My crazy ... my friend - 4 in Hindi Love Stories by Apoorva Singh books and stories PDF | मेरी पगली...मेरी हमसफ़र - 4

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मेरी पगली...मेरी हमसफ़र - 4

वो सामने कैंटीन एरिया में दो महिलाओं के साथ बैठी हुई उनसे कुछ बातचीत कर रही थी।शायद उनमे से एक थकी हुई थी।क्योंकि वो बार बार अपने पैरो को दबाती हुई दिखी।जिसे देख अर्पिता ने उसके पैरो को थामा तो उस महिला ने उसके हाथ रोक लिए।शायद वो नही चाहती थी अर्पिता उनके पैरो का स्पर्श करें।वो भी जिद्दी कम नही उसने उस महिला के चेहरे की ओर देखा,उसके होंठ हिले शायद उसने कुछ कहा और कुछ देर बाद उसने पैरो का स्पर्श कर कुछ लगाना शुरू कर दिया।

मैं समझ गया उसे "किसी न किसी तरह अपनी बात मनवाना भी आता है"।उसकी इसी परवाह पर मैं खुद को हार गया।चंद मुलाकातें और उन मुलाकातों में अपनो के लिए छिपी उसकी परवाह और उस परवाह में छुपा प्यार,मेरा हृदय चुरा गया।शायद मेरे मन को एहसास हो चुका था जिसकी मुझे अब तक तलाश थी वो वही थी।मैं वहीं खड़ा उसे तब तक देखता रहा जब तक वो वहां से चली नही गयी।आधे घण्टे तक जब मैं अंदर नही पहुंचा तो श्रुति मुझे ढूंढते हुए बाहर चली आई।मुझे वहां खड़े देख वो हल्का सा गुस्साते हुए बोली, 'भाई,मूवी वहां अंदर चल रही है और आप यहां खड़े हो क्यों'? मैं बेख्याली से धीरे से बोल गया, क्योंकि मेरी सिमरन मुझे यहां मिल गयी'।वो समझ नही पाई और बोली 'मतलब भाई'।उसकी बात सुन मुझे एहसास हुआ मैं क्या बोल गया।मैंने बात सम्हालते हुए कहा 'मतलब कुछ नही वो बस इम्पोर्टेन्ट कॉल आया तो बात करने चला आया! तुम जाओ एन्जॉय करो और अगर बोर हो रही हो तो घर भी चला जा सकता है'।


'हम्म ठीक है भाई वैसे भी कल बहुत काम है'! उसने कहा और वो अंदर चली गयी।मैं वहीं खड़ा मॉल को देखने लगा।ऐसा पहली बार हो रहा था मेरे साथ कि मैं बिन किसी कार्य के निश्चिन्त हो मॉल को निहार रहा।व्यर्थ में खड़े रहना मेरा स्वभाव नही और मैं अपने स्वभाव से उलट बदल रहा था।हां उस पल से मैं बदलने लगा था।किसी खास के आने से जीवन में बदलाव कुछ इसी तरह तो होते है हमे पता भी नही चलता और हम न जाने कब क्या से क्या बन जाते हैं।मेरे साथ भी ऐसा होने लगा।मै वहीं खड़ा हुआ था तभी श्रुति चित्रा परम त्रिशा सभी चले आए।मैंने सवालिया नजरो से उनकी ओर देखा जिसे जान कर चित्रा बोली, 'त्रिशा जिद कर रही थी तो इसिलिए चले आये'।मैंने त्रिशा को गोद में उठाया और वहां से चला आया।सभी वहां से फूड सेक्शन की ओर गये और सबने अपनी पसंद का डिनर कर चले आये।


अगले दिन कार्य से फ्री होकर मैं परम और श्रुति घर के हॉल में बैठे हुए दिन के विषय में चर्चा कर रहे।चर्चा क्या परम को ऑफिस न जाने के लिए बोल रहे थे लेकिन परम मान ही नही रहा था!


'छोटे, बड़ी मां ने सख्त आदेश दिया कि तुम्हे आज चलना है,और तुम हो कि ऑफिस के लिए निकल रहे हो'।मैंने उससे हल्की सी सख्ती से कहा।परम अपने शूज पहन खड़ा हो कहने लगा,'भाई आज जाना बेहद जरूरी है!मैंने वैसे भी राधु भाभी से सारी बातचीत पहले से ही कर ली थी तो वो सब अरेंज कर लेंगी ठीक आप टेंशन न लो'।


उसे सुन मैं हकबकाते हुए बोला 'मुझे टेंशन क्यों होगी,वो तो बड़ी मां ने कहा था इसीलिए मैंने तुमसे कहा अब तुम्हारा काम जरूरी है तो फिर मैनेज कर ही लिया जायेगा'।बात करते हुए मैं पहली बार हकबकाया।जिसे परम और श्रुति दोनो ने नोटिस किया।दोनो ने मेरी ओर देखा तो मैं आदतन उठकर वहां से कमरे में चला आया।परम मेरी बाइक ले वहां से ऑफिस निकल गया तो मैं उसकी कार से श्रुति को कॉलेज ड्रॉप करते हुए ऑफिस निकल गया।'न जाने क्यो कॉलेज में मुझे वो दिखी नही' अपने ऑफिस में बैठा हुआ उसके बारे मैं सोच रहा था तभी मेरी नजर हाथ में बंधी घड़ी पर पड़ी और मैं उसे याद कर मुस्कुरा गया।उसके एहसास मुझे अकेले बैठे हुए मुस्कुराना सिखा रहे थे।और मैं इस बात से अंजान सीख भी रहा था।घड़ी में सुईया देखी तो सब भूल हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ, दोनो बड़ी मांये ताऊजी भाभी सब मेरा इंतजार कर रहे होंगे मन में ख्याल आया और मैं कार की चाबी उठा चित्रा के केबिन की ओर बढ़ गया।चित्रा को ऑफिस सम्हालने का कह मैं वहां से निकल गया और प्रेम भाई के घर पहुंच सबको रिसीव किया।बड़ी मां ताऊजी पीछे बैठे थे तो वहीं राधु भाभी मेरे पास ही थी।वो मुझे रास्ता बता रही थी।कभी लेफ्ट तो कभी राइट!कभी स्ट्रेट।बड़ी मां को उन्होने परम के न आने के बारे में पहले ही बता दिया था जिस कारण बड़ी मां ने मुझसे कोई सवाल नही किया।कुछ देर में हम सब आलमबाग पहुंचे तो सब को घर के दरवाजे के सामने उतारकर मैं गाड़ी पार्क करने के लिए बढ़ गया।फोन पर कुछ क्लाइंट्स ने डिटेल भेजी थी उन्हें देखते हुए मैंने डोरबेल बजाई।दरवाजा खुला और एक पहचानी सी आवाज मेरे कानो में पड़ी ..'आ..प यहां'!आवाज सुन कर मैंने सामने देखा वो खड़ी थी।मैं हैरान हो गया उसे वहां देखकर!मन में ख्याल आया लगता है ठाकुर जी भी मुलाकातों का सिलसिला बनाये रखना चाहते है।मैंने चेहरे पर मुस्कान रखी और उसकी ओर देखा वो घबराहट में हड़बड़ाते हुए कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी,'आप यहां ..कैसे.हमारा मतलब..कहते हुए उसने अपने सर पर चपत मारी तो मैं 'पगली' कह मन ही मन हंस दिया।फिर वो खुद को सामान्य करते हुए बोली 'आप खड़े क्यों है अंदर आइये' वो घबरा तो इतनी गयी जैसे सामने कोई इंसान नही एलियन देख लिया हो।'जी बेहतर,नही तो मुझे लगा कि यहीं दरवाजे पर ही खड़े खड़े समय न गुजर जाये' धीरे से कहते हुए मैं अंदर आने लगा।दरवाजा बन्द कर मेरे साथ चलते हुए वो बोली, 'नही, वो हमने आपका यहां होना सोचा नही था तो बस यूँही हड़बड़ाहट में ऐसा रिएक्ट कर गए'!उसे वहां देख मेरा मन तो वैसे ही अच्छा हो गया था सो मैं अपने स्वभाव के विपरीत जाकर मुस्काते हुए बोला, 'ओह ऐसा क्या'।जवाब में वो हम्म कह खामोश हो गयी।हम दोनो वहीं सबके बीच आ गये।वो जाकर सोफे के पास खड़ी हो गयी।वहां कोई और लड़की नही थी।बड़ी मां और राधु भाभी कॉफी पीते हुए उससे बात कर रही थी और वो सहजता से सबको जवाब दिये जा रही।बड़ी मां ने मेरी ओर देखा तो इशारे से कॉफी के लिए बोला!अब मैं ठहरा चायप्रेमी ये कॉफी कहां मुझे पसंद आती लेकिन बड़ी मां का मन रखने के लिए मैं कॉफी मग उठा कर पीने लगा।उसका स्वाद मुझे थोड़ा अलग लेकिन अच्छा लगा।मन में ये ख्याल आया कि ये शायद अर्पिता ने ही बनाई है!वहीं मुझे पता चला कि वो आगरा से है और वहां अपनी मासी के पास रहती है।राधु भाभी बराबर उससे बाते किये जा रही।ये नजारा देख मुझे जोर का झटका बहुत हौले से लगा।मन मे ख्याल आया जिस तरह बड़ी मां और भाभी उससे बात कर रही है हो न हो परम का रिश्ता उसके साथ ही होने जा रहा।मैंने उसके चेहरे की ओर देखा वो बहुत खुश नजर आ रही थी।लेकिन मेरे मन में उथल पुथल मचने लगी।मन ने कहा शायद ये साथ ये एहसास बस चंद लम्हो के थे।एहसासों से बंधे मेरे हृदय से खुद ब खुद शब्द निकलने लगे.--


सोचा नही था कि तुमसे यूं मुलाकात होगी


किसी खास के लिये टूटती हुई सारी आस होगी॥


अभी तो ख्वाहिशे जग रही थी तुम्हे जानने की


क्या पता था कि वो ख्वाहिशे भी पल दो पल की मेहमान होगी।


मैं मन ही मन परम की किस्मत पर नाज करने लगा।होठों से मैं कुछ कह नही पाया लेकिन मन ही मन उस लम्हा थोड़ा उदास हो गया मेरा मन।सब यूँ ही हंसते मुस्कुराते बात कर रहे थे तभी वो वहां से ऊपर चली गयी!मैं वहीं खामोश सबके साथ बैठा था कि तभी श्रुति का कॉल आया,मैंने कॉल राधु भाभी को दिखाया तो वो आदतन मुस्कुराते हुए बोली, 'श्रुति का है तो अटैंड करना ही होगा बात कर लो'!मैं फोन लेकर वहां से उठकर दूसरी ओर चला गया।मैं कॉल अटैंड करते हुए बोला 'हेल्लो'।श्रुति तो जैसे मेरे हेल्लो का ही इंतजार कर रही थी!छूटते हुए ही बोली “भाई मैंने न आकर गलती ही कर दी आज तो कॉलेज में अर्पिता नही आई और सात्विक भी आकर चला गया।मतलब ये पक्का बोर हो रही हूँ। इससे अच्छा तो आपके साथ ही पहुंच जाती कितना बढिया होता।" उसे सुन मैं थोड़ा सा उदास मन से बोला 'अरे कोई नही वैसे भी हम लोग यहाँ जिससे मिलने आये है उसे हम लोग पहले से ही जानते हैं'।


अच्छा! फिर तो फोटो भेजिये भाई, अब मुझे भी देखना है कि आखिर वो है कौन?श्रुति उत्साहित होकर बोली।तो "ओके श्रुति वेट अ मिनट” अभी भेजता हूँ मैंने कहा और वहीं साइड से खड़े हो चुपके से अर्पिता की एक फोटो खींच (जिसमे किरण भी आ गयी जो अभी उसके साथ ही नीचे आई )श्रुति को सेंड कर दिया।


मैंने दोबारा कॉल लगाया और बोला 'फोटो सेंड कर दिया है देख लो ओके अब मै रखता हूँ बाय कह' मैंने अपना फोन रखा और आकर सबके साथ बैठ गया।


अर्पिता और वो साथ आई लड़की

दोनो वहीं एक ओर खड़े हो फुसफुसाते हुए बाते करती जा रही।बड़ी मां उठी और हाथ में शगुन का सामान पकड़े आगे बढ़ी।वो अर्पिता के पास खड़ी लड़की किरण को देकर मुस्कुराने लगी।ये दृश्य देख मेरे बुझे हुए चेहरे पर मुस्कुराहट छा गयी!मैं मन ही मन ठाकुर जी को धन्यवाद देते हुए बोला, 'विश्वास था आप कुछ गलत नही होने देंगे जो मेरा है वो मेरा ही होगा'।उस पल मन में ख्याल कर लिया मुझे आगे उसके बारे में ही जानना,समझना है,उस पल मुझे एहसास हो गया 'मेरे मन में जो एहसास जाग रहे है वो प्रेम के एहसास है'!अब इतना नादान तो नही था मैं कि उन एहसासों को न समझ पाऊं।थोड़ा समय लगा लेकिन समझ गया था मैं।


मैं तो समझ गया था लेकिन उसे एहसास कराना बाकी था जो मेरे लिए पहाड़ो पर रास्ता बनाने जैसा था।सीधे जाकर बोलना मेरे वश की बात नही।इस रास्ते पर नया नया था तो ये भी पता नही था कि रास्ते में फूल मिलेंगे या कांटे!बस रास्ते के सफर को खुलकर जीने का विकल्प था और उसे ही मैंने चुना।कुछ देर बाद राधु भाभी उठकर उसके पास गयी और धीमे से उससे कुछ बोली जो मुझे सुनाई तो नही दिया लेकिन उसके चेहरे के हावभाव देख लगा वो पहले थोड़ा चौंकी फिर मुस्कुराते हुए एक फोन उनकी ओर बढ़ा दिया।मतलब भाभी नम्बर एक्सचेंज के लिए बोली।समझ कर मैं मुस्कुरा दिया।सारी रस्मे कर कुछ देर बाद हम वहां से चले आये!आते हुए मेरा फोन वहीं सोफे पर रह गया।मैं पहली बार अपना फोन कहीं भूला जो सच में मेरे लिए हैरान करने वाली बात थी।सभी बाहर चले आये जहां मुझे हाथ खाली सा लगने पर समझ आया कि फोन मेरे पास नही है।मैंने पूछा,'मेरा फोन आपके पास है भाभी' नही भाई उन्होंने जवाब दिया तो 'शायद अंदर होगा मैं देख कर आता हूँ' कहते हुए मैं एक बार फिर अंदर चला आया।मैं बहुत खुश होते हुए अंदर गया।बरामदे को पार कर हॉल में पहुंचा तभी मुझे मेरे सर पर फिर वो हल्के नीले रंग की चुनरी का एहसास हुआ!मेरा सर ढंक गया और मैं उसे सम्हालते हुए वहीं खड़ा रह गया।उसकी हंसी मुझे सुनाई दी और मैं समझ गया कि वो उसी का है। मेरी नजर सामने उतर कर आती हुई उस पर पड़ी।साथ ही सुनाई दिये कुछ शब्द, 'सुनो वो हमारा है'।वो अपनी ही धुन में मेरी ओर चली आ रही थी। उसकी नजर मेरे पैरो पर पड़ी तो चौंकते हुए बोली पड़ी,'प्रशांत जी आप' उसके मुख से अपना नाम सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा ,मैं एक बार और सुनना चाहता था लेकिन वो आगे बिन कुछ कहे पलट गयी।उसकी ये अदा देख मन ही मन बोला


"माना कि मै हू नये जमाने का लेकिन मेरे ख्यालात जरा पुराने है। समझ रखता हूँ मेरे भारतीय रिवाजो के जिसके लाखो अफसाने हैं।मुझे पसंद है भारतीय संस्कारो के आवरण को लपेटे ‘वो’ जिंदगी जिसके माथे पर बिंदी, हाथो में चूड़ी और पैरों में झनकती हुई पायल होगी।"


मैं आगे बढ़ा और उसके पास जाकर सलीके से उसका दुपट्टा उसके ऊपर लपेट दिया और धीरे से बोला,'लगता है तुम्हारे दुपट्टे को मेरा साथ कुछ ज्यादा ही पसंद आ गया तभी तो हर बार मेरे ही पास चला आता है'।कहते हुए मैं वहां से चला आया!आते आते मन में एक बार फिर ख्याल आया कि मुड़कर देख लिया जाये उसे!पलट कर देखा तो वो सोचती हुई मेरी ओर ही देख रही थी।मैं बिन कुछ रिएक्ट किये वहां से चला आया।बाहर आकर मैं सबको लेकर प्रेम भाई के घर पहुंचा जहां कुछ देर बैठ सभी ने बातचीत की।त्रिशा और आर्य दोनो बच्चे सो गये थे सो हम सभी उन्हें बाहर से देख कर वापस हॉल में आ बैठ गये और बातचीत करने लगे।मैं भी वहीं बैठा हुआ उनकी बातचीत का हिस्सा बन गया।कमला और शोभा दोनो बड़ी मां को किरण अच्छी लगी।वो उसके बारे में चर्चा कर रही थी तभी शोभा बड़ी मां बोली, 'लड़कियां दोनो ही बहुत प्यारी है,कजिन बहने है दोनो।लेकिन जिस तरह खड़ी हुई बातें कर रही थी लग नही रहा था कि वो कजिन है।अगर छोटी यहां होती तो पक्का बात शुरू कर लेती'।उनकी बातों का आशय समझ मैं मन ही मन खुश हुआ और बोला 'आज नही तो कल वो घर हमारे ही आयेगी ठाकुर जी ने ये मुलाकाते यूँ ही तो नही लिखी हैं' लेकिन चेहरे से जताया नही।मुझे चुप देख ताईजी बोली 'क्या बात है प्रशांत?आज कुछ ज्यादा ही खामोश हो।' मैंने उनकी ओर देखते हुए कहा, ' अब मेरे कहने लायक तो कुछ है नही बड़ी मां तो क्या बोलूं'।सारा निर्णय तो आपको और ताऊजी को ही लेना है।


'ये बात भी सही है' तो अब हमे स्टेशन ड्रॉप कर दो बेटे,नही तो घर पहुंचने में देर हो जायेगी बड़ी मां ने कहा।उनकी बात सुन मैं चाबी उठा खड़ा हो बाहर चला आया।दोनो बड़ी मां ताऊजी तीनो उठ कर राधिका और स्नेहा भाभी से मिल कर बाहर आ गये तो मैं भी सबको लेकर वहां से स्टेशन की ओर निकल गया।हमारे पास गाड़ी थी सो बीस मिनट में मैं चारबाग स्टेशन पर खड़ा था।रिटर्न टिकट पहले से ही बनवा रखा था।सभी को ट्रेन में बिठा मैं वापस ऑफिस चला आया।ऑफिस में कदम रखते ही मेरे सामने चित्रा आ खड़ी हो गयी।उसके चेहरे पर हल्का सा तनाव था वो कुछ कहने को हुई तो मैंने उससे केबिन में बात करने के लिए कहा और आगे बढ़ गया।'जी' कहते हुए वो मेरे पीछे चली आई।उसके अंदर आते ही मेरे स्टाफ में खुसर फुसर शुरू हो गयी जिसका अंदाजा मुझे हो गया।मैंने नीलम को बुलाया और तेज आवाज में उससे कहा,' कल के कल अखबार में इश्तिहार निकलवाओ यहां करीब चौदह व्यक्तियों की हायरिंग होनी है जितनी भी पोस्ट है सब के नाम सहित कल के कल इश्तिहार निकल जाना चाहिए' उसने हैरानी से मुझे देखा तो मैं बोला,'यहां बॉस मैं हूँ सबको सेलेरी काम करने की मिलती है सवाल जवाब करने की नही और हां अभी तुरंत के तुरंत सबसे कहो बातें प्यारी है तो किसी भी दूसरे ऑफिस में बैठकर चुपचाप बातें करे,यहां व्यर्थ की बातें नही चलेगी।व्यर्थ का एक शब्द भी सुनने में आया तो सीधा नौकरी गयी'।


नीलम मेरी बातों का आशय समझ गयी।'यस सर' कहते हुए वो वहां से गयी और सिस्टम पर सारी पोस्ट का प्रिंट निकाल उसने ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर लगा दिया जिसमे स्पष्ट शब्दो में लिखा था 'वॉक इन इंटरव्यू।' पोस्ट के नाम देख सभी एम्प्लॉई के मन में हड़बड़ाहट मच गयी और सभी ने नीलम से पूछा 'ये किसलिए'! नीलम शालीनता से बोली , 'ये बॉस का ऑर्डर है,उनका कहना है सेलरी काम की दी जाती है बातों की नही।'


मेरी इंटेंशन समझ सभी इकट्ठे होकर नीलम के पास गये और उससे बोले, ' आगे से ऐसा नही होगा आप प्लीज सर से बात कीजिये'।सब जानकर भी नीलम अंजान बनते हुए बोली 'ये सब में मुझे नही पड़ना आप लोग जाने और बॉस जाने मैं बीच में नही हूँ कहीं ऐसा न हो आप सब के कारण मेंरी ही नौकरी चली जाये'।


चित्रा से डिस्कशन करता हुआ मैं बाहर की बाते सुन रहा था।मैं एक पल के लिए उठ कर बाहर आया और सख्त लहजे में बोला 'ये आप सब के लिए अंतिम चेतावनी है खुद में सुधार ले आइये! आप सब कार्य करने आते है किसी के व्यग्तिगत जीवन पर चर्चा करने नही तो सभी कार्य पर ध्यान दीजिये सबके लिए बेहतर रहेगा समझ गये' सभी ने सहमति में गर्दन हिलाई तो मैं वहां से वापस केबिन में चला आया।केबिन में आकर वापस से चित्रा के साथ मिस्टर तलवार के विषय में डिस्कशन करने लगा।चित्रा एक फाइल मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली, 'मिस्टर तलवार अब धोखाधड़ी पर उतारूँ हो रहे है उन्होंने हमारा ही एक रिजेक्ट प्रोजेक्ट रिन्यू कर अपने नाम से दिखाया है।हमारे पास इसके खिलाफ सारे प्रूफ है लेकिन हमे कोई एक्शन लेना चाहिए या नही ये निर्णय तो आपको लेना होगा'।'ठीक है मैं इस बारे में कल बात करूँगा' मैंने कहा तो चित्रा 'ओके' कह बाहर चली गयी।कुछ देर बाद मैंने घड़ी देखी और टेबल समेट की उठा बाहर निकल आया।सभी एम्प्लॉय जा चुके थे मैं भी ऑफिस बन्द करवा कर वहां से अकैडमी के लिए निकल गया और क्लासेस अटैंड कर घर पहुंचा और डेली रूटीन की तरह कार्य कर छत पर चांदनी रात में बैठ गिटार ट्यून करने लगा।


अगले दिन मिस्टर तलवार से मिल उन्हें आखिरी वॉर्निंग दे दोपहर को मैं काम से फ्री होकर ऑफिस में बैठा हुआ सॉन्ग सुन रहा था।सॉन्ग खत्म होते ही मेरे फोन में रिकॉर्ड ऑडियो प्ले होने लगा जो कल अर्पिता के घर बैठ कर की हुई बातचीत का है।ऑडियो श्रुति की थी मैंने सॉन्ग बदलने के लिए फोन उठाया तो उसमे समय देख थोड़ा हैरान हो गया।सात मिनट के ऑडियो की जगह बीस मिनट का ऑडियो था क्या क्या रिकॉर्ड हुआ है ये सोच मैंने उसे चलने दिया,कुछ देर चलने के बाद मैंने सुना श्रुति से कोई बदतमीजी से बात कर रहा है।


"हे बेबी आज तो तुम अकेले मिल ही गयी हमें।लगता है तुम लोग कतई बेशर्म हो इतना कुछ सुनने के बाद भी कुछ नया सुनने के लिये चले आते हो। उस दिन वाला सबक बड़ी जल्दी भूल गये।श्रुति ने एक ही सांस में कहा।जी हम लोग सबक तो भूल गये और अब बहुत जल्द तुम भी खुद को भूल ही जाओगी हमारा किया हुआ कारनामा देखोगी।बहुत अकड़ है न तुममे और तुम्हारी उस दोस्त क्या नाम है उसका गाइज अर्पिता!अर्पिता नाम है उस तीखी छुरी का।कितना धमकाती है।दूर रहो हमसे उलझो नही,नही तो अच्छा नही होगा।इतनी हिम्मत तो कॉलेज में किसी की नही होती जो हम पांचो में से किसी को कुछ बोल जाये, और वो बिन डरे पटर पटर बोलती जाती है।तो अब तुम दोनो भुगतो..!"मैंने पूरा ऑडियो सुना।सुनकर बहुत गुस्सा आया।श्रुति!मेरी प्यारी बहन! उसके साथ कोई बदतमीजी करे ये मुझे कतई बर्दाश्त नही था।उस पर अर्पिता के लिए भी गलत शब्दो का इस्तेमाल किया।मेरा सर घूम गया बहुत गुस्सा आया मुझे।मैं गुस्से मे उठा और अपनी बाइक की चाबी उठाइ,मोबाइल को अपनी पॉकेट में रखा और वहाँ से श्रुति के कॉलेज के लिये निकल गया।मैं गुस्से में नॉर्मल स्पीड से कुछ ज्यादा ही तेजी से बाइक राइड कर रहा था।उस समय तो बस ये लग रहा था कब कॉलेज पहुँचूँ!!और उन सबको सबक सिखाऊँ।लगभग तीस मिनट में मैं कॉलेज पहुंच गया और बाइक पार्क सीधा श्रुति के क्लासरूम में गया।वहां श्रुति नही है ये देख मैं उसे ढूंढता हुआ कॉरिडोर से होकर गार्डन में चला आया जहां मेरी नजर श्रुति के साथ खड़े हो उसके लिए स्टैंड लेती अर्पिता पर पड़ी!


क्रमशः....