संयोग-मुराद मन की - 1 in Hindi Classic Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | संयोग-मुराद मन की - 1

संयोग-मुराद मन की - 1

या हू-------
पहला लिफाफा खोलते ही उसमे से पत्र के साथ निकले फोटो को देखकर  अनुराग  खुशी से उछल पड़ा।
"क्या हुआ बेटा?" अनुराग की आवाज सुनकर उसकी मां कमरे में चली आयी।
"मिल गई।माँ मिल गई।"
"अरे कौन मिल गई?"माँ की समझ मे बेटे की बात नही आई थी।
"माँ तेरी वो मिल गई।"
"मिल गई।मिल गई ही करता रहेगा या आगे भी कुछ बतायेगा।"माँ नाराज होते हुए बोली।
"माँ तेरी बहु मिल गई।"
"कहाँ है?कौन है?"माँ ने उत्सुकता से पूछा था।।
",यह देख"।अनुराग ने लिफाफे मे निकला फोटो माँ के हाथ मे पकड़ा दिया।
"तुझे यह लड़की पसंद है?"फोटो को देखते हुए माँ ने अपने बेटे अनुराग से पूछा था
"हां माँ।मुझे यह लड़की पसंद है।"अनुराग बोला था।
"फिर देर कुस बात की है।आज ही तू पत्र का जवाब भेज दे।"माँ मन ही मन मे ईश्वर को धन्यवाद देते हुए बोली,"शुक्र है आखिर तुझे कोई लड़की पसंद तो आयी।"
माँ ने सही कहा था।वह पिछले कई वर्षों से अनुराग पर शादी कर लेने का दबाव डाल रही थी।जब अनुराग कॉलेज में पढ़ रहा था।तभी उसकी मां चाहती थी कि उसका बेटा शादी कर ले।लेकिन अनुराग ने अपनी मां से साफ शब्दों में कह दिया था,"माँ जब तक पढ़ाई पूरी करके मैं अपने पैरों पर खड़ा नही हो जाता।तब तक मैं शादी हरगिज नही करूँगा।"
और समय गुज़रा।अनुराग की पढ़ाई पूरी हो गई।और उसकी नौकरी भी लग गई।उसकी नौकरी लगते ही माँ की शादी की रट फिर से चालू हो गई।माँ आये दिन किसी ने किसी लड़की का जिक्र अपने बेटे से करने लगी।
अनुराग चाहे जिस लड़की के पल्लू से बंध जाने के लिए तैयार नही था।वह शादी करना चाहता था।लेकिन अपनी मन पसंद लड़की से।मा ने ढेरो फोटो उसे दिखाए थे।लेकिन उसे कोई भी उन मे से पसंद नही आई।तब माँ कहने लगी।न जाने कैसी लडक़ी वह चाहता है।और जैसी लड़की वह चाहता था।वैसी इत्तफाक से उसे एक दिन मिल ही गई थी।
अनुराग ने उस लडक़ी को पहली बार देखा तब चिल्ला जाड़ा पड़ रहा था।सर्दियों के मौसम में दिन छोटे जबकि रात लम्बी होती है।दिन देर से निकलता है।पर शाम जल्दी ढल जाती है।इन दिनों में रात होते ही कोहरा छाने लगता है।जो सुबह सूरज निकलने के बाद ही पिघलना शुरू होता है ।
ऐसे मौसम में भी अनुराग घूमने के लिए जरूर जाता।स्कूल के दिनों में सुबह घूमने की आदत लगी थी।जो अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी थी।इस आदत को वह नही तोड़ता था ।साल के बारह महीने।तीन सौ पेंशट दिन वह घूमने के लिए ज़रूर जाता।वह अपने घर से सिकन्दरा तक घूमने के लिए जाता।कभी दौड़ता।कभी धीरे चलता।वहां जाकर वह कुछ देर के लिए हरी घास पर बैठता।और फिर घर आता।
एक दिन वह घर लौट रहा था।रास्ते मे उसकी नज़र एक रिक्शे पर पड़ी।इस रिक्शे मे तीन लड़कियां बैठी थी।बीच मे बैठी लड़की ने उसका ध्यान आकर्षित किया था।
वह लड़की गोरे रंग,छरहरे बदन और तीखे नेंन नक्श की सुंदर लडक़ी थी।उस सूंदर बाला की जिस चीज ने उसे सब से ज्यादा आकर्षित किया ।वह थी ।उसकी आंखें।बड़ी बड़ी बोलती आंखे।ऐसा लगता था,उसकी आंखें बुला रही हो।आमंत्रित कर रही हो।निमंत्रण दे रही हो।जादुई आंखों की वजह से पहली बार देखते ही वह लड़की अनुराग को पसंद आ गयी थी।
(क्रमश शेष अगले भाग में


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