Karm path par - 10 in Hindi Novel Episodes by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | कर्म पथ पर - 10

कर्म पथ पर - 10




‌‌‌ कर्म पथ पर
Chapter 10



नाटक के पहले शो के दिन सभी बहुत उत्साहित थे। सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। बस कुछ ही समय में नाटक का मंचन शुरू होने वाला था। सिर्फ जय कुछ अनमना सा था। इंद्र ने उसे समझाया कि वह उस लड़की की बातों को मन से ना लगाए। शो खराब हो गया तो तुम्हारे पिता की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए वह ऊपरी तौर पर खुश रहने का दिखावा कर रहा था।
विलास रंगशाला में दर्शक जुटने लगे थे। श्यामलाल के मित्रगण भी पहुँच रहे थे। श्यामलाल स्वयं पूरे उत्साह से सबका स्वागत कर रहे थे। रहमतुल्लाह खान अपनी बेगम और अपने पोते जुनैद को लेकर आए थे। सबको मुख्य अतिथि जॉन हैमिल्टन का इंतज़ार था।
कुछ ही समय में जॉन हैमिल्टन भी आ गए। उनकी उपस्थिति से श्यामलाल को गर्व की अनुभूति हो रही थी। अब सभी को मंच का पर्दा उठने की प्रतीक्षा थी।
समय पर नाटक आरंभ हुआ। जय समेत सभी ने अपना पात्र सही तरह से निभाया। नाटक का मंचन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। अंत में जब पर्दा गिरा तो सभी ने खड़े होकर तालियां बजाईं।
मुख्य अतिथि हैमिल्टन नाटक देख कर बहुत प्रसन्न थे। नाटक की सफलता पर श्यामलाल बहुत खुश थे। इंद्र को उम्मीद थी कि उसे मेहनताने के अलावा कोई ईनाम भी अवश्य मिलेगा।
श्यामलाल ने अपने बंगले पर नाटक की सफलता की खुशी में एक पार्टी रखी थी। उन्हें राय बहादुर का खिताब मिलने की पूरी उम्मीद थी। पार्टी में श्यामलाल के सभी मित्रों सहित शहर के बड़े बड़े लोगों को बुलाया गया था।
सभी नाटक की बहुत तारीफ कर रहे थे। इंद्र सभी से बधाइयां ले रहा था। जय भी चेहरे पर मुस्कान चिपकाए सबकी तारीफ का जवाब धन्यवाद से दे रहा था। लेकिन उसका मन पार्टी में नहीं‌ लग रहा था। उसके मन में एक सवाल हलचल मचा रहा था।
वृंदा उस दिन नाटक रुकवाने के लिए पूरी तरह गंभीर थी। तो फिर उसने कुछ किया क्यों नहीं ? उस दिन उसके तेवर देख कर लग रहा था कि वह ऐसे ही नहीं बोल रही है।‌ वह शो के दिन हंगामा करने का संकल्प ले कर गई थी। तो फिर सबकुछ शांति से कैसे निपट गया ? क्या वह किसी मुसीबत में है। इन सारे सवालों से परेशान होकर वह चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गया।
इंद्र उसे खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। उसे वहाँ बैठे देखकर उसने पूँछा,
"यार तुम इतना चुप क्यों हो ?"
"कुछ खास नहीं बस कुछ देर अकेला रहना चाह रहा था। अपने कमरे में जा नहीं सकता। पापा बुरा मानेंगे।"
इंद्र भी वहीं शांति से बैठ गया। जय चाहता था कि वह वृंदा का ज़िक्र छेड़े। किंतु इंद्र अपने ही खयालों में खोया हुआ था। आखिरकार जय ने बात बनाते हुए कहा,
"चलो अच्छा हुआ। वह लड़की हंगामा करने नहीं आई।"
इंद्र ने जय की तरफ देखा। वह समझ रहा था कि जय इसी बात को लेकर सोंच में था।
"मौका मिला होता तो वह ज़िद्दी लड़की रंग में भंग डालने ज़रूर आती।"
जय चौंक कर बोला,
"क्या मतलब ?"
"मतलब ये है कि चाचाजी ने पहले ही उसे रोकने का प्रबंध कर दिया था। रंगशाला पहुँचने से पहले ही पुलिस ने उस लड़की और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया था।"
जय यह सुनकर और भी हैरान रह गया।
"मतलब की वह हिरासत में है ?"
"पता नहीं। होगी ही। उसकी जमानत कौन देगा ? सुना है बाल विधवा है। पिता की भी कुछ समय पहले मृत्यु हो गई।"
वृंदा के बारे में जानने के बाद जय और भी व्यथित हो गया। अब उसका मन पार्टी में बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। वह उस माहौल से निकल जाना चाहता था। इंद्र को किसी ने आवाज़ देकर बुलाया। वह उठ कर चला गया।
जय उठा और भोला को तलाशने लगा। भोला बेयरों को देख रहा था कि वह सही तरह से मेहमानों की देखभाल कर रहे हैं या नहीं। जय ने उसे अपने पास बुलाया। उसे कोने में ले जाकर बोला,
"भोला मैं बंगले के बाहर जा रहा हूँ।"
भोला ने आश्चर्य से कहा,
"पार्टी छोड़ कर। बड़े मालिक को पता चला तो नाराज़ होंगे।"
"वो मैं देख लूँगा। अगर कोई मेरे बारे में पूँछे तो कह देना कि तबीयत ठीक नहीं है। अपने कमरे में हैं।"
जय सबसे नज़रें बचा कर निकल गया। कुछ दूर जाने पर उसे एक तांगा दिखा। तांगे पर बैठते हुए उसने गोमती नदी के किनारे चलने को कहा।
गोमती के किनारे पहुँच कर वह तट पर बैठ गया। चांदनी रात में चंद्र किरणें पानी पर पड़ कर वातावरण को बहुत मोहक बना रही थीं। रेत पर बैठ कर नदी को देखने लगा। किंतु मनोरम वातावरण भी उसके चित्त को शांत नहीं कर पा रहा था।
"बाबूजी नाव में बैठेंगे ?"
जय के सामने एक मल्लाह खड़ा था।
"बीच धार में जाकर बहुत अच्छा लगेगा।"
मल्लाह ने सलाह दी।
जय इस समय अपने अशांत मन को किसी भी प्रकार शांत करना चाहता था। वह उठ कर खड़ा हो गया। मल्लाह उसे अपनी नाव तक ले गया। जय नाव में बैठ गया। मल्लाह ने लंगर खोला और नाव खेने लगा। जय ने देखा वह उससे एक आध साल ही छोटा होगा। उसके चेहरे पर मजदूरी मिलने की आस चमक रही थी।
जय अब तक अपनी ही दुनिया में मगन रहता था। सिर्फ अपने बराबर के लोगों से ही बात करता था। अपने घर में काम करने वाले नौकरों पर भी कभी ध्यान नहीं देता था। वह तो सदैव उसकी जी हुजूरी में उपस्थित रहते थे। उसके इशारे पर ही काम हो जाता था। लेकिन आज अचानक उसे मल्लाह के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी। उसने मल्लाह से उसका नाम पूँछ लिया। मल्लाह को भी इस बात की आस नहीं थी कि सामने कोट पतलून पहने बैठा बाबू उसका नाम पूँछेगा। उसने सकुचाते हुए उत्तर दिया,
"राम सनेही नाम है हमारा बाबूजी"
जय ने दूसरा सवाल किया।
"कब से नाव चलाने का काम करते हो ?"
"जब से होश संभाले तब से अपने बाप के संग नाव में बैठते थे। धीरे धीरे सीख गए। जब हम दस बरस के थे तब से अकेले नाव खेने लगे।"
"तुम्हारे पिता नहीं चलाते थे नाव।"
"का बताएं बाबूजी। जब हम दस बरस के थे तब हमारे बाप को एक दारोगा ने गोली मार दी। वो खतम हो गए। तो अपने घर का पेट पालने के लिए हम नाव खेने लगे।"
"दरोगा ने गोली मार दी। पर क्यों ?"
"किसी बात पे खपा हो गए होंगे। अब बड़े लोगन से कौन पूछताछ करता।"
जय ने आश्चर्य से पूँछा,
"उस दरोगा को पुलिस ने नहीं पकड़ा।"
रामसनेही को उसकी बात पर हंसी आ गई।
"कैसी बातें करते हैं बाबूजी, भला पुलिस को भी कोई पकड़ता है।"
रामसनेही के इस उत्तर ने समाज की एक सच्चाई जय के सामने ला दी थी। अमीर जुल्म करना अपना अधिकार समझते हैं। गरीब उसे चुपचाप सह जाना अपनी नियति।
अब तक नाव बीच धार में पहुँच गई थी। जय रामसनेही से उसके बारे में बहुत सारी बातें करता रहा। उसकी बातें सुनकर जय समाज के उस पक्ष से वाकिफ हो रहा था, जो उसकी अपनी दुनिया से एकदम जुदा था।
जब बहुत देर हो गई तो वह वापस किनारे पर आ गया। उसने जब रामसनेही को पैसे दिए तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
"बाबूजी ये तो बहुत जादा हैं।"
जय ने उसे आश्वस्त कर कहा,
"रख लो। तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।"
रामसनेही कुछ समझ नहीं पाया। खुश होकर बोला,
"बाबूजी और बड़े आदमी बनें।"
जय जब अपने घर लौटा तो पार्टी समाप्त हो गई थी। वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया। बिना कपड़े बदले वह बिस्तर पर लेट गया। वृंदा उसके दिलो दिमाग पर छाई हुई थी। जीवन में पहली बार किसी ने उसे इस तरह प्रभावित किया था। वह इसका कारण समझ रहा था। उसने जीवन में जो चाहा वह उसे अपने पिता के पैसे और रसूख के बल पर मिल गया। उसने कभी गरीबी नहीं देखी। जिनके साथ उसका उठना बैठना था वह सब भी बहुत अमीर थे। उन सभी को अपनी हैसियत का बहुत गुरूर था। लेकिन अपने स्वार्थ के लिए किसी अंग्रेज़ अधिकारी की जी हुजूरी करने में उन्हें ज़रा भी संकोच नहीं होता था। खुद अपने पिता को उसने कई बार ऐसा करते देखा था। लेकिन वृंदा उन सबसे अलग थी। उसमें स्वाभिमान था। देश की गरीब जनता के लिए करुणा थी। उस दिन रिहर्सल के दौरान जब वह रंगशाला में आई थी तो किस साहस के साथ उन लोगों का सामना कर रही थी।
इंद्र ने जब उससे प्रश्न किया कि क्रांतिकारी क्यों अंग्रेज़ों को भारत से निकलना चाहते हैं तो उसने बेखौफ़ कहा था कि यह हमारा मुल्क है। अंग्रज़ों का यहाँ कोई काम नहीं। लेकिन इंद्र भी हार मानने को तैयार नहीं था।
"देवी जी अंग्रेज़ी सरकार ही है जिसने आप लोगों के पढ़ने के लिए स्कूल कॉलेज खोले हैं। उन्हीं में पढ़ कर आपके नेता लोग भाषण देना सीखे हैं।"
"हाँ तो कोई एहसान नहीं किया इन लोगों ने। अपनी चाकरी के लिए उन्हें पढ़े लिखे नौकर चाहिए थे। इसलिए खोले यह स्कूल कॉलेज। वरना हमारे देश की जनता को लूटने का काम ही किया है।"
"तार,फोन, सड़के, मोटरें, रेल ये सब अंग्रेज़ ही इस मुल्क में लाए। आपकी भलाई के लिए इतना कुछ किया और आप जैसे लोग उन्हें सहयोग देमे की बजाय उनसे लड़ रहे हैं।"
"यह सब भी सिर्फ अपनी हुकूमत का शिकंजा कसने के लिए ही किया है अंग्रज़ों ने। पर आपको क्या समझाना। आप तो अपनी ही रंगीन दुनिया में मस्त हैं। आप लोगों को इस देश की गरीब जनता के दुख दर्द से क्या लेना देना।"
आज उस मल्लाह रामसनेही से बात कर जय को कुछ कुछ लोगों की तकलीफ का एहसास हुआ था। वह समझ सका था कि ज़िंदगी इतनी आसान नहीं होती जितना वह समझता था। अब वृंदा की तरफ उसका खिंचाव और बढ़ गया था। दूसरों की तकलीफ के लिए वह खुद के दुखों की भी परवाह नहीं करती। आज उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कोई उसकी जमानत देने वाला भी नहीं था। यह सोंच कर वह परेशान हो गया।

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