Sathiya - 28 in Hindi Fiction Stories by डॉ. शैलजा श्रीवास्तव books and stories PDF | साथिया - 28

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साथिया - 28

नियति भी जल्दी जल्दी कॉलेज जाने को तैयार हुई और आंगन में आई।

"अभी तो दीवाली आ गई है। छुट्टी न हुई कॉलेज की?" ठाकुर गजेंद्र सिंह बोले।

" बस आज ही लगना है बाबूजी फिर एक हफ्ते की छुट्टी है।" नियति बोली।

" ठीक है।" गजेंद्र सिंह बोले तो नियति निकल गई।

बाकी सौरभ आव्या और निशांत दिवाली की तैयारियों में लगे हुए थे।

पूरे घर में पूरे घर में नया रंग रोगन किया जा रहा था तो वही बड़ी ठाकुराइन दियों को पानी में डुबोकर रख रही थी तकि दिवाली के दिन वह कम तेल सोखें और ज्यादा देर तक जलते रहे।

" बड़ी माँ मैं करती हूं आप कुछ और देख लो।" आव्या बड़ी ठकुराइन के पास बैठ गई और दियों को पानी में डुबोने लगी।

बड़ी ठकुराइन उठकर रसोई घर में चली गई जहां पर आव्या की मम्मी और छोटी ठकुराइन दिवाली के लिए पकवान गुजिया मठरी और लड्डू बना रही थी।

नियति बस में बैठ गई पर उसके दिल की धड़कन बेतहाशा दौड़ रही थी। दिल और दिमाग में अपनी जंग छिड़ी हुई थी और जैसा कि अक्सर होता है प्यार मोहब्बत के मामले में दिल अक्सर ही दिमाग को पीछे छोड़ देता है और इंसान पर उसके दिल की भावनाएं हावी हो जाती है।
ठीक उसी तरीके से नियति के दिल ने दिमाग की सभी दलीलों को पीछे छोड़ते हुए सार्थक से प्रेम को को स्वीकार करने का मन बना लिया था।

उधर घर में निशांत भी सौरभ के साथ घर की साफ सफाई में लगा हुआ था पर दिल और दिमाग नेहा में उलझा हुआ था।

"आज नेहा आ रही है...! इस बार पूरे आठ महीने हो गए हैं जब वह वापस गांव आ रही है। कितना समय बीत गया उसे देखे हुए। इतनी बड़ी और कठिन पढ़ाई कर रही है तो उसे समय तो देना ही होगा।" निशांत ने मन ही मन सोचा।

"बस अब थोड़े से दिन और एक बार नेहा का मेडिकल पूरा हो जाए उसके बाद बाबूजी से कहूंगा उसके घर रिश्ता भेजें। दिल में बसी हुई है मेरे नेहा और हमेशा बसी रहेगी।" निशांत बोला और फिर कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

अलमारी खोली और नेहा का फोटो निकाल अपने सीने से लगा लगा कर आंखें बंद कर ली।

"तुम मेरी हो नेहा सिर्फ मेरी और हमेशा मेरी ही रहोगी। तुम कभी किसी और की नहीं हो सकती। तुम्हें कितना चाहता हूं पता नहीं और यह चाहत जुनून बनती जा रही है और एक तुम हो कि महीनों तक यहां आती नहीं हो।
वेसे तुम्हारी भी कोई गलती नहीं। तुम पढ़ाई कर रही हो इसीलिए मैं भी अभी कुछ नहीं कह रहा हूं। बस एक-दो साल का समय और दे रहा हूं तुम्हें उसके बाद बाबूजी से कहूंगा हमारे रिश्ते के बारे में और फिर तुम्हें हमेशा के लिए अपनी अपनी नजरों में कैद करके अपने पास रख लूंगा।" निशांत बोला और नेहा के फोटो पर अपने होंठ रख आंखें बंद कर ली।

उसे इस समय वो फोटो नही बल्कि नेहा लग रही थी और वह महसूस कर रहा था नेहा के लबो को अपने लबो के बीच।

"यह प्यार इश्क मोहब्बत है या मेरा जुनून ..! जो भी हो पर तुम्हारे लिए दीवानगी बढ़ती ही जा रही है। और जब से तुम शहर गई हो तब से यह दीवानगी अपनी हदें पार करने लगी है। अब तो मुझे उठते जागते हर समय तुम दिखाई देती नेहा । हर लड़की के चेहरे में तुम्हारा चेहरा दिखाई देता है और हर समय तुम्हारी छुअन महसूस होती है। तुम्हें अभी तक छुआ नहीं है मैंने पर फिर भी तुम्हारे स्पर्श को न जाने कितनी बार महसूस कर चुका हूं।

तुम्हारे हाथो का स्पर्श तुम्हारे नाजुक लबो का स्पर्श और तुम्हारे मादक सेक्सी जिश्म का स्पर्श बिना छुए ही महसूस करता हूँ।।बस अब जल्दी से पढ़ाई पूरी करके यहां आ जाओ तो तुम्हें अपनी बाहों के घेरे से कभी बाहर नहीं जाने दूंगा।" निशांत ने खुद से ही कहा और फिर गहरी सांस ले नेहा का फोटो अलमारी में रख दिया और फिर बाहर आकर काम देखने लगा।

सौरभ भी सामान एक तरफ जमा रहा था कि तभी आव्या जाकर उसके पास खड़ी हो गई?

'आज मैं अवतार काका के घर गई थी भैया! " आव्या ने कहा तो सौरभ ने उसकी तरफ देखा।

" माँ ने मिठाई लेकर भेजा था उन्हें देने।" आव्या बोली।

सौरभ ने कोई जवाब नहीं दिया।

" काकी बता रही थी कि आज नेहा दीदी और सांझ दीदी दोनों आ रही है दिवाली की छुट्टी के लिए।" आव्या ने कहा तो सौरभ के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट आ गई और आंखों की चमक बढ़ गई।

"मैंने सोचा कि आपको बता दूं ताकि आप एक बार ही सही सांझ दीदी को देखकर आ जाओ। बाकी उनसे कुछ कहने की ना ही आपकी हिम्मत है और ना ही आपको आपको जरूरत महसूस होती है।" आव्या बोली।

"बिल्कुल ठीक कह रही हो तुम आव्या मुझे अभी कुछ भी कहने की जरूरत महसूस नहीं होती। और हां रही बात हिम्मत की तो हिम्मत जैसी कोई बात नहीं है। बस मैं अभी सांझ को किसी भी प्रॉब्लम में नहीं डालना चाहता। मैं उसे पसंद करता हूं यह बात एक बार अगर बाहर आ गई तो दोनों परिवार मिलकर तुरंत हम दोनों की शादी करा देंगे। पर मैं चाहता हूं कि सांझ पढ़ाई लिखाई करें। अपने पैरों पर खड़ी हो उसके जो जो सपने में वह सारे पूरे हैं। और साथ ही तब तक मैं भी रिपोर्टर बन जाऊंगा। तब बात हो रिश्ते की।" सौरभ बोला।

"आपका प्यार भी बड़ा अजीब है भैया ...! एक तरफ निशांत भैया हैं उनका बस चले तो आज ही नेहा दीदी को लाकर अपने इस घर में कैद कर ले, और दूसरे आप हो! " आव्या बोली।

"प्यार का सही मतलब तुमने अभी समझा नहीं आव्या बच्ची हो तुम..! पर तो मैं तुझे बता रहा हूं प्यार का मतलब कैद करना नही होता बल्कि स्वतंत्र छोड़ना होता है। हासिल करना नहीं होता है, दूसरे को अपने कंट्रोल में रखना नहीं होता है । प्यार का मतलब होता है स्वतंत्रता।

अगर वह आपका होगा तो आपके पास दौड़कर आ जाएगा। प्यार का मतलब होता है सामने वाले को फ्रीडम देना उसे उसके सपने पूरे करने की आजादी देना। और मैं जानता हूं सांझ का सपना है अपने पैरों पर खड़ा होना और मैं उसके सपने के आडे कभी नहीं आऊंगा। मेरा मकसद उसे हासिल करना नहीं है बल्कि उसे खुशियां देना है। वह खुशियां जो सांझ डिजर्व करती है । वह खुशियां जो उसे बचपन से नहीं मिली।
हमने तो देखा है अवतार काका के यहाँ उसकी क्या हैसियत है? उन लोगों ने भले उसे अपने घर में रख लिया पर कभी दिल से अपनाया नही। बस उसके जीवन की वह कमी पूरा करना चाहता हूं ज्यादा की मुझे जरूरत नही।" सौरभ बोला।

" तब तक सांझ दीदी की जिंदगी में कोई और आ गया ? मतलब उन्होंने किसी और को चुन लिया तो? " आव्या ने कहा।

"उन्होंने किसी और को चुन लिया तो मेरी किस्मत पर मेरी तरफ से ना कभी जबरदस्ती हुई है ना कभी जबरदस्ती होगी। क्योंकि मैं जबर्दस्ती के रिश्ते में विश्वास नहीं करता। मैं दिल के एहसास में विश्वास करता हूं अव्या और अगर सांझ के एहसास मेरे एहसासों के साथ जुड़े तो ठीक है वरना सांझ जहां खुश है उसे देख कर मैं भी खुश रह लूंगा।" सौरभ ने धीरे से कहा और फिर अपना काम करने लगा।

"एकदम अलग हो भैया आप। इसीलिए तो मुझे आप से बात करने का मन करता है। जब भी आप से बात करती हूं आप हमेशा मुझे निरुत्तर कर देते हो। हमेशा मुझे एक नई सीख देते हो। आज फिर आपकी बातों ने मुझे एक नई दिशा दी है। थैंक्यू भैया। " आव्या ने सौरभ से कहा।

बदले में सौरभ ने उसके उसके सिर को सहला दिया।

"तुम एक बात हमेशा याद रखना आव्या भले हम इस गांव में पैदा हुए हैं। ऐसे परिवार में पैदा हुए हैं। इस गांव की हरकते और हमारे घर के कई तौर तरीके गलत है पर संसार का नियम है आगे बढ़ना और सही है को चुनना।

और तुम भी कोशिश करना कि तुम सही का साथ दो ।गलत का विरोध करो। हां सही का साथ देने में कई बार ऐसा हो सकता है कि थोड़ी परेशानी खड़ी हो पर ईश्वर सब देखता है आव्या और फिर हमारी अंतरात्मा कभी हमें माफ नहीं करती। अगर हम गलत का साथ देते हैं तो।" सौरभ बोला।

"आप निश्चित रहिए भैया जहां तक मुझसे हो सकेगा मैं कुछ भी गलत काम न करूंगी ना ही गलत का साथ दूंगी और जितना हो सकेगा सही करने की कोशिश करूंगी। इसके लिए अगर थोड़ी बहुत परेशानी भी मुझे झेलनी पड़ी तो मैं झेल लुंगी पर कोशिश पूरी करूंगी।" आव्या बोली तो सौरभ मुस्कुरा उठा
दोनों बहिन भाई ऐसे ही बात करते हुए काम करने लगे।

उधर नियति कॉलेज ऊंची पर उसकी सार्थक के सामने जाने की हिम्मत नहीं थी। उसने छिपकर देखा तो पाया कि सार्थक फुटबॉल ग्राउंड में खड़ा हुआ है।

नियति वापस से अपने क्लास में चली गई।

क्लास के बाद उसने फिर से आकर देखा तो पाया कि सार्थक अब भी फुटबॉल ग्राउंड में खड़ा हुआ है। अच्छी खासी धूप हो गई थी और सार्थक वहां से नहीं हटा था।

नियति लाइब्रेरी चली गई और और 2 घंटे बाद वापस आकर देखा तो पाया सार्थक अब भी ग्राउंड में ही खड़ा हुआ था।

नियति की आंखों में नमी उतर आई और होठों पर मुस्कुराहट।

वह धीमे से फुटबॉल ग्राउंड की तरफ चल दी क्योंकि थोड़ी देर बाद उसके लौटने का समय हो रहा था।

अब तक शाम होने लगी थी और सार्थक ने उम्मीद लगभग छोड़ दी थी उसके चेहरे पर उदासी आ गई थी। कि तभी उसकी नजर सामने से आती नियति पर पड़ी और सार्थक के चेहरे पर वापस से मुस्कुराहट आ गई।

वह तुरंत लंबे कदमों से चलकर नियति के पास आ गया।

"पूरा दिन हो गया तुम्हारा इंतजार करते-करते और तुम अब आई हो..? इतना तड़पाना जरूरी था क्या मुझे? " सार्थक ने कहा तो नियति ने भरी आंखों से उसे देखा और धीमे से सॉरी कहा।

"सॉरी की जरूरत नहीं है...! तुम आ गई बस मुझे सब कुछ मिल गया।" सार्थक ने जल्दी से उसके हाथों को अपने हाथों से थाम के कहा।

"मुझे नहीं पता जिस रास्ते पर मैं जा रही हूं उसका क्या अंजाम होगा? पर मैं खुद को रोक नहीं पाई।" नियति ने कहा।

"जो होगा उसको हम झेल जाएंगे और विश्वास रखो कुछ भी नहीं होगा। मैं हूं ना तुम्हारे साथ कुछ भी गलत नहीं होने दूंगा। थैंक यू सो मच नियति मेरे प्यार को एक्सेप्ट करने के लिए।" सार्थक नहीं कहा तो नियति ने उसकी आंखों में देखा और फिर गर्दन हिला दी।

"मैं बस इसीलिए डर रही थी कि मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें कोई नुकसान हो!" नियति बोली।

"तुम अगर आज नहीं आती तो मेरा न जाने कितना बड़ा नुकसान हो जाता। अब मुझे किसी नुकसान की किसी चीज की परवाह नहीं है।" सार्थक ने कहा और फिर दोनों के चेहरे इस प्रेम प्रस्ताव के स्वीकृति के बाद खिल गए।

जल्दी मिलने का वादा करके नियति अपने गांव निकल गई तो वही सार्थक भी अपने गांव निकल गया।

क्योंकि अब एक हफ्ते की छुट्टियां होने वाली थी तो अब अगली मुलाकात एक हफ्ते बाद ही होनी थी ।

क्रमश:

डॉ. शैलजा श्रीवास्तव