द्रौपदी की व्यथा (अंतिम भाग) in Hindi Mythological Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | द्रौपदी की व्यथा (अंतिम भाग)

द्रौपदी की व्यथा (अंतिम भाग)

"इन सब बातों को कौन मानेगा?"युधिष्ठिर बोला,"मां ने धर्म विरुद्ध और अनैतिक काम ही नही किया।पति को भी धोखा दिया।"
"तुम्हारे    मुह से धर्म की बाते    अछी.नही लगती",अपने पति  की बात   सुुनकर  द्रौपदी बोली थी।
"कृष्णे।यह तुम क्या कह रही हो,"द्रौपदी की बात सुनकर भीम बोला,"बड़े भैया को दुनिया धर्मराज के नाम से जानती है।भैया धर्म के ज्ञाता है।"
"युधिष्ठिर और धर्मराज आ हा--द्रौपदी ज़ोर से हंसी थी,"तुम्हारे भैया जैसा अधर्मी और अनैतिक कृत्य करने वाला आदमी मैने आज तक नही देखा।"
"द्रौपदी तुम बड़े भैया का अपमान कर रही हो,"द्रौपदी की बात सुनकर अर्जुन बोला,"मैं बड़े भैया के अपमान को बर्दाश्त नही कर पाऊंगा।तुम बड़े भैया से तुरंत माफी मांगो वरना--------
"वरना तुम क्या कर लोगे?"द्रौपदी, अर्जुन की बात को बीच मे काटते हुए बोली।
"भैया के अपमान के बदले में मैं तुम्हारा सिर काटकर धड़ से अलग कर दूंगा,।"अर्जुन गुस्से में बोला ।
"मौत का डर मुझे सच कहने से नही रोक सकता।आज तक मैं चुप रही हूँ।लेकिन आज मैं चुप नही रहूंगी।"
"अर्जुन तुम चुप रहो।"युधिष्ठिर ,अर्जुन को चुप रहने का आदेश देते हुए बोले,"कृष्णे बताओ हमने कौन सा धर्म विरुद्ध और अनैतिक कार्य किया है?"
"धर्म राज तुम भूले नही होंगे।याद हो तो बताओ मेरे स्वयंवर की शर्त क्या थी?"द्रौपदी ने प्रश्न पूछा था।
"जो पानी मे देखकर मछली की आंख में निशाना लगाएगा उसी के गले मे तुम वरमाला डालोगी।"युधिष्ठिर, द्रौपदी के स्वयंवर की शर्त को याद करके बोले
"उस शर्त को अर्जुन ने पूरा किया था,"द्रौपदी बोली,"उस शर्त के अनुसार में अर्जुन की पत्नी बनी थी।लेकिन तुमने अपने छोटे भाई की पत्नी को पांचों भाइयो की पत्नी बना दिया"
"यह मेरी आज्ञा नही थी।मां ने पांचों भाइयो में बांट लेने को कहा था।सिर्फ मां की आज्ञा का पालन करने के लिए मुझे यह निर्णय लेना पड़ा।"
"लेकिन क्या मैं कोई वस्तु थी जिसे बांटा जा सके?युधिष्ठिर की बात सुनकर द्रौपदी बोली,"छोटे भाई की पत्नी को अपना बनाना और दूसरे भाइयो में बांट देना क्या धर्म था?हमारे समाज मे कौन सी औरत है जिसके एक से ज्यादा पति है?"
द्रौपदी की बात सुनकर युधिष्ठिर कुछ नही बोले।चुप खड़े युधिष्ठिर को देखकर द्रौपदी फिर बोली,"तुम अपने मुख से चाहे कुछ न  कहो लेकिन मैं तुम्हारे दिल की बात जानती हूँ।"
"क्या?"युधिष्ठिर ने प्रश्न सूचक नज़रो से द्रौपदी को देखा था।
"तुम मेरे रंग रूप और सूंदरता पर मोहित हो गए थे।तुम मेरी  सुंदर देह को पाना चाहते थे।इसलिए तुमने मां की बात को पकड़ लिया।दूसरे भाई तुम्हारे निर्णय का विरोध न करे इसलिए तुमने उन्हें भी अपने साथ शामिल कर लिया,"द्रौपदी बोली,"मां का कथन झूँठा साबित न हो जाये।इसका बहाना करके तुमने अपने दिल की इच्छा पूरी कर ली।"
"कृष्णे  तुम ----
"तुम तो चुप ही रहो।।समाज के सामने मैने तुम्हारे गले मे वरमाला डाली थी।तुम मेरे पति थे।पति का कर्तव्य होता है पत्नी के मान सम्मान और इज़्ज़त की रक्षा करना।लेकिन तुमने अपने पतिव्रत धर्म का पालन न करते हुए अपनी पत्नी को भाइयो में बांटना स्वीकार कर लिया।ऐसा करते हुए तुम्हे तनिक भी शर्म नही आयी,"द्रौपदी, अर्जुन की बात को बीच मे काटते हुए बोली,"महाराज युधिष्ठिर तुम सबसे बड़े अधर्मी हो।इसलिए मां को धर्म और नैतिकता का पाठ मत पढ़ाओ।तुम्हारी भलाई इसी मे है कि मां की इच्छा का सम्मान करो।"
द्रौपदी की बातों को सुनकर युधिष्ठिर निरुत्तर हो गए


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