Phool bana Hathiyar - 3 in Hindi Fiction Stories by S Bhagyam Sharma books and stories PDF | फूल बना हथियार - 3

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फूल बना हथियार - 3

अध्याय 3

अपने मोबाइल को कान पर लगाए हुए नकुल कुछ सोच रहा था, यामिनी की दूसरी तरफ से व्यंग्य की आवाज सुनाई दी।

'क्या है नकुल.... मेडिटेशन में चले गए क्या..? मैंने जो प्रश्न पूछा उसका जवाब नहीं दिया?"

"पिछले साल इसी तारीख को हम एक दूसरे को पहली बार देखा। अर्थात हमारे प्रेम का जन्मदिन। उसे मनाना नहीं है क्या पूछा....?"

"हुम... हुम.. मनाएंगे।"

"तुम्हें क्या हुआ नकुल....? तुम जब भी मुझसे बात करते हो तो तुम्हारे शब्दों में खुशी दिखाई देती है आज उसका अभाव है । अभी तुमने जो 'हुम...हुम... मनाएंगे' इसको तौलकर के देखें तो 10 किलो विरक्ति होगी ऐसा लगता है? कोई समस्या है क्या?"

"समस्या को मैं पसंद नहीं और मुझे समस्या पसंद नहीं। फिर समस्या कैसे आएगी?"

"तो !... तुम अभी खुश हो?"

"बिल्कुल पक्का।"

"ठीक है! आज अपने प्रेम का जन्म हुआ था। उसे कैसे सेलिब्रेट करें?"

"एक अच्छे होटल में जाकर स्पेशल लंच लेंगे ।"

"लंच लेंगे। पर होटल में नहीं।"

"फिर....?"

"अडैयार में जो 'पी.एस.एम. है वहां आ जाओ! आज एक दिन तुम्हारे कंजूसी को त्याग कर ऑटो में आ जाओ!"

"ठीक....!"

"फिर पूछना भूल गई... आज बैंक लोन के बारे में मैनेजर से मिलना था बोल रहे थे ना... जाकर देखा?"

"हां.... देखा!"

"क्या बोले?"

"मेरे प्रोजेक्ट को पढ़ कर, देखकर उन्होंने मुझे गले नहीं लगाया इसी का दुख है।"

"इसका मतलब लोन पक्का मिल जाएगा बोलो।"

"मिलेगा क्या.... अरे मिल गया....!"

"जो अमाउंट मांगा है वह सेंक्शन कर देंगे?"

"पाँच लाख रुपए और मिला कर दे देंगे बोला। मैंने ही अभी नहीं चाहिए सर.... बाद में जरूरत पड़ेगा तो ले लूंगा बोला।"

"नकुल ! अब तुम्हारे जंगल में वर्षा ही वर्षा है। इस गरीब यामिनी को छोड़ मत देना....!"

"ये.... बकवास मत कर।"

"मजाक... एक उदाहरण....! तमिल पिक्चर के डायलॉग्स बोले बहुत दिन हो गए। इसलिए बोल कर देखा.... टेंशन मत करो! तुम ऑटो को पकड़कर तुरंत पी.यस.एम. आ जाओ। भूख इसी समय स्लो मोशन में स्प्रे हो रही है...."

"अभी रवाना हो रहा हूं....!" कह कर नकुल ने सेलफोन को बंद किया और उसे शर्ट के जेब में रख लिया। एक खाली ऑटो गोलाई का चक्कर आधा करके उसके पास आकर खड़ा हुआ।

"अड़ैयार जाना है।"

"अड़ैयार में कहां सर।"

"इंदिरा नगर में पी.एस.एम. ट्रस्ट।"

"प्रेस ट्रस्ट है ना सर?"

"हां।"

"ऐसा बोलो सर..... पूरा नाम बताओगे तभी तो हम जैसे ऑटो वालों को पता चलेगा।। बैठिए सर।"

"क्या लोगे...?"

"मीटर देखकर पैसा देना.... सर! मोलभाव करना बेकार है। यात्री पुलिस में चले जाते हैं।"

"यह डर सब ऑटो वालों को हो तो ठीक है ना।" मुंह से बड़बडते हुए नकुल ऑटो में चढ़कर बैठा।

अडैयार के इंदिरा नगर में सातवें गली के शुरू में ही एक बड़े नीम के पेड़ की छाया में प्रेस ट्रस्ट की बिल्डिंग दो मंजिल की थी |

नकुल उसके सामने ऑटो को खड़ा कर उतर गया। मीटर को देखकर रुपए देकर आधी खुली हुई विकेट डोर से अंदर घुसा। महीने में दो बार तो आने-जाने की जगह होने पर भी कंपाउंड के अंदर की दीवार पर लिखे हुए को नया जैसे देखा और पढ़ता हुआ चलने लगा।

'जीवित रहते समय खून का दान कीजिए; जीवन खत्म होने के बाद शरीर को दान कर दीजिएगा!

'जो हो गया उसके बारे में सोचना छोड़, जो होने वाला है उसके बारे में सोचो!'

'तुम्हारे पास जो ज्यादा है वह जिनके पास नहीं है उसे दूसरों को दो। भगवान को भी संदेह हो जाएगा कौन भगवान है!'

बाहर यामिनी इंतजार कर रही थी। उसके साथ नीलकमल ट्रस्ट को संभालने वाली 50 साल की महिला उसके साथ दिखाई दी।

"आ जाओ... नकुल! सब लोग तुम्हारा ही वेट कर रहे हैं।"

"सॉरी मैडम....! रास्ते में थोड़ा ट्रैफिक..." कहते नकुल की तरफ यामिनी मुडी। "आज लंच यही करने वाले हैं तुम पहले ही बोल सकती थी?

"मेरे ऐसे ना बोलने के दो कारण है नकुल।"

"क्या?"

"पहला कारण आज सुबह से ही मेरा मूड ऑफ है। साक्षात्कार लेने जहां पर गई वहां एक अनोखी घटना घटी।"

"किसका साक्षात्कार लेने गई थी?"

"उमैयाल एक डॉक्टर। आज की तारीख में वही नंबर वन गायनी हैं। उन्होंने बिना दर्द के डिलीवरी के बारे में कुछ बताई। यह कांसेप्ट थोड़ा नया होने के कारण एडिटर से परमिशन लेकर उनके पास साक्षात्कार लेने गई थी। ठीक तरह से साक्षात्कार लेने के बाद रवाना होने के थोड़ी देर पहले एक समस्या आ गई।" बात करनी शुरू हुई तो उसे लगा अक्षय के बारे में बता दूं क्या? एक मिनट के लिए सोचा फिर नकुल के चेहरे की रंगत बदल रही थी अतः उसने अपनी राय बदल ली।

"क्या समस्या....?" नकुल घबराहट से पूछा।

"उसे खाना खाने के बाद आराम से बताऊंगी। अभी बताऊंगी तो तुम्हारा खाने का मूड ही खराब हो जाएगा। दूसरा कारण चाहिए तो कहती हूं!"

"इसे तो सस्पेंस में न रखकर बोलो।"

"इसमें कोई सस्पेंस नहीं है.... मेरी एक फ्रेंड एक घंटे पहले मुझे फोन करके ‘कोई मर गया है उसकी बॉडी का जी.एच. डोनेट करना है उसके लिए क्या करना चाहिए पूछ रही थी।’ तुरंत मुझे हम दोनों भी पहली बार शरीर दान करने की जगह पर ही मिले थे और एक दूसरे से पहचान हुई यह बात मुझे याद आ गई। मैंने तारीख देखा। वही तारीख थी। मन के अंदर एक खुशी हुई। मैडम मंगई अर्शी को भी फोन करके बताया। वे भी बहुत खुश हुई और कहा तुम दोनों यहां आकर अनाथ बच्चों के साथ, बैठ कर लंच करिए। अगले साल हम सबको शादी का खाना खिलाइएगा । मैंने तुम्हें तुरंत तुम्हें फोन कर दिया।"

मंगई अर्शी हंसने लगी।

"क्यों नकुल अगले साल हमें शादी का खाना मिलेगा ना?"

"खिला देंगे मैडम!"

"यामिनी तो तैयार है.... तुम ही लेट कर रहे हो?"

"बैंक से एक लोन का इंतजार कर रहा था।"

"वह भी सेंक्शन होने वाला है... यामिनी बोली....'

"इतनी जल्दी सब कुछ बोल दिया?"

"यह क्या युद्ध का सीक्रेट है?"

"खाना खाकर दोनों आराम से झगड़ा करो। पहले अंदर आओ...!"

तीनों लोगों ने लंबे चौकोर डायनिंग हॉल के अंदर प्रवेश किया।

थोड़ा बड़ा हॉल। अलग-अलग उम्र के आदमी और औरतें थे करीब पचास लोग थाली के सामने लाइन से बैठे हुए थे। मंगई अर्शी ने हाथ से इशारा किया।

"वहां... आप दोनों बैठो....?"

"मैडम... आप..?"

"मैं बाद में खाना खाऊंगी। एक नया केस एडमिशन के लिए आया है। मैं जाकर बात करती हूं। तुम खाना खा कर आओ....!"

मंगई अर्शी के वहां से जाते ही, नकुल और यामिनी जो खाली जगह थी वहां थाली के सामने जा कर बैठे। जो परोसा हुआ था उनको धीरे से खाना शुरू किया। यामिनी थाली में जो हलवा था उसको निकाल कर मुंह में डालते हुए बोली "नकुल!"

"हां..."

"तुम और मैं 365 दिनों में कम से कम 200 बार तो मिलकर बात किए होंगे है ना?"

"हां।"

"आज तुमने क्यों झूठ बोला?"

"झूठ?"

"फिर तुम्हें बैंक लोन मिल गया वह सच है बोलने आ रहे हो....?"

"या... या.. यामिनी!"

"यह देखो नकुल....! तुम खुश हो... या तकलीफ में हो तुम्हारी आंखें ही मुझे बता देती है। मन को भारी करके रखो तो एक भी कौर अंदर नहीं जाएगा।"

"सॉरी यामिनी! लोन नहीं मिला तो तुम्हारा मन दुखी होगा। इसीलिए मैंने ऐसा एक झूठ बोला।"

"उस झूठ को तुम कितने दिन तक बचा सकते हो...."

"किसी भी तरह लोन मिल जाएगा मैंने सोचा। उस मैनेजर ने झूठा आश्वासन देखकर मुझे धोखा दिया.... अब मुझे दूसरे बैंक में ही ट्राई करना पड़ेगा....!"

"नहीं।"

"क्यों नहीं....?"

"अब बैंक लोन अप्लाई करने की कोशिश मत करो।"

"फिर?"

"जो पढ़ाई तुमने पहले की हैं उसी के हिसाब से नौकरी के लिए कोशिश करो। उसके बाद बिजनेस करने के बारे में सोचेंगे।"

"मैं क्या नौकरी के लिए प्रयत्न नहीं कर रहा हूं? कितने ही कंपनी में अप्लाई करने के बाद सब कुछ कुएं में डाले हुए पत्थर जैसा हो गया..... कोई पार्ट टाइम जॉब करने के कारण मैस में तीन टाइम का खाना, साफ-सुथरे कपड़े पहन कर बाहर आ पा रहा हूं। मेरे फ्रेंड गुरु ने मुझे अपने कमरे में जगह दे दिया तो कमरे के किराए की बचत है ।"

यामिनी सांभर-चावल खाते मुंह से हंसी।

"उस गुरु के घर शादी की तैयारियां चल रही है तुमने बोला! वह शादी करके चले जाएं तो तुम कहां पर रहोगे?"

"तिरूवलकेणी में एक बैचलर मेंशन है। वहां जाकर शरण लेनी पड़ेगी। वह ठीक है.... आज सुबह ही साक्षात्कार लेने गई जगह पर कुछ समस्या हुई तुमने बोला था ना... वह क्या है.....?"

"बोलूंगी तो तुम्हें टेंशन हो जाएगी....! तुम खाना खाकर हाथ धोलो। बाहर जाकर पेड़ के छाया में बैठकर बात करेंगे!"

"समस्या बड़ी है लगता है!"

"बड़ी है!"

"डॉक्टर का नाम क्या बताया?"

यामिनी के बोलने के लिए मुंह खोलने के पहले ही नकुल के मोबाइल से रिंगटोन बजने लगी।