smriti - 1 in Hindi Love Stories by Shekhar Kumar books and stories PDF | स्मृति - 1

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स्मृति - 1


स्मृति
भाग-1

स्मृति, अपने नाम की ही तरह अब बस एक याद बनकर रह गई थी। कुछ नही जानता था मैं क्या हुआ उसके साथ, कहाँ गयी वो, जिंदा भी है या नहीं। शायद अब मैं उसे भूल चुका था या यूं कहो कि अब मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुका था। मैं अपनी बीवी अंतरा और अपने बेटे राघव के साथ खुश था।
गुड इवनिंग पापा कहते हुए राघव आया तो मैने पाया कि ये सब सोचते सोचते कब शाम हो गयी पता ही नही चला, "पापा आपको पता है आज मेरे साथ क्या हुआ, आज मैंने एक पागल औरत को देखा वो बहुत कमजोर लग रही थी, तो मैने अपने सारा लंच उसे खिला दिया।" मैंने कहा "ये तो तुमने बहुत अच्छा काम किया।" राघव को ये सुनकर बहुत अच्छा लगा, फिर "उसने कहा चलो पापा नाश्ता कर लो।"
हम नाश्ता करने नीचे गए। आज अंतरा ने राजमा चावल बनाये थे, खुशबू से तो लग रहा था कि बेहत स्वादिष्ट बने होंगे।
खैर अंतरा ने खाना परोसा और जैसा की खुशबू से ही लग रहा था, खाना सच मे बेहद स्वादिष्ट बना था। खाना खाते वक्त मैंने अंतरा से कहा "अंतरा कल शॉपिंग चलते है, वैसे भी कई दिन बीत गए हम कहीं बाहर नही गए।" ये सुनते ही वो बहुत खुश हुई। हमने खाना खा लिया, रात कब हो गयी समय का पता ही नही चला। हम सब जाकर सो गए।

अगले दिन जब मैं सो कर उठा तो मैंने देखा अंतरा बहुत खुश थी, आखिर खुश होती भी क्यों नही इतने दिनों बाद हम कहीं बाहर जा रहे थे। मैं बाहर गया और जाकर बालकनी में बैठ गया, मैं सोंच रहा था कि शॉपिंग के बाद कहां जाएंगे, तभी अंतरा आयी और बोली "तैयार हो जाओ शॉपिंग पे नही जाना क्या" मैंने शॉपिंग जाने से मना कर दिया। उसका मुह उतर गया, वो बिल्कुल बच्चो जैसी थी उसे कुछ भी कहो तो मुह फूला जर बैठ जाती थी। मुझसे उसका उतरा हुआ चेहरा देखा नही गया इसीलिए मैंने कहा "चलो आज तुम्हे शॉपिंग पर चलना था ना?" उसने मुझे घूरा और बोली "अभी तो मना कर रहे थे" मैंने कहा "अरे वो तो मैं मजाक कर रहा था, खैर ये सब छोरो जाओ जल्दी तैयार होकर आओ मैं भी तैयार होने जा रहा हूँ।"
अंतरा ने लगभग उछलते हुए कहा " हाँ बस 10 मिनट में तैयार होकर आती हूँ।"
ये तो सब जानते है की लड़कियो का 10 मिनट तो आधे घंटे के बराबर होता है पर आज अंतरा ने 15 मिनट ही लगाए। शायद वो शॉपिंग पर जाने के लिए काफी उत्सुक थी।

शॉपिंग मॉल में एंटर करते ही जो दृश्य मेरे सामने था उसने मुझे सब कुछ भुला दिया था। सामने कई मूर्तियां लगी थी जिन्होंने ऐसे कपड़े पहन रखे थे जो हमे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। ऊपर बड़ा सा झूमर लटक रहा था और उसकी रोशनी ऐसी थी कि मेरी तो आंखे चौंधिया गयी थी। खैर हमे शॉपिंग मॉल में 1 घंटे से ज्यादा और 2 घंटे से कम समय लगा पर हम घर से 6 बजे निकले थे तो अभी शाम हो गयी थी और सूरज भी ढलने को था। हम शॉपिंग मॉल से निकले तो राघव के लिए बैट लेने जाने लगे राघव रास्ते मे ही रुका और उसने उंगली दिखाकर एक जगह इशारा किया मैंने पहले ध्यान नही दिया फिर जब राघव ने कहा "पापा ये वही पागल औरत है जिसे मैंने अपना लंच खिलाया था" यह सुनकर मैंने उसे देखा और उसे देखकर तो जैसे मैं कुछ सेकंड के लिए स्थिर हो गया। वही आंखे, वैसे ही बाल, वही कमर जिसका कभी मानने स्पर्श किया था, उसके होंठ भी वैसे ही थे लेकिन अब वो फट रहे थे, उसने क्या पहना था मैंने इस पर गौर नही किया बस उसे देखता रह गया। आज भी वो पहले की ही तरह ही खूबसूरत लग रही थी। शाम का समय था सूरज अपनी लालिमा पूरे बादलो में फैला चुका था और छुपने के फिराक में था। उसका चेहरा बादलो के रंग से ठीक विपरीत था, कपड़े फ़टे हुए थे उसे ऐसी हालत में देखकर मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था। मैं उससे नज़रे मिलाने से भी हिचकिचा रहा था। मेरे गालो पर आंसू लुढ़क आये थे और ये कब हुआ मुझे पता ही नही चला। मैं उसे देखते ही जान गया था की वो स्मृति थी।
अंतरा के टोकने पर मैंने अपने आपको संभाला और मेरे कदम अपने आप उसके तरफ हो लिए। मैं उसके सामने गया तो उसने मुझे देखा भी नही बस अपने मे ही मस्त रही शायद उसे अब कुछ भी याद नही था।
मैं उसके सामने बैठकर बस उसे निहारता रहा, वो बहुत कमजोर लग रही थी तो मैने उसे छोले और चावल खिलाये जो उसे बहुत पसंद थे। खाते समय आज भी वो बच्ची ही लग रही थी। मैं बस उसे ही देखे जा रहा था, समय रुक सा गया था। सबकुछ अच्छा सा लग रहा था, उसने जो कपड़े पहने थे वो फ़टे हुए थे और उसकी कमर आराम से देखी जा सकती थी, मैं सोंच में था कभी उसके चेहरे को तो कभी उसकी कमर को देख रहा था, ऐसा नही था कि मैं हवसी बन गया था, बस उसकी कमर के साथ मेरी कुछ यादें जुड़ी हुई थी।अंतरा भी स्मृति को पहचान गयी थी और वो दूर बैठे बस सब कुछ देख रही थी। कब वो मेरे पास आकर खड़ी हो गयी मुझे पता नही चला, फिर उसने मेरा ध्यान तोड़ते हुए कहा "स्मृति को डॉक्टर के पास ले जाना है या यही बैठे बस उसे निहारते रहोगे"।