mirage recognized you late - 6 in Hindi Novel Episodes by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | मृगतृष्णा तुम्हें देर से पहचाना - 6

मृगतृष्णा तुम्हें देर से पहचाना - 6

अध्याय छह
माता न कुमाता हो सकती

आखिर तुम्हारे पिता में ऐसा क्या है कि तुम उनके इतने नजदीक हो| इतने नजदीक कि मेरी हर एक बात उनसे बता देते हो | दोनों मिलकर मेरी बुराई करते हो...मेरा मज़ाक बनाते हो | पहले मैं सोचती थी कि यह मेरा भ्रम है पर हर बार वह भ्रम सही साबित हुआ है | बहू ने मुझे खुद ही बताया कि तुम जब भी मेरे घर आते हो, उसके पहले घंटों पिता से फोन पर बात करते हो | उनसे टिप्स लेते हो।यह बात तो मैं समझती ही थी क्योंकि तुम्हारी हर बात में पिता का टोन होता है | तुम्हारे विचार ...तुम्हारी भावनाएँ, तुम्हारी शरीर -भाषा सब कुछ पिता की तरह यूं ही तो नहीं हो सकती | कभी-कभी अफसोस होता है कि अपने बदले की भावना के तहत तुम्हारे पिता ने तुम्हें स्वतंत्र व्यक्तित्व बनने ही नहीं दिया
आज तुम फिर पकड़े गए ही | मैंने तुम्हें जो-जो मैसेज किया था तुम्हारे पिता ने उसकी काँपी भेजी और उन मैसेजों का उल्टा-सीधा जवाब भी| जवाब क्या था सीधे-सीधे गाली-गलौज और चरित्र -हनन था | बेटे को लिखे गए मैसेज का जवाब पिता दे रहा है इसका अर्थ वे सारे मैसेज बेटे ने पिता को फारवर्ड कर दिए थे | यूं तो तुम कहते रहते हो कि पिता पुरानी सोच के हैं फिर भी उनसे हर बात शेयर करते हो | माँ बेटे के बीच की बात भी | तुम दोनों ही जानते हो कि मैं हाई ब्लडप्रेशर की मरीज हूँ फिर भी ....| क्या दोनों मेरी मृत्यु चाहते हो?तुम मेरे साथ रहने को तैयार नहीं कि पिता नहीं चाहते | पिता कहता है कि मैं ही बेटे को अपने पास नहीं रखना चाहती| तुम दोनों की ही बातें समझ में नहीं आतीं | सब कुछ उलझा हुआ है फिर भी साफ है | दोनों को ही मुझसे जरा-सा भी लगाव नहीं | पिता के पास तो दूसरी पत्नी और उससे उत्पन्न दो बेटे और भी हैं | वह चार बेटों वाला दशरथ है | ऐशो-आराम से जीवन गुजार रहा है | फिर भी सोचता है कि मैं अकेली मौज कर रही हूँ| मुझ पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं | अतीत मुर्दा ही ठीक था जीवित होकर वर्तमान को भी खा रहा है | 
जब मेरी छोटी बहन गुड़िया मुझे खुशी-खुशी बताती है कि आयुष का फोन आया था | उससे ये...ये बातें हुईं | वह तुम्हारे बारे में भी पूछ रहा था तो मुझे मन ही मन बहुत क्रोध आता है | आयुष मेरा छोटा बेटा है पर मुझे फोन नहीं करता | मुझसे मिलने नहीं आता पर बहन को जताता है जैसे उसे माँ की बहुत चिंता है | यह लड़का भी बिलकुल अपने पिता पर गया है दिखावटी ...पाखंडी ...दुहरा | मेरी तरह सीधे –सीधे सच नहीं कह सकता | गुड़िया क्या इस बात को नहीं समझती ?क्या वह उसे नहीं समझा सकती कि वह गलत कर रहा है पर नहीं वह तो जैसे मेरे जले पर नमक छिड़कती है | आयुष मौसी की प्रशंसा करता है | उसे लगता है कि वह अपने पति की ज़्यादतियों को सहते हुए भी बच्चों के खातिर उसी घर में पड़ी है जबकि मैं उसके पिता के अहंकार को नहीं सह पाई और उससे अलग हो गयी | जिसके कारण आयुष को भी अलग होना पड़ा और वह सौतेली माँ के साथ रहा | हालांकि सौतेली माँ से उसे कभी कोई शिकायत नहीं रही | उस स्त्री ने उसे बेटे की तरह ही पाला | मैं अक्सर सोचती हूँ कि कैसे उस स्त्री ने उसके पिता के साथ जीवन काटा होगा ?आयुष ने अलका को इसके बारे में बताया कि उनके पास सहने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं था | गरीब विधवा थीं इसलिए उन्हें दो बच्चों के बाप से शादी करनी पड़ी | अब उसे छोड़कर कहाँ जाएँ ?नौकरी लायक पढ़ी-लिखी भी तो नहीं हैं | आयुष इसी कारण अपनी सौतेली माँ की प्रशंसा करता है कि वे सब्र और संतोष के साथ अत्याचारी पति के साथ रह रही हैं | आयुष के ये कैसे विचार हैं ?वह तो बिलकुल अपने पिता की कार्बन कापी है | उन्हीं की तरह सोचता है ...बोलता है | हालांकि वह वायुसेना में नौकरी करता है और एक आधुनिक सोसाइटी में रहता है | पत्नी को आधुनिक वस्त्र पहनाता है पर सोच के स्तर पर पिता की तरह ही सामंती है | घर-परिवार बनाने-बचाने का सारा भार स्त्री पर डालकर खुद सारी हदें पार कर जाने का वह समर्थन करता है | स्त्री की सहनशक्ति को वह स्त्री का संस्कार कहता है | भारतीय संस्कार, जिसमें स्त्री के लिए पति परमेश्वर है और वह उसकी दासी मात्र | आयुष नहीं जानता कि प्रतिकूल साथी के साथ चला नहीं जाता, जीना तो दूर की बात है | पाँव की जरा-सी चप्पल बदल जाती है तो उस पाँव का चलना मुश्किल हो जाता है फिर साथ देह से अधिक मन का होता है | अगर वही अनुकूल न हुआ तो जिंदगी का चलना मुश्किल और कठिन ही नहीं असंभव –सा हो जाता है | 
आयुष मुझसे बीस साल बाद मिला है | पाँच वर्ष का था, जब उसके पिता धोखे से उसे उठा ले गए थे और फिर उसकी देखभाल के बहाने दूसरी शादी कर ली थी | जब वह दस साल का हुआ, तब तक दूसरी माँ के भी दो बच्चे हो गए थे | इंटर पास करते ही वह वायुसेना में आ गया और तब से परिवार चलाने में पिता की मदद कर रहा है | जब तक उसका विवाह नहीं हुआ था, तब तक पूरा वेतन ही घर भेज देता था | अब भी वह जरूरत -भर का भेजता रहता है | पत्नी के एतराज की परवाह नहीं करता | पत्नी को इतने दबाव में रखता है कि वह आवाज नहीं निकाल पाती | आयुष अपने सौतेले भाइयों और सौतेली माँ का विशेष ध्यान रखता है | तीज-त्योहार पर उनके लिए नए कपड़े अनिवार्य हैं भले ही अपने लिए कुछ न खरीद पाए | चालाक पिता ने घर बनवाने के नाम पर उसे लोन भी लेने को मजबूर कर दिया था, इसलिए एक बड़ी रकम उसे किस्त के रूप में अलग से भरनी पड़ती है | इसके लिए उसे अपने परिवार की जरूरतों को कम करना पड़ता है | उसकी पत्नी और उसके मायके वाले इस बात के लिए चिढ़ते हैं पर आयुष पिता और सौतेली माँ के कर्ज से खुद को इतना दबा पाता है कि उनकी मांगों को पूरा करना अपना फर्ज समझता है | पिता ने बचपन में ही उसे यह पाठ पढ़ा दिया था कि जब तुम दुधमुंहे थे तभी तुम्हारी माँ तुम्हें छोड़कर भाग गयी थी क्योंकि मैं उसकी महत्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं कर पा रहा था | तब इसी सौतेली माँ के साथ मिलकर मैंने तुम्हें पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया | आयुष खुद के परवरिश के लिए उनका अहसान मानता है और उस अहसान को उतारने की कोशिश करता रहता है | जबकि उसके माता-पिता उसका भरपूर शोषण करते रहते हैं | सौतेली माँ अपने बच्चों के भविष्य को संवार रही है उनकी नींव मजबूत कर रही है, यह बात आयुष को कौन समझाए ?वह समझना भी नहीं चाहता| पत्नी और ससुराल वालों को भी डांट देता है | मेरा कुछ कहना तो और भी गलत समझेगा | 
आयुष जितना अपने पिता और सौतेली माँ का अहसान मानता है उतना ही मुझसे नफरत करता है | हालांकि बड़े होने के बाद कई माध्यमों से उसे पिता के झूठ का पता चल गया था | अलका और मुझसे मिलने के बाद तो सारी स्थिति ही साफ हो गयी, फिर भी वह मुझसे चिढ़ता है | वह मेरे प्रति कोई लगाव, कोई ज़िम्मेदारी महसूस नहीं करता | इस सच्चाई से अवगत होने के बाद भी कि उसके पिता ने जबरन उसे माँ की ममता से वंचित किया था, उसके व्यवहार व सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है | वह मुझे तकलीफ पहुंचाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं छोड़ता और मैं ममता की मारी इसे सहती रहती हूँ | वह मुझे स्वार्थी, महत्वाकांक्षी और आजाद औरत समझता है | मेरे पक्ष में की गयी बातों को गढ़ी हुई बातें कहता है | वह अपने पिता को कभी गलत नहीं मानता | 
जब वह मेरे शहर में ट्रांसफर होकर आया था तो गुड़िया के बताने पर मैं खुद उससे मिलने गयी थी और फिर जाती रही थी | मुझे उसके बच्चे से बहुत लगाव हो गया था | पर वह नहीं चाहता था कि मैं उससे जुड़ूँ जैसे उसके पिता नहीं चाहते थे कि मैं बेटे से जुड़ूँ | आयुष मुझसे बदतमीजी तो नहीं करता था पर गाहे-बगाहे तानें जरूर मारता था | मेरी आधुनिक सोच, रहन-सहन, शिक्षा, लेखन सब उसके निशाने पर आ जाता था | कभी-कभी तो वह मेरी उम्र पर भी तानें दे देता | एक दिन मुझे क्रीम लगाते देखकर बोला—कितना भी लगा लीजिए | दो-चार वर्ष बाद कोई नहीं पूछेगा | 
ठीक इसी तरह की बात पच्चीस साल पहले उसके पिता ने भी कही थी –एक बच्चे की माँ हो, अब तुम्हें कौन पूछेगा ?मेरी तो आसानी से दूसरी शादी हो जाएगी | 
स्त्री को उसकी उम्र, उसकी देह से पिता भी पहचानता था अब बेटा भी | दोनों में एक ही मर्दवादी सोच है | 
उन्हें कौन समझाए कि मैं रूपजीवी स्त्री नहीं हूँ ...।न फिल्मों या विज्ञापन जगत में काम करती हूँ जहां उम्र और देह की सुंदरता ही आधार है | मैं शिक्षिका हूँ....लेखक हूँ जहां उम्र से परिपक्वता मिलती है .....महत्व मिलता है वरिष्ठ होना जहां सम्मान है, अपमान नहीं | 

धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि आयुष को अपने घर मेरा आना-जाना अच्छा नहीं लगता | मैं जबरन उससे रिश्ता जोड़ रही हूँ | वह भी शायद दबाव में था क्योंकि उसका पिता व सौतेली माँ उसे मुझसे मिलने-जुलने के कारण तानें दे रहे थे | आयुष उनके दबाव में मेरे घर न खुद आता था, न अपने परिवार को लाता था | जैसे मैं बहिष्कृत होऊं और मेरा घर अभिशापित हो | यह घर मैंने अपने खून-पसीने से निर्मित किया था | यह मेरे पिता, भाई, पति या पुत्र का घर नहीं था, मेरा अपना था | मैं इस घर का अपमान होते कैसे देख सकती थी ?मैंने उससे एक दिन कह दिया कि मेरे जीते-जी तुम इस घर में नहीं आना चाहते तो मेरे न रहने पर क्यों आओगे ?अगर मैं गलत हूँ तो यह घर भी तो उसी गलत स्त्री का है | तो वह नाराज हो गया | कहने लगा -मुझे आपका यह दरबानुमा घर नहीं चाहिए | सरकारी नौकरी में हूँ ।ऐसे कई घर बनवा सकता हूँ और फिर मुझसे संबंध-विच्छेद कर लिया | मैंने क्या गलत कह दिया था ?वह अल्का से कहता है कि मैं उसे लालची समझती हूँ ।न जाने क्यों वह एक माँ की भावनाओं को क्यों नहीं समझना चाहता ?
कब तक मैं बेटे से अपमानित होती रहूँगी ?मैं अब समझ गयी हूँ कि रिश्तों के टूटे तार फिर नहीं जुड़ सकते | इतने वर्षों से बेटे से अलग होकर भी मैं उससे जुड़ी हुई थी पर अब उसकी बातें...उसकी हरकतें, उसकी सोच उसे मन से दूर कर रही हैं | तीस वर्ष की उम्र में भी बेटे की अपनी सोच नहीं बन पा रही है | पता नहीं वह स्वयं कोई निर्णय नहीं ले पा रहा है ?या फिर जानबूझकर ऐसा कर रहा है ताकि भविष्य में मेरे बुढ़ापे की जिम्मेदारियों से बच सके| 
जब उसका तबादला दूसरे शहर हो गया, तब भी उसने मुझे नहीं बताया | मुझे गुड़िया से पता चला | मैं सोचती रही कि कम से कम मुझसे मिलकर तो जाएगा पर वह पिता के घर बिहार जाकर बैठ गया और वहीं से चला भी गया | बीच-बीच में आता भी तो बिहार ही रहता | सारे तीज-त्योहार भी वहीं मनाता | एक बार मैंने शिकायत की तो आपे से बाहर हो गया और गड़े मुर्दे उखाड़ने लगा कि ’आपने मेरे लिए किया क्या है, जो उम्मीद रख रही हैं ?’
अब बेटे से मिलने की इच्छा भी उम्मीद रखना है ?
मैं समझ गयी हूँ कि बेटा मेरा नहीं रहा ...न हो सकता है | मेरी सारी कोशिशें नाकामयाब हो गयी हैं  | मैंने सोचा था कि इतने दिनों की प्यार की कमी मैं चंद दिनों में पूर दूँगी | मुझे कहीं न कहीं यह अपराध –बोध था कि [चाहें जिस भी कारण से रहा पर ]बेटे को माँ का प्यार नहीं दे पाई | पर मैं भी क्या करती ?उसके पिता के साथ रहना कितना मुश्किल हो गया था | मानसिक उत्पीड़न सहते-सहते मैं विक्षिप्त –सी हो गयी थी | अगर कुछ दिन और साथ रहती तो जीवित नहीं बचती पर जानती हूँ बेटा मेरी इस सच्चाई को मनगढ़ंत कहानी मात्र समझता है | 
बेटों की वजह से मैं बार-बार उस अतीत को जीने लगती हूँ जिसमें मैं उनके पिता से अलग हुई | 
मेरी स्मृति में एक-एक दृश्य आज भी ताजा है | मुझे आज भी याद है जब ससुराल में मुझे खून की उल्टियाँ हुई थीं | डॉक्टर ने तपेदिक का प्रारम्भ बताया और मेरी ठीक से देखभाल व इलाज की सलाह दी थी | तब मेरे पति ने मेरे सीधे-सादे गरीब पिताजी को बुलाकर उन्हें खरी-खोटी सुनाई कि बीमार बेटी को मेरे सिर पर मढ़ दिया, उसे अपने साथ ले जाइए | मेरे पिताजी, जिन पर अपने दूसरे आठ बच्चों की ज़िम्मेदारी और भी थी, रो पड़े | पर वे नहीं माने और जबरन मुझे विदा कर दिया था | हाँ, विदा से पहले उन्होंने मेरे मुंह पर तौलिया रखकर बलात्कार किया था, जिसकी देन आयुष था | पिता के घर भेजकर उन्होंने एक बार भी मेरी खबर नहीं ली | बच्चे के जन्म की खबर सुनकर भी उनका दिल नहीं पिघला | उन्हें लगा था कि बीमार स्त्री ने बीमार बच्चे को जन्म दिया होगा | आयुष के छह महीने होने के बाद आए तो माँ-बेटे को देखकर दंग रह गए | दोनों ही पूर्ण स्वस्थ थे | माँ के घर मेरी इतनी देखभाल हुई कि तीन महीने में ही मैं पूर्ण स्वस्थ हो गयी थी | जिस मानसिक तनाव ने मुझे बीमार किया था, वह यहाँ नहीं था | माँ ने दवा और पौष्टिक आहार खिलाने के लिए अपने जेवर भी गिरवी रख दिए थे | उसने मुझे दूसरी बार जीवन दिया था साथ ही मेरे बेटे को भी | डाक्टरों के हिसाब से तो दोनों में से एक ही बच सकता था पर माँ ने दोनों को बचा लिया | 
ससुराल से वापसी के बाद मैं आत्महत्या कर लेना चाहती थी | पति के व्यवहार से मुझे बहुत धक्का लगा था | मेरे जीवन में जैसे कुछ बचा ही नहीं था | मात्र सत्रह की उम्र में मैं जैसे बूढ़ी हो गयी थी पर आयुष के पेट में होने की खबर से मैं फिर से जी उठी थी | गर्भ किसी स्त्री को इतना सूट कर सकता है, यह मुझे देखकर समझा जा सकता था | पर मैं जानती थी कि ऐसा क्यों हुआ है ?दरअसल सदा से अकेली मुझे किसी का साथ मिला था | मेरे अस्तित्व के साथ एक और अस्तित्व जुड़ गया था | किसी के होने से मैं खुद को पा रही थी...सार्थक हो रही थी | मेरे जीवन में जैसे उम्मीद की कोंपले निकल आई थीं | अपने भीतर किसी जीवित प्राणी का आभास नवजीवन देने वाला था | जल्द ही मेरी बीमारी दूर हो गयी और मैं सेहत और सौंदर्य से दमकने लगी| 
पर मेरे मन में पति के प्रति जो गांठ बनी वह कभी नहीं खुली और उसका परिणाम दोनों के अलगाव में हुआ | मैंने अपनी अधूरी पढ़ाई शुरू की तो वे बौखला उठे | मुझे तोड़ने की हर कोशिश की | तलाक की धमकी से तेजाब की शीशी तक| रिश्तेदारों से पड़ोसियों तक | उस बीच क्या कुछ नहीं झेला मैंने पर पढ़ाई नहीं छोड़ी | तब ये कोई नौकरी करते भी नहीं थे | मैंने सोचा कि पढ़ाई पूरी करके नौकरी करूंगी | अगर तब तक सब ठीक रहा तब वापसी करूंगी, पर इन्हें मेरा पढ़ना मंजूर नहीं था | इसीलिए जब मैं परीक्षा देने गयी थी, इन्होंने एक चाल चली | घर आए ...माँ से माफी मांगी और फिर बच्चों को घुमाने के बहाने लेकर भाग गए | सरल माँ उनकी चाल नहीं समझ पाई और मैं सदा के लिए बच्चों से बिछड़ गयी | इस अलगाव का मुझ पर बहुत बुरा असर हुआ | मेरी जिंदगी न भरने वाले शून्य से भर गयी | माँ से अलग होने का आयुष पर कितना बुरा असर हुआ यह उसे देखकर समझा जा सकता है | उसके पिता तो इस समय चार बेटों वाले दशरथ की तरह घमंड से फूले फिरते हैं | उन्हें खुशी है कि उन्होंने मुझे फिर से अकेला कर दिया है | 
‘अभी समय नही आया | समय आने पर उनसे मिल लूँगा' बेटे आयुष ने मेरे संबंध में अपनी मौसी गुड़िया को बताया | फोन पर जब गुड़िया ने मुझे यह बात बताई तो मैं थोड़ी बुझ -सी गई फिर उदासी से बोली –कोई बात नहीं, न मिले, मुझे भी अब कोई आकांक्षा नहीं | मैं समझ गयी थी कि बेटे का ‘समय’ से क्या तात्पर्य है ?समय से उसका तात्पर्य –मेरी लाचारी...बदहाली...से था, जब मेरा शरीर भी मेरा साथ नहीं देगा | उसे लगता है कि शायद तब मैं उसके पिता के आगे घुटने टेक कर माफ़ी जरूर माँगूगी| कितना अजीब है ना कि पुत्र भी पिता की तरफ सोचता है | मेरे प्रति सम्मान उसके मन भी नहीं है | 
मेरे मन में यही कसक रहती है कि मैं बेटे को अपने विचार नहीं दे पाई | वह एक पारम्परिक पुरूष ही बनकर रह गया | स्त्री को मनुष्य मानना, उसे पुरूष जितना अधिकार देना उसे मान्य नहीं | वह भी स्त्री को या तो देवी के रूप में देख सकता है या फिर मनोरंजन के रूप में | स्त्री के स्वतंत्र रूप की तो वह  कल्पना भी नहीं कर सकता | उसे एक बार भी नहीं लगता कि पिता, पति, पुत्र से इतर  भी स्त्री की कोई पहचान हो सकती है | उसके पिता ने उसे माँ के प्यार से अलग किया, दूसरी शादी की और बच्चे पैदा किए, फिर भी वे उसके लिए गलत नहीं पर माँ ने पढ़ने के लिए संघर्ष किया, तो अपराधी हो गई | 
आज बड़े बेटे आदेश को एक पत्र लिखा है शायद यह मेरा आखिरी पत्र हो| 
मेरे बेटे !
शायद तुम्हें ‘मेरे’ शब्द से आपत्ति हो, क्योंकि तुम्हें हमेशा लगता है कि मैंने तुम्हें अपना बेटा नहीं समझा। तुम्हारी इस समझ पर मैं हँसू या रोऊँ, समझ में नहीं आता ।तुम एक माँ के बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ? यह सच है कि मैं तुम्हें अपने पास नहीं रख सकी। नहीं रखना चाहा होगा क्या ! सात वर्ष की उम्र तक रात-दिन तुम मेरे पास रहे। एक पल के लिए भी तुम्हें आँखों से ओझल न होने दिया, फिर नियति के क्रूर हाथ तुम्हें मुझसे छीन ले गए। वर्षों रात-दिन तुम्हारे लिए रोती रही, तड़पती रही। एक भी इंसानी हाथ मेरी मदद को आगे ना बढ़ा। किसी ने भी मेरे बारे में ना सोचा| मझधार में डोलती नाव की तरह डरी हुई थी मैं| किनारे दूर थे और चारों तरफ तूफान के अंदेशे थे। ऐसे में अपने अस्तित्व का ही खतरा था, इसलिए उसे ही बचाने की जद्दोजहद में लग गई। जब एक किनारे आ लगी तो पता चला तुम तन-मन से नदी के दूसरे किनारे हो। दोनों के भीतर एक ही पानी था| एक ही प्यास थी पर मिलना आसान ना था। सत्रह वर्ष बाद तुम्हारी धार मेरे किनारे से टकराई| हम मिले, प्रसन्न हुए कि फिर तूफान तुम्हें दूसरी छोर ले गया। मैं असहाय- सी तुम्हें देखती रही। ऐसा कई बार हुआ। तुम आते.. चले जाते। हर बार लगता कि वक्त ने जो दूरी पैदा किया है, वह कभी नहीं भर सकती। तुम मुझे समझने को तैयार नहीं थे और कहते थे कि मैं तुम्हें गलत समझती हूँ| प्यार नहीं करती| हाँ, मैं पारम्परिक माँ की तरह नहीं थी, जिसका अपना अलग ना व्यक्तित्व होता है ना अस्तित्व।पर थी तो एक माँ ही। तुम मेरी हर बात को काट देते या उसका मजाक बनाते। जब अवसर मिलता मुझे अपमानित करने से नहीं चूकते। मेरे पास आते ही ऊबने लगते। तुम ना भी कहते तो भी तुम्हारी देह-भाषा से मेरे प्रति उपेक्षा व घृणा प्रकट होती रहती| मैं भीतर ही भीतर तिलमिलाकर रह जाती। एक बार जब मैंने इस बात की शिकायत की, तो तुमने बेरूखी से कहा कि -आपको गलतफहमी है, मैं जानबूझकर ऐसा नहीं करता।मैं जानती हूँ कि तुम बहुत -कुछ जानबूझकर नहीं कहते या करते। तुम्हारे पिता का संस्कार, उनका रक्त, उनकी दी शिक्षा, उनके विचार तुम्हारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुके हैं। तुम उन्हीं की तरह सोचने लगे हो, जबकि तुम इस बात से इन्कार करते हो। खुद को पिता से ज्यादा प्रगतिशील, आधुनिक और प्रयोगवादी बताते हो, पर मैं हमेशा उन्हें तुम पर लदा पाती हूँ। तुम इसे अपने प्रति अन्याय और पिता के प्रति मेरा पूर्वाग्रह मानते हो। पिता ने तुम्हें जो कहानी बचपन से सुनाई है, वह तुम्हारे दिल-दिमाग पर इस तरह हावी है कि तुम्हारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी है।मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब मुझे तुम्हें अपनी बेगुनाही का सबूत देना पड़ता है। तुम मुझ पर भरोसा नहीं करते, तो मैं भी सफाई क्यों दूँ ? क्या बेटे का अपनापन, प्यार, विश्वास या साथ पाने के लिए हर माँ को इस अग्नि -परीक्षा से गुजरना पड़ता है। मेरी बहनें, माँ सभी कहती हैं कि मैं तुम्हारी तरफ खुद कदम बढ़ाऊँ। धीरे-धीरे तुम्हारे मन से अपनी खराब छवि को मिटाऊँ, सफाई दूँ। मैं सोचती हूँ-ऐसा क्यों ?मैंने किया ही क्या है ! जानती हूँ तुम्हारी परवरिश ही मेरी खिलाफत से हुई है । मेरी गलत इमेज तुम्हारे मन में बैठाई गई। गलत इमेज यानी एक महत्वाकांक्षी स्त्री की इमेज ! एक ऐसी स्त्री, जो अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पति-बच्चे  का परित्याग कर देती है। पर क्या यह सच था? घरेलू हिंसा से बचने और पढ़ाई पूरी कर आत्मनिर्भर बनने के लिए ही तो मैंने बगावत की थी, वह भी तुम्हारे लिए!हमें अलग तो तुम्हारे पिता ने किया। उन्होंने तुम्हें माँ के प्यार से महरूम किया, फिर भी तुम्हारे लिए वे भगवान हैं। काश, तुम जान सकते कि बच्चे माँ के लिए आक्सीजन की तरह होते हैं। तुम्हारे बिना मेरी साँसें किस तरह घुटती रहीं, यह नहीं बता सकती।चलो वे पुरानी बातें हुईं पर तुम्हारे पिता आज भी तुम्हें भड़काते हैं कि बीबी-बच्चे के साथ मेरे घर न रहना। मुझे क्रोध आता है इस बात पर, पर मैं ये भी समझती हूँ कि आज भी उनका आहत पुरूषार्थ इस बात पर तिलमिलाता है कि मैंने उन्हें छोड़ दिया था... ।
तुम पिता का अहसान मानते हो कि उन्होंने तुम्हें पाला। अब तुमसे कौन प्रश्न करे कि फिर कौन पालता? पिता ही तो बच्चों का पालक होता है। जब तक तुम मेरे पास रहे, मैं भी रात-रात भर जागी। तमाम कष्ट सहे, तब तुम पले। बच्चे के लिए सबसे जरूरी और नाजुक वक्त तो वही होता है। मैं माँ के फर्ज से कभी नहीं चुकी। दो वर्ष अपना दूध पिलाया। तुम्हें सूखे में सुलाने के लिए गीले में सोई। वह भी घोर अभाव भरे दिनों में, जब ना तो पति का आर्थिक सहयोग था, ना भावनात्मक। यहाँ तक कि किताब-कॉपी तक नहीं छू पाई उन वर्षों में। उसके बाद तुम्हें छीन लिया गया तो क्या करती ? ना तो मेरे पास पैसा था, ना कोई नौकरी। कोई हाथ मेरी मदद के लिए नहीं था। कितनी मुश्किलों से मैं आत्मनिर्भर हुई। एक अकेली, सुंदर स्त्री को इस बंद समाज में क्या-क्या नहीं झेलना पड़ता है ? हर तरफ गिद्ध नोचने को तैयार रहते हैं। कितना बरगलाया-फुसलाया जाता है उसे। गिराने की हर कोशिश की जाती है।काश, तुम इस बात को समझ सकते कि स्त्री से व्यक्ति बनना कितना मुश्किल होता है | अगर तुम्हें यह गलत लगता है कि मैं एक व्यक्ति हूँ माँ नहीं तो तुम्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए बेटा क्योंकि माँ हमेशा माँ होती है चाहे वह पारंपरिक माँ हो या व्यक्ति माँ | 
तुम्हारी माँ

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