्थ है। उपन्यास में सतनाम, हरनाम, गुरनाम, छोटी बच्ची डिम्पल और जगीर सिंह की भयाक्रान्त मनोदशाएँ हमें यथार्थ के भीषण प्रवाह में बहा ले जाती हैं और सोचने पर मजबूर करती हैं कि राजनीति और सम्प्रदाय की भयावहता के आगे इन्सानियत जैसी पवित्र चीज दबकर क्यों कुचल जाती है ? उपन्यास के अंत में गुरनाम जिस सच्ची मानवता की खोज में घर से महाप्रस्थान कर जाता है- दरअसल लेखक उसी मैसेज को प्रसारित करने के लिए बेचैन प्रतीत होता है, जिससे पूरे समाज में सामुदायिकता की भावना को मजबूती मिले- हिन्दू, सिख, मुस्लिम या ईसाई की खतरनाक एकांगिकता का ज्वर कमतर हो। ’’

-कमलेश्वर

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आखर चौरासी

एक

कोयला खदान की गहराई से ऊपर धरती की सतह तक आने में हरनाम सिंह बुरी तरह थक चुके थे। खाखी रंग के हाफ पैंट और शर्ट पर कई जगह कोयले की कलिख लगी थी, जो खदान की गहराई से उनके साथ ही चुपके से निकल आयी थी। हाजरी बाबू के ऑफिस की बगल में बने ओवरमैन के अपने कार्यालय कक्ष में पहुँचकर उन्होंने कमर से अपनी बेल्ट खोली। उस बेल्ट के साथ ही पीठ की ओर कमर पर बंधी, दो-ढाई किलो वज़न वाली, कैप-लैम्प की बैटरी भी उतार कर उन्होंने टेबल पर रख दी। हाथ में थमा डयूटी वाला मज़बूत डंडा वे पहले ही कोने में रख चुके थे। कोयला खदान की काली अँधेरी गहराइयों में बस यही दो चीज़ें सब के साथ होती हैं, उनकी रक्षक भी और उनकी मार्गदर्शक भी।

तभी माइनिंग सरदार सुरेश भीतर आते हुए बोला, ‘‘लगता है आज फिर आप खदान की ‘फेस’ तक चले गये थे। मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि अब आप खदान में नीचे-ऊपर होने का काम मत किया कीजिए, मगर आप हैं कि मानते ही नहीं। .....और तीन-चार महीना बाद आप रिटायर होने वाले हैं, अब तो आराम कीजिए।’’ उसके चेहरे पर आदरसूचक अपनेपन वाला गुस्सा था।

अपने पहले पल्ले (सुबह की शिफ्ट) पर आये सुरेश ने हाजरी बाबू के कमरे से ही उन्हें खदान से निकलते देख लिया था। उसे नौकरी में आये अभी दो साल हुए हैं। उसकी ट्रेनिंग और अब पोस्टिंग दोनों ही ‘बांसगढ़ा खदान’ में हरनाम सिंह के ही मातहत हुई थी। उसके आदरपूर्ण व्यवहार के कारण हरनाम सिंह ने भी हमेशा उसे पुत्रवत् स्नेह दिया था। उन्हें सुरेश का यूँ गुस्सा होना बड़ा भला लगा। रात पल्ला (नाइट शिफ्ट) ड्यूटी के कारण नींद और थकान से ढीले पड़े उनके चेहरे पर एक ताजी-सी मुस्कान फैल गई।

‘‘अरे मैनिंग बाबू (उम्र में छोटा होने के बावजूद उन्होंने सुरेश को हमेशा इसी नाम से संबोधित किया था) आराम करने को किसका मन नहीं करता ? मगर क्या करें उम्र भर ड्यूटी करने की आदत तो आसानी से नहीं जाएगी न। आज रात पल्ला वाले माइनिंग सरदार की तबियत अचानक बिगड़ जाने से उसे छुट्टी लेनी पड़ी। पाँच नम्बर फेस पर ब्लास्टिंग करनी थी। माइनिंग सरदार के नहीं रहने से उस जगह पर मेरा रहना जरुरी था। भगवान ना करे, ‘शॉट फायर’ या ‘होलड्रिल’ में कोई छोटी-सी चूक भी खदान की इन गहराइयों में काल का रुप धर कर आ जाए।’’

बातें करते हरनाम सिंह और सुरेश बाहर आ गये। दाहिनी तरफ ‘हॉलेज’ चल रहा था, उसका काम खदान से कोयला लदी ट्रॉलियां बाहर निकालना और खाली ट्रॉलियां भीतर भेजना होता है। ‘ट्रिपलर’ पर अगली शिफ्ट वाले मजदूरों की हलचल शुरु हो चुकी थी। खदान से निकली कोयला लदी ट्रॉलियां एक लाईन से खड़ी थीं, जिन्हें बारी-बारी से ‘एन्डलेस हॉलेज’ के रस्से में फंसा कर ट्रिपलर पर भेजा जा रहा था। वहां पहुँच कर एक ही झटके में ट्रॉली उलट कर ‘सूप’ में खाली हो जाती है और उसमें लदा सारा कोयला फिसलते हुए सूप के दूसरे मुहाने पर नीचे खड़े मालगाड़ी के वैगन में चला जाता है। आस–पास के वातावरण में रह-रह कर मेहनत करते मजदूरों की समवेत आवाजें, ‘जोर लगा के हईसा’ गूंज जातीं।

जैसे बरसात के मौसम में गाँव के खेतों में दूर-दूर तक हरियाली नजर आती है। वहाँ कोलियरी में चारों तरफ दूर-दूर तक कोयला ही कोयला दिखाई पड़ रहा था। ‘लोकल सेल’ में ट्रकों द्वारा ले जाए जाने वाले कोयले के ऊँचे-ऊँचे टीले बेतरतीब इधर-उधर दूर तक फैले हुए थे।

‘‘अच्छा मैनिंग बाबू, मैं चलता हूँ। आज बेटा हॉस्टल जाने वाला है।’’

‘‘गुरनाम की बात कर रहे हैं न !’’ सुरेश ने पूछा।

‘‘हां वही जाने वाला है। वाहेगुरु की कृपा से दो बेटे हैं। सतनाम तो राशन दुकान खोल कर सेट हो गया है। गुरनाम कहता है, अभी पढ़ूंगा। हम लोग भी कहते हैं, पढ़ लो जितना पढ़ना है। अच्छा, चलता हूँ। नमस्कार !’’ हरनाम सिंह मुड़ कर चल दिये।

सुरेश बाबू ने अपनी कमर पर बेल्ट कसा, कैप-लैंप ठीक की और खदान की गहराइयों में उतरने के लिए तैयार हो गये। जहां उन्हें आठ घंटे काम करते हुए धरती के गर्भ से कोयला निकालने की प्रक्रिया का हिस्सा बनना था।

...कोई और दिन होता तो घर पहुँच कर नहा-धो और नाश्ता करने के बाद हरनाम सिंह सीधे बिस्तर पर चले जाते। मगर गुरनाम को हॉस्टल जाना था, इसलिए वे जल्दी-जल्दी तैयार हो कर उसके साथ बस स्टैण्ड को चल दिए।

अपने पिता की तरह ही लगभग छ्ह फुट और अच्छी सेहत वाला गुरनाम अपनी कद-काठी से गबरू जवान की तरह निकला था।

“अपनी सारी चीजे वगैरह तो रख ली हैं न, कुछ छूटा तो नहीं !” हरनाम सिंह ने तसदीक की ।

“जी पापा जी, बैग मैंने रात को ही पैक कर लिया था।”

बातें करते वे दोनों बस स्टैंड जा पहुँचे। थोड़ी देर में बस आ गई। गुरनाम ने अपनी सीट पर बैठ कर पापा को हाथ हिला कर विदा ली ।

गुरनाम की बस जाने के बाद हरनाम सिंह लौटने को मुड़े ही थे कि दूसरी तरफ से पास आ कर रुकते आटो से उन्होंने रमण शंडिल्य को उतरते देखा।

‘‘नमस्कार रमण बाबू, सुबह-सुबह कहाँ से आ रहे हैं ?’’ हरनाम सिंह ने उनका अभिवादन किया। रमण शंडिल्य ने हंसते हुए उनके अभिवादन का जवाब दिया और पास आ खड़े हुए।

‘‘विक्की को छोड़ने गया था, आज वह अपने इंजीनियरिंग कॉलेज गया है।’’

‘‘अच्छा-अच्छा, मैं भी गुरनाम को हॉस्टल भेजने के लिए बस पर बैठाने आया था।’’ हरनाम सिंह ने बताया।

वे दोनों बातें करते साथ-साथ चलने लगे। हरनाम सिंह जहाँ कोलियरी से कोयला उत्पादन का हिस्सा थे, वहीं रमन शंडिल्य कोलियरी के मुख्य कार्यालय में होने वाले लिपिक-कार्य का हिस्सा। एक ही कोलियरी में दो अलग- अलग जगहों पर काम करने से उनमें जो सामान्य-सी औपचारिक जान-पहचान थी, वह विक्की और गुरनाम की गहरी दोस्ती के कारण बढ़ कर प्रगाढ़ हो गई थी। घर परिवार की रस्मी बातों के बाद उनके बीच कोलियरी की बातें होने लगीं।

‘‘आज कल मैनेजमेंट में इस बात की बड़ी चर्चा है कि कोलियरी में वर्करों की तुलना में उत्पादन बहुत कम हो रहा है। इसलिए यहां के वर्करों को दूसरी कोलियरियों में ट्रांस्फर किया जाएगा।’’ रमण शंडिल्य ने बताया। ‘‘रमण बाबू आप तो प्रोजेक्ट ऑफिस में बैठते हैं, मैनेजमेंट की बातें आप ही जानें। हम लोग तो बस इतना जानते हैं कि हर हफ्ते हम लोग निर्धारित लक्ष्य से बीस-तीस गाड़ी ज्यादा ही प्रोडक्शन देते हैं। रही बात ट्रांस्फर की तो हम मजदूरों को काम करने से मतलब है, जहाँ मर्जी करवा लीजिए। हम हर जगह मेहनत करने को तैयार हैं।’’ हरनाम सिंह ने मुस्कराते हुए कहा।

बातें करते-करते वे दोनों हनुमान मंदिर के पास पहुँच गये।

रमण शंडिल्य ने रुकते हुए कहा, ‘‘अच्छा हरनाम जी, मैं जरा मंदिर हो लूँ। विक्की को भेज कर मैं हमेशा यहाँ उसकी यात्रा सफल होने के लिए प्रसाद चढ़ाता हूँ।’’

‘‘आप तो ऐसे बता रहे हैं, जैसे मैं नहीं जानता। चलिए मैं भी गुरनाम की यात्रा सफल होने की प्रार्थना कर लूँ।’’ हरनाम सिंह रमण बाबू के साथ मंदिर में घुस गये।

हनुमान मंदिर से निकल कर वे दोनों फिर बातें करते साथ-साथ चल दिए। अगले मोड़ से हरनाम जी को अपने घर की ओर मुड़ जाना चाहिए था, मगर वे भी रमण बाबू के साथ चलते रहे।

‘‘क्यों अभी घर नहीं जाना है क्या ?’’ रमण शंडिल्य ने आखिर पूछ ही लिया।

‘‘जाना है मगर पहले जरा गुरुद्वारे में मत्था टेक लूँ। गुरनाम को भेज कर मैं भी गुरुद्वारे में अरदास करने के बाद ही घर जाता हूँ।’’ हरनाम सिंह ने बताया।

‘‘चलिए आज मैं भी आपके साथ मत्था टेक लूँ। मैं भी तो विक्की को भेज कर आ रहा हूँ।’’ कहते हए रमण बाबू भी उनके साथ गुरुद्वारे की ओर बढ़ गये।

गुरुद्वारे में मत्था टेक और ग्रंथी से प्रसाद ले कर जब वे दोनों बाहर आ गये तो रमण बाबू ने हरनाम सिंह से कहा, ‘‘चलिए अब मेरे घर, एक-एक कप चाय हो जाए।’’

‘‘नहीं रमण बाबू, अभी तो रहने ही दीजिए। रात पल्ला के बाद जब तक एक लम्बी नींद न ले लूँ, सारा बदन टूटता रहता है। आज की चाय उधार रही।’’ हरनाम सिंह ने उन्हें बताया।

‘‘ठीक है लेकिन उधार आज ही शाम को वसूल कर लेने का वादा करें, तभी आप छूटेंगे।’’ रमण बाबू ने हंसते हुए कहा।

हरनाम सिंह ने भी हंसते हुए उत्तर दिया और विदा ली, ‘‘आपका आदेश सर माथे पर, .....रमण बाबू। तब शाम को मिलते हैं।’’

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मुख्य शहर से कोईं बीस-पचीस किलोमीटर दूर जंगल से सट कर वह कोलियरी अंग्रेजों के जमाने से बसी हुई थी। अंग्रेजी राज के उन दिनों कोयल और रेल विभाग एक ही मंत्रालय के अधीन था । लेकिन अब तो अँग्रेजों को गये कई साल हो गये। अब कोयल और रेल विभाग के अलग-अलग मंत्रालय है।

कहने को तो कोयला उत्पादन करने वाली वह एक छोटी सी कोलियरी थी, लेकिन वहाँ बसने वाली आबादी की विविधता ने उसे छोटे भारत का रूप दे रखा था। मतलब कि देश के लगभग हर हिस्से, हर जाति, हर धर्म को मानने वाले लोग वहाँ रह्ते थे। सब वहाँ आ कर ऐसे घुल मिल गए थे जैसे दूध में पानी। मंदिरों में पूजा, मस्जिद में नमाज, गिरजे में प्रार्थना और गुरुद्वारे में पाठ सहजता से होता रह्ता था। सबको रोजगार होने के कारण हर ओर ख़ुशी और शांति व्याप्त थी ।

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कमल

Kamal8tata@gmail.com

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