हमसफर- (भाग 2) in Hindi Social Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | हमसफर- (भाग 2)

हमसफर- (भाग 2)

उसका देखा सुनहरा सपना भी आज टूट गया था।
काफी दिनों से सजोये सपने के टूटने से वह हताश था और हारे हुए जुआरी की तरह ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन लौट रहा था।उसे दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़नी थी।
अचानक सामने नज़र पड़ते ही वह ठिठक कर खड़ा रह गया।दूर खम्बे के सहारे कोई औरत खड़ी थी।इतनी रात गए सुनसान जगह में एक औरत को देखकर वह चोंका था।कौन है,वह?यहाँ क्यो खड़ी है?उस औरत को देखकर उसके मन मे अनेक प्रश्न उभरे थे।जिनका उत्तर वह औरत ही दे सकती थी।
कुछ देर तक वह उस औरत के बारे में सोचता रहा।फिर कुछ देर सोचने के बाद वह दबे कदमो से उसके पीछे जा पहुँचा।
वह औरत अपने मे खोई थी।इसलिए उसे उमेश की उपस्थिति का जरा भी भान नही हुआ।तभी दूर से आती ट्रेन के इंजन की सिटी ने वातावरण की नीरवता को भंग कर दिया।सामने से आती ट्रेन को देखते ही उस औरत के शरीर मे हरकत हुई थी।वह अपनी जगह से हिली और लाइनों की तरफ बढ़ने लगी।
उमेश के मन मे पहले यह आशंका हुई थी,लेकिन उसने नकार दिया था।पर अब उस औरत की हरकतों को देखकर उसे समझते देर नही लगी कि इतनी रात गए इस सुनसान इलाके में वह औरत आत्महत्या के इरादे से आई थी।वह भी दबे कदमो से उसके पीछे चलने लगा।सामने से ट्रेन दौड़ती चली आ रही थी।औरत धीरे धीरे चलकर लाइनों के बीच मे आ गई थी।
ज्यो ज्यो ट्रेन पास आ रही थी।इंजन की सर्च लाइट का प्रकाश तेज होता जा रहा था।इंजन की रोशनी में उमेश ने देखा।आत्महत्या के इरादे से आई औरत एक युवती थी।ट्रेन को अपनी तरफ आता देखकर उस युवती की आखों में चमक आ गयी थी।उसके चेहरे पर भयानक इरादे की झलक साफ नजर आ रही थी।ज्यो ज्यो ट्रेन करीब आ रही थी।उस युवती के जीवन और मौत के बीच फासला कम होरा जा रहा था।युवती  होने वाली दुर्घटना के लिए स्वयं को तैयार कर रही थी।ट्रेन और युवती के बीच कुछ ही गज का फासला रहा होगा।तभी उसने बाज की तरह झपट्टा मार कर उस युवती को अपनी बाहों में भर लिया था।अप्रत्याशित पकड़ से वह कसमसाई।पूरी ताकत से छूटने का प्रयास करते हुए वह चिल्लाई,"कोंन हो तुम?मुझे छोड़ो।मुझे मर जाने दो।"
उसने युवती की बातों पर ध्यान नही दिया।अपनी पकड़ और मजबूत की।और उस युवती को बाहों में भरकर छलांग लगा दी।कुछ दूर तक वे ज़मीन पर लुढ़कते हुए चले गए।ट्रेन शोर मचाती हुई वहाँ से गुज़र गई।युवती फुर्ती से उठी और विस्फुरित नज़रो से अपनी जान बचाने वाले को देखने लगी।उसका तन पसीने से तर था।सांसे तेज चल रही थी।अपने सामने खड़े युवक को आश्चर्य से देखते हुए वह बोली,"कौन हो तुम?"
"तुम्हारी ही तरह हाड़ मास का आदमी।"
"तुमने मुझे क्यो बचाया?"
"यह मेरा कर्तव्य था।मानवता का तकाजा"उमेश बोला"जो तुम करने जा रही थी।वह कायरता थी।जिंदगी ईश्वर की देन है।उसे लेने का हक़ भी उसे ही है।तुम्हे अपनी जिंदगी मिटाने का कोई हक नही है।"
"तुम मर्द हो।औरत की पीड़ा को क्या समझो"उमेश की बात सुनकर वह युवती बोली,"तुमने मुझे बचा कर मेरे जीवन के दर्द और पीड़ा को और बढ़ा दिया है।"

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