Akele Hum Akele Tum - 2 books and stories free download online pdf in Hindi

अकेले हम अकेले तुम - 2


दूसरे दिन सुबह से ही हर्ष फिर घर की व्यवस्था और बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में जुट गया. डिनर के लिए जब फिर सब ने बाहर का प्रोग्राम बनाया तो सारिकाजी ने रोकते हुए कहा कि कल सुबह ही हर्ष को निकलना है तो इस समय सब घर पर ही रहो, घर पर ही बनाओ खाओ.

मगर बच्चे नहीं माने तो सारिकाजी ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम सब जाओ मैं नहीं जाऊंगी. मैं अपने लिए यहीं कुछ बना लूंगी.’’

निकलतेनिकलते हर्ष ने कहा, ‘‘मम्मीजी, आप अपने लिए जो भी बनाइएगा उस में 2 रोटियां मेरी भी बना दीजिएगा. मैं भी घर आ कर ही खा लूंगा, बाहर का खाना खाखा कर मन भर गया है मेरा.’’

सारिकाजी ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन हर्ष के जाने के बाद तान्या को आड़े हाथों लिया, ‘‘तान्या, तुझे क्या लगता है हर्ष की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई है तो उस में उस का कोई गुनाह है? तुझे यहां अकेले रहना पड़ रहा है तो इस में उस का कोई कुसूर है? क्या सोचती है तू? क्या अकेले रहने से परेशानियों का सामना केवल तुझे ही करना पड़ रहा है? हर्ष बड़ा ऐश कर रहा है वहां पर? कैसी बीबी है तू कि तुझे उस का खराब हो रहा स्वास्थ्य और ढलता जा रहा चेहरा नहीं दिख रहा है? देख रही हूं एक दिन के लिए इतनी दूर से बेचारा भागाभागा बीवीबच्चों के पास रहने के लिए आया और सारा दिन तुम लोगों की जरूरतें और फरमाइशें पूरी करने में लगा रहा. 1 पल भी चैन से नहीं बैठ पाया. क्या उस के शरीर को आराम की जरूरत नहीं है?’’





‘‘पर मां मैं ने ऐसा क्या कर दिया जो आप इतना नाराज हो रही हैं मुझ पर? आप को ऐसा क्यों लगने लगा कि मुझे हर्ष की चिंता नहीं है? ऐसा क्या देख लिया आप ने जो मुझे इतना डांट रही हैं?’’

‘‘देख तान्या जब से हर्ष चंडीगढ़ गया है तब से मैं तेरे मुंह से बस यही सुनती आ रही हूं कि मैं अकेले कैसे रह रही हूं यह मैं ही जानती हूं. मुझे कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है कि क्या बताऊं? यह बात तू अपने मायके, ससुराल के 1-1 इंसान को बता चुकी है… अकेले रहने की वजह से तुझे कितनी तरह की परेशानियां हो रही हैं… पर एक बार भी मैं ने तुम्हें हर्ष की चिंता करते नहीं सुना. एक बार भी मैं ने तेरे मुंह से यह नहीं सुना कि हर्ष वहां क्या खाता होगा? पता नहीं मनपसंद खाना मिलता भी होगा उसे या नहीं… उस के कपड़े कैसे धुलते और प्रैस होते होंगे? शाम को थकाहारा घर आता होगा तो 1 कप चाय की जरूरत होती होगी तो क्या करता होगा?

‘‘बेचारा एक दिन के लिए घर आता है और उस एक दिन भी तू उसे एक पल भी आराम से बैठने नहीं देती. सारा दिन किसी न किसी काम के लिए दौड़ाए रहती है उसे… क्या इतनी पढ़ीलिखी होने के बावजूद तू हर्ष के बिना घरगृहस्थी के अपने छोटेबड़े काम नहीं कर सकती?’’

‘‘मां मैं कर तो लेती पर आप तो देख ही रही हैं कि क्षितिज और सौम्या इतने छोटे हैं कि इन्हें ले कर बाजार जाना खतरे से खाली नहीं है… और बाहर खाना और घूमनाघुमाना तो बच्चों की फरमाइश पर करना पड़ता है… मैं थोड़े ही कहती हूं जाने को,’’ तान्या ने रोंआसे होते हुए कहा.

इस पर सारिकाजी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो बेटा, मैं समझ रही हूं कि हर्ष के जाने की वजह से तुझे परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है पर तू केवल अपनी ही परेशानियों के बारे में क्यों सोचती रहती है? क्या यह खुदगर्जी नहीं है तेरी? मेरी नजर में तो तुझ से ज्यादा परेशानी हर्ष को उठानी पड़ रही है. तुझ से तो केवल हर्ष दूर गया है पर हर्ष से तो घर, बीवीबच्चे, घर का खाना, घर का सुकून सबकुछ छिन गया है. एक दिन के लिए आता भी है तो तुम सब के लिए ऐसे परेशान होता है जैसे कोई गुनाह कर के लौटा है.

‘‘तू पढ़ीलिखी और समझदार है. तुझे चाहिए कि बच्चों को स्कूल भेजने के बाद बाजार जा कर सारा सामान ला कर रख ले ताकि कम से कम रविवार को तो दिनभर हर्ष आराम से रह सके… और तुझे शुरू से पता है कि हर्ष को तेरे हाथ का बना खाना ही पसंद है बाहर के खाने से वह कतराता है. फिर भी तू रविवार को भी उसे बजाय अपने हाथों से बना कर खिलाने के बाहर ले जाती है. बच्चों को पिज्जाबर्गर खाना हो तो तू ही ले जा कर खिला आया कर.’’

मां की बात सुन कर तान्या को एहसास हुआ कि सचमुच वह बहुत बड़ी गलती कर रही थी कि हर्ष के जाने से समस्या केवल उसे हो रही है. हर्ष की परेशानियों के बारे में न सोच कर वह इतनी खुदगर्ज कैसे बन गई उसे खुद ही समझ में नहीं आ रहा था.

अगले शुक्रवार को बच्चों को स्कूल भेज कर घर के सारे छोटेबड़े कामों की लिस्ट बना कर तान्या घर से निकल गई. उस ने तय कर लिया था कि अब आगे से हर्ष के आने पर उसे किसी काम के लिए बाहर नहीं भेजेगी, बल्कि अब पूरा रविवार वे सब हर्ष के साथ घर पर ही बिताएंगे ताकि उसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से आराम मिल सके.

बाजार की तरफ जाते समय अचानक तान्या की नजर सड़क के किनारे छोलेचावल के ठेले के पास खड़े एक युवक पर पड़ी जो जल्दीजल्दी छोलेचावल खा रहा था. उसे देखते ही न जाने क्यों तान्या की आंखों से आंसू गिरने लगे. वह सोचने लगी कि हर्ष भी तो आखिर भूख लगने पर ऐसे ही जहां कहीं भी जो कुछ भी मिल जाता होगा खा कर अपना पेट भर लेता होगा. मनपसंद चीजों की फरमाइश कर के बनवाना और खाना तो भूल ही गया होगा हर्ष.

अपने आंसू पोंछतेपोंछते तान्या जल्दीजल्दी घर चली जा रही थी, साथ ही सोचती भी जा रही थी कि अपने परिवार वालों को भरपेट भोजन देने और उन के लिए सुखसुविधा जुटाने के लिए घर से दूर रह कर दिनरात खटने वाले हमारे पतियों को भूख लगने पर मनपसंद भोजन तक मुहैया नहीं होता और हम पत्नियां यही जताती रह जाती हैं कि हम ही उन के बिना बड़ी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं l



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