Basanti ki Basant panchmi - 14 in Hindi Fiction Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | बसंती की बसंत पंचमी - 14

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बसंती की बसंत पंचमी - 14

जॉन की पार्टी शुरू होने में तो अभी पूरा आधा घंटा बाक़ी था। पार्टी में आने वाले अभी आए भी नहीं थे, लेकिन उससे पहले ही श्रीमती कुनकुनवाला ने जो दृश्य ख़ुद अपनी आंखों से देखा उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
वे तो बालकनी में बैठी हुई अपनी सहेलियों से फ़ोन पर टूटे हुए तार फ़िर से जोड़ने की कोशिश कर रही थीं कि अचानक उन्होंने देखा दो आदमी उनके घर के बाहर नीचे गेट पर आकर रुके। आश्चर्य तो उन्हें तब हुआ जब उन्होंने देखा कि वो लोग घर के भीतर नहीं आए बल्कि उनका बेटा जॉन ही लगभग दौड़ कर बाहर गया। इतना ही नहीं, बल्कि जॉन ने वहां जाकर अपनी जेब से निकाल कर उन्हें कुछ रुपए दिए जो उन्होंने झटपट गिन कर अपनी जेब में रख लिए। उसके बाद वे न तो वहां रुके और न ही जॉन ने उनसे घर में भीतर आने का कोई आग्रह किया या उनकी कोई मनुहार ही की।
श्रीमती कुनकुनवाला को पहली नज़र में ही ऐसा लगा जैसे उन लोगों को उन्होंने पहले भी कहीं देखा है। फ़िर तुरंत ही उन्हें याद आ गया कि कहां देखा है, कब देखा है! और ये याद आते ही उनका माथा ठनका।
अरे, ये तो वही प्रोड्यूसर और डायरेक्टर साहब हैं जो उस दिन उनकी पार्टी में आए थे और उनकी सहेलियों को फ़िल्म की शानदार कहानी सुनाई थी।
लेकिन...
लेकिन उस दिन तो इनके ठाठ - बाट ही कुछ निराले थे। ये शानदार कार में आए थे। कपड़े भी खासे रईसाना थे। हज़ारों रुपए के तो कलरफुल सन - ग्लासेज़ चढ़े थे इनकी आंखों पर!
और आज ये दोनों एक ही बाइक पर सवार होकर शोहदों की तरह यहां चले आए? उनके बेटे ने भी उन्हें बाहर से ही टरका दिया? और उन्हें रुपए किस बात के दिए गए हैं? उधर सब फ्रेंड्स कह रही हैं कि उन्होंने फ़िल्म के लिए कोई पैसे नहीं दिए? माजरा क्या है आख़िर?
बेटे के ऊपर आते ही वे उस पर फट पड़ीं।

जॉन जैसे ही घर के भीतर आया, मम्मी के तेवर देख कर बौखला गया। श्रीमती कुनकुनवाला ने उसे कुछ सोच पाने या छिपा पाने का मौक़ा ही नहीं दिया। उसे देखते ही उस पर पिल पड़ीं।
बोलीं- सच- सच बता, ये क्या चक्कर है, कौन हैं ये लोग? और तू किस बात के पैसे दे रहा है इन्हें। तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे झूठ बोलने की और मेरी सारी फ्रेंड्स को उल्लू बनाने की? शर्म नहीं आती तुझे। ये रुपए की हेराफेरी का क्या लफ़ड़ा है? कहां से आए तेरे पास इतने रुपए? और तूने मुझसे सफ़ेद झूठ बोल दिया कि सब आंटियों ने दिए हैं। बिना बात के सबसे मेरी भी लड़ाई करवा दी। दुष्ट कहीं का? आने दे आज तेरे पापा को, मैं उन्हें सब बताती हूं। वो ही अच्छी तरह खबर लेंगे तेरी तो...
जॉन मॉम के धाराप्रवाह भाषण पर खड़ा - खड़ा हंसता रहा। फ़िर उनके चुप होते ही आकर उनसे लिपट गया।
बोला- सॉरी बोला न मॉम! मैंने कहीं कोई लफ़ड़ा नहीं किया है। अभी बताता हूं आपको सब कुछ सच - सच।
जॉन फ़िर बोला- ये जो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर बन कर हमारे घर आए थे, ये तो मैंने ही बुलाए थे, एक छोटा सा मज़ाक करने के लिए।
- छोटा सा मज़ाक? नालायक, तुझे पता भी है कि तेरे मज़ाक के कारण मेरी कितनी हेठी हुई है? सारी फ्रेंड्स हंस रही हैं मुझ पर...
- डोंट वरी मॉम! वो क्या हंसेंगी तुम पर, देखना मैं और तुम ही हसेंगे उन सब पर!
- क्या? फ़िर कोई नया चक्कर चलाया क्या तूने? हम क्यों हंसेंगे उन पर? बेचारी मेरी बात पर यकीन करके ही तो यहां आई थीं। क्या किया अब? सच- सच बता?
पहले तो ये बता, ये दोनों लफंगे थे कौन जो बड़े बढ़- चढ़ कर फ़िल्म की कहानी सुना रहे थे?
जॉन हंसते हुए ही बोला- मम्मी प्लीज़! सुनो तो।