Sathiya - 60 in Hindi Fiction Stories by डॉ. शैलजा श्रीवास्तव books and stories PDF | साथिया - 60

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साथिया - 60

एक घंटे बाद निशि थोड़ी फ्री हुई तो उसने काफी मंगाई।

तब तक सौरभ भी आ गया था।

आते ही उसने निशि को गले लगाया और फिर उसके सामने वाली चेयर पर बैठ गया।

"तो कैसी चल रही है तुम्हारी मीडिया और रिकॉर्डिंग? " निशि ने कहा।

"सब बढ़िया चल रहा है...! सच्चाई की तह तक जाने की कोशिश करता हूं और लोगों को न्याय दिलाने की भी। शायद इसी से मेरे पाप कुछ धूल जाए।" सौरभ बोला।

" तुम बार-बार ऐसी बातें क्यों करते हो? तुमने कोई पाप नहीं किया है और ना ही तुम्हारी कोई गलती है । पापी तो तुम्हारे ताऊजी और उनका परिवार है और साथ ही साथ तुम्हारा पूरा गांव और तुम्हारा भाई।" निशि ने सौरभ के कंधे पर हाथ रखकर कहा।

"पर पाप होते हुए भी उसे ना रोकना भी तो एक पाप होता है..!! नियति के साथ गलत हुआ तब भी मैं कुछ नहीं कर पाया और फिर साँझ के साथ जब वह दुर्घटना हुई तब भी मैं कुछ नहीं कर पाया। इस बात का अफसोस मुझे हमेशा रहेगा और बस अब यही कोशिश करता हूं कि जब तक जितना हो सके सच्चाई की तह तक जाऊं जिससे कि लोगों को न्याय मिल सके।" सौरभ बोला।

" सबको न्याय दिला रहे हो इसलिए अपने में पर कोई बोझ मत रखो।" निशि बोली।

" सबको न्याय दिला रहा हूं पर आज भी ऐसा लगता है जैसे नियति की आत्मा बेचैन है।जैसे कि सांझ मुझसे कह रही हो कि उसे न्याय क्यों नहीं मिला? काश के कहीं से कुछ ऐसा हो जाए कि मैं नियति और सांझ को न्याय दिला सकूं पर मैं क्या करूं? नियति और सांझ दोनों ही इस दुनिया में नहीं और उनके पक्ष में न कोई केस करने वाला है और गवाही देने वाला भी कोई नहीं है। मैं कैसे न्याय दिलाऊँ उन लोगों को।" सौरभ दुखी होकर बोला।


"हिम्मत रखो सब सही होगा..!" निशि ने कहा और उसके हाथ में काफी मग पकड़ा दिया।

सौरभ ने कॉफी पी और थोड़ा रिलैक्स हुआ।

"अच्छा सुनो पापा ने कहा है कि एक दिन अंकल आंटी को लेकर घर आ जाओ हमारी शादी की डेट फाइनल करना चाहते हैं..!" निशि बोली।

"यह तो बहुत अच्छी बात है..!" मैं मम्मी पापा को बोलता हूं और जितना जल्दी हो सकता है आने की कोशिश करता हूं। आखिर तुम मेरी वाइफ बनकर मेरी लाइफ में आ जाओ इससे बड़ी खुशी की बात तो कोई हो ही नहीं सकती।" सौरभ मुस्कुरा कर बोला तो निशि के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई।

"तुम ना ऐसे ही खुश रहा करो ...!! ऐसे खुश रहते हो तो अच्छे लगते हो वरना बहुत ही खड़ूस से लगते हो।" निशि बोली।

"यह खुशी भी तुमने दी है वरना मैं तो मुस्कुराना ही भूल गया था..! उस दिन कितनी मुश्किल से जान बचाकर मैं और पापा आव्या और मम्मी को लेकर गांव से निकले थे क्योंकि गांव वाले हमारे भी दुश्मन बन गए थे पापा के उनके खिलाफ जाने के कारण। कितनी चोटें भी आई थी हमारे परिवार को तब हम तुम्हारे पास ही आए थे और उस दिन एक डॉक्टर और पेशेंट का रिश्ता तो बना ही था हम लोगों के बीच में साथ ही साथ कुछ और रिश्ता भी बना और जो धीरे-धीरे मजबूत होता चला गया।"'सौरभ ने कहा।

" और ऐसे ही मजबूत होता जाएगा, डोंट वरी बस तुम घर आ जाना इससे पहले की पापा मुझे दोबारा कहें और फिर उन्हें लगे कि मैं भी नील भैया की तरह लापरवाही करती हूं।" निशि ने कहा तो सौरभ मुस्करा उठा।

"तुम लोग हर समय नील भैया को इस तरीके से क्यों लेते हो? होते हैं कुछ लोग नहीं कह पाते बात सीधा तो इसका मतलब यह थोड़ी ना है कि वो लापरवाह है।" सौरभ बोला।

" भैया लापरवाह नहीं है। पर कई बार अपनी बात ना कहने के कारण बहुत बड़ा नुकसान कर लेते हैं और मुझे ऐसा लगता है कि अपनी बात ना कहने के कारण नील भैया काफी कुछ खो चुके हैं। बस वह आगे कुछ ना खोये। " निशि बोली।

"चलो तुम टेंशन मत लो सब सही होगा...! मैं निकलता हूं मुझे थोड़ा काम है।" सौरभ बोला।

" ठीक है चलो मिलते हैं जल्दी ध्यान रखना अपना।" निशि ने उसे साइड हग करके कहा तो सौरभ उसकी क्लीनिक से बाहर निकल गया और निशि वापस से पेशेंट देखने में बिजी हो गई।

सौरभ वहां से फ्री होकर अपने घर आया।

उस समय सब लोग हाल में ही बैठे हुए थे।

सौरभ यहां पर अच्छे से सेटल हो चुका था। उसकी मीडिया में अच्छी पहचान हो चुकी थी और एक बहुत अच्छे रिपोर्टर के रूप में सब उसे जानते थे। यहां पर उसने अपना एक फ्लैट ले लिया था जहां पर उसकी मम्मी पापा और आव्या के साथ वह रहता था।

इसके अलावा उनकी कुछ गांव की जमीनें भी थी जो कि यहां आने के कुछ समय बाद सुरेंद्र ने बेच दी ताकि यहां का इंतजाम ठीक कर सके, क्योंकि अब वापस गांव वह नहीं जाना चाहते थे। हालांकि उन्हें उतनी कीमत नहीं मिली जितनी कि उनकी जमीन थी क्योंकि गांव वाले और खासकर उनके बड़े भाई गजेंद्र और उनका बेटा निशांत उनसे पहले से ही बेहद नाराज थे। पर फिर भी जितना मिला सुरेंद्र ने उतने में ही तसल्ली कर ली थी। बाकी उन्हें इस बात की खुशी थी कि आखिर अब उनके बच्चे और उनका परिवार उन पुरानी मान्यताओं और बिना मतलब के नियम कानून से आजाद थे।


"भैया चाय पियोगे आप? मैं सबके लिए चाय बना रही हूं।" आव्या ने सौरभ को देखते हुए कहा।

"हां बना ले मेरे लिए भी अदरक वाली चाय।" सौरभ ने कहा तो आव्या किचन की तरफ बढ़ गई।

सौरभ वही अपने मम्मी पापा के पास बैठ गया।

"पापा मम्मी आप लोगों से कुछ जरूरी बात करनी थी!" सौरभ ने कहा।

"हां बेटा बोलो ना..!" सुरेंद्र बोले।


"आज मैं निशि से मिलने गया था..!! उसने मुझे मिलने बुलाया था। उसके पापा चाहते हैं कि आप लोग उनके घर जाओ किसी दिन और शादी की तारीख देखकर तय कर लो और बाकी आप लोग क्या सोचते हो? " सौरभ ने कहा,

"यह तो बड़ी खुशी की बात है...! हम तो खुद ही तुमसे कहने वाले थे कि अब तुम दोनों अपनी जिंदगी में अच्छे से सेटल हो गए हो तो रिश्ते के बारे में भी सोचो। ठीक है हम जल्दी ही उनके घर जाते हैं।" सुरेंद्र बोले।

" ठीक कह रहे है तुम्हारे पापा।" सौरभ की मम्मी बोली।

"बाकी और सब लोग ठीक हैं वहां..?" सुरेंद्र ने कहा।

"जी पापा सब ठीक है ठीक बस मुझे बुरा लगता है तो अक्षत के लिए। हालांकि मेरी उनसे इतनी अच्छी दोस्ती या जान पहचान नहीं है। पर निशि अक्सर उनके बारे में बताती रहती है। मुझे बहुत अफसोस होता है इस बात का कि मैं सांझ के लिए कुछ नहीं कर पाया। उस घटना मे सांझ की जिंदगी तो गई ही गई साथ ही अक्षत की जिंदगी भी जैसे उसी दिन पर रुक गई है जिस दिन सांझ इस दुनिया से गई थी।" सौरभ बोले तो सुरेंद्र के चेहरे पर अजीब से भाव आये।

"और सबसे बड़ी बात है कि वह यह बात मानने को तैयार नहीं है कि सांझ इस दुनिया में नहीं है। अगर एक बार अक्षत इस बात को एक्सेप्ट कर ले कि अब सांझ इस दुनिया में नहीं है और वह कभी वापस नहीं आएगी तो शायद वह सच को भुलाकर आगे बढ़ सके। पर जब तक वह यह बात नहीं मानते तब तक कुछ भी पॉसिबल नहीं है और उनकी जिंदगी भी इसी तरीके से अधूरी सी रुकी हुई है।" सौरभ बोला।



"अगर उसका दिल नहीं मान रहा की सांझ इस दुनियाँ में नहीं है तो तुम सब क्यों उसके पीछे पड़े हो यह बात मनवाने के लिए? हो सकता है उसके उसकी अंतरात्मा से ऐसा महसूस होता हो कि सांझ है और शायद उसके पास वापस आ जाएगी।" सुरेंद्र ने कुछ सोचते हुए कहा।

"कैसी बातें कर रहे हैं पापा हर कोई जानता है कि अब सांझ इस दुनिया में नहीं है और वह कभी वापस नहीं आएगी ..!! फिर कैसे वापस आ जाएगी?" सौरभ बोला।

" सांझ की लाश नहीं मिली इस बात को हम लोग इग्नोर नहीं कर सकते..!" सुरेंद्र इरिटेट होकर बोले।

"पर पापा लाश मिलेगी भी तो कैसे मिलेगी? भले लाश नहीं मिली पर हम सब जानते हैं कि उस नदी से कोई भी इंसान आज तक बचकर बाहर नहीं आया, और फिर उस समय तो नदी का बहाव भी तेज था क्योंकि बरसात हुई थी फिर कैसे आ जाएगी सांझ वापस..?? उसकी बॉडी भी न जाने कहां बह गई होगी ? या शायद नदी में रहने वाले मछलियों और मगरमच्छों ने खा लिया होगा। अब कहां से आएगी और कहां से उसकी बॉडी मिलती किसी को। अब हमको इस बात को एक्सेप्ट करना ही होगा कि सांझ नही है।" सौरभ ने कहा।


सुरेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

"ठीक है जब तुम कहोगे तब हम वर्मा जी के घर चले चलेंगे ..!" सुरेंद्र बोले और उठकर अपने कमरे में चले गए।

" मुझे शायद वक्त तुम और अक्षत कभी माफ नही कर पाओगे क्योंकि एक बहुत बड़ा राज छिपाया है मैंने..!" सुरेंद्र खुद से बोले फिर दरवाजा बंद कर लिया और अपना फोन उठाकर किसी को कॉल लगा दिया।

"हेलो...!" सामने से आवाज आई।

"कैसी है अब बच्ची? " सुरेंद्र ने कहा।


"धीमे-धीमे ठीक हो रही है...!; जिंदगी की तरफ वापस लौट रही है पर नॉर्मल हो पाएगी या नही कुछ कह नहीं सकते।" सामने वाला बोला।


" जरूर होगी नॉर्मल भी। एक बार यहाँ वापस आयेगी तो नॉर्मल हो जायेगी।" सुरेंद्र ने कहा


" पता नही आना चाहेगी भी कि नही ? वैसे आपका बहुत-बहुत शुक्रिया जो आपने उसकी मदद की।" सामने से आवाज आई

"मेरे लिए मेरी आव्या की जैसी ही है आपकी बेटी और जो मुझे बन पड़ा वह मैंने किया। और आपके कहने पर आज तक यह राज मेरे सीने में दफन है और हमेशा रहेगा। जब तक आप नहीं चाहेंगे तब तक सच्चाई किसी के सामने नहीं आएगी।" सुरेंद्र बोले।

"आपका बहुत-बहुत शुक्रिया...!!" सामने वाला बोला और कोल कट कर दिया।


"आज नहीं तो कल वह वापस यहां जरूर आएगी क्योंकि जो तड़प एक इंसान के दिल में है वही तड़प दूसरे के दिल में भी जरूर होगी...! कुछ कड़वी यादें और बुरे अनुभव हमे कुछ समय के लिए कमजोर कर सकते है पर सच्चे प्यार की तड़प उसे वापस लेकर आयेगी।

एक यहाँ तड़प रहा है तो दूसरा भि तड़प रहा होगा और यही तड़प दोनों को फिर से करीब लायेगी जानता हूँ मैं।" सुरेंद्र ने गहरी सांस ली।


क्रमश:

डॉ. शैलजा श्रीवास्तव