Azaadi - 3 in Hindi Fiction Stories by राज कुमार कांदु books and stories PDF | आजादी - भाग 3

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आजादी - भाग 3



शीघ्र ही विनोद और कल्पना पुलिस स्टेशन पहुँच गए । पुलिस स्टेशन में कई पुलिस के अधिकारी आ जा रहे थे । विनोद की समझ में नहीं आ रहा था किससे पूछे कहाँ शिकायत करे ? ‘ पूर्व में कभी भी पुलीस चौकी से पाला नहीं पड़ा था । इसी असमंजस में कल्पना भी थी । फिर भी हिम्मत करके बाहर नीकल रहे एक अधिकारी से कल्पना ने पूछ ही लिया ” साहब ! हमारा बेटा स्कूल से घर नहीं आया है । कहाँ शिकायत करें ? ”
वह अधिकारी सज्जन था । एक माँ की तड़प को महसूस कर उसने एक सिपाही को आवाज लगायी और उसे कुछ निर्देश दिया । कल्पना से बोला ” मैडम ! आप चिंता न करें ! वहां शिकायत दर्ज करदें । मैं देखता हूँ हम क्या कर सकते हैं । ” कहकर वह अधिकारी बाहर चला गया ।
एक मेज के पीछे दो हवलदार बैठे रजिस्टर के पन्ने पलट कर कुछ देख रहे थे कि तभी विनोद और कल्पना उस सिपाही के साथ वहाँ पहुंचे । साथ आये सिपाही ने उन्हें बताया ” बड़े साहब ने इनकी शिकायत दर्ज करने को कहा है । ”
तब तक विनोद और कल्पना इस तरफ पड़ी ख़ाली कुर्सियों पर बैठ चुके थे ।
हवलदार ने रजिस्टर बंद करते हुए विनोद की तरफ देखा और पूछा ” बोलो क्या कहना है ? ”
विनोद अभी कुछ कहता कि कल्पना पहले ही बोल उठी ” साहब ! हमारा इकलौता बेटा राहुल सुबह स्कूल गया और अभी तक वापस स्कूल से नहीं आया है । जबकि उसका स्कूल छूटे हुए लगभग दो घंटे हो चुके हैं । साहब ! बड़ी चिंता हो रही है । कुछ कीजिये ! ” कल्पना ने विनती की ।
हवालदार ने रूखेपन से कहा ” ठीक है । हम देखेंगे !लेकिन तुम लोग पहले अपने पहचानवालों और रिश्तेदारों के यहाँ ढूंढ लो । अपने किसी मित्र के यहाँ होगा । आज की रात इंतजार कर लो । सुबह तक भी अगर नहीं आएगा तो उस लडके की एक फोटो लेकर सुबह दस बजे आना । रिपोर्ट दर्ज करेंगे और बताएँगे क्या कर सकते हैं । ठीक है ? ”
विनोद गिडगिडा उठा था ” साहब ! कुछ कीजिये सुबह तक तो बहुत देर हो चुकी होगी । पता नहीं कहाँ होगा किस हाल में होगा मेरा बेटा ? ”
” एक बार कह दिया न ! अभी कोई रपट नहीं लिखी जाएगी । सुबह ही आना । ” हवलदार ने गला छुडाते कहा ।
” अरे साहब ! बड़े साहब ने खुद कहा है रपट लिखने के लिए । और आप हैं कि आनाकानी कर रहे हैं । ” अब विनोद से अधिक सब्र नहीं हो रहा था ।
अब हवलदार लगभग चीख सा पड़ा ” सीधे से बोला हुआ तुम्हारी समझ में नहीं आता क्या ? बड़े साहब जब मुझसे कहेंगे तब देख लूँगा । अभी तो तुम जाओ ! ”
विनोद और कल्पना अपना सा मुंह लेकर चौकी से बाहर आ गए ।
राहुल के न मिलने से दुखी विनोद और कल्पना के दुःख को पुलिस के असहयोगी रवैये ने कई गुना बढ़ा दिया । थके हारे परेशान दोनों ने बाहर आकर उसी पहले वाले सिपाही से बड़े साहब के बारे में पूछा । उसने बताया कि अब बड़े साहब कल ही मिल पाएंगे । फिलहाल किसी केस के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए हैं ।
विनोद और कल्पना अपने घर वापस आ गए थे । अँधेरा घिर गया था लेकिन उन्हें घर रोशन करने का भी मन नहीं कर रहा था । जिसके दिल दिमाग में भविष्य के अँधेरे का ख्याल रच बस गया हो वह भला घर के उजाले की फ़िक्र क्यों करने लगे ?
पडोसी घर पर फिर से जमा होने लगे थे । कुछ जानना चाहते थे कि दरअसल हुआ क्या था ? कुछ महानुभाव दोनों को उपदेश देते हुए भी दिखे । उपदेश देनेवालों में ऐसे लोग भी थे जिन्हें बोलने की तमीज भी नहीं थी । कुछ तो निरे अनपढ़ निपट गंवार भी विनोद और कल्पना को बहुत कुछ समझा रहे थे । शिष्टाचार के मारे बिचारे कुछ सोच पाने में भी अपने आपको असमर्थ पा रहे थे ।
राहुल के जाने से दुखी दोनों संवेदना दिखानेवालों से ज्यादा परेशान हो गए थे ।
इधर राहुल बगीचे से बाहर निकल कर कुछ करने की ठान चुका था । कुुुछ ही दिन पहले उसने टी वी पर एक फ़िल्म देखी थी । उसे याद आ गया था उस फिल्म का नायक कैसे संघर्ष करके शहर का बड़ा आदमी बन जाता है ।
उसे भी कहीं से अपनी जिंदगी की शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी ।
आजादी की चाह में राहुल ने बीना सोचे समझे इतना बड़ा कदम उठा तो लिया था लेकिन इसमें आई मुश्किलों से भी उसे दो चार होने का अंदाजा भली भांति लग रहा था । माँ के लाख समझाने पर भी खाना खाने में आनाकानी करनेवाला राहुल फ़िलहाल तो इस समय भूख से ही तड़प रहा था । पेट में चूहे उछलकूद कर रहे थे और दिमाग में बहुत से विचार गुत्थमगुत्था हो रहे थे । भुख से बेहाल राहुल को अब माँ बाप की डांट बुरी नहीं लग रही थी । अब उसकी समझ में आ रहा था जिस भोजन को वह इतने नखरे दिखाकर ठुकराता था उसके बीना कैसा लगता है । लेकिन अब वह क्या मुंह लेकर वापस जायेगा ? यह भी एक अहम् सवाल था जो उसके सामने मुंह बाये खड़ा था । आखिर आत्मसम्मान भी कोई चीज होती है ? भले ही तकलीफ हो लेकिन अब वह वापस खुद से अपने घर नहीं जायेगा । इरादा पक्का होते ही उसके कदमों में तेजी आ गयी और वह सड़क किनारे एक बड़े ढाबे के सामने जाकर खड़ा हो गया ।
काउंटर के सामने जाकर राहुल ने वहां खड़े आदमी से कहा ” अंकल ! मैं यहाँ अपनी माँ के साथ आया था लेकिन अब मेरी माँ मुझे मिल नहीं रही है और मुझे बड़े जोरों की भूख लगी है । क्या मुझे कुछ खाने को मिलेगा ? ”
” बेटा ! तुम कहाँ से आये हो और कहाँ जाना चाहते हो ? क्या अपने गाँव का पता जानते हो ? ” अच्छे कपडे पहने भले से दिखनेवाले राहुल की बात का भरोसा करते हुए उस दुकानदार ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा और उसे खाने के लिए कुछ पकौड़े दिए । राहुल ने पकौड़े खाने के बाद उस दुकानदार से कहा ” अंकल ! आपकी बड़ी मेहरबानी ! आप कितने अच्छे हैं ! जब तक मेरी माँ मुझे नहीं मिल जाती क्या आप मुझे यहाँ रहने देंगे ? बदले में आप जो भी काम मुझे कहेंगे मैं ख़ुशी ख़ुशी कर दुंगा । ”
” ठीक है बेटा ! जब तक तुम्हारी माँ नहीं मिल जाती तुम यहाँ रह सकते हो । काम की कोई फ़िक्र नहीं करना । जो कर सको करना नहीं तो कोई बात नहीं । ” उस सज्जन आदमी ने उसे सहारा देकर इंसानियत का फर्ज ही निभाया था ।
राहुल वहीँ होटल में अन्दर बैठ गया ।
बाहर अँधेरा हो गया था । पूरा शहर तरह तरह के बिजली के बल्ब से रोशन हो गया था । ढाबे के किचन में भी भोजन की तैयारियां जोरों पर थी । ढाबे के कर्मचारी तेजी से अपना अपना काम कर रहे थे ।
रात दस बजते बजते ही राहुल को नींद सताने लगी थी जबकि ढाबे में अभी भी ग्राहकों की भरमार थी । ढाबे के बाहर सड़क किनारे राहुल कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो गया ।

क्रमशः