Pasand apni apni - 2 in Hindi Social Stories by किशनलाल शर्मा books and stories PDF | पसंद अपनी अपनी - 2

पसंद अपनी अपनी - 2

"रोको,"उमेश के बांयी तरफ बैठा आदमी बोला था।
ऑटो रुकते ही वह आदमी उतर गया।उसके उतर जाने पर हुई खाली जगह में उमेश खिसक गया था।
सड़क पर लोग आ जा रहे थे।अचानक ऑटो के सामने एक साईकल वाला आ गया।उसे बचाने के चक्कर मे ऑटो ने ऐसा टर्न लिया कि युवती सम्हलेते सम्हलते भी युवती उमेश की गोद मे आ गिरी।ऐसा होने पर उमेश को बहुत अच्छा लगा।उसने मन ही मन सोचा।काश युवती इसी तरह उसकी गोद मे पड़ी रहे।लेकिन उसने जैसा सोचा था,वैसा नही हुआ।युवती फुर्ती से उसकी गोद से उठते हुए बोली,"सॉरी।"
उमेश शालीनता से बोला,"ऐसा हो जाता है।'
बिजलीघर आने पर युवती और उमेश ऑटो से उतर गए।युवती फुर्ती से पैसे देकर बांयी तरफ खड़ी बस में जा बैठी।उमेश ऑटोवाले को किराया देते हुए बोला,"कमला नगर को बस कन्हा से मिलेगी।"
"सामने खड़ी है।,"ऑटोवाला हाथ का इशारा करते हुए बोला।
उमेश कमलानगर जाने वाली बस में चढ़ गया।उसके चढ़ते ही बस चल पड़ी।बस खचा खच भरी थी।युवती बस में आगे जबकि उमेश पीछे के दरवाजे से चढ़ा था।उमेश युवती के पास पहुँचना चाहता था।लेकिन बस में भीड़ ज्यादा होने के कारण वह ऐसा नही कर सका।बस में गरीब मज़दूर भी थे।जो युवती के आस पास ही खड़े थे।उन मज़दूरों के कपड़े से उठ रहे पसीने की बदबू से युवती को उबकाई आने लगी थी।उन मज़दूरों से दूर होने के लिए वह धीरे धीरे लोगो के बीच से जगह बनाकर पीछे खिसकने लगी।।
बस बार बार रुक चल रही थी।हर स्टॉप पर सवारियां चढ़ उतर रही थी।एक जगह ड्राइवर ने इतनी जोर से ब्रेक लगाया कि वह युवती सम्हलते सम्हलते भी उमेश से आ टकरायी।
"सॉरी",बिना पीछे देखे वह बोली थी।
"सॉरी की कोई बात नही है।बस में अक्सर ऐसा हो जाता है।"
जानी पहचानी आवाज सुनकर उस युवती ने पीछे मुड़कर देखा था।उमेश पर नज़र पड़ते ही ऐसे चौकी मानो बिछू ने डंक मार दिया हो।वह मज़दूरों से बचने के लिए पीछे आयी थी।पर उमेश को देखकर वापस मज़दूरों के ही बीच चली गई।
"कमला नगर",कंडुक्टर ने आवाज लगाई थी।कमला नगर आने पर वह युवती उतर गई थी।उमेश भी उतर गया।
उमेश भरतपुर का रहने वाला था।जब तब आगरा भी आता रहता था।यंहा का कुछ इलाका उसका देखा हुआ था।लेकिन इस तरफ पहली बार आया था।
भरतपुर से चलते समय उसके ताऊजी ने एक पत्र लिखकर दिया था।उसने पत्र निकाला।उसमे पता लिखा था।उसने पता पढ़ा।उसे राधा विहार कॉलोनी में जाना था। युवती बस से उतरते ही चल पड़ी थी।उमेश ने सोचा उस युवती से ही पता पूछा जाये।वह उस युवती के पास जाकर बोला,"आप यंही रहती है?"
"आपको मेरे रहने से मतलब।आप कौन है मुझसे पूछने वाले?"युवती के तेवर देखकर वह सहम गया।औरत है या बला।बात बात में काट खाने को आ जाती है।
वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा।उस युवती को यह भी नागवार गुजरा।वह बोली,"मेरे पीछे क्यो चल रहे हो?"
"आप कमाल कर रही है।सड़क सरकारी है।इस पर आपको चलने का अधिकार है,तो मुझे भी है।"
उमेश की बात का उसके पास कोई जवाब नही था।इसलिए वह कुछ नही बोली लेकिन उसने अपनी चाल तेज़ कर दी।वह युवती के पीछे पीछे नई बस रही कॉलोनी में आ गया था।मकान तो लोगो ने अछे बनवाये थे लेकिन नंबर किसी पर भी नही पड़ा था।कुछ दूर तक चलने के बाद युवती एक मकान का गेट खोलकर अंदर घुसी थी।गर्मी की दोपहरी की वजह से सन्नाटा था।कोई आता जाता नज़र नही आ रहा था।उमेश एक बार फिर युवती से बोला था,"यह पता तो मुझे बताती जाओ"।
"यंही रुको अभी बताती हूं,"।युवती मकान के अंदर चली गई।
"कौन है बाहर?किससे बात कर रही थीं,"विमला बेटी का तमतमाया चेहरा देखकर बोली,"क्या बात है?"
"कोई सिरफिरा है।बस स्टैंड से ही पीछे लगा है।बाहर गेट पर खड़ा है"।

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Gordhan Ghoniya

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