Bharosha - 3 in Hindi Moral Stories by Parul books and stories PDF | भरोसा - 3

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भरोसा - 3

3

दूसरे दिन गौरी मौसी ने चित्रा की बहुत ही राह देखी पर वो आई नहीं, मौसी उसके घर पर गई तो देखा कि दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। तीसरा दिन, चौथा दिन, पांचवा दिन, ऐसे पूरे पंद्रह दिन बीत गए पर चित्रा आई नहीं थी और उसका कोई अता - पता भी नहीं था। गौरी मौसी को अब चिंता हो रही थी। उनको भैरवी की कही हुई बात याद आई कि किसी पर भी भरोसा नहीं कर लेना चाहिए! भैरवी की बात न मानने का उन्हें अब बहुत ही पछतावा हो रहा था। पूरा एक महीना बीत गया था इस बात को, पर चित्रा लौटी नहीं थी।

गौरी मौसी को बहुत बड़ा झटका लग गया था। उस दिन उन्होंने अपने सारे ही ज़ेवर चित्रा के सामने धर दिए थे, और वो सारे ज़ेवर चित्रा ले कर भाग गई थी।

एक दिन अचानक भैरवी मौसी के घर नमकीन देने आ गई थी। उसे देखते ही गौरी मौसी की आँख में आंसू आ गए। भैरवी ने पूछा तो उन्होंने कहा कि, "तेरी बात न मानकर मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है, चित्रा पर भरोसा मुझे नहीं करना चाहिए था।" और उन्होंने सारी अपने धोखे की बात बता दी कि कैसे चित्रा से उन्होंने धोखा खाया!

भैरवी ने उन्हें पुलिस के पास जाने के लिए कहा पर मौसी ने मना कर दिया। अपनी किस्मत का दोष समझकर उन्होंने अपने मन को मना लिया था। उन्होंने भैरवी को अब उनसे मिलने के लिए आते रहने के लिए कह दिया था। उस दिन के बाद भैरवी दिन में एक बार तो गौरी मौसी को मिलने के लिए अचूक ही आती थी। उसके साथ बातें करके मौसी को अच्छा लग रहा था।

एक दिन देर रात किसीने गौरी मौसी का दरवाजा खटखटाया। 'इतनी देर रात कौन आया होगा?' मौसी ने मन में सोचा। खोलकर देखा तो सामने एक दाढ़ीवाला आदमी खड़ा था, जिसे देखकर गौरी मौसी एकदम ही चोंक गई थी।

अगले दिन सुबह दूधवाला आया, न्यूज पेपरवाला आया, कचरा लेनेवाला आया पर किसी के लिए मौसी ने दरवाजा नहीं खोला। वे लोग बहार ही दूध और न्यूज पेपर रख के चले गए थे, कचरा लेनेवाला भी खाली हाथ ही लौट गया था। कामवाली बाई आयी तभी भी वह दरवाजा नहीं खोल रही थी। उसने मौसी को मोबाइल लगाया पर मोबाइल बंद आ रहा था। तभी तो वो चली गई पर थोड़ी देर के बाद वह वापस आई, पर मौसी ने दरवाजा खोला नहीं था। उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था, क्योंकि इससे पहले मौसी कभी भी इतनी देर तक सोई रहती नहीं थी। वो उधर से चली गई पर थोड़ी ही देर में वो वापस आई, इस बार वो अकेली नहीं थी, भैरवी भी उसके साथ थी। वो जब लौट जा रही थी तब उसे रास्ते में भैरवी मिल गई थी और इसलिए वो भैरवी के साथ वापस आई थी।

भैरवी ने भी बहुत बार दरवाजा खटखटाया पर मौसी ने दरवाजा नहीं खोल रही थी। उसने मोबाइल ट्राय किया पर मोबाइल बंद आ रहा था। उसने गौरी मौसी को आवाज़ भी बहुत लगाई पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिला था। उसे अब मौसी की चिंता होने लगी थी इसलिए उसने पुलिस को फोन किया। थोड़ी ही देर में पुलिस वहाँ आ पहुँची। पुलिस ने चाबीवाले को बुलाकर दरवाजा खोलवाया। दरवाजा खुलते ही पुलिस ने जैसे ही घर के अंदर प्रवेश किया, तो देखा कि गौरी मौसी नीचे ज़मीन पर पड़ी थी और उनके सिर से बहुत ही खून बह रहा था। उन्हें फौरन अस्पताल पहुंचाया गया। पुलिस ने पूरे घर के सारे कमरे छान मारे पर किसी भी कमरे से चोरी हुई हो एसा नज़र नहीं आ रहा था।

'अगर चोरी के इरादे से मौसी पर हमला नहीं हुआ था तो फिर किस इरादे से उन्हें मारा गया था?' यही एक सवाल पुलिसवालों के मन में चल रहा था। अब ये तो जभी मौसी को होश आएगा तभी पता चल पाएगा कि उन पे हमला कैसे हुआ था? और किसने किया था? या करवाया था? जब तक मौसी को होश आ जाए तब तक पुलिसवालों कामवाली बाई, दूधवाला, न्यूज पेपरवाला, कचरा लेनेवाला, इन सबसे पूछताछ कर रहे थे। उन्होंने भैरवी से भी पूछताछ की।

भैरवी से पूछताछ करने पर उन्हें ये मालूम हुआ कि गौरी मौसी का संबंध नए पड़ोसी चित्रा और तुषार से बहुत ही गहरे थे और भैरवी ने उन्हें ये भी बताया कि किस तरह वो दोनों मौसी के सारे ज़ेवर ले कर पलायन हो गए थे! और बहुत दिनों से उनका अता-पता ही नहीं था। पुलिस का सारा शक उन दोनों पर ही जा रहा था। पर मन में ये दुविधा भी थी कि अगर उन्हें पहले से ही सारे ज़ेवर मिल गए थे तो फिर एसा हमला करने या तो फिर करवाने का कारण क्या रहेगा?

उन्होंने अपने हिसाब से सारी तपास करना शुरू कर दिया था और मौसी को जल्दी से जल्दी होश आ जाए वही राह देख रहे थे। भैरवी, मौसी के पास अस्पताल में ही रही थी। उसके साथ एक महिला पुलिस भी रखी गई थी। ताकि मौसी को होश आने पर उनसे सबसे पहले पुलिस ही बात कर सके।

डॉक्टर्स की पूरी कोशिश रही थी कि मौसी को जल्द से जल्द होश आ जाए पर खून ज्यादा बह जाने से थोड़ा वक्त लग रहा था। सिर पर चोट लगने के कारण उनकी हालत बहुत ही गंभीर थी। उनके बेटे को भी खबर दी गई थी और वो भी अमेरिका से इन्डिया आ पहुँचा था। अपनी माँ की एसी हालत देखकर उसे बहुत ही रोना आया था। सब मिलकर भगवान से यही प्रार्थना कर रहे थे कि मौसी को जल्द से जल्द होश आ जाए ताकि सच्चाई का पता लग पाए।

चित्रा और तुषार को ढूंढने के लिए पुलिस हर तरह से प्रयत्न कर रही थी। वो दोनों अचानक कहाँ गायब हो गए थे वही पता नहीं चल रहा था। आजूबाजू में भी किसीको ये बात मालूम नहीं थी कि वो दोनों अचानक ऐसे क्यों और कहाँ चले गए थे। पर गली के कोने में एक पान के गल्लेवालेने पुलिस को बताया था कि तीन - चार दिन पहले ही तुषार उसकी दुकान पे सिगरेट लेने आया था। उस पानेवाले ने पूछा भी था कि, "क्यों भैया, आजकल आप रोज आते नहीं हो?"

"हम अभी दुसरी जगह पर रहने के लिए चले गए हैं।" तुषार ने तब उसे ऐसा जवाब दिया था।

उस पानेवाले ने ये भी बताया कि तुषार ने दाढ़ी उगा ली थी और इसलिए जल्दी पहचानने में नहीं आ रहा था। उस पानेवाले की बात सुनकर पुलिस ने उस पान के गल्ले की चौकीदारी के लिए एक हवालदार बैठा दिया था कि, 'शायद तुषार उधर वापस आए!' और पुलिस का अनुमान ठीक निकला भी! तुषार उस पान के गल्ले पर वापस आया था और उसे देखते ही उस हवलदारने उसे पकड़ लिया था।

 

(क्रमश:)

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