Prem Diwani Aatma - 7 books and stories free download online pdf in Hindi

प्रेम दीवानी आत्मा - भाग 7

सिद्धार्थ के रोंगटे खड़े होने लगते हैं, उसे ऐसा महसूस होता है कि नंदू भैया की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर रही है और जैसे ही सिद्धार्थ की मां सिद्धार्थ को देखकर उसके सर पर हाथ रखकर कहती है "अपने भाई को परेशान मत कर नंदू बेटा।" तो मां के यह कहते ही सिद्धार्थ बिल्कुल ठीक हो जाता है।

सिद्धार्थ के घर के अंदर पहुंचने के बाद जब अंकिता की मां को घर में बैठने के लिए कुर्सी नहीं मिलती है तो सिद्धार्थ अपनी कुर्सी से उठ कर अंकिता की मां को अपनी कुर्सी बैठने के लिए देता है, लेकिन अंकिता की मां सिद्धार्थ की तरफ नफरत भरी नजरों से देख कर अंकिता से कुर्सी लेकर बैठती है और सिद्धार्थ की दी हुई कुर्सी पैर से खिसका कर अंकिता को बैठने के लिए दे देती है, ताकि सब अपनी अपनी जगह बैठ जाए और सिद्धार्थ मुजरिमो जैसे सब के सामने खड़ा रहे।

अपनी मां कि यह हरकत अंकिता को बहुत बुरी लगता है, इसलिए अंकिता अपनी मां को नाराजगी दिखाते हुए अपनी कुर्सी सिद्धार्थ को बैठने के लिए दे देती है और खुद खड़े होकर सब लोगों की बात सुनती है।

अंकिता का यह व्यवहार सिद्धार्थ के साथ सिद्धार्थ के परिवार वालों को भी बहुत पसंद आता है।

सीमा गुरु जी को फोन करके सारी घटना के बारे में बताती है, तो फोन पर गुरु जी सीमा को बताते हैं कि "मेरी पहचान के पंडित जी ने अंकिता सिद्धार्थ का नकली विवाह किया है, एक भी मंत्र का उच्चारण नहीं किया है और ना ही कोई रीति रिवाज किया है और हां तुम्हारी एक बात से मुझे समझ आ गया है कि नंदू की आत्मा बहुत शक्तिशाली है, क्योंकि वह मंदिर के अंदर भी प्रवेश कर गई शायद कोई बड़ी शक्ति नंदू की आत्मा की मदद कर रही है, इसलिए दिवाली की अमावस्या की रात को आत्मा की शांति का पूजा पाठ नियम कायदे से नहीं हुआ तो अगली दिवाली तक इंतजार करना पड़ेगा और इस एक वर्ष में सबसे ज्यादा खतरा आप दोनों बहनों को रहेगा, और हां एक बात आप ने सीमा जी अच्छी बताई की नंदू की आत्मा अपनी मां का कहना मानती है। नंदू की बेचैन भटकती आत्मा को हम उसकी मां की वजह से ही काबू में रख सकते हैं।"

सीमा ने अपने मोबाइल का स्पीकर खोल रखा था, इसलिए दोनों परिवार सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

गुरु जी की बात पूरी होने के बाद अंकिता की मां गुरु जी को प्रणाम करके पूछती है "गुरु जी मेरा मुंह बोला भाई तांत्रिक है, मैं उसकी मदद से नंदू की आत्मा को कैद करवा लूं वह भटकती आत्माओं को कैद करके उनसे अपने बड़े-बड़े काम करवाता है।"

"आप अपनी तरफ से ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे मेरी आत्मा शांति की पूजा में विघ्न पड़े।" गुरु जी ने कहा

नंदू की आत्मा को कैद करने वाली बात अंकिता की मां की वहां बैठे सब लोगों को बहुत बुरी लगती है, लेकिन अंकिता की मां किसी की भी परवाह किए बिना दूसरे दिन अपने मुंह बोले तांत्रिक भाई को अपने घर बुला लेती है, यह कहकर कि "उसकी तंत्र विद्या का इस्तेमाल बस अपने परिवार की सुरक्षा के लिए करूंगी, नंदू की भटकती आत्मा को कैद करने की सोचूंगी भी नहीं।"

सिद्धार्थ के मकान की छत से गंगा नदी दूर बहती हुई साफ़ दिखाई देती थी, इसलिए जब कभी भी सिद्धार्थ का मन अशांत बेचैन होता था, तो वह छत पर कुर्सी पर बैठकर शांत विशाल बहती हुई, स्वच्छ पवित्र गंगा नदी को घंटों देखता रहता था और इन दिनों उसका मन बहुत ज्यादा अशांत बेचैन था, इसलिए वह दिन के पहले प्रहर जाड़े के मौसम में धूप में अपनी छत पर कुर्सी पर बैठकर गंगा नदी को देख रहा था, और पुरानी यादों में खोया हुआ था।

जब कार्तिक पूर्णिमा पर 12 बरस की आयु में वह जिद करके अकेले अंकिता के परिवार के साथ गंगा स्नान करने मेला घूमने चला गया था, और मेले में गुम हो गया था। उसके गुम होने के बाद अंकिता ने रो-रो कर अपना बुरा हाल कर लिया था और जब पुलिस वाले उसे ढूंढ कर लाए थे, तो 14 बरस की अंकिता उसके गले लगा कर बहुत रोई थी।

तब सीमा ने अपनी मां से कहा था "अंकिता सिद्धार्थ को बहुत प्रसंद करती है, इन दोनों की आपस में शादी कर दो।"

और सीमा अंकिता की मां ने सीमा से कहा था "अगर सिद्धार्थ अंकिता से दो वर्ष छोटा नहीं होता, तो मैं जरूर इन दोनों की शादी करवा देती।"

वह यह बात सोच कर दुखी हो रहा था कि पहले अंकिता की मां उसे कितना पसंद करती थी, अब उससे कितना नफरत करने लगी है।

और फिर सोचता है, शायद उसी दिन मेरे दिल में अंकिता के लिए प्रेम का अंकुर फूटा था।

और उसी समय अंकिता गुलाबी साड़ी में जिस साड़ी को पहने हुए देखकर उसकी जन्मदिन की पार्टी में उसके दोस्त विक्रम ने उसकी तारीफ की थी, दोपहर का खाना थाली में सजाकर छत पर लेकर आती है और सिद्धार्थ से कहती है "खाना खाकर जल्दी तैयार हो जाओ, फिर मेरे साथ घर का घरेलू सामान लेने बाजार चलना ऐसा मां ने कहा है।"

अंकिता के साथ कुछ घंटे अकेले बिताने की खुशी में सिद्धार्थ जल्दी-जल्दी खाना खाकर तैयार हो जाता है और बाजार में घर का खाने पीने का सामान खरीदते हुए जब सिद्धार्थ अंकिता का पति जैसे पूरा ख्याल रखता है, और दुकानदारों से सामान खरीदते वक्त अंकिता दुकानदारों से मोल भाव करने के बाद पैसों की बचत करती है, तो सिद्धार्थ अंकिता की तारीफ करता है, तो सिद्धार्थ की यह सारी बातें अंकिता को बहुत अच्छी लगती है और वह सोचती है सिद्धार्थ प्रेमी पति दोनों रूप में संपूर्ण है, उसके जीवन में जो भी लड़की आएगी वह बहुत खुश रहेगी।

फिर दोबारा अपने मन में सोचती है, मैं फिर उससे शादी करने से क्यों डर रही हूं।

और रात को खाना खाकर जब अंकिता अपने घर सोने जाती है तो सिद्धार्थ के एक बार कहने से ही उसके साथ उसके घर की छत पर आग जलाकर तपने के लिए कुछ देर के लिए बैठ जाती है।

कुछ दिनों से अंकिता के हाव-भाव देखकर सिद्धार्थ को यकीन हो गया था कि अंकिता मेरे प्यार को अपना लेगी।

बहती गंगा नदी सुहाना कम ना ज्यादा सर्दी का मौसम रात की रानी के फूलों की खुशबू छत के सन्नाटे में दिवाली का त्यौहार आने की वजह से रुक-रुक कर बम पटाखों की आवाजें आस पड़ोस के घरों पर रंग-बिरंगे बल्बों की बिजली की लड़ियां, ऐसे माहौल में बार-बार सिद्धार्थ अपने प्यार का इजहार अंकिता के सामने करने के लिए बेकरार हो रहा था और जब उसकी बेकरारी ज्यादा बढ़ जाती है, तो सिद्धार्थ बातों ही बातों में साफ शब्दों में अंकिता का हाथ पकड़ कर अपने प्यार का इजहार अंकिता से कर देता है।

अंकिता पहले ही समझ गई थी कि सिद्धार्थ अब उसके सामने अपने दिल का हाल बयान करने वाला है, इसलिए अंकिता ने अपने मन में ऐसा जवाब सोच रखा था कि जिससे कि सिद्धार्थ के दिल को ज्यादा चोट ना पहुंचे।

लेकिन अंकिता के कुछ कहने से पहले ही विक्रम का फोन आ जाता है और विक्रम पति जैसा हक जता कर अंकिता से बोलता है "सिद्धार्थ से ज्यादा चिपकने की जरूरत नहीं है और रात को सिद्धार्थ के घर पर रुकने की भी कोई जरूरत नहीं है, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

विक्रम की लड़खड़ाती जुबान से अंकिता समझ जाती है कि आज फिर विक्रम टेंशन में है, इसलिए वह बियर पीकर मुझे फोन कर रहा है, क्योंकि जब भी उसे थोड़ा बहुत भी टेंशन होता है, तो बहुत ज्यादा बियर पी लेता है, इसलिए अंकिता विक्रम का फोन काटने की बाद अपने मोबाइल को स्विच ऑफ कर देती है।
और सोचती है विक्रम सिद्धार्थ की तुलना की जाए तो सिद्धार्थ हर तरफ से बेहतर है, क्योंकि सिद्धार्थ घरेलू सीधा-साधा लड़का है, कोई नशा भी नहीं करता है और मेरे अलावा कोई भी लड़की उसके जीवन में नहीं है और कोई भी लड़की उसके जीवन में आएगी उसके प्रेम में जान देने से पीछे भी नहीं हटेगा, अच्छी तरह सोच विचार करने के बाद अंकिता सिद्धार्थ को अपना जीवन साथी बनने के लिए उससे कहती है।

तभी उसके कुछ कहने से पहले ही नंदू की बेचैन भटकती आत्मा सिद्धार्थ के शरीर में घुस कर अंकिता से कहती है "तुम मेरी धर्मपत्नी हो इसलिए मैं तुम्हें लेने आया हूं और यह कहकर नंदू की आत्मा अंकिता को सिद्धार्थ के मकान की तीसरी मंजिल की छत से नीचे फेंक देती है।
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