Phool bana Hathiyar - 10 books and stories free download online pdf in Hindi

फूल बना हथियार - 10

अध्याय 10

अक्षय और परशुराम दोनों उस हॉस्पिटल के लंबे बरामदे में धीरे-धीरे चल कर आई.सी.यू. तक पहुंचे।

यूनिट के पहले कमरे में ऑक्सीजन का सिलेंडर की सहायता से रोहिणी सांस ले रही थी। अक्षय उसके पास जाकर खड़े होकर धीरे से छूकर "अम्मा!" आवाज दिया। रोहिणी का शरीर अक्षय के आवाज को सुनकर थोड़ा सा भी नहीं हिला। आवाज़ को थोड़ी ऊंची करके अक्षय ने फिर से 'अम्मा' बोलते समय ही पास में खड़ी एक नर्स बीच में बोली।

"सॉरी सर ! कोमा स्टेज में रहने वाले को फोर्स करके अपने होश में लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए... वह जान के लिए खतरनाक है ऐसा डॉक्टर ने कहा है...."

"अक्षय एक दीर्घ श्वास छोड़ता हुआ आंसू भरे आंखों से पास में खड़े परशुराम जी को दिखा।

"अंकल ! अम्मा को कुछ नहीं होगा ना? मुझे अम्मा की स्थिति को देखकर मन धक सा हो जाता है।"

"डरो मत अक्षय ! अम्मा को अचानक हुए सदमे के कारण ऐसी एक स्थिति उत्पन्न हुई। भावनाओं में ना बहकर थोड़ा तसल्ली से रहो। डॉक्टर उमैयाल किसी तरह उन्हें पहली परिस्थिति में लेकर आ जाएंगी....! तुम यहां खड़े मत रहो! चलो... बाहर चलते हैं।"

अक्षय कुछ क्षण अपनी अम्मा को देख कर बाहर आया।

दूसरे ही क्षण में बरामदे में चलने लगे।

"अंकल"

"क्या बात है बोलो बोलो...!"

"अम्मा को देख-देख मुझे अपने सभी रक्त की नाडियां जल रही है ऐसा लगता है। उस यामिनी को मेरे सामने लाकर खड़ा करने की बात थोड़ी देर पहले आपने कहा था ना अंकल?"

"हां"

"आप उसे कैसे जानते हैं?"

परशुराम उसके कंधे को थपथपाकर धीरे से मुस्कुराए। आज रात को ट्रस्ट के बंगले में डॉक्टर उत्तम रामन आ रहे हैं। तुम भी आओ.... यामिनी को देखेंगे।"

चल रहा अक्षय एकदम से खड़ा हो गया।

"अंकल ! फिर.... यामिनी...?"

"मेरे कस्टडी में ही है.…"

"कैसी अंकल...?"

"इस हॉस्पिटल के कैंटीन की कॉफी अच्छी होती है। चलो... जाकर पीते हुए बात करेंगे....!"

दोनों हॉस्पिटल के पीछे वाले कैंटीन की तरफ चलने लगे।

नकुल के कंधे को धीरे से मंगैय अर्शी ने पकड़ा।

"क्या बात है नकुल, स्टील जैसे जम कर बैठ गए?"

"इदम् चैरिटेबल ट्रस्ट में यामिनी गई होगी। वहां उसको कोई समस्या हुई होगी।"

"तू जो कह रहा है वह हो सकता है तुम क्या सोच रहें हो ।"

"इसमें सोचने का क्या है मैडम? मैंने जो कहा उसके बारे में आप आराम से सोच कर देखिएगा.... स्कूटी को चलाते हुए यामिनी कैसे एस.एम.एस. कर सकती है? ठीक है, स्कूटी को एक जगह खड़ा करके एस.एम.एस. की होगी तो भी इतनी विस्तार से मैसेज भेजने की जरूरत नहीं है....?

"यामिनी किसी विपत्ती में फंस गई सोच रहे हो क्या नकुल?"

"मैं बोल नहीं पा रहा हूं मैडम.... यामिनी बहुत सेंसिटिव टाइप की है। गलती करने वाला चाहे कोई भी हो, उससे पंगा जरूर लेगी वह ऐसी ही है। 'इदम्' चैरिटेबल ट्रस्ट पिछले तीन महीने से आपके 'अपनापन' संस्था को जो रुपए भेजना था नहीं भेजा तो वह वहां गई यामिनी कुछ गुस्से में बात की होगी। वहाँ वाद-विवाद ज्यादा बढ़कर कोई समस्या खड़ी हो गई होगी। ऐसा हो सकता है।"

"तुम जो कह रहे हो वह सोचने वाली बात ही है।"

"उस ट्रस्ट के फोन नंबर आपके पास है क्या मैडम?"

"है!"

"फोन करके देखें?"

"नहीं नकुल...! इस तरह के समस्या के लिए टेलीफोन का कन्वर्सेशन सही नहीं। तुम प्रत्यक्ष ट्रस्ट में जाकर देखो। वहां रहने वाले आदमियों से यामिनी के बारे में पूछताछ करो। उस समय उन लोगों के चेहरे में जो बदलाव आता है उसे नोट करो। हृदय में जो बात होती है वह चेहरे पर दिखाई देती है ऐसा कहते हैं। यामिनी के विषय में उन्होंने कोई गलती की होगी तो जरूर उनके चेहरे पर दिखाई देगा...."

"मे... मैडम...."

"क्या बात है...?"

"अभी 7:15 बजे हैं.... मैं एकदम से भी रवाना होऊंगा तो भी इस ट्रैफिक का पिक अवर है। 'इदम ट्रस्ट पहुंचने में ही 8:00 बज जाएंगे.... उस समय ट्रस्ट में कोई होंगे क्या?"

"यह देखो नकुल...! ऐसे सब सोचकर समय खराब मत करो! पहले ट्रस्ट में जाकर पूछताछ करो। वहां यदि समाधान का समाचार ना मिले तो पुलिस में चले जाओ.... तुम तुरंत रवाना हो...!"

नकुल सिर हिला कर पसीने के चेहरे से बाहर आया। सड़क पर जा रहे एक खाली ऑटो को हाथ दिखा कर रोक के उसमें बैठ गया।

जाने वाले जगह के नाम को बता कर टेक लगाकर बैठा तो उसको एक अजीब से डर ने घेर लिया। उसके पेट में कुछ-कुछ होने लगा उसके हृदय की धड़कन बढ़ गई। प्रश्न उसके दिमाग को परेशान करने लगे।

'यामिनी! तुम अभी कहां हो?'

'तुम्हें क्या हो गया?'

नकुल की आंखों में आंसू बाहर झांकते हुए एक नए मकान के गोरखा जैसे झांक रहे थे।

"यही है साहब वह चैरिटेबल ट्रस्ट!" ऑटो ड्राइवर सड़क के किनारे ऑटो को खड़ी करके बोला, नकुल ने रुपयों को देकर यंत्र की तरह उतरा।

बंद उस बड़े लोहे के गेट की तरफ बढ़ा। गेट की एक तरफ एक विकेट डोर दिखाई दिया, वहाँ जाकर खड़ा होकर धीरे उसे खटखटाया।

कुछ देर बाद...

वह दरवाजा धीरे से खोलकर सिक्योरिटी नरसिम्मन झांककर देखा।

"कौन है...?"

"मेरा नाम नकुल... इस ट्रस्ट के प्रमुख मिस्टर परशुराम से मिलना है!"

"किस बारे में?"

"वह.... वह... वह कुछ पर्सनल"

"परशुराम साहब बाहर गए हैं?"

"अंदर और कौन हैं?"

"कोई नहीं है...!" कहते हुए नरसिम्मन उस विकेट डोर को बंद करने की कोशिश की तो नकुल जल्दी से बोला "एक मिनट"

"क्या?"

"आज दोपहर को करीब 1:00 बजे इस ट्रस्ट में एक लड़की आई थी क्या?"

नरसिम्मन सतर्क हुआ।

"लड़की?"

"हां... पिंक रंग के स्कूटी पर वह लड़की यहां आई होगी..."

"ऐसी कोई नहीं आई?"

"प्लीज... थोड़ा सोचो" नकुल अपनी बात पूरी करने के पहले नरसिम्मन गुस्से से बीच में बोला।

"मैंने तो नहीं आया कह दिया ना.... फिर क्या... प्लीज... प्लीज... आदि...! ट्रस्ट तीन महीने से बंद है.... यह बड़े पूछताछ करने आ गए जा रे..."

नकुल को थोड़ा गुस्सा आया। उसका चेहरा लाल हो गया। अभी मैंने क्या पूछा...? आज दोपहर को 3:00 बजे पिंक रंग की स्कूटर पर एक लड़की आई थी क्या। इसके लिए क्यों इतना गुस्सा...? बातचीत में आदर को रहने दो.... जा रे आ रे... बात करने से मैं भी ऐसे ही बोलूंगा...."

"क्या...! तुम भी ऐसे बोलोगे...? बोलो... तू क्या बोलेगा मैं देखता हूं... बोल भाई" नरसिम्हन के ऐसे बड़े बोल बोलते समय ही एक कार हेड लाइट की रोशनी में गेट के पास आकर बिना आवाज के खड़ी हुई।

सिक्योरिटी नरसिम्मन घबराकर कार के पास दौड़ा। कार के ड्राइविंग सीट पर परशुराम ने कार के कांच को नीचे किया। झांक कर देखा तो नरसिम्मन नम्रता से झुका। परशुराम ने पूछा।

"गेट के पास खड़ा है वह कौन है?"

अपनी आवाज को नरसिम्मन ने बहुत धीमी कर लिया।

"साहब! उसका नाम नकुल है। उस पत्रिका के लड़की को ढूंढता हुआ आया है।"

"परशुराम का चेहरा एक क्षण के लिए काला पड़ गया फिर अपनी स्थिति में वापस आए।

"तुमने क्या बोला?"

"वह लड़की नहीं आई बोला"

"विश्वास कर लिया?"

"विश्वास करने वाला नहीं लगा... कोई पुलिस जैसे पूछताछ कर रहा है। इसीलिए... गुस्सा आया..."

"बेवकूफ! ऐसे समय में सहनशीलता को नहीं खोकर साधारण ढंग से बात करना चाहिए....! अब मैं उससे बात कर लेता हूं।" गेट के पास खड़े नकुल के सामने गए।

"क्या बात है भाई! सिक्योरिटी से क्या समस्या है?"

"कोई समस्या नहीं है सर.... मेरी पहचान की एक लड़की उसका नाम यामिनी है जो एक पत्रिका में रिपोर्टर है!"

"हो....! वह लड़की....! उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं.... तीन महीने पहले इस चैरिटेबल ट्रस्ट में आई थी और उसने मेरा साक्षात्कार लिया। उस लड़की को क्या हुआ?"

"वह... वे... है ना..."

"बोलो भाई....!"

"आज दोपहर के 3:00 बजे से वह लड़की यामिनी मिल नहीं रही है सर।"

"क्या... क्या..…! लड़की नहीं मिल रही?" परशुराम अपने चेहरे पर एक नकली आश्चर्य को दिखाया।

"हां... सर"

"ठीक....! वह लड़की नहीं मिल रही है तो तुम यहां आकर समस्या खड़ी करने का क्या मतलब है?"

"यामिनी दोपहर को 3:00 बजे के करीब इदम चैरिटेबल ट्रस्ट मेरी आई थी....?"

"दोपहर को 1:00 बजे से शाम को 6:00 बजे तक मैं इस ट्रस्ट में ही था। अभी बाहर जाकर आ रहा हूं। तुम कह रहे हो उस समय यामिनी मुझे देखने नहीं आई?"

वे जो बोल रहे हैं वह सच... झूठ इस पशोपेश में परशुराम ने नकुल के कंधे पर हाथ रखा ।

"यह देखो भैया....! यामिनी एक पत्रिका में काम करने वाली लड़की है। किसी जगह पर साक्षात्कार लेने गई होगी। वहां पर बहुत लेट हो गई होगी। परंतु निश्चित रूप से वह इस ट्रस्ट में नहीं आई। आने का भी अवसर नहीं है। ट्रस्ट के कामकाज को कोर्ट ने स्टे दे रखा है.... इसके बावजूद भी मेरे कहने पर तुम्हें विश्वास नहीं है तो मेरे साथ कार में आकर अंदर देखो।"

"ना... नहीं सर....! आप के कहने पर विश्वास कर रहा हूं। आपका सिक्योरिटी अपमानजनक ढंग से बोल रहा था। अतः मुझे भी जवाब में ऐसा बोलना पड़ा।"

"वह सिक्योरिटी गार्ड थोड़ा गुस्से वाला है। उसको किसके साथ कैसे बोलना चाहिए नहीं पता। उसकी तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूं भैया..."

"कोई बात नहीं है सर....! मनुष्यों में कोई भी खराब नहीं होता है। थोड़ा अलग तरह के होते हैं। बस इतना ही.... आप इतने आश्वस्त होकर बात कर रहे हैं मुझे खुशी हो रही है। मैं आता हूं सर" कहता हुआ जाने वाले नकुल को परशुराम ने आवाज देकर रोका।

"एक मिनट भैया !"

नकुल रुका।

"वह लड़की यामिनी तुम्हारी कौन है ?"

"वह.... वह.... और मैं और यामिनी एक दूसरे को चाहते हैं... सर....."

"ओ! प्रेम...."

"हां सर...."

"फिकर मत करो घर जाकर भैया... यामिनी एक घंटे के अंदर कहीं भी हो फोन करेगी.... तुम दोनों शादी करके खुश रहना यह मेरा आशीर्वाद है, शुभकामनाएं!"

"बहुत धन्यवाद सर" नकुल हाथ जोड़कर प्रणाम करके चलना शुरू कर दिया। मन के अंदर कई विचार आए। 'परशुराम को देखें तो झूठ बोलने वाला जैसे नहीं लग रहा। वह भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ कौन हैं उसे मालूम करना है यह अगला काम है...!"

सोचता हुआ नकुल चल रहा था तो पीछे से एक लड़की की आवाज सुन जल्दी से रुक गया।

"सर... सर... सर"

नकुल ने मुड़कर देखा वह लड़की खड़ी हुई थी। बीच की उम्र की थी। थोड़ा भारी शरीर। कॉटन की साड़ी को बेतरतीब से बांधी हुई थी। चेहरे पर अठन्नी जैसे बड़ी सी कुमकुम की बिंदी।

क्या बात है जैसे उसे नकुल ने देखा। आसपास कुछ क्षण देखकर धीमी आवाज में बोली।

"सर... मेरा नाम पूजा है। वहां... इस ट्रस्ट से थोड़ी दूर पर ही मेरी फल की दुकान है। उस ट्रस्ट सिक्योरिटी से आपके बात करते समय मैं भी सुन रही थी। वह आदमी भी ठीक, कार में आने वाला बड़ा आदमी भी ठीक.. दोनों लोग झूठ बोल रहे हैं।"

"की... क्या.. क्या... झूठ ?"

"हां... सर... आज दोपहर को 3:00 बजे के करीब इस ट्रस्ट के बिल्डिंग के अंदर एक लड़की को जाते मैंने देखा..... उसके बाद उस लड़की को वापस आते हुए मैंने नहीं देखा..."

नकुल को आघात लगने से उस लड़की को ही देखता रहा। घबराए हुए आवाज में पूछा।

"तुम क्या कर रही हो....."

"हां सर.... पिंक कलर का स्कूटर"

नकुल अपने मोबाइल को उठा कर फोटो ऑप्शन में जाकर यामिनी के फोटो को जूम करके उसे दिखाया।

"तुमने जिसे देखा वह इस फोटो की लड़की ही है देख कर बताओ !"

वह लड़की उस फोटो को देख उसका चेहरा ठीक से नहीं दिखा सर। परंतु ऐसी ही उम्र की लड़की थी...."

नकुल माथे को पकड़कर आसपास में देखा।

"अब क्या करें समझ में नहीं आ रहा है?

"सर! मैं भी बहुत दिन से देख रही हूं। इस ट्रस्ट के बिल्डिंग के अंदर कोई गलत काम हो रहा है सर। अचानक से कोई ना कोई आ जाता है.... और चला जाता है... एक बार विदेशी भी आए थे। आपको आगे क्या करना है करिए और उस लड़की को ढूंढने का प्रयत्न कीजिए सर। मेरी दुकान में कोई नहीं है... मैं जा रही हूं सर।"

धीमी आवाज में जल्दी-जल्दी बोल कर अपने फल की दुकान की तरफ चली गई। नकुल वापस आकर अंधेरे में खड़े होकर देख रहा था।

'वह फल वाली बोल रही है वैसे ही यहां मैंने इस बिल्डिंग के अंदर ही होगी?"

'कैसे पक्का करूं?'

'इस बिल्डिंग के पीछे की तरफ जा कर दीवार को फांद कर अंदर जाकर देखूं...?'

नकुल एक फैसले में आया जैसे बिल्डिंग के पीछे की तरफ जल्दी-जल्दी चलने लगा। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज हो गई कि ऐसे लगा जैसे फट जाएगी। पसीना सर से बहता हुआ चेहरे पर और पीठ पर धार धार बनकर बह रहा था शर्ट बुरी तरह भीग चुकी थी। उसका मुंह और नाक दोनों से श्वास ले रहा था।

दो मिनट के चलने के बाद बिल्डिंग का पिछवाड़ा आ गया। चारों तरफ कालीश पुती हुई जैसे अंधेरा था। दीवार सात फुट ऊंची विश्वरूप में खड़ी थी।

'कैसे चढ़े?'

नकुल ऊपर की तरफ देख कर सोचने लगा उसी समय उसका मोबाइल बजा उसने निकाल कर देखा। डिस्प्ले में मंगई अर्शी का नाम था।

"मैडम"